इंडिया मार्का में फंसा वाटर मार्क

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पिछले तीन दशक से उत्तर प्रदेश का ’अमेठी’ एक अति विशिष्ठ लोकसभा क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। इस इलाके के पानी की तसवीर पतीली के उस चावल की तरह है, जिसे देखकर आप पानी पर देश के नीति निर्धारकों की दृष्टि का पूरा अंदाजा लगा सकते हैं।
पहले वी वी आई पी सांसद स्व. संजय गांधी ने अमेठी में धान-गन्ना खूब बोने की सलाह दी थी। उन्हे पानी पर बात करने की न फुरसत थी, न समझ। उस वक्त तक अमेठी के समदा-बढै़या जैसे कई तालों की जलराशि विशाल थी और जेठ की दोपहरी में छोटे ताल-तलैयों में भैंसों व चरवाहों की मस्ती आम। मालती-उज्जयिनी जैसी नदियों में कुलाचें मारती टोलियां कभी भी देखी जा सकती थी। बङे उत्सवों के मौके पर नदी के पानी से भोज पकाकर शुद्धता की गारंटी दी जाती थी। कुओं की खुदाई गुङ के शर्बत, लाई-चने के फांके तथा हंसी ठहाकों के साझे से हो जाती थी। कुओं में आठ-दस हाथ की रस्सी से काम चल जाता था। दुगला से पानी उठाकर खेतों तक पहुंचाने के लिए नहरें भी थी। अतः उनमें पानी की आवक से सिंचाई की गारंटी सुनिश्चित की जा सकती थी; बावजूद इनके तब सिंचाई के लिए सरकारी गहरे नलकूप लगाये गये। इस तरह नहरों के बाद दूसरी बार पानी के लिए किसी बाहरी मशीन या प्रणाली पर लोगों की निर्भरता का नमूना सामने आया।
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80 के दशक में एक बाढ़ आई। तालाबों की पाल लांघकर पानी खेतों में भरा रहा; तब राजीव गांधी सांसद थे। बाढ. मुक्ति के लिए उन्होने बढ़ैया ताल जैसे कई बङे तालाबों से जल निकासी के नाले खुदवा दिए। वे आज भी उसी तरह पानी बहाकर तालाब खाली कर देते हैं। उनके इस निर्णय को आसपास के प्रतापगढ़  जैसे कई इलाकों में अपनाया। नतीजे भी सभी ने भुगते। निजी नलकूपों के लिए बांटी गई सब्सिडी ने इस संकट को बढ़ाया ही। लगाये गये कुछेक उद्योगों ने भी आगे चलकर पानी की मात्रा व गुणवत्ता में सेंध लगाई।
राजीव गांधी के जमाने तक अमेठी के आम आदमी की अपने सांसद तक पहुंच आसान थी। वहां से लौटे लोगों में वी वी आई पी होने का घमंड दिखाई देने लगा था। इसका प्रतिबिंब कालांतर में प्रधानों द्वारा बडे. पैमाने पर किए गये भूमि पट्टों व पंचायती जमीनों पर कब्जों के रूप में दिखा। कब्जे बढे., तो तालाब सिकुङ गये।
अमेठी में उसर-बंजर क्षेत्र की अधिकता व उससे जुङे भाग्य को लेकर एक कहावत प्रचलित है – जो न होते अमेठी में उसर, तो अमेठी के दइव होते दूसर यानी यदि अमेठी मे उसर धरती न होती, तो अमेठी का भाग्य विधाता कोई और होता। यह अधिकता बाद के वर्षों में और बढ़ी। आज से करीब एक दशक पहले तत्कालीन सांसद श्रीमती सोनिया गांधी इस बात को लेकर चिंतित हुईं। उन्हे उसर की अधिकता का कारण बताने के लिए एक अति प्रतिष्ठित भूगोल संस्थान के वैज्ञानिक तथा स्थाीय कृषि विज्ञान केंद्र के दल ने दौरा किया। रिपोर्ट दी -“धरती के भीतर चट्टानों की परत है। उसी के चलते धरती पानी सोख नहीं पाती। यह जलभराव ही अंततः जमीन को बंजर बना रही है।”
