लेखक: अरुण तिवारी

मछली मारना, कई के लिए एक शगल है, तो किसी के लिए पेट भरने की मज़बूरी। बिहार, बंगाल जैसे इलाकों में मछली एक ऐसा भोजन है, जिसे ग्रहण करने में ब्राह्मण वर्ण के लोगों को स्वीकार्य है। भोजन के अलावा, मछली के तेल आदि का इस्तेमाल औषधि के रूप में भी किया जाता है। मछली से मिलने वाली पौष्टिकता भी इससे आहार के लिए स्वीकार्य बनाती है। इसके अलावा मछली का और कोई भी उपयोग है ? ऐसा प्रश्न करने पर सामान्य तौर पर ’नहीं’ में उत्तर आता है। मछली पालन करने वाले भी यही उत्तर देते हैं। ’’बोल मेरी मछली कित्ता पानी….’’ छुटपन से यह कविता पढ़कर बङे हुए, फिर भी हमें याद नहीं रहता।
हम अक्सर भूल जाते हैं कि मछली, भोजन के अलावा भी बहुत कुछ है। कुछ नहीं, तो इस कविता से इतना तो याद रखते कि मछली, नदियों के पानी की गहराई बताने का भी काम करती है। किस नदी और कैसे पानी में कौन सी मछली मिलती है ? इस प्रश्न का उत्तर जानने वाले मछुआरे व विज्ञानी..दोनो के लिए मछली, नदी की नाप, सेहत और दिशा का औजार भी है।

रानी भी, दासी भी
’’मछली, जल की रानी है..’’ ये बचपन में पढ़ी कविता के सिर्फ बोल नहीं है, मछली, सचमुच पानी में रहने वालों की रानी है; एक ऐसी रानी, जिसे गंदगी पसंद नहीं; जो खुद पानी को साफ करती है। इस नाते, मछली, चाहे समुद्र में हो या फिर नदी, तालाब, झील में, वह रानी भी है और दासी भी। यूं शैवाल व अन्य वनस्पतियां, मछली का भोजन होते हैं, किंतु वह पानी में मौजूद कचरे को खाकर उसे स्वच्छ करने में हमारी मदद करती है। समुद्री कचरे पर एक ताजा शोध इस दिशा में प्रमाण देता है।
मछली, सहयोगी: इंसान, विरोधी
हमें याद करना चाहिए कि मछली की उछल-कूद और लगातार गतिमान रहने से पानी में जो हलचल होती है, वह पानी के लिए कितनी लाभदायक है ? इससे पानी के भीतर आॅक्सीकरण की प्रक्रिया को कितनी मदद मिलती है ? सोचिए, एक तरफ मछलियां हैं कि जो पानी में प्राणवायु बढ़ाने में मदद का काम करती हैं, दूसरी तरफ हम इंसान हैं कि जो नदी से प्राणवायु छीनने का काम करते हैं! मछली, कोई एक काम ऐसा नहीं करती, जिससे इंसानों का कोई नुकसान होता हो। हम हैं कि हमने अपने कृत्यों से समुद्र और नदी ही नहीं, मछलियों का जीना भी मुहाल कर रखा है। मछलियों की कितनी किस्मों के दर्शन अब हमने दुर्लभ बना दिए हैं। मूर्ति विसर्जन जैसी गतिविधियों से उन्हे बीमार बना रहे हैं। दुनिया नदी व समुद्र को छोङकर, अन्य जल ढांचों में मछली पालने के मामले में भारत दुनिया का नंबर एक देश है। किंतु नदियों में पलने वाली मछलियों की भारत ने खूब उपेक्षा की है। नदी मछली जीवन प्रबंधन पर हमारी कोई दृष्टि व ललक नहीं है। उलटे, बांधों, बैराजों, प्रदूषकों और जल निकासी के जरिए हमने मछलियों पर बुरा असर डाला है। 
इसीलिए मत्स्य दिवस
हमारी इन्ही हरकतों की वजह से आये संकट के कारण विश्व दिवसों में एक दिवस, विश्व मत्स्य दिवस के नाम से भी जुङ गया है। 21 नवबंर को यह दिवस मनाया जाता है। मछली की महत्ता बताने के लिए इस वर्ष भी विश्व मत्स्य दिवस के आयोजन हुए। उङीसा में भी एक आयोजन हआ। लक्ष्य था: मछली संरक्षण के लिए समुद्री तट नियमन क्षेत्र (कोस्ट्रल रेगुलेशन ज़ोन ’सीआरज़ेड’) संबंधी अधिसूचना तथा समुद्र तटीय संस्थानों को शक्ति देना। कोस्ट काउंसिल नेयूएए, सीपीआर तथा उङीसा टेªडिशनल फिश वर्कर्स यूनियन के साथ मिलकर यह आयोजन किया। 
अधिसूचना की पालना जरूरी
कोस्ट काउंसिल के संयोजक श्री सुदर्शन क्षोत्रय से प्राप्त ई मेल में कहा गया है कि उङीसा के पास 482 लंबे तट हैं। प्राकृतिक आपदा और जलवायु परिवर्तन ने इन पर नकारात्मक प्रभाव डाला है। उङीसा के 12 तटीय इलाकों को खासतौर संकटग्रस्त माना गया है। ऐसे इलाकों के पर्यावास पर आये संकट ने स्थानीय लोगों की आजीविका के परंपरागत साधनों पर संकट ला दिया है। इनमें सुधार के लिए तट नियमन के संबंध में 2011 में जारी हुई अधिसूचना की पालना जरूरी है। तटों के नियोजन व प्रबंधन के लिए तटीय संस्थानों को जिला स्तर तक उतारने की जरूरत है, जिसमें प्रगति नहीं हुई। उन्होने प्रभावी पालना हेतु प्रभावी तंत्र बनाने की मांग की। 
आयोजन के दौरान उङीसा के राज्य कृषि व मत्स्य मंत्री प्रदीप मोहंती तथा स्वास्थ्य मंत्री श्री अतानू सब्यसाची नायक ने मछुआरों के घर व मुआवजा जैसी मांगों को मानने की बात तो कही, किंतु उस व्यापक क्षति की ओर संभवतः उनका ध्यान भी नहीं गया, जिसकी भरपाई मछली, समंदर, कुदरत और इंसान… सभी की के लिए हितकर है। कौन नहीं जानता कि बदलता मौसम और समुद्री का बढ़ता तापमान सबसे पहला संकट तो समुद्री जीव व वनस्पतियों पर ही लाने वाले हैं। उनकी मौत के आंकङे बढे़ंगे, तो उनकी हत्या का एक दोषी और उनकी हत्या से दुष्प्रभावित एक कृति, इंसान को भी माना जायेगा। क्या यह अपने पैर खुद कुल्हाङी मारने वाली बात नहीं हुई ? 
एक-दूजे के लिए
आखिरकार हम कैसे भूल सकते हैं कि प्रकृति ने अपनी रचनाओं को एक डोर में बांधा हैं। सभी का अस्तित्व एक-दूसरे से जुङा है। एक जायेगा, तो दूसरे के जाने का समय दूर नहीं होगा। एक बचेगा, तो दूसरे का जीवन संरक्षण सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। भोजन श्रृंखला का संदेश भी यही है। पानी और मछली का भी यही रिश्ता है। दोनो, एक दूजे के लिए ही बने हैं। अतः जरूरी है कि यदि हमें पानी की चिंता करनी है, तो मछली की चिंता करें और मछली की चिंता करनी है, तो पानी की चिंता करें।
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