अरुण तिवारी
011-22043335 / 9868793799
[email protected]
———————————————————————————————————————

30 नवंबर से 11 दिसम्बर, 2015 तक पेरिस में जलवायु शिखर सम्मेलन विश्व पर्यावरण संधि होनी है। इस पर पूरी दुनिया की निगाह है; स्वयं जलवायु की भी। जलवायु परिवर्तन पर शिखर संवाद को सिर्फ मौसम नहीं, जीवन बचाने की कवायद के तौर पर लेना चाहिए।  जीवन बचाने के लिए किसी की प्रतीक्षा नहीं कि जाती। सुखद है कि जलवायु शिखर सम्मेलन की तैयारी बैठकों में भारतीय प्रधानमंत्री ने किसी की प्रतीक्षा नहीं की। जलवायु परिवर्तन समस्या के समाधान में भारत की ओर से स्वैच्छिक तौर पर तीन जवाब पेश कर दिए: कार्बन उत्सर्जन घटायेंगे; अक्षय ऊर्जा उत्पादन बढ़ायेगे; कार्बन को अवशोषित करने वाली अवशोषण प्रणालियों को बढ़ाते चले जायेंगे। इस लेख में हम तीसरे कदम, यानी कार्बन अवशोषण की सम्भावनाओं और वर्तमान सामाजिक-शासकीय व्यवहार पर चर्चा करेंगे।

कार्बन अवशोषण प्रणाली की चिंता करें

भारत की घोषणा

गौर कीजिए कि भारत, प्रति वर्ष 54 मीट्रिक टन कार्बन डाई आॅक्साइड उत्सर्जित करता है। अब भारत सरकार ने कार्बन उत्सर्जन की मात्रा में 33 से 35 प्रतिशत घटोत्तरी का लक्ष्य रखा है। भारत, वर्ष 2020 तक ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में 20 से 25 फीसदी कमी लायेगा। दूसरे महत्वपूर्ण कदम के तौर पर भारत, अक्षय ऊर्जा उत्पादन में 40 फीसदी बढ़ोत्तरी करेगा। तीसरे कदम के तौर पर भारत ने 2030 तक 2.5 से तीन अरब टन कार्बन डाई आॅक्साइड अवशोषित करने का भी लक्ष्य रखा है। भारत, इस कार्य को अंजाम देने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक कोष का गठन करेगा। 
भारत ने यह घोषणा, युनाइटेड नेशन्स फे्रमवर्क कन्वेंशन आॅन क्लाईमेट चेंज (यू एन एफ सी सी ) के समक्ष की है। भारत ने इस घोषणा को इंटेडेंट नेशनली डिटरमांइड कन्ट्रीब्युशन (आई एन डी सी)  का नाम दिया है। 30 नवंबर से 11 दिसम्बर, 2015 पेरिस में चलने वाले जलवायु सम्मेलन विश्व पर्यावरण संधि होनी है। उसकी दृष्टि से इस घोषणा का विशेष महत्व है। घोषणा के लिए प्रधानमंत्री ने गांधी जयंती, 2015 का दिन चुना। यह संयोग हो, तो भी सुखद है। पहले दो प्रस्तावों पर मीडिया में काफी चर्चा हो चुकी है, लिहाजा इस लेख में हम तीसरे कदम, यानी कार्बन अवशोषण की सम्भावनाओं और वर्तमान सामाजिक-शासकीय व्यवहार पर चर्चा करेंगे। 

कार्बन अवशोषण और नदी जोङ

मूंगा भित्तियां, कार्बन अवशोषण की प्राकृतिक प्रणाली है। इनका स्थान, समुद्र में है। समुद्रों का तापमान बढ़ने से मूंगा भित्तियों का बङा क्षेत्रफल तेजी के साथ नष्ट हो रहा है। समुद्र का तापमान कैसे कम हो ? इसे कम करने का काम, नदियों से आने वाले मीठे और शीतल जल का है। किंतु नदियां तो हम सुखा रहे हैं। नदियों से बहकर आने वाले पानी को बांधों, बैराजों, नहरों में रोककर हम घटा रहे हैं। बीते 18 नवंबर को जलसंसाधन मंत्रालय की हुई बैठक के बाद अगले दिन आई खबरों में मंत्रालय ने नदी जोङ परियोजना के लिए राज्यो से सहयोग मांगा है और बिहार में इसे प्राथमिकता के तौर पर किए जाने की बात कही है। कहा जा रहा है कि इससे पूरे भारत के पानी की समस्या का हल हो जायेगा। 
आखिर कोई विषय विशेषज्ञ यह कैसे भूल सकता है कि नदी जोङ परियोजना के जरिए हम समुद्री जल में नदी के मीठे पानी की मात्रा घटा देंगे। इससे समुद्र का खारापन बढ़ेगा और पहले से तेजी से बंजर हो रहे भारत में खारी-बंजर ज़मीन के आंकङे बढ़ जायेंगे। समुद्र किनारे के इलाकों में पेयजल का संकट बढ़ेगा। दूसरी ओर नदी के पानी का एक काम समुद्र के तापमान को भी नियंत्रित करना है। नदी जोङ परियोजना को ज़मीन पर उतारकर हम नदी के इस काम में अवरोध उत्पन्न करेंगे। जरा सोचिए, समुद्र का तापमान नियंत्रित नहीं होगा, तो क्या होगा ? मूंगा भित्तियां कितनी  बचेंगी ? हमारे मानसून का क्या होगा ? अलनीनो और लानीनो क्या खेल रच जायेंगे ? हमारी नदियों में लगातार पानी घट रहा है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, गंगा को प्रवाह देने वाली धाराओं में करीब 106 धारायें सूख गई हैं। सिक्किम ने वापसी जरूर की है, किंतु पूरे भारत में झरने सूखने की राह पर तेजी से बढ़ चुके हैं। हिमालयी क्षेत्र, इसका सबसे बङा शिकार है। जब झरने नहीं बच रहे, तो खेती कैसे बचेगी ?
नदी जोङ परियोजना की वकालत का एक आधार, बिहार जैसे कुछ इलाकों को बाढ़ क्षेत्र मानना है। इस पर सवाल उचित होगा। हम भूल रहे हैं कि बदलता परिदृश्य ऐसा है कि कब कौन से इलाका बाढ़ क्षेत्र बनेगा और कौन सा सूखा क्षेत्र ? कहना मुश्किल हो गया है। हर साल, बाढ़ और सुखाङ के नये इलाके बन रहे हैं। राजस्थान, कश्मीर में भी बाढ़ के संदर्भों से आप परिचित ही हैं। यह मौसमी-मानसूनी अस्थिता तथा भौगोलिक बदलाव का कालखण्ड है। इसके मद्देनजर, अब आप ही तय कर लीजिए कि नदी जोङ परियोजना, जलवायु परिवर्तन, तापमान वृद्धि और भारत के भूगोल, खेती व रोजगार को संजोने में कितनी सहायक अथवा विरोधी ? जलवायु परिवर्तन के मसले पर एक ओर भारत के नेतृत्वकारी भूमिका में आने की खबरें और दूसरी ओर गैर समग्रता से सोचे किए जा रहे ये कृत्य ??  

