अन्धकार की बातें करते बीत गए यूं साल भतेरे

लेखक: अरुण तिवारी

अन्धकार की बातें करते 
बीत गए यूं साल भतेरे।
तुमने जाने क्या सोचा है
मैंने तो बस यह सोचा है
एहसासों की दुनिया में मैं 
अब कदम रखूंगा धीरे-धीरे।
नई कहानी कुछ लिख दूंगा
कुछ लिखूंगा पानी-सानी 
राहगीर बन कुछ लिख दूंगा
इस जमीर पर नई दीवानी। 
कोई जाने या न माने
नहीं रखूंगा कलम पैताने 
अन्धकार की बातें करते बीत गए…

धरती का बज गया अलार्म
नदिया-नाते टें बोल रहे
टें बोल उठी गौरैया।
वोट-नोट में लिपटे रहकर
एक गया औ दूजा आया
प्रश्न खड़ा है अभी अनुत्तरित 
लोक कहां है, तंत्र कहां है,
खोज लाये वो जंत्र कहां हैं।
बातें खाना-बातें पीना 
धन- यश की खातिर बस जीना
आखिर इसकी भी तो हद हो
रिश्तों में कुछ तो मन रस हो
कैसे रखूं मैं कलम पैताने
अन्धकार की बातें करते बीत गए ….

ऐसे प्यारे नहीं चलेगा
नहीं चलेगी सीनाजोरी
नहीं चलेगी देखा-देखी
नहीं चलेगी हरम तिजोरी।
जाने मुट्ठी कब बंधेगी 
जाने नजरें कब सधेंगी 
जाने कब धरा ध्वजा पर
मेरा मस्तक उठ जायेगा
जाने कब लोक भेष ले 
ध्वजा प्रहरी बन जायेगा। 
जाने-जानम के चक्कर में
प्रश्न रहे जो प्रश्न थे मेरे 
संकल्पों में वक्त लगेगा 
पर नहीं रखूंगा कलम पैताने,
अंधकार की बातें करते बीत गए… 

तुमने भी कुछ सोचा होगा
तुम भी रुस्तम छिपे घनेरे
अपनी खातिर नहीं सही पर
मेरी खातिर ही बतलाओ 
मेरी खातिर खुद को जानो
खुद की ताक़त को पहचानो
मर्म नहीं पर धर्म को जानो। 
सच कहता हूं एक बार जो धम्म बोलोगे 
शांति-प्रीत के रस घोलोगे 
एक बार जो उठा फावड़ा
हर किसान का सच बोलोगे।
बस, एक बार जो निकल पड़े तुम
पगडंडी पर लोकतंत्र की 
दंड ध्वजा का तुम्ही बनोगे
साथ तुम्हारे कलम मिलेगी
संकल्पों की राह चलेगी
नहीं रखूंगा इसे पैताने 
अंधकार की बातें करते बीत गए…

पर ये बातों से न होगा
शोणित लहू की चाह नहीं है
नहीं चाहिए बही खजाना।
कुछ फटे हुए दिलों को सीना
कुछ चली हुई हरकत को पीना  
कुछ आंखों में खुशियों खातिर
कुछ आंखों में तरल वेदना 
कुछ माटी में अथक पसीना।
कुछ बूंदे गर दे जाओगे 
जीना सचमुच हो जायेगा
एक सुन्दर सार्थक जीना 
क्या तुम ये करना चाहोगे ?
मुबारक कह पाओगेे ?
एहसासों से भर पाओगे ?
मैंने तो बस सोच लिया है
नहीं रखूंगा कलम पैताने
अंधकार की बातें करते बीत गए…

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अरुण तिवारी
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