मैगासायसाय से सम्मानित प्रख्यात पानी कार्यकर्ता जल पुरुष श्री राजेन्द्र सिंह ने राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। उसके पश्चात् अप्रैल, 2012 में लिए श्री सिंह से लिए साक्षात्कार पर आधारित लेख 
प्रस्तुति: अरुण तिवारी


राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का सदस्य बनते समय मैने सोचा था कि प्राधिकरण, गंगा कार्ययोजना के फेल होने से कुछ सीखेगा। सोचा था कि पृथ्वी शिखर सम्मेलन-1972 में इंदिरा जी ने स्वीडन की स्टाॅकहोम नदी देखकर गंगा को भी वैसा निर्मल बनाने की जो आकांक्षा व्यक्त की थी; प्राधिकरण उसे पूरा करेगा। हो सकता है कि टिहरी के लिए रूस से पैसा लेते वक्त राजीव गांधी न जानते हों कि टिहरी गंगा की निर्मलता घटायेगा; लेकिन वह यह जरूर जानते थे कि गंगा की निर्मलता का काम सिर्फ ठेकेदारों और इंजीनियरों द्वारा पूरा नहीं हो सकेगा। इसलिए उन्होंने कहा था कि यह जन-जन की कार्ययोजना बननी चाहिए। दुर्भाग्य से गंगा कार्ययोजना के कर्णधारों ने यह होने नहीं दिया। गंगा कार्ययोजना की घोषणा ने राजीव गांधी सरकार को सबसे ज्यादा वोट दिलाये। लेकिन योजना के अफसर उसमे सिर्फ नोट ही देखते रहे। 
गलती यह हुई कि नाम तो गंगा कार्ययोजना रख दिया, लोक निर्माण विभाग को काम भी दे दिया, लेकिन गंगा के काम की लोकयोजना बनाने के बारे में सोचा तक नहीं गया। जनता इस कार्ययोजना से कभी नहीं जुङ सकी। कालांतर मंे यही अलगाव गंगा कार्ययोजना की विफलता का सबसे बना कारण बना। 
किसी भी योजना-परियोजना की परिकल्पना करने से पहले जरूरी होता है कि उसके सिद्धांत और कार्य के नीतिगत बिंदु तय किये जायें। गंगा कार्ययोजना बनाने से पहलेे भी जरूरी था कि गंगानीति का निर्धारण होता। नीति के आधार पर नियम बनते। योजना बनती। कार्यक्रम तय होते । कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में कायदे-कानूनों की पालना कराने के लिए तंत्र बनता। गंगा कार्ययोजना का दुर्भाग्य रहा कि इसके तहत् मल शोधन संयंत्रों, घाटों और शौचालयों आदि जैसे निर्माण कार्य हेतु सिर्फ रुपया बांटा गया। जवाबदेही के नाम पर योजना शून्य ही साबित हुई। यह योजना भ्रष्ट होने से नहीं बच सकी। डी. पी. आर. से लेकर सब कुछ ठेकेदारों के द्वारा, ठेकेदारों के लिए होकर रह गया। गंगा के हिस्से में सिर्फ तंत्र की मलीनता ही आई। 
मैंने दो अक्तूबर, 2010 से एक नवम्बर, 2010 के दौरान गंगोत्री से गंगासागर तक कोई शहर ऐसा नहीं दिखा, जिसके सभी नालों का मल, शोधन के बाद ही गंगा में मिल रहा हो। इस दौरान सभी एस.टी.पी. देखे। मौके पर एक भी एस.टी.पी. चलता हुआ नहीं मिला। हमारे आने की पूर्वसूचना के कारण कानपुर, इलाहाबाद, बनारस के जो कुछ एस.टी.पी. चलते हुए हमें दिखायें गये, वे भी अपनी क्षमता के अनुरूप कार्य नहीं कर रहे थे। ये चलते, तो भी गंगा निर्मल नहीं रह सकती थी।  कारण कि गंगा कार्य योजना की बात छोङिए; गंगा प्राधिकरण के तीन साल पूरे होने के बाद भी उद्योगों के प्रदूषण पर कोई लगाम आज तक नहीं लगाई जा सकी है। गंगा को जल देने वाली छोटी धाराओं के पानीदार बनाये रखने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा , सो अलग।
