लेखक: अरुण तिवारी
भू-सांस्कृतिक आधार पर समृद्धि की अलग योजना बननी ही चाहिए। भला इस बात से किसे विरोध हो सकता है ? किंतु अलग भूसांस्कृतिक आधार पर अलग राज्य बनाने के नये अनुभव अच्छे नहीं है। नवगठित राज्यों में प्राकृतिक संसाधनों की होे रही लूट से सभी वाकिफ हैं। नया राज्य बनने के बाद झारखण्ड में खनन ही खनन है। खनन की खनक से ही छत्तीसगढ. का बिलासपुर देश का सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला जिला हो गया है। उत्तराखण्ड ऊर्जाखण्ड बनने पर उतारू है। इसी जिद् में अपने जंगल-पहाङ-नदियां सुखा रहा है और उत्तर भारत का पर्यावरण भी। यह आकलन दिलचस्प है कि प्रकृति वहीं बची रही, जहां विकास की नई परिभाषा नहीं पहुंची। जहां आदिवासी, बागी और नकस्लवाद जिंदा रहे, वहां प्रकृति भी जिंदा रही। किंतु नये दौर का नकस्लवाद तो कुछ और ही कथानक कह रहा है अैर बुदेलखण्ड में बागी ही बहुत पहले से बाग काटने की ठेकेदार रहे हैं। चिंता इस बात की है कि राज्य बने बगैर ही बुंदेलखण्ड में नई लूट का जो नया दौर आया है, उससे पर्यावरण और विकास की कुछ नई चुनौतियां खङी हो गई हैं। चूँकि जलवायु परिवर्तन के जिस वैश्विक खतरे से निपटने के लिए मिशन, प्रोजेक्ट और जाने क्या-क्या बनाकर केन्द्र सरकार अरबों खर्च करने की तैयारी कर रही है; प्राकृतिक समृद्धि के ऐसे टापू ही उस खतरे से दुनिया को बचा सकते हैं। अतः 29,718 वर्ग किमी. वाले इस बुलंद बुंदेला टापू को नैसर्गिक रूप में संजोकर रखना जरूरी है। इन चुनौतियां पर चिंतन इसलिए भी जरूरी है; चूंकि आई पी एस अधिकारी नरेन्द्र ने इन्ही चुनौतियांें को चुनौती देने की कोशिश की थी। उन्हे मौत दे दी गई।

 वर्ष 2003.से 2006 के मध्य बुंदेलखण्ड में हुई आत्महत्याओं तथा पलायन का शोर पूरी दुनिया में कुछ इस कदर मचा कि वह यमराज को घर के पता चलने जैसा ही साबित हो रहा है। हुआ यूं कि इलाके के कष्ट व लाचारी देखने के नाम पर बुद्धिजीवियों की जो भीड. यहां आई, उसने यहां की बेशकीमती प्रकृति का पता दुनिया के बाजार को बता दिया। रासायनिक प्रदूषण से मुक्त सस्ती जमीन और विशुद्ध देसी नस्ल के मवेशियों की खबर सुनकर यहां बकरी फार्म भी आ रहे हैं, औषाघि फार्म भी और कचरा फैलाने वाले उद्योग भी। वन व खनिज संपदा के लुटेरे यहां पहले से थे ही। केन-बेतवा नदी जोङ से आने वाली बर्बादी व अशांति की धमक भी यहां सुनाई दे ही रही है। कुल मिलाकर जमीन हङपो अभियान वालों की निगाहें  यहां गढ. गई हैं और उन्हे मदद करने काली सडक और रेल की पटरियां पहुंचने लगी है। 
इसी बीच बडे. पैकेज का एक रेला भी यहां आ गया है। साथ में आये हैं भ्रष्ट आचार का अनेक मौके। इसी पैसे से जल संचयन के ढंाचे कुछ इस तरह बनाये जा रहे हैं कि उनमें पानी तो नहीं रुक रहा; हां … पैसा पानी की तरह बहकर जरूर कई जेबों में जा रहा है। आरोप तो यह भी लगा है कि कई जगह ढंाचे बनाये बगैर ही उन्हे पहले बना और बारिश के बाद बह गया दिखा दिया गया है। दरअसल सूख गये सतही पानी को वापस संजोने की संजीदा कोशिश की जगह इंजीनियरों की रुचि भूगर्भ का पानी खींचने वाली मशीनों में ज्यादा रहती है। वही हो रहा हैं। पानी प्रबंधन के नाम पर इंडिया मार्का हैंडपंप और गहरे नलकूप लग रहे हैं। नतीजा ? कुएं और छोटे तालाब सूख रहे हैं। मनरेगा के तालाबों में पानी आने के रास्ते हैं नही। नहरों में पहले ही धूल उड रही है। इससे बुंदेलखण्ड में सिंचाई और पेयजल का नया संकट खडा हो रहा है।
