लेखक: अरुण तिवारी

कचरे और समुद्र के जलवायु सबक

गर्म प्रदूषक गैसें, कचरे से पैदा होती हैं। कचरा चाहे, तरल हो या ठोस; पानी में हो या तैलीय ईंधन में अथवा कोयले में।  तपन, जलन, सङन और दाब: ये चार प्रक्रिया, गैस की उत्पत्ति का माध्यम बनती हैं। इसका मतलब है कि कचरा बढ़ने से भी उत्सर्जन बढ़ रहा है।……..तो क्या उत्सर्जन और तापमान बढ़ने से हवा-पानी में कचरा यानी प्रदूषक सामग्री भी बढ़ सकती है ? जवाब है – हां; क्योंकि पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा जारी आंकङे और समुद्री परिदृश्य तो यही कह रहे हैं।
आंकङे बता रहे हैं कि 25 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के चलते काशी, कानपुर, गाजियाबाद आदि में देवदीपावली मनाई गई, कितु दिल्ली में ऐसा कुछ नहीं हुआ। दिल्ली में न कोई व्यापक आतिशबाजी हुई और न अतिरिक्त प्रदूषण का कोई नया स्त्रोत दिखा, बावजूद इसके दिल्ली के वायुमंडल में प्रदूषण सामान्य से काफी अधिक दिखाई दिया – पी एम 10 का स्तर 382.9 माइक्रोग्राम क्युबिक मीटर, पी एम 2.5 का स्तर 234.4 माइक्रोग्राम क्युबिक मीटर। 26 नवंबर को इसमें और वृद्धि हुई। 
विचारने का विषय यह है कि प्रदूषण का यह स्तर दीवाली के दिन हुई व्यापक आतिशबाजी के परिणामस्वरूप बढ़े प्रदूषण स्तर से भी अधिक है। दीवाली के अगले दिन 12 नवंबर को पी एम 10 का स्तर 376.5 माइक्रोग्राम क्युबिक मीटर तथा पी एम 2.5 का स्तर 229.5 माइक्रोग्राम क्युबिक मीटर पाया गया था। यह क्यों हुआ ?
वायु प्रदूषण रही है, मौसमी अस्थिरता
विज्ञान पर्यावरण केन्द्र ने तलाशा, तो हवा की रफ्तार काफी कम पाई । केन्द्र ने यह भी पाया कि तापमान कभी उतर रहा है और कभी चढ़ रहा है। मौसम विभाग के मुताबिक न्यूनतम और अधिकतम..दोनो तापमान में सामान्य से एक-एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि पाई गई। पश्चिमी विक्षोभ के चलते पहाङों में बूंदाबांदी हुई, किंतु  25-26-27 नवंबर की तारीखों में दिल्ली का औसतन तापमान बढ़ा यानी मौसम अपने रुख में अस्थिरता दिखाता रहा। विशेषज्ञ मत है कि यह अस्थिरता खतरनाक है। इसी के कारण वाहनों से निकले उत्सर्जन को वायुमंडल में पूरी तरह घुलने का मौका मिल रहा है। यही 25 नवंबर को दिल्ली के वायुमंडल में प्रदूषण वृद्धि का प्रमुख कारण बना। 
चिंतित हों कचरा-प्रदूषण नियंत्रक