यूं भी पहले अमृत में विष को मिलाना और फिर उसे वापस अमृत बनाने के लिए पैसा बहाना कहां कि समझदारी है ? क्या यह अनुकूल नहीं है कि गंगामृत में विष रूपी प्रदूषण मिलने ही न दिया जाये। यह नीतिगत बात है। लेकिन उनकी नीति तो ज्यादा बङा बजट, ज्यादा बङी परियोजना और ज्यादा बङा निजी मुनाफा था। इन गलतियों का ही खामियाजा था कि गंगा कार्ययोजना शुरु हुई, तो गंगा मैली थी। कार्ययोजना पूरी हुई, तो गंगा मां से मैला ढोने वाली मालगाड़ी बना दी गई थी। 
गंगा को राष्ट्रीय नदी बनाने और प्राधिकरण की घोषणा से  देशभर की तरह मुझे भी उम्मीद जगी थी। पहली बार प्रधानमंत्री जी ने विविध गंगा विशेषज्ञों को सीधे अपने से  जोड़ा। लेकिन अधिकार और जवाबदेही के अभाव में  प्राधिकरण में कुछ काम नहीं हुआ। प्राधिकरण के एजेंडे में केवल तत्कालीन विचारार्थ मुद्दे रखे गये। हमारी मांग के बावजूद महत्वपूर्ण और नीतिगत मुद्दे कभी रखे ही नहीं गये। दो बैठकों की कार्यवाही में वे बाते ही आई जो अफसरों को पसंद थी। हमारी जो बातें उन्हें पसंद नहीं थी, वे कार्यवाही में दर्ज ही नहीं की गई।
गंगा मास्टर प्लान-2020 कैसा बने ? कब तक बने ? क्या किया जाये ? क्या नहीं किया जाये ? आदि बातों को चर्चा में नहीं लाया गया। मैंने दोनों बैठकों में कहा कि हमें गंगा कार्ययोजना के फेल होने के अनुभवों से सीखकर आगे की कार्ययोजना बनानी चाहिए। मैंने गंगा नीति, कानून और गंगा पंचायत बनाने के लिखित सुझाव विस्तार से लिखकर दिये। सहमति भी बनी। लेकिन कभी कार्य संचालन की जिम्मेदारी नहीं तय हुई। इसलिए काम भी नहीं हुआ। 
मेरे लिए और क्या रास्ता था। मैं भी गंगा तपस्वियों में शामिल हो गया। प्राधिकरण ने तप पर भी कोई ध्यान नहीं दिया। मुझे असहयोग का रास्ता अपनाना पङा। मैने इस्तीफा दिया। ऐसी स्थिति में आप होते, तो क्या करते ? 
गंगा संरक्षण हेतु गंगा नदी नीति और गंगा कानून बनवाने की प्रक्रिया शुरू कराने हेतु गंगा मुक्ति संग्राम शुरू करना होगा। यह कार्य समाज करेगा। गंगा के पास पूरे कैबिनेट से ज्यादा वोट हैं। यह भी समाज ही सिद्ध करके दिखायेगा। मैं आन्दोलनकर्ता नहीं हूं। गंगा को आज आन्दोलन के स्थान पर त्याग-तपस्या चाहिए। आन्दोलन करने में लोगों के जीवन में बहुत कुछ छूट जाता है। लोगों को काम आदि छोड़कर इसमें लगना पड़ता है। जब हम काम छोड़ते हैं तो हमारी यात्रा उल्टी हो जाती है। हम गंगा शुद्धि की सिद्धि हेतु सीधी यात्रा करना चाहते हैं। सीधी यात्रा शुभ की चाहत से होती है। हम अपने राष्ट्र और राष्ट्रीय नदी का साझा शुभ ढूंड़कर ही रास्ता पकडेंगे। 
हमारा रास्ता समाज के साथ मिलकर गंगा को स्वयं समझना व समझाना है। सहज सृजन करना है। जहर को बदलकर उपयोगी जल बनाना कठिन है; जहर-अमृत को अलग रखने वाली कम खर्चीली संरचनायें बनाना आसान। सृजनात्मकता और सकरात्मकता से ही यह सम्भव है। इसी सकारात्मकता को अपनाते हुए मैने 17 अप्रैल, 2012 की गंगा प्राधिकरण बैठक में जाना तय किया है। संभव है यह बैठक कुछ चेतना लाये। अन्यथा गंगा तपस्वी होने के नाते गंगा तपस्या का रास्ता है ही। कुंभ से पूर्व गंगा निर्मल बने। गंगा तपस्वी के रूप में अभी इसी तप में जुटा हूं। हमने गंगा घाटी की सात छोटी नदियों को सदानीरा बनाया है। गंगा घाटी में इस कार्य को करते हुए ही मेरे तप की पूर्ति होगी। देखना ! एक दिन रचना, सृजना और सकरात्मकता से ही चेतना का उदय होगा।…समाज और सरकार के साथ-साथ गंगा भी कोमा से बाहर आ जायेगी। दुआ कीजिए कि यह हो।
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