लेखक: अरुण तिवारी

एक दिन मेरे गांव  
पाकुङ में भी आया विकास
साथ लाया एक लंबी
काली-सर्पीली सङक खास,
जो बांट गई पानी
पाट गई पोखर
लील गई खेत
बना गई हमें कामचोर।
फिर आये कतार दर कतार
ट्रक ही ट्रक 
सिखा गये बेईमानी
बना गये 
कोयला ढोर।
अब हर रोज रहता है
मुझे इनका इंतजार
मैं इन्हे रोक लूट लेता हूं
थोङा थोङा कोयला
ओढ़ लेता हूं
ढेर सारी कालिख।
जानता हूं
यह चोरी है
इनसे लगता है दामन पर दाग
इसीलिए भाग रहा हूं
देखकर कैमरा
ताकि न खींचे कोई तसवीर।
मैं नहीं बनना चाहता 
चोर या ढोर
पर जमीन बंजर है
धरती बेपानी
और जेब खाली
कोई बताये 
मैं कहां जाऊं ?
क्या करुं ??

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