प्रथम लेख – आशंका और आकांक्षाओं के बीच पेरिस जलवायु सम्मेलन

लेखक: अरुण तिवारी

गर्माती छत, प्रभावित भारत

पेरिस जलवायु सम्मेलन, फिलहाल वैश्विक समझौते के दौर में प्रवेश कर चुका है। दुआ कीजिए कि दुनिया किसी समझौते पर एकमत हो। यह दुआ इसलिए भी जरूरी है कि सम्मेलन से पूर्व अभी देश, विकासशील और विकसित के बीच बंटे नजर आये। बंटवारे का आधार आर्थिक है और मांग का आधार भी. किंतु क्या प्रकृति से साथ व्यवहार का आधार आर्थिक हो सकता है ? यह बहस का विषय है। उपभोग और प्रकृति को नुकसान की दृष्टि से देखें तो यह दायित्व निश्चय ही विकसित कहे जाने वाले देशों का ज्यादा है, किंतु इस लेख के माध्यम से मैं यह रेखांकित करना चाहता हूं कि मानव उत्पत्ति के मूल स्थान के लिहाज से यह दायित्व सबसे ज्यादा हम हिमालयी देशों का है; कारण कि सृष्टि में मानव की उत्पत्ति सबसे पहले हिमालय की गोद में बसे वर्तमान तिब्बत में ही हुई। आज मानव उत्पत्ति का यह क्षेत्र ही संकट में है। 
गौर कीजिए कि पिछले 11,300 सालों की तुलना में, आज पृथ्वी सबसे गर्म है। उत्तरी ध्रुव के आर्कटिक सागर में इस बार 1970 के बाद सबसे कम बर्फ जमी है। उत्तरी और दक्षिणी धु्रव से बाहर दुनिया का सबसे बङा बर्फ भंडार, तिब्बत में ही है। इसी नाते तिब्बत को ’दुनिया की छत’ कहा जाता है। इस नाते आप तिब्बत को दुनिया का तीसरा ध्रुव भी कह सकते हैं। यह तीसरा धु्रव, पिछले पांच दशक में 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की नई चुनौती के सामने विचार की मुद्रा में है। नतीजे में इस तीसरे धु्रव ने अपना 80 प्रतिशत बर्फ भंडार खो दिया है। तिब्बती धर्मगुरू दलाईलामा चिंतित हैं कि 2050 तक तिब्बत के ग्लेशियर नहीं बचेंगे। नदियां सूखेंगी और बिजली-पानी का संकट बढे़गा। तिब्बत का क्या होगा ? वैज्ञानिकों की चिंता है कि ग्लेशियरों पिघलने की रफ्तार जितनी तेज होगी, हवा में उत्सर्जित कार्बन का भंडार उतनी ही तेज रफ्तार से बढ़ता जायेगा। जलवायु परिवर्तन और उसके दुष्प्रभावों के लिहाज से यह सिर्फ तीसरे धु्रव नहीं, पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है।
ऐसी ही चिंता जताते हुए में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख क्रिस्टीन लोगान ने कहा है कि यदि जलवायु परिवर्तन पर ऐतिहायती कदम तत्काल न उठाये गये, तो दुनिया की हालत पेरु के उस प्रसिद्ध चिकन की तरह होने वाली है, जिसका लुत्फ उनके बयान संबंधी सम्मेलन में आये प्रतिनिधियों ने उठाया। 