इस रिपोर्ट से असंतुष्ट वैज्ञानिक व विज्ञान पर्यावरण केन्द्र के प्रमुख स्व. श्री अनिल अग्रवाल ने पानी कार्यकर्ताओं की एक देहाती टीम को वहां भेजा। वापस लौटी टीम के एक कार्यकर्ता ने जमीन पर लाइने खींचकर उन्हे बताया कि कैसे अमेठी में फैली सङकों के नये संजाल ने पानी की घेराबंदी कर दी है। सडकों में आसपास की जमीन के ढाल को समझे बगैर गलत जगह पर लगाई गई जलनिकासी पाइप बेकार साबित हुई है; परिणामस्वरूप सङकों ने वहां एक ओर जलभराव किया, तो दूसरी ओर जलाभाव। दोनो ने जमीन को बेकार किया। खारा पानी व बंजर धरती दोनो बढ़े। दुर्योग से उसके कुछ महीने बाद अनिल जी नहीं रहे। सांसद महोदया की चिंता रिपोर्ट तक सीमित होकर रह गई।
इसी बीच विश्व बैंक की स्वजल योजना आई; तब तक अमेठी के कुओं का पानी उतरना शुरु हो गया था। चार नंबर की मशीन वाले हैंडपंप दिखाई देने लगे थे। वी वी आई पी इलाके के लोग पानी खींचने के लिए मेहनत क्यों करें ? अतः 150-200 गहरे बोर वाले इंडिया मार्का हैंडपंप की एक बडी खेप इस इलाके में खैरात की तरह खपा दी गई। जहां जरुरत थी, वहां भी और जहां जरुरत नहीं थी, वहां भी। प्रधानों व पार्टी कार्यकर्ताओं ने लोगों की जरुरत के लिए नहीं, अपितु अपनी हैसियत जताने के लिए इंडिया मार्का लगवाये। जो जितने ज्यादा इंडिया मार्का हैंडपम्प ला सके, वह उतना बङा कार्यकर्ता। मुफ्त में बांटा गया इंडिया मार्का हैंडपम्प, हैसियत का प्रतीक हो गया। स्थानीय विधायकों से लेकर प्रधान व ग्रामीणों तक ने इसे ही विकल्प के रूप में चुना। इसने आगे चलकर काफी नुकसान किया।
वर्ष 2004 के चुनाव हुए। राहुल गांधी ने सांसदी संभाली; तब तक खैरात के इंडिया मार्का की मांग काफी बढ. चुकी थी। मांग पर लगाम के लिए आवेदकों द्वारा इंडिया मार्का की कुल लागत का 10 फीसदी खर्च वहन करने का प्रावधान किया गया। लेकिन मांग घटी नहीं, क्योंकि ज्यादातर कुएं उपयोग न करने के कारण बेकार हो चुके थे; शेष पानी की अधिक खिंचाई व परंपरागत स्त्रोतों के सूख जाने के कारण संकट की चपेट में आ चुके थे। नदियों ने ठेंगा दिखाना शुरु कर दिया था। खारे पानी के इलाके बढ़ने लगे थे। चार नंबर की मशीन वाले हैंडपंप पानी की जगह रेत पिलाने लगे थे। छह नंबर की मशीन भी ज्यादा दिन साथ नहीं देगी; ऐसा साफ दिखाई देने लगा था। इंडिया मार्का की मांग इतनी बढ़ी, कि सांसद-विधायक के माथे पर बल पङ गये। अगली बार वोट मांगने जाने तक आवेदक को इंडिया मार्का मिलेगा भी या नहीं…यह गारंटी देना कठिन हो गया। इसीलिए चुनाव आने से साल-छह महीने पहले इंडिया मार्का बांटे जाने की रणनीति अपना ली गई। अब कहीं-कहीं इंडिया मार्का भी जवाब देने लगा है। कुुंए पहले ही साथ छोड. चुके हैं। लोगों ने समर्सिबल का दामन थामना शुरु कर दिया है। अब कम में समर्सिबल लगाने के लिए कंपनियां आगे आ गई हैं। खेती का पानी और मंहगा हो गया है। पीने का क्या होगा ? यह सवाल अमेठी के सामने सिर उठाकर खडा हो गया है। फिलहाल शासन-प्रशासन ने कई गांवों में जल निगम के नलों का प्रवेश कराकर इतिश्री कर ली गई है। इंडिया मार्का बनाम वाटर मार्क का हश्र सामने आ गया है।
