लेखक: अरुण तिवारी
प्रिय बच्चों, 
जैसे तुम नहीं जानते कि तुम कैसे पैदा हुए, वैसे मैं भी नहीं जानता कि मैं कैसे पैदा हुआ। किंतु मुझे इतना पता है कि सबसे पहले मैं ही पैदा हुआ; क्योंकि जब मैं पैदा हुआ, तो मुझे अपने सिवाय कुछ नहीं दिखाई दिया। इंसान का तो तब कहीं अता-पता भी नहीं था। चारों तरफ बस, मैं ही मैं था यानी पानी ही पानी। 
मेरी उत्पत्ति
तुम्हारे पूर्वजों द्वारा रचा एक ग्रंथ है – मनुस्मृति। इसके प्रथम अध्याय (सृष्टि) का दसवें मंत्र के अनुसार कहूं तो मैं, नर से प्रकट हुआ था:  
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
तासू शेते स यस्माच्च तेन नारायणः स्मृतः।।
इसका मतलब है कि जल, नर से प्रकट हुआ है, इसलिए इसका नाम ’नार’ है। भगवान इसमें अयन करते हैं यानी सोते हैं, इसलिए उन्हे नारायण कहा गया।
सबसे पुराना मैं
कहने वाले कहते हैं कि जीवन, सबसे पहले समंदर में पाई जाने वाली मूंगा भित्तियों में आया। मैं पूछता हूं कि आखिर मैं भी तो सांस लेता हूं; मुझे भी सांस लेने के लिए आॅक्सीजन की जरूरत होती है; आॅक्सीजन की कमी होने पर मेरी भी संास घुटने लगती है, तो आखिर मुझे भी तो जीवित की श्रेणी में रखना चाहिए कि नहीं ? 
यूं भी मूंगा भित्तियां मुझसे पहले कैसे आ सकती थीं ? पृथ्वी तो बाद में कछुए की पीठ की तरह एक तरह से मेरे गर्भ से निकलकर ऊपर आई। वनस्पति, बादल, इंसान सब बाद में आये। सब मेरी ही संतानें हैं। भ से भूमि, ग से गगन, व से वायु, अ से अग्नि और न से नीर: इन पांचों को जोङो, तो क्या हुआ ?  ’भगवान’ हुआ न ? इस तरह हम पंचतत्वों को इंसान ने भगवान का नाम दे दिया। क्यों ? क्योंकि हमने  हमने मिलकर ही तुम्हारी दुनिया बनाई; तो एक बात तो पक्की हो गई कि अगर तुमसे कोई पूछे कि तुम्हारी दुनिया में सबसे लंबी उम्र किसकी है, तो तुम दावे के साथ कह सकते हो – ’’पानी की’’। 
मेरा नामकरण
मेरा नामकरण, मेरी ही संतान इंसानों ने किया। नीर, जल, वाटर जैसे कई नाम मुझे दिए। तुम्हारे भारत देश ने आकाश से बरसते जल को इन्द्रजल, भूमि के नीचे के जल को वरुण जल कहा। इन्द्रजल का वेग, बहुत होता है और वरूणजल विनम्रभाव से बहता है। ऐसे ही नाद् स्वर से उत्पन्न होने के कारण, भूमि के समानान्तर और लगातार बहते प्रवाहों को नदी कह दिया। पहाङी स्पर्श के साथ ऊंचाई से लगातार झरते जल को झरना कह दिया। वैज्ञानिकों ने मेरी संचरना में हाइड्रोजन और आॅक्सीजन रासायनिक तत्वों के कारण मुझे ’एच2ओ’ कहा। हाइडोजन और आॅक्सीजन ऐसे नहीं मिलते, आकाश में एक खास तरह को स्पार्क इन्हे जोङता है। तभी बादल बरसते हैं। यदि ऐसा न होता, तो वैज्ञानिक, किसी भी प्रयोगशाला में मुझे बना लेते। वह आज तक ऐसा नहीं कर पाया। 
मेरी तारीफ
खैर, देखता हूं कि जीवों में इंसान, सबसे होशियार जीव है। चाहे जन्म को मौका हो, विवाह का अथवा मृत्यु का… इंसान मेरा आशीष लेने जरूर आया। उसने मेरी खूब तारीफ की: ’’जल ही जीवन है; जल, अमृत है; जल में औषधीय गुण हैं; जल न हो, तो कुछ न हो वगैरह वगैरह..’’ 
