लेखक: अरुण तिवारी

वर्ष 2012 में राष्ट्रीय वर्षाजल क्षेत्र प्राधिकरण के तत्कालीन मुख्य कार्यकारी अधिकारी डाॅ. सामरा ने बुंदेलखण्ड पैकेज की समीक्षा करते हुए नलकूपों को प्रोत्साहन के संकेत दिए थे। यह सुझाव पूरे देश में संकटग्रस्त एक्यूफरों की नित बढती संख्या को और बढ़ायेगा। बुदेलखण्ड के तो यह प्राण ही ले लेगा। दरअसल, जलनिकासी परियोजनायें हमेशा से ही जलसंसाधन मंत्रालय की प्राथमिकता पर रही हैं। जलसंचयन कभी उसकी प्राथमिकता नहीं बन सका। इस पर टिप्पणी आवश्यक है। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह लेख:
कभी-कभी लगता है कि भारत के केंद्रीय जलसंसाधन मंत्रालय का नाम बदलकर केंद्रीय जलनिकासी मंत्रालय रख देना चाहिए। पानी की कमी की समस्या कहीं भी हो, कभी भी हो…. मंत्रालय को समाधान जलनिकासी ही लगता है। अब तक की सारी पंचवर्षीय योजनाओं का आकलन करें, तो पायेंगे कि जलबजट का सबसे बङा हिस्सा जलनिकासी व जलनिकासी के हालात बनाने वाली सिंचाई बांध परियोजनाओं पर खर्च हुआ है।
बहुत संभव है कि हाथों से रेत खोदकर उतराये पानी को पीकर प्यास बुझाने के अनुभव से पहली बार गहरे से जलनिकासी का ख्याल आया हो। फिर अस्तित्व में आईं होंगी ठेठ रेगिस्तान की कुंइयां। कुंआ, जलनिकासी का पहला स्थायी ढांचा था। यह पहली बार हङप्पा सभ्यता में अस्तित्व में आया। फिर हैंडपंप। अलग-अलग नंबर की मशीने। फिर बोरवैल, ट्युबवैल ओर अब समर्सिबल। नेताओं की सबसे प्रिय… वोटबैक बढाने की मशीन – इंडियामार्का ! ये सभी भारत में पहली बार कब अस्तित्व में आये; इसका कोई पक्का रिकार्ड अभी तक मेरी नजर में नहीं आया। इनका अविष्कार किसने किया; यह भी मेरे सामान्य ज्ञान से परे है। …किंतु इतना अवश्य कह सकता हूं कि जब-जब पानी नीचे उतरा, तब-तब भारत की सरकार ने समाधान के रूप में इन्हे ही पेश किया। 

कुएं का पानी उतरने लगे, तो हैंडपम्प। हैंडपम्प की चार और छह नंबर की मशीन काम करना बंद कर दे, तो इंडिया मार्का। स्वजल परियोजना !  रहट, चङस और दुगले से होने वाली सिंचाई के श्रम से मुक्ति दिलानी हो, तो सरकारी ट्युबवैल। निजी ट्युबवैल के लिए सब्सिडी। जहां ट्युबवैल जवाब दे जाये, वहां समर्सिबल। यही हाल शहरी जलापूर्ति का है। आगे जब समर्सिबल भी जवाब दे जायेंगे, तब जलसंसाधन मत्रालय के इंजीनियर जरूर कोई न कोई पातालतोङ जलनिकासी संयंत्र खोज लायेंगे। सो, चिंता की कोई बात नहीं। गोया धरती के भीतर पानी का कोई अन्तत भंडार हो कि बस! नीचे उतरो और पानी ऊपर खींच लाओ। मानव-मवेशी श्रम की बजाय बिजली-ईंधन चालित मशीनों को प्राथमिकता पर लाओ और फिर हाय बिजली ! हाय डीजल !! चिल्लाओ। बिजली और डीजल की कीमतें जिस तरह आगे भी बेलगाम ही रहने के संकेत हैं, यह हाय-हाय आगे और बढने ही वाली है। कम होने के कोई आसार नहीं।  
एक क्षण को मान लेते हैं कि इंजीनियरों को मशीनों से प्यार होता है। उन्हे मशीनों की खरीद और कमीशन प्रिय होता है। अतः वे पानी की हर समस्या का समाधान मशीनों में खोजते हैं। वह भी जलनिकासी की मशीनों में। ताकि समस्या आगे और बढे। मशीनो की जरूरत पङती रहे और कमीशन खाने का रास्ता बना रहे। लेकिन क्या जलसंसाधन मंत्रालय के योजनाकार भी यह नहीं जानते कि धरती के भीतर यदि कहीं से पानी आता है, तो वह है – वर्षाजल ? धरती के भीतर पानी का कोई स्त्रोत नहीं होता। जो कुछ होता है, वह आकाश से बरसे वर्षाजल संचयन का ही परिणाम होता है। 