नवंबर के महीने मंे इस तरह की मौसमी अस्थिरता, दिल्ली के लिए एक तरह का अपवाद थी। यह अपवाद, आगे अपवाद न होकर, नियमित क्रम हो सकता है। यह अस्थिरता आगे और बढ़ सकती है। प्रदूषण नियंत्रकों के लिए यह विशेष चिंता का विषय होनी चाहिए। क्यों ? क्योंकि दुनिया में 40 प्रतिशत मौत पानी, मिट्टी और हवा में बढ आये प्रदूषण की वजह से हो रही हैं। भारत में हर रोज करीब 1.60 लाख मीट्रिक टन कचरा पहले से ही होता है। इलेक्ट्रानिक कचरा, वायु प्रदूषण बढ़ाने वाला एक नया प्रदूषक बनकर इन मौतों को और बढ़ायेगा। कहते हैं कि बिना शोधन किए, ई कचरे और रासायनिक कचरे का निष्पादन नहीं करना चाहिए। ऐसा न करने पर, ऐसी जगहों पर अगले 15 साल तक गैसों के अलावा घुलनशाील नाइट्रेट आदि प्रदूषणकारक तत्वों का उत्सर्जन होता रहता है। अंततः यह उत्सर्जन जा तो वायुमंडल में ही रहा है। 
जैविक कचरे पर क्या असर होगा ? फ्रिज में रहने पर भोजन सामग्री, सामान्य से अधिक समय तक खराब नहीं होती। यह हम जानते हैं। अणु, परमाणु की तरह जीवाणु, विषाणु, कीटाणु. से हम परिचित हैं। गर्मी में इनकी प्रजनन दर बढ़ जाती है। यह भी हम जानते हैं। स्पष्ट है कि तापमान बढे़गा, तो जैविक कचरे में सङन की प्रक्रिया और तीव्र होगी। जैविक कचरा कम से कम समय में निष्पादित करने का कौशल अपनाना होगा; क्षमता बढ़ानी होगी। क्या उत्सर्जन रोकने का दावा पेश करने वाली सरकार इसे बारे में भी कुछ सोच रही है ? भारत सरकार का स्वच्छ भारत अभियान, क्या इस दिशा में भी कुछ हौसला दिखायेगा या शौचालय ही बनाता रह जायेगा ? अभी तक का परिदृश्य संतोषजनक नही है। हमने कचरा प्रबंधन के नाम पर कई नारे गढे; किंतु हम कचरा कम करने की बजाय, बढाने वाले साबित हो रहे हैं। कचरे के पुनर्चक्रीकरण यानी रिसाइक्लिंग की हमारी रफ्तार अत्यंत धीमी है। अभी हम कुल कचरे की मात्र एक प्रतिशत मात्रा को रिसाइकल कर पा रहे हैं। यह परिदृश्य चिंतित करता है। हम चिंतित हों, चिंतन करें और क्रियान्वयन करें। दिल्ली सरकार ने कारों के सङक पर उतारने की नबंर प्रणाली प्रयोग का ऐलान कर दिया है। नतीजा क्या होगा ? प्रशासकीय मुस्तैदी और कार मालिकों का व्यवहार बतायेगा । इंतजार करें।
फिलहाल गौर करें कि कुदरत का कैलेण्डर से, विश्व मौसम संगठन के आकलन का कैलेण्डर छोटा है। इसलिए विश्व मौसम संगठन ने वर्ष 2015 को अब तक का सबसे गर्म वर्ष करार दिया है। मनुस्मृति का प्रलयखण्ड पढ़ा होता, तो शायद वह ऐसा न करता; फिर भी विश्व मौसम संगठन के रिकाॅर्ड का सबसे गर्म वर्ष तो 2015 ही है; 19वीं शताब्दी के औसत तापमान की तुलना में एक डिग्री सेल्सियस अधिक ! गौर कीजिए कि पृथ्वी पर जीवन के लिए इस एक डिग्री की वृद्धि का बहुत मायने है। वायुमंडल की 90 प्रतिशत गर्मी सोखने का काम महासागर ही करते हैं। कार्बन अवशोषण में मानव की सीधी भूमिका भले ही 10 प्रतिशत दिखती हो, किंतु मूूंगा भित्तियों के नाश का कारण ढूढे़ंगे, तो यह भूमिका पूरे 100 फीसदी अवशोषण में दिखेगी। खैर, इस एक डिग्री के बढ़ने से महासागरों में उथल-पुथल मच गई है। 
एक डिग्री वृद्धि का समुद्री मायने