सच पूछिए, तो मुद्रा कोष द्वारा खासकर गरीब देशों में जिस तरह की परियोजनाओं को धन मुहैया कराया जा रहा है, यदि कार्बन उत्सर्जन कम करने में उनका योगदान आकलित कर लिया जाये, तो मालूम हो जायेगा कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष प्रमुख की चिता कितनी जुबानी है और कितनी ज़मीनी। कहने को तिब्बत को अपना कहने वाला चीन भी बढ़ती मौसमी आग और बदलते मौसम से चिंतित है, किंतु क्या वाकई ? तिब्बत को परमाणु कचराघर और पनबिजली परियोजनाओं का घर बनाने की खबरों से तो यह नहीं लगता कि चीन को तिब्बत या तिब्बत के बहाने खुद या दुनिया के पर्यावरण की कोई चिंता है। हमें सोचना चाहिए कि यदि दुष्प्रभावित तिब्बत से निकलने वाली नदियों पर आश्रित उत्तर-पूर्व भारत का क्या होगा ? हिमालय का उत्तरी ही नहीं, दक्षिणी क्षेत्र भी दुष्प्रभाव की सीधी पकङ में आ चुका है। अतः कोई चिंता करे न करे, भारत को करनी चाहिए। 
भारत पर असर
हिमालयी ग्लेशियरों के 30 मीटर प्रतिवर्ष की रफ्तार से घटने का अनुमान लगाया गया है। जिस-जिस हिमालयी इलाकों में ग्लेशियर पिघलने की रफतार तेज पाई गई है, वहां-वहां बर्फ के रेतीले कण भी पाये गये हैं। लाहुल-स्पीति, हिमाचल के ठंडे मरुस्थल हैं। कोई ताज्जुब नहीं कि कल को हिमालय में कई और ठंडे मरुस्थल बन जायें। 
वैज्ञानिकों की चिंता है कि ग्लेशियरों पिघलने की रफ्तार जितनी तेज होगी, हवा में उत्सर्जित कार्बन का भंडार उतनी ही तेज रफ्तार से बढ़ता जायेगा। अंततः इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा। कई द्वीप जलमग्न होंगे। बदली जलवायु, बाढ, चक्रवात और सूखा लायेगी। जहां जोरदार बारिश होगी, वहीं कुछ समय बाद सूखे का चित्र हम देखेंगे। 100 वर्ष में आने वाली बाढ़, दस वर्ष में आयेगी। हो सकता है कि औसत वही रहे, किंतु वर्षा का दिवसीय वितरण बदल जायेगा। नदियों के रुख बदलेंगे। कई सूखेंगी, तो कई उफन जायेंगी। गंगा-बह्मापुत्र के निचले किनारे पर शहर बनाने की जिद्द की, तो वे डुबेंगे ही। बांध नियंत्रण के लिए नदी तटबंध तोडने पडेंगे। निचले स्थान पर बने मकान डुबेंगे। लोगों को ऊंचे स्थानों पर जाना होगा। पानी के कारण संकट, निश्चित तौर पर बढे़गा, साथ ही पानी का बाजार भी।
जलवायु परिवर्तन का वनस्पति पर एक असर यह होगा कि फूल ऐसे समय खिलेंगे, जब नहीं खिलने चाहिए। फसलें तय समय से पहले या बाद में पकने से हम आश्चर्य में न पङें। यूनिवर्सिटी आॅफ फलोरिडा के प्रमुख शोधकर्ता डाॅ ग्लेन माॅरिस के अनुसार, तापमान बढ़ने से गैम्बीयर्डिक्स नामक विषैला  समुद्री शैवाल बढ़ रहा हैं । मछलियां, समुद्र में शैवाल खाकर ही जिंदा रहती हैं। शैवालों की बढ़ती संख्या के कारण, वे इन्हे खाने को मजबूर हैं। यह ज़हर इतना ख़तरनाक किस्म का है कि पकाने पर भी इनका ज़हर खत्म नहीं होता। इन मछलियों को खाने वाले लोग गंभीर रोग की चपेट में आये हैं। आकलन है कि यदि तापमान एक से चार डिग्री सेल्सियस तक नीचे गया, तो दुनिया में खाद्य उत्पादन 24 से 30 प्रतिशत गिर जायेगा। मौसम की मार का असर, फसल उत्पादन के साथ-साथ पौष्टिकता पर भी असर पडेगा। भारत, पहले ही दुनिया से सबसे अधिक कुपोषितों की संख्या वाला देश है; आगे क्या होगा ?