दरअसल, मैं हूं ही इतना अच्छा। कोई मुझे उपयोग करे, मैं आपत्ति नहीं करता। वनस्पति, जीव या समूची पृथ्वी, मुझसे भीगना चाहे, सूर्य मेरा पान करना चाहे या फिर वायु मुझसे शीतल होना चाहे, मैं किसी को नहीं रोकता। इंसान, आज मुझे घुमा भी रहा है, रोक भी रहा है, बांधने की भी कोशिश कर रहा है; मुझमें गंदगी भी डाल रहा है। मुझे कष्ट तो होता है, लेकिन मैं कहां कुछ बोलता हूं। बोलूं भी तो कौन मेरी बोली समझ पाता है। शायद तुम समझो, इसीलिए तुम बच्चों से अपनी कहानी कह रहा हूं।
मैं और इंसान
फिलहाल समझो कि जब इंसान जंगलों में अकेले-दुकेले भागते-भटकते थक गया, तो उसने देखा कि पानी हो, तो कुछ उगाया जा सकता है। वह पानी देखकर वहां टिक गया। जब कुछ उगाने की ललक हुई, तो साझे की जरूरत खुद-ब-खुद हो गई। इस तरह इंसान का एक परिवार हो गया; फिर कई परिवार और फिर आगे चलकर गांव। एक जगह, एक साथ कई परिवारांे के रहने की ललक के चलते पानी की जरूरत बढ़ी, तो इंसान ने अपनी मेहनत से आसमान से बरसे पानी को सालभर संजोकर रखने के लिए तालाब, झालरे, टांके, कुण्ड, चाल, खाल, पाल… आगे चलकर न जाने क्या-क्या तकनीक और नाम से जल ढांचे बनाये। 
इंसान ने अपने लिए पानी की जरूरत का इंतजाम करना न सिर्फ बहुत जल्द सीख लिया था, बल्कि उसने इसकी सुंदर व्यवस्था भी बना ली थी। अक्सर तो समाज की अपनी व्यवस्था थी, लेकिन जरूरत पङने पर राजा, पानी के ढांचों के लिए ज़मीन व धन मुहैया कराता था और समाज अपने श्रम से योगदान करता था। तालाब, कुआं, बावङी बनाना, प्यासे के लिए प्याऊ लगाना तो धार्मिक दृष्टि से भी पुण्य का काम माना गया। एक समय में पानी के ढांचे बनाने वाले असली इंजीनियर तो दक्षिण में नीरघंटी, छत्तीसगढ़ में रामनामी, महाराष्ट्र में चितपावन, जें राजस्थान के पुष्करणा, व बंजारे ही थे।
मैं और मेरी मशीनें
धरती से पानी निकालने के लिए कुंए तो शुरु में ही बना लिए थे। कुंए से मुझे निकालने के लिए चरखी, चङस, रहट बनाये। नया जमाना आया, तो इंसान ने धरती में बोर करके यानी छेद करके इसके गहरे तलों से पानी निकालने के लिए हैंडपम्प बनाये, उसमें भी चार इंची और छह इंची मशीन और इंडियामार्का बनाया। जैसे-जैसे मैं भूमि के ऊपरी तल से नीचे उतरता गया, इंसान भी बोरवैल, ट्युबवैल मोटरपम्प, समर्सिबल पम्प और अब तो जेट्पम्प जैसी मशीनें ले आया है। पानी गंदा करने और फिर उसे साफ करने के उपाय भी इंसान ने कम नहीं किए। सीवेज, फिल्टर, आर ओ… सब तुम जानते ही हो।
मैं और इंसानी सभ्यतायें