क्या अमेठी के सांसद इससे चिंतित हैं। शायद नहीं ? तभी अमेठी के लोगों का उद्धार करने आया राजीव गांधी चेरिटिबल ट्रस्ट पढाई, सेहत व महिला सबलीकरण के प्रोजेक्ट व पैसा तो लाया, इलाके की एक बंद पडी फैक्टरी खरीदकर रोजगार देने की भी बात कही, किंतु उससे कहीं ज्यादा बङा रोजगार व सेहत देने वाले नीचे गये पानी को उपर लाने में ट्रस्ट ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई; अलबत्ता गौरीगंज के पहले से बंजर इलाके में रेल नीर की मंजूरी देकर किसानों का पानी लूट लेने का इंतजाम और कर दिया गया।
दलितों के घर में भोजन करने के शौकीन सांसद महोदय ने यह भी जानने की कोशिश नहीं की, कि उनके परिवार द्वारा संचालित संजय गांधी अस्पताल व गेस्ट हाउस के अलावा एच ए एल फैक्टरी का कचरा.. किस जल स्त्रोत में मिलकर किस दलित की जिंदगी में कितना जहर घोल रहा है। इसकी खबरों ने भी सांसद को कभी चिंतित नहीं किया। उन्होने जिस समदा ताल के पुर्नउद्धार की परियोजना का बडे. उत्साह से श्रीगणेश किया था; उसका क्या हश्र हुआ ?.. उन्होने यह जानने की जहमत भी नहीं उठाई। हां ! राजीव गांधी महिला परियोजना का एक दफ्तर अवश्य उज्जयिनी नदी के मूल स्त्रोत के पेट पर बना दिया गया है। उज्जयिनी आज प्रदूषण से कारण बीमार भी है और उसकी नीलिमा सूखकर भूरी लकीरों में बदल गई है। एक दूसरी नदी ‘मालती’ का तल खोदकर इतना ढालू बना दिया गया है, कि अब उसमें पानी रुकता ही नहीं। इस सपाट खुदाई के कारण नदियों के भीतर वे गहरे कुण्ड भी नहीं बचे, जिनमें पशु-पक्षियों के पीने लायक पानी हमेशा बचा रहता था। नदियों के बेपानी होने से आसपास की वनस्पति उजङ गई है और उसके साथ-साथ नीलगायों के अशियाने भी। वे अब फसल पर हमले बोलने को मजबूर हो गई हैं और लोग उन पर। ये सब इस इलाके के ऐसे नये संकट हैं, जो सिर्फ और सिर्फ योजनाकारों की बेसमझी के कारण उपजी हैं। गलती सुधार के नाम पर ढालू हुई मालती में पानी दिखाने के लिए छह फुट ऊंचे बंधे बनाना, एक नये बजट खेल के रूप में सामने आया है। अमेठी-ककवा रोड पर महाराजपुर बाजार से ठीक पहले आप इसे देख सकते हैं।
अमेठी लोकसभा क्षेत्र के इस एक चावल से आप-हम पूरी पतीली का अंदाज लगा सकते हैं कि पानी को लेकर सांसदों की दिलचस्पी कितनी है। हालात ये हैं कि जहां लोग सो गये, वहां सत्ता की लोकधर्मिता भी सो गई। जहां जन जगा, वहीं कुछ आगाज हुआ। एक बार अमेठी के करीब 250 मानिंदों की सहभागिता से संपन्न हुए एक ऊर्जा सम्मेलन ने चेतना जगाई भी, तो वह महज् एक नदी जन-जागरण यात्रा तक सिमटकर रह गई। दुआ कीजिए कि यह यात्रा कर्मफल में बदले। अमेठी वासियों का श्रमबल जागेे और उनके साथ-साथ सांसद-विधायकों की जल चेतना भी; ताकि तालाब-कुंए-नदियां फिर से जिंदा हो जायें और इंडिया मार्का के लिए गुहार मचे और न रार।
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