India - Varanasi - 001 - Killer view - the Ganga and ghats from our balcony

गंगा प्रदूषण मुक्ति की कामना करते 30 बरस बीत गये। नमामि गंगे ने भी नित नये बयान, घोषणा और तारीखें तय करने में डेढ़ बरस गुजार दिया। बीते डेढ़  बरस में अलग-अलग कारणों से गंगा प्रदूषण मुक्ति के लिए संघर्षरत गैर सरकारी संगठनों की सक्रियता कम हुई, तो राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने सचमुच ’पर्यावरण एक्टिविस्ट’ की भूमिका निभाई। मूर्ति विसर्जन, मलवा, रेत, पाॅलीथीन, नदी की भूमि से लेकर प्रदूषित करने वाले उद्योगों व नगर निगम के नालों तक को लेकर नित् नये आदेश दिए। सरकारों और संबंधित विभागों के बीच तालमेल बिठाने के लिए खुद पहल कर बैठक तक बुलाई, किंतु क्या हुआ ? क्या उन आदेशों की वाकई पालना हुई ? क्या हमारी संवेदना वाकई जगी ? नदियों की प्रदूषण मुक्ति के नाम पर पैसे का खर्च बढ़ता ही जा रहा है, किंतु नदी की प्रदूषण मुक्ति की संवेदना और सरकारी प्रयास नतीजा लाते अभी भी दिखाई नहीं दे रहे। 

क्यों ? 
क्योंकि नदी को धन नहीं, धुन चाहिए; क्योंकि नदी को ढांचें नहीं, ढांचों से मुक्ति चाहिए; क्योंकि नदी को शासन नहीं, अनुशासन चाहिए। नदी को मलीन करने वालों को रोकने की बजाय, निर्मलीकरण के नाम पर कर्ज, खर्च, मशीनें, ढांचें प्रदूषण मुक्ति का काम नहीं है। यह प्रदूषण मुक्ति की आवाजों को पैसे में बदल लेने का काम है, जो कि शासन, प्रशासन और बाजार..तीनों ने अच्छी तरह सीख लिया है। भारतीय नदियां अब भ्रष्टाचार का नया अड्डा हैं, तो सदाचार कैसे लौटे और नदी कैसे निर्मल हो ?  आइये, सोचें कि कमी कहां रह गई ? सोच में, कामना में या साधना में ?

नदी निर्मलता को चाहिए एक समग्र सोच

दरअसल, नदी की निर्मल कथा टुकङे-टुकङे में लिखी तो जा सकती है, सोची नहीं जा सकती। कोई नदी एक अलग टुकङा नहीं होती। नदी सिर्फ पानी भी नहीं होती। नदी एक पूरी समग्र और जीवंत प्रणाली होती है। अतः इस इसकी निर्मलता लौटाने का संकल्प करने वालों की सोच में समग्रता और दिल में जीवंतता और निर्मलता का होना जरूरी है। ’’गोमती प्रदूषण मुक्ति अभियान फलां संस्था की है, तो मैं क्यों जाऊं ?’’ यह भाव गोमती को साफ नहीं करा सकता है। नदी हजारों वर्षों की भौगोलिक उथल-पुथल का परिणाम होती है। अतः नदियों को उनका मूल प्रवाह और गुणवत्ता लौटाना भी बरस-दो बरस का काम नहीं हो सकता। हां! संकल्प निर्मल हो; सोच समग्र हो; कार्ययोजना ईमानदार और सुस्पष्ट हो, सातत्य सुनिश्चित हो, तो कोई भी पीढी अपने जीवन काल में किसी एक नदी को मृत्यु शय्या से उठाकर उसके पैरों पर चला सकती है। इसकी गारंटी है। 

एक बात और यह जो लोग सोचते हैं कि पैसा कहां से आयेगा; धन की कमी इसमें कभी बाधा नहीं बनती। आजादी के दीवानों ने कभी पैसे की कमी का रोना नहीं रोया। जब जरूरत हुई, जुट गया। चाहे किसी मैली नदी को साफ करना हो या सूखी नदी को ’नीले सोने’ से भर देना हो…सिर्फ धन से यह संभव भी नहीं होता। ऐसे प्रयासों को धन से पहले धुन की जरूरत होती है। नदी को प्रोजेक्ट बाद में, वह कशिश पहले चाहिए, जो पेटजाये को मां के बिना बेचैन कर दे। इस बात को भावनात्मक कहकर हवा में नहीं उङाया जा सकता। कालीबेईं की प्रदूषण मुक्ति का संत प्रयास और अलवर के 70 गांवों द्धारा अपने साथ-साथ अरवरी नदी का पुनरोद्धार इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं। 