2015 के पहले छह महीने का महासागरीय तापमान, 1993 से लेकर अब तक के किसी भी वर्ष के पहले छह माह की तुलना में ज्यादा हो गया है। जलवायु परिवर्तन पर बनाई एक इंटर गवर्नमेंटल पैनल (आई पी सी सी ) के अनुसार, इस सदी में धरती का तापमान में 1.4 से लेकर 5.8 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि हो सकती है। इससे धु्रवों और ग्लेशियरों से बर्फ पिघलने की रफ्तार बढे़गी। अंदाजा लगाया गया है कि बर्फों के पिघलने के असर को न जोङा जाये, तो महज् इस तापमान वृद्धि के सीधे असर के कारण ही समुद्रों का तापमान 35 इंच तक बढ सकता है। तापमान यदि सचमुच यह आंकङा छूने में सफल रहा, तो समुद्री चक्रवातों की संख्या और बढेगी। हिंद महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक सुंदरबन, बांग्ला देश, मिस़्त्र और अमेरिका के फ्लोरिडा जैसे निचले प्रांत सबसे पहले इसका खामियाजा भुगतेंगे। बांग्ला देश का लगभग 15 फीसदी और हमारे शानदार सुंदरबन का तो लगभग पूरा क्षेत्रफल ही पानी में डूब जायेगा। 
हालांकि भारतीय महासागर में समुद्र तल में बढोतरी को लेकर भारत के पृथ्वी विज्ञान विभाग मंत्रालय का मानना है कि इसका कारण जलवायु परिवर्तन या तापमान वृद्धि ही है; यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। अटकलें लगाई जा रही हैं कि यह नदियों में पानी बढने अथवा भूकंप के कारण समुद्री बेसिन में सिकुङन की वजह से भी हो सकता है। इसका कारण प्रत्येक साढे 18 वर्ष में आने वाला टाइड भी हो सकता है, किंतु समुंद्रो का सामने दिख रहा सच कुछ और नहीं हो सकता। 
जमे हुए ग्रीनलैंड की बर्फ भी अब पिघलने लगी है। हिमालयी ग्लेशियरों का 2077 वर्ग किलोमीटर का रकबा पिछले 50 वर्षों में 500 वर्ग किमी घट गया है। पिछले दशक की तुलना में धरती के समुदों का तल भी 6 से 8 इंच बढ गया है। समुदों का तल 6 से 8 इंच बढने की खबर का असर, भारत के सुंदरबन से लेकर पश्चिमी घाटों तक नुमाया हो गया है। समुद हर बरस हमारे और करीब आता जा रहा है। इसका मतलब है कि समुद्र फैल रहा है। इसका यह भी मतलब है कि उसका जलस्तर बढ रहा है; मुंबई, विशाखापतनम, कोचीन और सुंदरबन में क्रमशः 0.8, 0.9, 1.2 और 3.14 मिलीमीटर प्रतिवर्ष। इसका मतलब है कि भारतीय समुद्र के जलस्तर में प्रतिवर्ष औसतन 1.29 मिमी की बढ़ोत्तरी हो रही है। करीब 13 साल पहले प्रशांत महासागर के एक टापू किरीबाटी को हम समुद्र में खो चुके हैं। ताज्जुब नहीं कि वनुबाटू द्वीप के लोग द्वीप छोङने को विवश हुए। न्यू गिनी के लोगों को भी एक टापू से पलायन करना पङा। भारत के सुंदरबन इलाके में स्थित लोहाचारा टापू भी आखिरकार डूब ही गया। जिस अमेरिका में पहले वर्ष में 5-7 समुद्री चक्रवात का औसत था, उसकी संख्या 25 से 30 हो गई है। न्यू आर्लिएंस नामक शहर ऐसे ही चक्रवात में नेस्तनाबूद हो गया। क्या सुनामी, समुद्री चक्रवातों की आवृति और समुद्र के जलस्तर में वृद्धि के संकेतों को हम नजरअंदाज कर सकते हैं ? 
फिर भी जारी तथाकथित विकास

तिब्बत में हर दस साल में 0.3 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ रहा है और चीन, 2015 का सबसे गर्म देश घोषित कर दिया गया है; पनबिजली बांधों के कारण डेल्टा बढऋ रहे हैं। समुद्र के काम में खलल पङ रहा है; बावजूद इसके चीन क्या कर रहा है ? ; इंटरनेशनल रिवर्स’ नामक संगठन के मुताबिक, चीन तिब्बत से सागर तक जाने वाली 5000 किलोमीटर लंबी मेकेांग नदी पर 6 मेगा बांध बना चुका है, 14 और की योजना बना रहा है। इसी तर्ज पर लाओस, कम्बोडिया, थाईलैंड और वियननाम भी लोअर मेकोंग पर बांधों की श्रृखला बनाने की सोच रहे है। भारत भी अपनी हिमालयी नदियों पर यही कर रहा है। 
सबक

हमारा कचरा और हमारे कृत्य मिलकर, हमारे पानी, मिट्टी, वायु और शरीर को विष से भर देंगे। जलवायु परिवर्तन, इसमें सहायक होगा। यह चित्र साफ है; फिर भी सोच नहीं रहे। आइये, इस अंतर्संबंध के बारे मंे सोचें और कचरा, समुद्र, नदी और अपनी जीवन शैली में संतुलन साधने के प्रयास तेज कर दें। जलवायु परिवर्तन के समुद्री और हवाई परिदृश्य का सबक फिलहाल यही है।
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