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अनुपम मिश्र

आज का लेख, पानी लेख, समय विशेष

द्वितीय अनुपम व्याख्यान (22 दिसम्बर, 2018) : एक रिपोर्ट

मैं, जैसलमेर ज़िले के रामगढ़ के पास…पिता का नाम कर्ण सिंह…” नपे-तुले शब्द, किंतु पूरी तरह सहज और सरल। अपने पूर्वजों के नाम बताने शुरु किए तो इतनी पीढ़ियां और इतने पेशे गिना गए कि एक ऐसा सामाजिक विन्यास प्रस्तुत हो गया, जिसमें पेशागत् भेदभाव की कोई गुंजाइश ही न थी।……….बचपन में पढ़ा था कि ऊंट एक सप्ताह तक पानी नहीं पिता था। बकरी 100 दिन तक बिना पानी पीये रह सकती है। मैने सोचा, यह कैसे संभव है ? ——–जो नहीं जोतते, वे भी आज अपनी ज़मीन को समाज की ज़मीन मानते हैं। इस उदारता को समझता हूं तो कई पृष्ठ खुलते हैं।

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आज का लेख, समय विशेष

द्वितीय अनुपम स्मृति (19 दिसम्बर, 2018) : एक रिपोर्ट

नदी, पानी और जीवन के नैतिकता पहलुओं पर छाई वर्तमान छंई को देखते हुए कह सकते हैं कि धुआ मिश्रित इस धुंध के बीच यदि सवेरा लाना है तो हमें अनुपम साहित्य और उनके जीवन के कथा-चित्रों को खंगालना ही पडे़गा।

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