अरुण तिवारी

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गरमाते, फैलते, दहाङ मारते समुद्र कुछ कह रहे हैं; कुछ इतना जरूरी कि उन्हे अनसुना करना हितकर नहीं होगा। इसी को आधारित है यह लेख:


प्रकृति की अपनी भाषा होती है…अपनी आवाज। हवा, पानी, मिट्टी, आकाश, सूरज, चांद, सितारे… सभी अपनी-अपनी भाषा में कुछ कहते हैं। दरख्त महसूस करते हैं और प्रतिक्रिया भी देते हैं। वैज्ञानिक तौर पर यह बात बहुत पहले जगदीशचद्र बसु प्रमाणित कर चुके हैं। आकाश देखकर धरती का हाल बताने देन की विधा को हम ज्योतिष व नक्षत्र विज्ञान के रूप में जानते हीं हैं। भूगोल, मौसम व पर्यावरण विज्ञान प्रकृति की बोलियों को समझने के ही विज्ञान हैं। इसी तरह समुद्रों का भी एक अपना विज्ञान है। समुद्र भी कुछ कहते हैं। जरूरत है, उनकी आवाज सुनने और समझने की। समुद्र एक बार फिर कुछ कह रहे हैं। कुछ चेतावनी ! कुछ संकेत !! 
खबर है कि समुद हर बरस हमारे और करीब आता जा रहा है। इसका मतलब है कि समुद्र फैल रहा है। इसका यह भी मतलब है कि उसका जलस्तर बढ रहा है। मुंबई, विशाखापतनम, कोचीन और सुंदरबन में क्रमशः 0.8, 0.9, 1.2 और 3.14 मिलीमीटर प्रतिवर्ष। इसका मतलब है कि भारतीय समुद्र के जलस्तर में प्रतिवर्ष औसतन 1.29 मिमी की बढोतरी हो रही है। करीब 13 साल पहले प्रशांत महासागर के एक टापू किरीबाटी को हम समुद्र में खो चुके हैं। ताज्जुब नहीं कि वनुबाटू द्वीप के लोग द्वीप छोङने को विवश हुए। न्यू गिनी के लोगों को भी एक टापू से पलायन करना पङा। भारत के सुंदरबन इलाके में स्थित लोहाचारा टापू भी आखिरकार डूब ही गया। सुनामी का कहर अभी हमारे जेहन में जिंदा ही है। जिस अमेरिका में पहले वर्ष में 5-7 समुद्री चक्रवात का औसत था, उसकी संख्या 25 से 30 हो गई है। न्यू आर्लिएंस नामक शहर ऐसे ही चक्रवात में नेस्तनाबूद हो गया। क्या सुनामी, समुद्री चक्रवातों की आवृति और समुद्र के जलस्तर में वृद्धि के संकेतों को हम नजरअंदाज कर सकते हैं ? नहीं। इनकी आवाज सुननी ही होगी। 
फैलता समुद्र कह रहा है कि धरती गर्म हो रही है; साथ-साथ समुद्र का पानी भी। यह खतरनाक संकेत है। जलवायु परिवर्तन पर बनाई एक इंटर गवर्नमेंटल पैनल (आई पी सी सी ) के अनुसार इस सदी में धरती का तापमान में 1.4 से लेकर 5.8 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि हो सकती है। इससे धु्रवों और ग्लेशियरों से बर्फ पिघलने की रफ्तार बढेगी। अंदाजा लगाया गया है कि बर्फों के पिघलने के असर को न जोङा जाये, तो महज इस तापमान वृद्धि के सीधे असर के कारण ही समुद्रों का तापमान 35 इंच तक बढ सकता है। तापमान यदि सचमुच यह आंकङा छूने में सफल रहा, तो समुद्री चक्रवातों की संख्या और बढेगी। हिंद महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक सुंदरबन, बांग्ला देश, मिस़्त्र और अमेरिका के फ्लोरिडा जैसे निचले प्रांत सबसे पहले इसका खामियाजा भुगतेंगे। बांग्ला देश का लगभग 15 फीसदी और हमारे शानदार सुंदरबन का तो लगभग पूरा क्षेत्रफल ही पानी में डूब जायेगा। भविष्यवाणी सच होने ही लगी है। जमे हुए ग्रीनलैंड की बर्फ भी अब पिघलने लगी है। हिमालयी ग्लेशियरों का 2077 वर्ग किलोमीटर का रकबा पिछले 50 वर्षों में 500 वर्ग किमी घट गया है। पिछले दशक की तुलना में धरती के समुदों का तल भी 6 से 8 इंच बढ गया है। 
हालांकि भारतीय महासागर में समुद्र तल में बढोतरी को लेकर भारत के पृथ्वी विज्ञान विभाग मंत्रालय का मानना है कि इसका कारण जलवायु परिवर्तन या तापमान वृद्धि ही है; यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। अटकलें लगाई जा रही हैं कि यह नदियों में पानी बढने अथवा भूंकप के कारण समुद्री बेसिन में सिकुङन की वजह से भी हो सकता है। इसका कारण प्रत्येक साढे 18 वर्ष मंे आने वाला टाइड भी हो सकता है। यह सब संभव है, लेकिन इन अटकलों  के कारण हम समुद्र जलस्तर में वृद्धि का निदान समुद्र तक जाने नदियों का पानी को रोककर नहीं कर सकते। नदियों का जल ही समुद्र के पानी के खारेपन को नियंत्रित करते हैं। यदि नदी जोङ जैसी परियोजनाओं को लागू कर नदियों के पानी की समुद्र तक पहुंचने वाली मात्रा को कम किया गया, तो नदी किनारे के इलाके विष से भर जायेंगे। 
समझना होगा कि जलस्तर में वृद्धि का असल कारण तापमान में वृद्धि ही है। इसका सबसे बङा प्रमाण है, मूंगा भित्तियों (कोरल रीफ) का नष्ट होना। दुनिया का सबसे बङा जीवंत ढांचा कहे जाने वाले ग्रेट बैरियर रीफ का अस्तित्व खतरे में है। चेतावनी दी गई है कि समुद्र का तापमान यदि आधा डिग्री सेल्सियस तक बढ गया, तो ही इन मूंगा भित्तियों का अस्तित्व ही खतरे में पङ जायेगा। यह सबसे खतरनाक बात होगी। कारण ? मूंगा भित्तियों पृथ्वी पर पर्यावरणीय संतुलन की सबसे प्राचीन कहे जाने वाली प्रणाली है। मूुुगा भित्तियां कार्बन अवशोषित करने का प्रकृति प्रदत अत्यंत कारगर माध्यम हैं। हमारी पृथ्वी पर जीवन का संचार सबसे पहले मूंगा भित्तियों में ही हुआ। इसे जीवन की नर्सरी कहा जाता है। धरती पर जीवन की नर्सरी कहे जाने वाली मूंगा भित्तियां पूरी तरह नष्ट हो जायेंगी। तब जीवन बचेगा… इस बात की गारंटी कौन दे सकता है ? समुद्र का संकेत स्पष्ट है। अब जरूरी है कि हम समुद्र की आवाज सुनकर समाधान में लगे। इसे अनसुना न करें, प्लीज ! 

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