मैं यह प्रश्न इसलिए उठा रहा हूूं कि चंूकि भारत सरकार का राष्ट्रीय वर्षाजल क्षेत्र प्राधिकरण भी समाधान के रूप नलकूप ही सुझा रहा है। जबकि प्राधिकरण का काम ऐसे इलाकों में जलप्रबंधन सुनिश्चित करना है, जहां खेती सीधे-सीधे बारिश पर निर्भर करती है; वह भी एक ऐसे इलाके में, जहां धरती के भीतर 5-7 फीट पर ही पत्थर की चट्टानी परत पायी जाती है। मतलब यह कि वहां पानी के एक्यूफर बहुत गहरे नहीं है। धरती का पेट बहुत छोटा है। वहां वर्षाजल का ज्यादा भंडारण भी संभव नहीं हैै। यदि चट्टानों को छेदकर नलकूप लगा दिए गये, तो रही – सही भंडारण क्षमता भी छेद के साथ नीचे चली जायेगी। मैं बुदेलखण्ड की बात कर रहा हूं।
उल्लेखनीय है कि बुंदेलखण्ड में चंदेलों के बनाये स्थानीय तालाबों ने ही कभी बांदा को धान का कटोरा बनाया था। बुंदेलखण्ड के स्थानीय वर्षाजल संचयन ढांचों को देखकर ही कभी जलसंचयन पर ’’आज भी खरे है तालाब’’ जैसी लोकप्रिय पुस्तक लिखी गई। ऐसे अतीत को ध्यान में रखते हुए बुंदेलखण्ड में वर्षाजल के अधिक से अधिक संचयन और उसके अनुशासित उपयोग की सलाह देने की जरूरत है। यहां जंगल व छोटी वनस्पति को बढाकर और खनन पर लगाम लगाकर वर्षाजल का भंडारण बढाया जा सकता है। बुंदेलखण्ड में आजीविका हेतु मवेशी व दूसरे कुटीर उद्योगों पर निर्भरता बढाने व खेती पर निर्भरता घटाने की जरूरत है। कम पानी में अच्छी खेती व उसके अधिक मूल्य सुनिश्चित करने की जरूरत है। 
डा. जे. एस. सामरा राष्ट्रीय वर्षाजल क्षेत्र प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी है। ताज्जुब है कि वर्ष 2012 में बुंदेलखण्ड पैकेज की समीक्षा करते हुए वउन्होने ऐसे इलाके में नलकूप को प्रोत्साहित करने वाले सुझाव दिए। उन्होने निजी नलकूप हेतु सब्सिडी देने की बात की। छोटे काश्तकारों को सरकार द्वारा सामूहिक नलकूप स्थापित कर प्रबंधन हेतु काश्तकार समिति को सौंप देने की बात की। पंजाब, हरियाणा और गुजरात की तरह देश के दूसरे राज्यों में भी वह नलकूपों के लिए अलग बिजली फीडर की वकालत की। शुक्र है उन्होने उत्तर प्रदेश में सत्तारुढ़ समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र मुताबिक, मुफ्त बिजली और पानी मुहैया कराने का सुझाव देने की बात नहीं कही।   
डा सामरा का तर्क है – ’’देश में 65 फीसदी सिंचाई नलकूप से होती है। नहरों में प्रति हेक्टेयर ढाई लाख रुपये के निवेश की जरूरत होती है। नलकूपों में सवा लाख रूपये प्रति हेक्टेयर। नहरों में पानी बर्बाद ज्यादा होता है। नलकूप पानी का कम दोहन करते हैं। नहरों की तुलना में नलकूप से सिंचाई करने वाले खेतों में उत्पादन ज्यादा होता है। नहरों में 100 फीसदी पैसा सरकार लगाती है। नलकूप में 100 फीसदी पैसा किसान लगाता है। अतः जरूरी है कि केंद्र सरकार नलकूप से सिंचाई करने वाले किसानों को सहूलियत दी जाये। इसके लिए केंद्र सरकार एक नई योजना तैयार कर रही है।’’ 

