लेखक: अरुण तिवारी

आशंका और आकांक्षाओं के बीच पेरिस जलवायु सम्मेलन

पृथ्वी, एक अनोखा, किंतु छोटा सा ग्रह है। अभी इसके बारे में ही हमारा विज्ञान अधूरा है। ऐसे में एक अंतरिक्ष के बारे में सम्पूर्ण जानकारी का दावा करना या फिर जाने और कितने अंतरिक्ष हैं; यह कहना, इंसान के लिए दूर की कौङी है। सम्पूर्ण प्रकृति को समझने का दावा तो हम कर ही नहीं सकते; फिर भी हम कैसे मूर्ख हैं कि प्रकृति को समझे बगैर, उसे अपने अनुकूल ढालने की हिमाकत में लगे हैं। कोई आसमान से बारिश कराने की कोशिश करने में लगा है, तो कोई प्रकृति द्वारा प्रदत हवा, पानी को बदलने की कोशिश में! क्या ताज्जुब की बात है कि इंसान ने मान लिया है कि वह प्रकृति के साथ जैसे चाहे व्यवहार करने के लिए स्वतंत्र है। 
प्रकृति ने कितनी सुंदर पृथ्वी बनाई ! पहाड, समुद्र, मैदान बनाये। प्राणवायु के लिए वायुमंडल बनाया। वायुमंडल में मुख्य रूप से आॅक्सीजन और नाइटोजन का मुख्य घटक बनाया। सूरज की पराबैंगनी किरणों को रोकने के लिए 10 से 15 किलोमीटर की उंचाई पर आजोन गैस की सुरक्षा परत बनाई। हमने क्या किया ? हमने ओजोन की चादर को पहले कंबल, फिर रजाई और अब हीटर बना दिया। वायुमंडल में कार्बनडाइआॅक्साइड की मात्रा इसलिए बनाई, ताकि धरती से लौटने वाली गर्मी को बांधकर तापमान का संतुलन बना रहे। इसकी सीमा बनाने के लिए उसने कार्बन डाई आॅक्साइड के लिए सीमित स्थान बनाया। हमने यह स्थान घेरने की अपनी रफ्तार को बढ़ाकर 50 अरब मीट्रिक टन प्रति वर्ष तक तेज कर लिया। जानकारों के मुताबिक, वायुमंडल में मात्र एक हजार अरब टन कार्बन डाई आॅक्साइड का स्थान बचा है; यानी अगले 20 वर्ष बाद वायुमंडल में कार्बन डाई आॅक्साइड के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा। नतीजे में कहा जा रहा है कि वर्ष 2100 तक दुनिया 2.7 डिग्री तक गर्म होने के रास्ते पर है। वल्र्ड वाच इंस्टीट्युट की रपट भिन्न है। वह अगले सौ वर्षों में हमारे वायुमंडल का तापमान पांच डिग्री सेल्सियस तक अधिक हो जाने का आकलन प्रस्तुत कर रहा है। 
ये  आंकङे कितने विश्वसनीय है; कहना मुश्किल है। हां, यह सच है कि इस तापमान वृद्धि से मिट्टी का तापमान, नमी, हवा का तापमान, दिशा, तीव्रता, उमस, दिन-रात तथा मौसम से मौसम के बीच में तापमान सीधे प्रभाव में हैं। हेमंत-बसंत भारत से गायब हो रहे हैं। पिछले एक महीने में ही तापमान में रिकार्ड परिवर्तन के समाचार हैं। चेन्नई डूब रहा है और पूर्वी उत्तर प्रदेश सूखे से बेहाल है। पहले सूखे के कारण गेहूं की बोआई पिछङी और अब अचानक आई बारिश के कारण। मच्छरों का हमला जारी है। धङाम से आई बाढ़ के उपजे चेन्नई दृश्य ने पूरे देश के माथे पर बल ला दिए हैं। कीटाणुओं की प्रजनन दर और बीमारियां बढ़ेगी ही, सो बढ़ रही है।
अब हम क्या करें ? 
अब पृथ्वी के देश, कार्बन उत्सर्जन में घटोत्तरी की बात कर रहे हैं। हाल के सम्मेलनों में अमेरिका ने अपने उचित हिस्से का पांचवां हिस्सा कार्बन घटोत्तरी  की बात की है। 1850 को आधार वर्ष मानें, तो चीन ने 2,371 मीट्रिक टन कार्बन डाई आॅक्साइड उत्सर्जित की है, किंतु उसने 2030 तक 488 मीट्रिक टन कार्बन डाई आॅक्साइड उत्सर्जन कम करने का प्रस्ताव रखा है। भारत ने  54 मीट्रिक टन कार्बन डाई आॅक्साइड उत्सर्जित की है।  उसने 2030 तक 280 मीट्रिक टन कार्बन डाई आॅक्साइड उत्सर्जन कटौती करने की घोषणा की है। अक्तूबर माह में चली तैयारी बैठकों की गईं ऐसी सारी घोषणायें, वर्ष 2020 तक वैश्विक तापमान वृद्धि को दो डिग्री तक कम करने के लक्ष्य को सामने रखकर की गईं। बोन में हुई तैयारी बैठकों में मिले सभी देशों के प्रस्तावों को 55 पेजी दस्तावेज के रूप में एक साथ किया गया है। पांच दिवसीय बोन सत्र में तैयारी बैठक ही आगे पेरिस सम्मेलन का आधार है। अब चुनौती है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती पर वैश्विक सहमति कैसे सुनिश्चित हो ? यह सुनिश्चित करने के लिए ही 30 नवबंर से 11 दिसंबर, 2015 तक पेरिस जलवायु सम्मेलन चल रहा है।
पेरिस सम्मेलन: जनाकांक्षा और आशंका 
जनाकांक्षा है कि जब 11 दिसंबर, 2015 को पेरिस जलवायु सम्मेलन संपन्न हो, तो देशों के हाथ मिले हुए हों, दिल खुले हुए हों और सहमति से आगे के कदमों के लिए कमरें कसी हुई हों, किंतु क्या यह होगा ? पेरिस में हुए हमले से दुनिया चिंतित तो है ही, जलवायु सम्मेलन को लेकर भी चिंता कम नहीं है। जानकार आशंकित हैं कि सम्मेलन में गरीब और विकासशील देशों की क्या वाकई सुनी जायेगी या बोन सत्र में मिला आश्वासन झूठा हो जायेगा ?

