लेखक: अरुण तिवारी

कई बार..कई बातों को लेकर धुर असहमति के बावजूद, जलपुरुष राजेन्द्र सिंह से कायम मेरे रिश्ते की वजह आपसी समझ है। उन्हे अच्छा लगता है, जब उनकी राय को अपनी राय के अनुकूल बनाने के लिए मैं अक्सर बंद किवाङों को खोलने का मार्ग अपनाता हूं। उस दिन भी मंै याद दिलाने की कोशिश कर रहा था कि डाॅक्टरी पढने के बावजूद उन्होने गांव में रहकर काम करना पसंद किया। गांव में भी डाॅक्टरी की बजाय, फावङा उठाकर जोहङ खोदने का काम अपनाया। यह सब उन्होने सहज् भाव से किया। ऐसा करते हुए उन्हे कोई डर नहीं लगा। आजकल कोई पढ-लिखकर वापस गांव में मिट्टी खोदने के काम में लगे, तो अक्सर लोग उसे ’रिजेक्टिड यूथ’ मानकर सहानुभूति, उपहास या बेकद्री जतायेंगे।
दरअसल, मैं गांवों को लेकर चिंतित था। मेरेे मन में कई सवाल थे: आजकल पढने-लिखने के बाद नौजवान गांव में क्यों नहीं रहना चाहते ? अब कैरियर और पैकेज पर इतना जोर क्यों है ? आज के नौजवान अपने को इतना असुरक्षित क्यों महसूस करते हैं कि बिना आर्थिक सुरक्षा काम करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते ? किसी काम को करने की एवज् में क्या हासिल होगा ? इसका उत्तर मिले बगैर आज कोई काम क्यों नहीं करना चाहता ? ’’कर्मण्ये वा अधिकारस्ते…’’ का गीता संदेश और कबीर की फक्कङी क्या सिर्फ किताबों में पढने की बात रह गई है ? आजकल ऐसा वातावरण क्यूं है ?
मेरे इन प्रश्नों का जवाब देने की कोशिश में राजेन्द्र सिंह के जेहन में उनकेे स्कूल के दिन जिंदा हो गये। तब भी उनका मन खेत, खेलिहान और मवेशियों के बीच ज्यादा लगता था। यही उनके खेल थे। सचमुच, तब पढाई भी एक खेल जैसी ही थी। हम पढते थे, लेकिन उसका बोझ नहीं मानते थे। हालांकि वह जाति-भेद का जमाना था; लेकिन विभिन्न जातियों के बीच भी एक अनकहा सा रिश्ता था। पूरा गांव हमारा घर था। पैसा कम था, लेकिन अपनापन बेशुमार!
जब राजेन्द्र सिंह ने पढाई पूरी की, वह गांव में रहना चाहता था। पिताजी ने कहा -’’जिंदगी बनाना चाहता है तो गांव छोङकर चला जा। नहीं तो न इधर का रहेगा, न उधर का।’’ वह बहुत रोये। उन्होने सोचा कि पिताजी उन्हे गांव में क्यों नहीं रहने देना चाहते ? जवानी में गलतियां हो जाया करती हैं। किंतु उन्होने तो ऐसी कोई गलती भी नहीं की थी, पिताजी यह बेरुखी दिखायें। उन्होने मां से कहा। मां ने समझाया कि पिताजी ने कुछ सोच कर ही कहा होगा। 
मैं समझता हूं कि उनके इस रुख की वजह शायद यह थी कि उस वक्त एक वातावरण था, जो विद्यार्थियों को राष्ट्रहित में चिंतन के लिए प्रेरित करता था। तब विद्यार्थियों को हर वक्त कैरियर की चिंता नहीं होती थी; स्कूल की उम्र तक तो कतई नहीं। युवाओं के भीतर भीतर उत्साह होता था; पढाई से भिन्न कुछ करने का। जब कोई सामाजिक या राजनैतिक जलसा होता था, तो कोई कहता नहीं था कि आओ; युवा स्वयं जाते थे; एक उतावली, एक जिज्ञासा के साथ। 