बंजर होता भारत

गौर कीजिए कि पिछले कुछ सालों में भारत की 90 लाख, 45 हजार हेक्टेयर जमीन बंजर हो चुकी है। केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान ’काज़री’ का आंकङा है कि रेगिस्तान से उङे रेत कणों के कारण, भारत प्रतिवर्ष 50 वर्गमील खेती योग्य भूमि की उर्वरता खो रहा है। रेत कणों की यह आंधी हिमालय तक पहुंच रही है। ऐसा, आई आई टी, कानपुर की रिपोर्ट है। आई आई टी कानपुर के शोध मे पता चला है कि थार की रेतीली आंधियां, हिमालय से टकराकर कर उसे भी प्रभावित कर रही है । भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ’इसरो’ के अनुसार, थार रेगिस्तान पिछले 50 सालों में औसतन आठ किलोमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से बढ़ रहा है। अन्य इलाकों की तुलना में, रेगिस्तानी इलाकों के वायुमंडल में कार्बन की अधिक मात्रा की उपस्थिति बताती है कि खनन और अरावली से अन्याय के अलावा, यह वैश्विक तापमान वृद्धि का भी असर है। रेगिस्तान के इलाकों में अधिक वनस्पति की हरी चादर फैलाकर इसे ढक लें। खनन पर लगाम लगायें और अरावली से अन्याय करना बंद कर दें। राजस्थान से निकलकर, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में पैर फैला चुके थार रेगिस्तान में तो यह करना ही होगा। यह प्रक्रिया अभी और इलाकों में भी बढेगी। शोध निष्कर्ष यह भी है कि भारत के जिन 32 फीसदी भू-भागों की उर्वरा शक्ति लगातार क्षीण हो रही है, उनमें से 24 फीसदी इलाके, थार क्षेत्र के आसपास के हैं। इसमें तापमान वृ़िद्ध के अलावा, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और तेजी से नीचे गिरते भूजल स्तर का भी योगदान है। समझ सकते हैं कि रासायनिक उर्वरक, भूजल, रेत व बंजर का ग्लेशियर व वैश्विक तापमान में वृद्धि से क्या संबंध हैं। 
इन स्थितियों में क्या हमें प्रकृति केन्द्रित ऐसी गतिविधियों को प्राथमिकता पर नहीं रखना चाहिए, जिनसे कार्बन अवशोषित करने व तापमान घटाने में भी सहयोग हो ? क्या रासायनिक उर्वरक का उपयोग घटाते जाने तथा जैविक खाद का उपयोग बढ़ाते जाने से मिट्टी की नमी बरकरार रख सकते हैं ? क्या भारत की हरीतिमा में वृद्धि करते जाने से लाभ होगा ? उचित रास्ता क्या है ? 

हरीतिमा का कोई विकल्प नहीं

गौर कीजिए कि हरीतिमा बढ़ाने का कोई विकल्प नहीं है और पानी संजोये बिना यह संभव नहीं है। यह करना ही होगा। ऐसे उपायों से तापमान वृद्धि रोकने में भी मदद होगी और अपनी जीवन रक्षा में भी। बांधों, बैराजों में ठहरे पानी से मीथेन जैसी हानिकारक गैसों की उत्पत्ति होती है। तालाबों के जल पर जलकुंभी के कब्जे से भी यही होता है। हम नदी में ठहरे पानी को चला दें। जलकुंभी से तालाबों के जल को मुक्ति दिला दें। वर्षाजल संचयन बढ़ाकर, भूजल भंडार बढ़ा दें। इससे नदियों में भी पानी बढ़ेगा। परिणामस्वरूप, समुद्र का ताप और  खारापन दोनो कम होगा। जीवन की नर्सरी यानी मूंगा भित्तियों की रक्षा होगी और अंततः पृथ्वी पर जीवन की। क्या हम करेंगे ?

………………………………………………………………………………………………………………………………..