डा सामरा के ये सभी तर्क सही हो सकते हैं। सिंचाई की फव्वारा पद्धति अपनाने की उनकी सलाह भी वाजिब है। लेकिन शायद वह भूल गये हैं कि एक ओर सरकार खेती में सबसे ज्यादा पानी की खपत का रोना रो रही है। प्रधानमंत्री जलदोहन क्षमता में 20 फीसदी सुधार के का आहृान् कर रहे हैं। भूजल को भू-मालिक की मिल्कियत से निकालकर सरकार के कब्जे में लाने की बात कर रहे हैं। केंद्रीय जलसंसाधन मंत्रालय कह रहा है कि 65 वर्षों में उपयोगी जल की उपलब्धता घटकर एक-तिहाई हो गई है। आकलन बता रहे हैं कि देश मेें भूजल के 70 फीसदी एक्यूफर संकटग्रस्त है। गहरी होती जलनिकासी के कारण ही झारखण्ड, बिहार, बंगाल और यू पी के कई इलाकों के भूजल में भी आर्सेनिक नामक खतरनाक जहर की मौजूदगी मिली है और फ्लोराइड की अधिकता वाले इलाके बढ रहे हैं। ऐसे में जलनिकासी को प्रोत्साहन देने की बात करना वोट बैंक बढाने के फौरी आइडिया से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता। कुछ साल बाद इसका ढोल भी फूट जायेगा। जिस तरह नलकूपों को अलग बिजली फीडर वाले पंजाब, हरियाणा और गुजरात में फूट चुका है। आज ये तीनो ही तेजी से बेपानी होते राज्य हैं। 

एक बार विश्व बैंक की स्वजल नामक परियोजना भी इसी प्रकार गहरे बोर वाले इंडियामार्का हैंडपम्प लेकर आई थी। आज यही इंडिया मार्का नेता और कुंओं के लिए आफत बन गये हैं। उत्तराखण्ड के पहाङी गांवों और रास्तो पर लगे 40 प्रतिशत इंडियामार्का एक साल में ही फेल हो गये। दूसरे इलाकों में इन्होने कुंओं को बेकार बना दिया है। कई इलाकों में अब इंडिया मार्का भी बेकार हो रहे हैं। आगे क्या ? दरअसल जरूरत नलकूपों को 24 घंटे धकाधक पानी निकालने हेतु बिजली मुहैया कराने की नहीं, उससे पहले इनके मालिकों को कम पानी मेें भी अधिक उत्पादन की अनुशासित कृषि प्रणाली सिखाने व कम पानी की फसलों को अधिक मूल्य देकर प्रोत्साहित करने की है।
मै नहरों के दुष्परिणामों से भली-भांति वाकिफ हूं। मैं नलकूपों की जरूरत से भी इंकार नहीं करता। लेकिन डा सामरा का सुझााव कम से कम बुंदेलखण्ड के लिए तो हितकर नहीं ही है। गौरतलब है कि पूरे देश में यह चर्चा आम है कि नलकूप नीचे उतर रहे है। सिंचाई हेतु जहां एक भी समर्सिबल पहुंच गया हैं, वहां आसपास के कई ट्युबवैल, कुंए, तालाब और हैंडपम्पों की छुट्टी हो गई है। लोगों को ट्युबवैल के पाइप कबाङ में बेचने पङ रहे हैं और पीने का पानी पाने के लिए समर्सिबल मालिकों की मिन्नते करनी पङ रही है। यह नया परिदृश्य.. नई चेतावनी है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 
सरकार सुनना चाहे तो इतना ही कहा जा सकता है कि नलकूपों को प्रोत्साहन देने से पहले नलकूपों के लिए धरती के भीतर पानी संजोने की परियोजनाओं को तो जमीन पर उतारकर दिखाइए। पहले यह सुनिश्चित कीजिए कि भूगर्भ में निकालने लायक पानी का भंडार हमेशा बचा रहेगा। जितना जोर आज जलनिकासी पर है, जब तक उससे ज्यादा जोर जलसंचयन पर सुनिश्चित नहीं हो जाता, मंत्रालय का नाम जलसंसाधन बने रहना ठीक नहीं। माननीया जलसंसाधन मंत्री जी ! या तो मंत्रालय का नाम बदल डालिए या काम।
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