कारण शायद यह था कि तब अध्यापकों के चिंतन में राष्ट्रहित की संवेदना दिखती थी। वे शारीरिक संरचना के जटिल विज्ञान को पढाते-पढाते भारत की सामाजिक संरचना में बढ आई जटिलता पर चिंतित होने लगते थे। राजेन्द्र कहते हैं कि अध्यापकों की चिंता कभी-कभी उन्हे इतनी उद्वेलित कर देती थी कि मन करता था कि अभी साईकिल उठाऊ और निकल पङूं। अध्यापक हमारे कान खटाई करते थे; बेंत से भी सुध लेते थे। लेकिन वे हमारी निजी चिंताओं को अपनी निजी ंिचता समझते थे। उनके प्यार के साथ-साथ उनकी एक-एक बात हमें आकर्षित करती थी। अक्सर विद्यार्थी किसी न किसी अध्यापक में अपना ’रोल माॅडल’ देखते थे। उनके व्यवहार से हम सीखते थे। गुरु-शिष्य के बीच की वह दुनिया, सचमुच बहुत अच्छी थी। 
एक समय आया कि जब राजेन्द्र ने भारत सरकार की सेवा छोङकर गांव की सेवा का मन बनाया। उस वक्त तरुण भारत संघ, जयपुर के अध्यापकों और विद्यार्थियों का एक साझा संगठन था। उन्होने तरुण भारत संघ को गांव ले जाने की जिद्द की, तो उन्हे न तो किसी आर्थिक सुरक्षा का आश्वासन था और न कोई अन्य। कहते हैं-’’आत्मा से कह रहा हूं कि मेरे मन में यह भाव कभी आया ही नहीं, न तब और न अब। हां, उस वक्त पत्नी ने एक बार जरूर कहा कि यदि पालने नहीं थे, तो बच्चे पैदा क्यों किए। किंतु मुझे अपने से ज्यादा पत्नी पर भरोसा था। इससे भी ज्यादा मुझे इस बात का भरोसा था कि काम करने वाला कभी भूखा नहीं मरता। आज नई पौध अपनी भूख के इंतजाम की पूर्ति की चिंता पहले करती है, काम की बाद में। ऐसा क्यों है ? इस बात पर मैने बहुत गहरे से विचार किया है।’’
’’मैं अनुभव करता हूं कि यह आज के नौजवानों की गलती नहीं है; गलती वातावारण निर्माण करने वालों की है। हमने ऐसे वातावरण का निर्माण कर दिया है कि हर काम-काज, रिश्ते-नाते और विचार के केन्द्र में पैसा आ गया है। पैसा के बिना कुछ नहीं हो सकता। पैसा होगा, तो सब कुछ होगा; शोहरत, इज्जत, रिश्ते-नाते; यह भाव गहरा गया है। इस भाव का प्रभाव सामाजिक काम करने वालों पर दिखना भी स्वाभाविक है। सामाजिक काम में गिरावट आई है। देखने वालों का नजरिया बदला है। पहले यह काम स्वेच्छा से होता था, अब एनजीओ हो गया। कहा जा रहा है कि जिनके मन में सरकारी हो जाने की लालसा थी, वे नहीं हो पाये तो गैरसरकारी संगठन हो गये।’’ 
सच है कि 1990 के बाद इस ’एनजीओ’ नामकरण ने ज्यादा ख्याति पाई। उदारीकरण के नाम पर हुए हमारे वैचारिक बाजारीकरण ने हमारे सामाजिक काम का भी बाजारीकरण किया। दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्वैच्छिक कार्य की रफ्तार धीमी पङी है। फिर भी राजेन्द्र मेरे के प्रश्नों से निराश नहीं हैं। वह कहते हैं-’’उत्थान और पतन तो दुनिया में हमेशा हुआ है। मुझे इस अंधेरे से ही रोशनी आती दिखाई दे रही है। अभी भी ऐसे लोग हैं कि जो सूरज से रोशनी नहीं लेते। वे अपने जीवन को गौरवान्वित करने की रोशनी ढूंढने घोर अंधेरे के बीच जाते हैं और एक दिन खुद दूसरों के लिए रौशनी बन जाते हैं। खासकर मध्यम-उच्च मध्यम वर्गीय नौजवानों के भीतर ऐसी रोशनी बनने की बेचैनी में देख रहा हूं। देखना, एक दिन यह अंधेरा फिर छटेगा; रोशनी देने का काम फिर रोशन होगा।’’
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