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मैं देवदार का घना जंगल

लेखक: अरुण तिवारी मैं देवदार का घना जंगल,गंगोत्री के द्वार ठाड़ा,शिवजटा सा गुंथा निर्मलगंग की इक धार देकर,धरा को श्रृंगार देकर,जय बोलता उत्तरांचल की,चाहता सबका मैं मंगल,मैं देवदार का घना जंगल… बहुत लंबा और ऊंचा,हिमाद्रि से बहुत नीचा,हरीतिमा पुचकार बनकर,खींचता हूं नीलिमा को,मैं धरा के बहुत नीचे, सींचता हूं खेत को…

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