दरअसल, अधिक से अधिक सुविधा जुटाने की लत इंसान की बहुत पुरानी है। इसी लत के कारण, अधिक पानी की जरूरत की स्थिति में इंसान ने कभी नदियों के ऊंचे तटों के आसपास बसना शुरु किया था। सुविधा जुटाने की इस लत को उसने बङी होशियारी के साथ ’सभ्यता’ का नाम दे दिया। नदियों के नाम पर सभ्यताओं का भी नामकरण कर दिया। यूरोप में डैन्यबू, मिस्त्र में नील, मध्य एशिया में दजला, फरात, आमू, सर, चीन में यांगत्सी, भारत में गोदावरी, कावेरी से लेकर पंजाब की पंाच नदियों के किनारेे कई सभ्यतायें बसा दीं। उत्तरकाशी, श्रीनगर गढ़वाल, हरिद्वार, दिल्ली, आगरा, कानपुर, इलाहाबाद, पटना, कोलकोता, मुंबई, हैदराबाद… कितने भारतीय शहरों के नाम गिनाऊं; सभी के सभी नदियों के किनारे ही तो बसे हैं। सभ्यता के विकास में मेरे यानी पानी के योगदान के बारे में आप भूगोल व इतिहास की किताबों में पढ़ सकेंगे। नदियों में स्नान के हर मौके को उत्सव की तरह मनाते तो आप आज भी देखते ही हैं। धर्मग्रंथों में आप पढ़ेंगे कि भारत में नदियों को मां मानकर इनके पूजन का चलन कैसे चला।
मेरे ढांचे भी देवी-देवता
प्रख्यात लेखिका-संपादक मृणाल पाण्डे जी ने तो जल के देवी-देवताओं पर एक पूरा लेख ही लिखा है। लिखती है कि भारत ही नहीं, दुनिया के दूसरे देशों में भी जल के देवी-देवता मानकर पूजा जाता है: मिस्त्र की प्रमुख देवी है – आइसिस। आइसिस के पति ’ओसिरिस’ को भी ’समुद्र का सितारा’ माना जाता है।  नील नदी का देवता है – हापी। यूनान के प्रमुख देवता क्रोनस के पोते ट्राइटन को जल से जुङा माना जाता है। नाएड्स, यूनान की जलपरी के रूप में पूजी गई और अफ्रोफाइड, समुद्र की बेटी के रूप में। रोम में जलदेवता के रूप में नेप्चून और खारे पानी की देवी के रूप में नेप्चून की पत्नी  सलासिया की पूजा होती है। इया,  सुमेर के लोगों की जलदेवी है। लातिस, ब्रितानी झीलों की देवी है। बोआन, आयरलैंड की बोआन नदी की देवी है। वेल्स के लोग, लायर को जलदेवी मानते हैं। रैड इंडियन  कबीलों के बीच ’चलचिटलीक्यू’ जल देवी के रूप में मशहूर है।  
इंसानी चाल और मेरे हाल
यह तो हुई चर्चा मुझे पूजने और मेरे से अपनी जरूरत पूरी करने की, सभ्यता और एक समय की। आप यह भी जानना चाहेंगे कि किसने-किसने मेरी दुर्गति कैसे की। जब मेरी दुर्गति हुई, तो मैने क्या किया ? तुम्हारे कम्पयुटर और इंटरनेट के इस ज़माने में मेरे क्या हाल हैं ?
पानी पोस्ट पर अपने हाल बताने जल्द ही लौटूंगा। 
प्यारे बच्चों, मिलना जरूर। 
आप सभी को प्यार
आपका अपना
पानी  
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