उत्सर्जन कटौती उपायों के कारण अर्थव्यवस्थाओं पर पङने वाले नकरात्मक असर की एवज में विकसित देशों द्वारा वर्ष 2020 तक विकासशील और गरीब देशों को 100 अरब अमेरिकी डाॅलर धनराशि देने का प्रस्ताव है। इसकी व्यवस्था कैसे होगी ? इसके वितरण का आधार क्या होंगे ? कार्बन बजट, एक मसला है। जान-माल के नुकसान, दूसरा मसला है। उत्सर्जन कटौती में सहयोगी तकनीक का हस्तांतरण जरूरी है। अतः तकनीकों को पेटेंट मुक्त और हस्तांतरण को मुनाफा मुक्त रखने की मांग, एक अन्य मसला है। विकसित व अग्रणी तकनीकी देश, इन मसलों पर स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत करने में अभी भी आनाकानी कर रहे हैं। वे चालाकी में हैं कि इस पर पेरिस सम्मेलन के बाहर हर देश से अलग-अलग समझौते की स्थिति में अपनी शर्तों को सामने रखकर दूसरे हित भी साध लेंगे।
विज्ञान पर्यावरण केन्द्र की महानिदेशक, सुनीता नारारण का कहना है कि स्पष्ट रूपरेखा होनी चाहिए कि कैसे करेंगे। यदि विकसित देशों ने न माना, तो वे अन्य देशों के अपने ग्रीनहाउस गैसे कटौती लक्ष्य को बढाने को कह सकते हैं। इससे विवाद होगा। तैयारी बैठकों में भी विवाद हुआ। गौर कीजिए कि 96 देशों के एक प्रतिनिधिमंडल चाहता था कि बोन में हो रहे पेरिस समझौते के प्र्रस्ताव को और संतुलित बनाया जाये, अध्यक्षीय पैनल के दो सदस्यों की राय से उस प्रतिनिधिमंडल को बंद कमरे के हुए समझौते  से अगले चार दिन के लिए अलग रखा गया। जापान समर्थित इस प्रतिनिधिमंडल में भारत, चीन, जी 77 के भी सदस्य थे। अमेरिकी और यूरोपीय सदस्य चुप रहे।
कुल मिलाकर चित्र यह है कि पृथ्वी पर जीवन बचाने जैसे गंभीर मसले पर गरीब और विकासशील देश, आर्थिक सिद्धांत को अमल में लाने की जिद्द ठाने बैठे हैं। तर्क है कि जिसने जितना ज्यादा कार्बन उत्सर्जन किया, उत्सर्जन रोकने का उसका लक्ष्य उतना अधिक और त्वरित होना चाहिए। दण्ड स्वरूप, उसे उतनी अधिक धनराशि कम उत्सर्जन करने वाले और गरीब देशों को उनके नुकसान की भरपाई में देनी चाहिए। गलती का पश्चाताप् करने की ईमानदारी और हिम्मत विकसित देशों में भी नहीं है। इसी भिन्न रवैये के कारण, रियो डि जिनेरियो में हुए प्रथम पृथ्वी सम्मेलन ( 03 से 14 जून, 1992 ) से लेकर अब तक हुईं सहमति की कवायदें, परवान नहीं चढ़ पाईं। 23 वर्षों से यही चल रहा है। पेरिस सम्मेलन भी इस रवैये से मुक्त नहीं है। 
प्रश्न कई
इस रवैये से मुक्ति के लिए हम क्या करें ? पेरिस जलवायु सम्मेलन में समझौते के आधार, आर्थिक हों अथवा कुछ और ? क्या जलवायु परिवर्तन का मसला इतना सहज है कि कार्बन उत्सर्जन कम करने मात्र से काम चल जायेगा या पृथ्वी पर जीवन बचाने के लिए करना कुछ और भी होगा ? भारत का पक्ष और पथ क्या हो ? जलवायु परिवर्तन के कारण और दुष्प्रभावों के निवारण में हमारी व्यक्तिगत, सामुदायिक, शासकीय अथवा प्रशासकीय भूमिका क्या हो सकती है ? सबसे महत्वपूर्ण यह कि जलवायु परिवर्तन, क्या सिर्फ पर्यावरण व भूगोल विज्ञान का विषय है या फिर कृषि वैज्ञानिकों, जीव विज्ञानियों, अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, चिकित्साशास्त्रियों, नेताओं और रोजगार की दौङ में लगे नौजवानों को भी इससे चिंतित होना चाहिए ? ऐसे तमाम प्रश्नों के उत्तर की तलाश जरूरी है। क्या हम-आप तलाशेंगे ? 
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