मैं गंगा तुमसे पूछ रही..

लेखक :  अरुण तिवारी

राष्ट्र को कहते भारत मां, 
मुझे कहते तुम मां गंगा,
वे भी सपूत, ये भी सपूत,
वे भारत मां पर कुर्बान हुए,
ये मुझ गंगा पर बलिदान हुए,
उन पर आघात हुआ भारी,
इन के घाती खुद घर-बारी,

उन को वंदन, उन पर क्रंदन,
बदला-बदले की आवाज़ें,
शत्-शत् करती मैं उन्हे नमन्,
पर इन पर चुप्पी कितनी जायज़,
खुद से पूछो, खुद ही जानो,
खुद का करतब पहचानो,
मैं गंगा तुम से पूछ रहीं…

मैं गंगा भारत की मन औ प्राण,
मैं गंगा अंतिम तन पवित्र बूंद,
मैं गंगा भारत को सेती हूं,
मैं गंगा आत्मन को खेती हूं,


ऐसी गंगा पर बलि गए हैं जो,
निगमानंद, सानंद, नागनाथ,
इन के घाती हैं व्यापारी, कुछ घाटों के, कुछ रिवर फ्रंट,
कुछ बिजली, कुछ जल-मारग के,
कुछ रेती-जंगल काट-काट,
कुछ मल-जल का व्यापार करें,
कुछ मन में मलीनता पोत-पोत,
उजरे कपरे में साज रहे,
कहने को नेता बाज रहे,

इन पर चुप्पी कितनी जायज़, 
खुद से पूछो, खुद ही जानो,
खुद का करतब पहचानो,

मैं गंगा तुम से पूछ रहीं…

मरने पर बोलयं वाह! वाह!
जीते दे रहे हैं दाह ! दाह !!
इनका भी कोई उपचार करो,
इनसे भी हाथ दो-चार करो,
इनकी मति पर कुछ धार धरो,
सत्तानशाीं का भ्रम पार करो,
तब जानूं मैं बेटा-बेटी,


वरना् कैसा कुम्भ, मैं कैसी माता,
कोरी बातें, कोरा नाता,
सिर्फ मुखौटा झूठा-सांचा,
झूठ हुआ भगीरथ का बांचा,
क्या कहती कुछ मैं नाजायज़,
इन पर चुप्पी कितनी जायज़, 
खुद से पूछो, खुद ही जानो,
खुद का करतब पहचानो,
मैं गंगा तुम से पूछ रहीं…