कमीशनखोर यह समझने को तैयार नहीं हैं कि धरती के नीचे बहुत कम गहराई पर ग्रेनाइट, चूना और पत्थर की चट्टानी परत की वजह से बुंदेल़खण्ड के पानी के एक्यूफर बहुत उथले हैं। यह इलाका भूजल की लूट की इजाजत नहीं देता। सतही जल का संचयन ही यहां की खेती, मवेशी व समृद्धि का प्राणाधार है। जल की समृद्धि का आधार होते हैं-नदी, तालाब, मेडबंदियां और जंगल। चंदेलों ने इन्ही को समृद्ध कर यहां की समृद्धि कायम रखी। उसी काल के तालाबों से प्रेरित होकर लिखी गई पुस्तक ‘‘आज भी खरे हैं तालाब‘‘ ने कई को प्रेरित किया। 
ध्यान देने की बात है कि जहां नदी, तालाब व जंगल पर हमला सबसे ज्यादा हुआ, वहीं आत्महत्यायें हुईं-बाँदा, महोबा, हमीरपुर और चित्रकूट। करीब 70 हजार लोगों के अकेले इसी इलाके से पलायन का आंकड़ा हैं। यह बुंदेलखण्ड का वह हिस्सा है, जहां के जंगल आज पूरी तरह नेस्तनाबूद हो चुके हैं। खनन पर कोई नियंत्रण नहीं है। तालाबों पर बडे पैमाने पर कब्जे हैं। भूजल स्तर में प्रतिवर्ष 5 से 50 सेंमी तक की सबसे ज्यादा गिरावट भी इन्ही जिलों में है। समझने की बात है कि अंग्रेजों के आने के बाद का पहला बडा अकाल उत्तरी बुंदेलखण्ड के हमीरपुर और बंादा में ही क्यों आया ? और अब जब 21वीं सदी का पहला अकाल ;2003-2005द्ध आया, तो सबसे बुरा दुष्प्रभाव भी इसी इलाके में पडा। क्यों ?
यूं बुंदेलखण्ड में अकाल का जिक्र मोहम्मद बिन तुगलक के भारत प्रवेश के वक्त भी मिलता है। किंतु इतिहास प्रमाण है कि बुंदेलखण्ड में अकाल का पहला सबसे बुरा व लंबा दौर तब आया, जब 19वीं सदी में अंग्रेजों ने जंगलों का अधिग्रहण किया। शुरु में चालीसा का अकाल, फिर 1809-10, 1865 से 1889 का पच्चीसा का अकाल और फिर पूरी 20वीं सदी बुंदेलखण्ड के हिस्से में अकाल ही अकाल लाई। बुंदेलखण्ड में अकाल प्रकृति नहीं लाई; अकाल लाये अंग्रेज और डकैत। इनकी करतूतों ने जंगल खत्म किया।  
समझना होगा कि 950 मिमी. का वार्षिक वर्षा औसत कम नहंीं होता। राजस्थान व गुजरात में बुंदेलखण्ड से काफी कम बारिश के कई इलाके हैं, लेकिन वहां किसानों ने कभी आत्महत्यायें नहीं की। क्यों ? क्योंकि कम पानी के बावजूद उन्होने अपने मवेशी, जंगल व चारागाहों को मरने नहीं दिया। बारिश की हर बूंद को संजोने के लिए सरकार का इंतजार नहीं किया। मोटा अनाज बोया। धान व सोयाबीन का लालच नहीं किया। 
जहां भी जंगल-तालाबों की समृद्धि बनी रहेगी, वहां आत्महत्या की विवशता कभी नहीं होगी। जंगल न सिर्फ अपनी जडों में पानी, मौसम में आद्रता व जलसंरचनाओं से वाष्पन को रोककर रखते हैं, बल्कि बादलों को भी आकर्षित करते हैं। अब जंगल ही बुंदेलखण्ड को काल के गाल से बचा सकते हैं। जंगल ही जल का वाहक होता है। जंगल… अकाल मुक्ति की पहली शर्त है। 
इस प्रमाणिक सत्य के बावजूद बुंदेलखण्ड में जंगल कटान, तालाबों पर कब्जे व भयानक खनन को रोकने की हिम्मत किसी सरकार में आज भी दिखाई नहीं दे रही। दिखाई दे तो दे कैसे…खान, क्र्रेसर मालिक व लकडी के ठेकेदार ही यहां के नियंता है। ताज्जुब है कि लोग भी थोडा-बहुत हल्ला मचाने के बाद चुपचाप बैठ गये हैं। बुंदेलखण्ड के विकास की लोक योजना को लागू करने के लिए सरकारों को अभी तक विवश नहीं कर सके हैं। 
कुछ भी हो, बुंदेलखण्ड की समृद्धि का रास्ता यह नहीं है। पर्यटन और तीर्थ के फर्क को समझते हुए बुंदेलखण्ड की समृद्धि का मॅाडल एक समृद्ध प्राकृतिक-सांस्कृतिक-तीर्थ व परंपरागत वनक्षेत्र के रूप में ही हो सकता है। इसके लिए अलग राज्य नहीं, अलग समझ, संकल्प, आस्था व ईमानदारी की जरूरत है। काश! यह हो सके। 
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