गौर कीजिए कि वर्ष 2010 के वैश्विक जलवायु संकट सूचकांक में भारत पहले दस देशों में है। एक अध्ययन के मुताबिक, विकास के नये पैमानों को अपनाने की भारतीय ललक यदि यही रही, तो वर्ष 2050 तक शीतकाल में तापमान 3 से 4 डिग्री तक बढ़ सकता है। मानसूनी वर्षा में 10 से 29 प्रतिशत कमी आ सकती है। तापमान बढ़ने से मिटटी की नमी, कार्यक्षमता प्रभावित होगी। लवणता बढे़गी। जैव विविधता घटेगी। बाढ से मृदा क्षरण बढ़ेगा, सूखे से बंजरपन आयेगा। गर्मी कीट प्रजनन क्षमता में सहायक होती है। अतः कीट व रोग बढ़ेगा। परिणामस्वरूप, कीटनाशकों का प्रयोग बढे़गा, जो अंत में हमारी बीमारी का कारण बनेगा। असिंचित खेती सीधे प्रभावी होगी। असिंचित इलाके सबसे पहले संकट में आयेंगे। असिंचित इलाकों में भी किसान सिंचाई की मांग करेगा। सिंचित इलाकों में तो सिंचाई की मांग बढेगी ही, चूंकि उपलब्धता घटेगीं।
उत्पादन घटेगा 

विशेषज्ञों के मुताबिक, इन सभी का असर यह होगा कि भारत में चावल उत्पादन के 2020 तक 6 से 7 प्रतिशत, गेहूं में 5 से 6 प्रतिशत आलू में तीन तथा सोयबीन मे 3 से 4 प्रतिशत कमी आयेगी। तापमान में 10 सेल्सियस की वृद्धि हुई तो गेहूं का उत्पादन 70 लाख टन गिर जायेगा। अंगूर जैसे विलासी फल गायब हो जायंेगे। दूसरी ओर, जनसंख्या बढ़ने से खाद्य सामग्री की मांग बढ़ेगी। भारतीय राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा पिछले तीन साल में डेढ फीसदी घटा है। वर्ष 2009 में सूखे की वजह से 29 हजार करोड का खाद्यान्न कम हुआ। खेती में गिरावट का असर सीधे 64 प्रतिशत कृषक आबादी पर तो पढेगा ही। खाद्य वस्तुएं मंहगी होने से गैर कृषक आबादी पर भी असर पङेगा और राजनीति पर भी। पिछले महीने, दाल के उत्पादन में कमी के कारण हो-हल्ला हुआ। खाद्यान्न में पांच फीसदी की कमी आयेगी, तो जीडीपी एक फीसदी नीचे उतर जायेगी। भारत में 2100 तक प्रति व्यक्ति सकल घरेलु उत्पाद में 23 प्रतिशत तक की कमी का अनुमान है। 
संकट में साझे की दरकार
जब खाद्य सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं बचेगी, तो परिणाम क्या होगा ? खाद्य सुरक्षा घटेगी, तो गरीबी बढेगी; आत्महत्यायें बढेंगी; छीना-झपटी बढ़ेगी; अपराध बढेंगे; प्रवृतियां और विकृत होंगी। सबसे ज्यादा गरीब भुगतेगा; मछुआरे, कृषक और जंगल पर जीने वाले आदिवासी। भारत के हाथों से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का बिल्ला छिन जायेगा। क्या करें ? रासायनिक खेती भी हरित गैसों का उत्सर्जन बढ़ाती है। अतः जैविक खेती चाहिए, एकल की बजाय समग्र  खेती चाहिए। लवण व क्षार सहने वाली किस्में ईजाद करनी होगी। कृषि वानिकी करनी होगी। किंतु क्या ये पर्याप्त होगा ? नहीं, सिर्फ इतने से काम चलेगा नहीं। हम प्रत्येक को चाहिए कि जो जितना अधिकतम सकारात्मक यत्न कर सकता है, उसे उतनी क्षमता और पूरी ईमानदारी से अधिकतम उतना साझा करना चाहिए। संकट में साझे का सामाजिक सिद्धांत यही है। साझेदारी से ही संकट को निपटाया जा सकता हैं। आइये, साझा बनायें।
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