बान की मून (संयुक्त राष्ट्र महासचिव ) – ’’यह धरती के लिए ऐतिहासिक जीत का क्षण है। इससे दुनिया से गरीबी खत्म करने का मंच तैयार होगा। यह सभी देशों के सामूहिक प्रयास का नतीजा है। कोई यह लक्ष्य अकेले हासिल नहीं कर सकता था।’’

बाराक ओबामा (अमेरिकी राष्ट्रपति) – ’’आज अमेरिकी गर्व कर सकते हैं कि सात सालों से हमने अमेरिका को जलवायु परिवर्तन से लङने में विश्व प्रमुख बनाया है। यह समझौता धरती को बचाने के हमारे प्रयासों को सफल बनायेगा।’’

अल गोर (पूर्व अमेरिकी उपराष्ट्रपति) – ’’मैं पिछले दो दशक से इस तरह के सम्मेलनों में जाता रहा हूं। मेरी नजर में यह सबसे कुशल कूटनीति का नतीजा है।’’

माइगेल एरिस कनेटे (जलवायु प्रमुख, यूूरोप) – ’’यह आखिरी मौका था और हमने इसे पकङ लिया।’’

डैविड कैमरन (ब्रितानी प्रधानमंत्री) -’’इस पीढ़ी ने अपने बच्चों को सुरक्षित धरती सौंपने के लिए अह्म कदम उठाया है। इस समझौते की खूबी यह है कि इसमें धरती बचाने के लिए हर देश को जिम्मेदारी दी गई है।’’

नरेन्द्र मोदी ( भारतीय प्रधानमंत्री, भारत सरकार) – ’’पेरिस समझौते का जो परिणाम है, उसमें कोई भी हारा या जीता नहीं है। जलवायु न्याय जीता है और हम सभी एक हरित भविष्य के लिए काम कर रहे हैं।’’

प्रकाश जावेङकर ( केन्द्रीय वन एवम् पर्यावरण मंत्री, भारत सरकार) – ’’ यह एक ऐसा ऐतिहासिक दिन है, जब सभी ने सिर्फ एक समझौते को अंगीकार ही नहीं किया, बल्कि धरती के सात अरब लोगों के जीवन में  उम्मीद का एक नया अध्याय भी जोङा।..हमने आज भावी पीढि़यों को यह आश्वासन दिया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण उपजी चुनौती को कम करने के लिए हम सब मिलकर काम करेंगे और उन्हे एक बेहतर भविष्य देंगे।’’

कुमी नायडू ( कार्यकारी अधिकारी, ग्रीनपीस इंटरनेशनल) -’’कभी-कभी लगता है कि सयंुक्त राष्ट्र संगठन के सदस्य देश कभी किसी मुद्दे पर एकजुट नहीं हो सकते, किंतु करीब 200 देश एक साथ आये और समझौता हुआ।’’

स्ट्रर्न (अगुआ जलवायु अर्थशास्त्री) – ’’उन्होने अत्यंत सावधानी बरती; सभी को सुना और सभी से सलाह ली।.. यह फ्रांस के खुलेपन, राजनयिक अनुभव और कौशल से संभव हुआ।’’
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शी जेनहुआ (चीन के वार्ताकार) -’’हालांकि, यह समझौता हमें आगे बढ़ने से नहीं रोकता, किंतु समझौता श्रेष्ठ नहीं है। कुछ मामलों में काफी सुधार की जरूरत है।’’

पाॅल ओक्टिविस्ट (निकारगुआ के प्रतिनिधि) ’’हम संधि का समर्थन नहीं करते। यह वैश्विक तापमान को कम करने व प्रभावित गरीब देशों की मदद के मामले में नाकाफी है।’’

तोसी मपाने (कांगों के वार्ताकार ) – ’’ ग्रीन क्लाइमेट फंड की बात समझौते में होनी थी, किंतु यह बाध्यकारी हिस्से में नहीं है।  उन्होने इसे कानूनी रूप नहीं लेने दिया।’’

सुनीता नारायण (महानिदेशक, विज्ञान एवम् पर्यावरण केन्द्र, दिल्ली) – ’’यह एक कमज़ोर और गैर महत्वाकांक्षी समझौता है। इसमें कोई अर्थपूर्ण लक्ष्य शामिल नहीं है।’’

जेम्स हेनसन (विशेषज्ञ) – ’’ यह समझौता, एक झूठ है। यह धोखापूर्ण है। यही इसकी सच्चाई है।…इसमें कोई कार्रवाई नहीं है, सिर्फ वादे हैं।… जब तक जीवाश्म ईंधन सस्ते मंे उपलब्ध रहेगा; यह जलाया जाता रहेगा।’’
………………………………………………………………………………………………………………………………………. संकलन: पानी पोस्ट टीम