नदी की समग्र सोच यह है कि झील, ग्लेशियर आदि मूल स्त्रोत हो सकते हैं, लेकिन नदी को प्रवाह को जीवन देने का असल काम नदी बेसिन की जाने छोटी-बङी वनस्पतियां और उससे जुङने वाली नदियां, झरने, लाखों तालाब और बरसाती नाले करते हैं। इन सभी को समृद्ध रखने की योजना कहां है ? हर नदी बेसिन की अपनी एक अनूठी जैवविविधता और भौतिक स्वरूप होता है। ये दोनो ही मिलकर नदी विशेष के पानी की गुणवत्ता तय करते हैं। नदी का ढाल, तल का स्वरूप, उसके कटाव, मौजूद पत्थर, रेत, जलीय जीव-वनस्पतियां और उनके प्रकार मिलकर तय करते हैं कि नदी का जल कैसा होगा ? नदी प्रवाह में स्वयं को साफ कर लेने की क्षमता का निर्धारण भी ये तत्व ही करते हैं। सोचना चाहिए कि एक ही पर्वत चोटी के दो ओर से बहने वाली गंगा-यमुना के जल में क्षार तत्व की मात्रा भिन्न क्यों है ? गाद सफाई के नाम पर हम अमेठी की मालती और उज्जयिनी जैसी नदियों केे तल को जेसीबी लगाकर छील दें। उनके ऊबङ-खाबङ तल को समतल बना दें। प्रवाह की तीव्रता के कारण मोङों पर स्वाभाविक रूप से बने 8-8 फुट गहरे कुण्डों को खत्म कर दें। वनस्पतियों को नष्ट कर दें और उम्मीद करें कि नदी में प्रवाह बचेगा। उम्मीद करें कि अमेठी की मालती जैसी छोटी सी नदी, संजय गांधी अस्तपताल व एच ए एल के बहाये जहर को स्वयं साफ कर लेगी, यह संभव नहीं है। ऐसी बेसमझी को नदी पर सिर्फ स्टाॅप डैम बनाकर नहीं सुधारा जा सकता। कानपुर की पांडु के पाट पर इमारत बना लेना, पश्चिम उ. प्र. हिंडन को औद्योगिक कचरा डंप करने का साधन मान लेना और मेरठ का काली नदी में बूचङखानों के मांस मज्जा और खून बहाना और नदी को एक्सप्रेस वे नामक तटबंधों से बांध देना नदियों को नाला बनाने के काम है। 

क्या करना होगा ?

प्राकृतिक स्वरूप ही नदी का गुण होता है। गुण लौटाने के लिए नदी को उसका प्राकृतिक स्वरूप लौटाना चाहिए। नालों को वापस नदी बनाना चाहिए।

Ganges river dolphin

जैव विविधता लौटाने के लिए नदी के पानी की जैव आॅक्सीजन मांग घटाकर 4-5 लानी होगी, ताकि नदी को साफ करने वाली मछलियां, मगरमच्छ, घङियाल और जीवाणुओं की एक बङी फौज इसमें जिंदा रह सके। नदी को इसकी रेत और पत्थर लौटाने होंगे, ताकि नदी सांस ले सके। कब्जे रोकने होंगे, ताकि नदियां आजाद बह सके। नहरी सिंचाई पर निर्भरता कम करनी होगी। नदी से सीधे सिंचाई अक्तूबर के बाद प्रतिबंधित करनी होगी, ताकि नदी के ताजा जल का कम से कम दोहन हो। भूजल पुनर्भरण हेतु तालाब, सोखता पिट, कुण्ड और अपनी जङों में पानी संजोने वाली पंचवटी की एक पूरी खेप ही तैयार करनी होनी होगी, भूजल को निर्मल करने वाले जामुन जैसे वृक्षों को साथी बनाना होगा। इस दृष्टि से प्रत्येक नदी जलग्रहण क्षेत्र की एक अलग प्रबंध एवम् विकास योजना बनानी होगी। 


नदी जलग्रहण क्षेत्र के विकास की योजना शेष हिस्से जैसी नहीं हो सकती। झारखण्ड, बुंदेलखण्ड, उत्तराखण्ड जैसे इलाके एक जरूरी प्राकृतिक टापू है। बुंदेलखंड की विकास योजना, एक तीर्थ और वनक्षेत्र के रूप में ही हो सकती है। धरती से सिर्फ ज्यादा से ज्यादा उपजाने की जुगत लगाने से सूखे का दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता। बुंदेलखण्ड वासियों के आजीविका प्रबंधन की दृष्टि से खेती और खनन से ज्यादा मवेशी, वनोत्पाद, तीर्थ एवम् हस्तकौशल के कुटीर उद्योगों को प्राथमिकता पर आना चाहिए। आज हम धन की मांग करने वाले जिंदगी के सारे सपनों की पूर्ति धरती और प्रकृति की सांस खींचकर करने में लग गये हैं। इसने हमारी सांसों में भी बाधा पैदा करनी शुरु कर दी है। यह ज्यादा दिन नहीं चलेगा। नदी जलग्रहण क्षेत्र में रोजगार और जीविकोपार्जन के कुटीर और अन्य वैकल्पिक साधनों को लेकर पुख्ता कार्ययोजना चाहिए ही। 

सिद्धांत पहले, कार्ययोजना बाद में

आज भारत की सरकारें नदियों पर कार्ययोजनायें तो बना रही हैं। नदी प्रबंधन का सिद्धांत उसने आज तक नहीं बनाया। समग्र सोच के चिंतन का एक विषय यह भी है। सिद्धांत पहले बनाने चाहिए, कार्ययोजना बाद में। सिद्धांत कार्ययोजना का ऐसा मूलाधार होते हैं, जिनकी पालना हर हाल में करने से ही कार्ययोजना अपना लक्ष्य पाने में ईमानदार भूमिका अदा कर पाती है। वह सिद्धांत ही क्या जो व्यवहार में लागू न हो सके।

किस नदी को साल के किस अवधि में किस स्थान पर न्यूनतम कितना पानी मिले जिससे कि नदी का पर्यावास सुरक्षित रह सके ? नदी में कब-कहां और कितना रेत-पत्थर-पानी निकालने की अनुमति हो ? इसका कोई तय सिद्धांत होना चाहिए कि नहीं ? नदी निर्मलता का सिद्धांत क्या हो ? नदी को पहले गंदा करें और फिर साफ करें या नदी गंदी ही न होने दी जाये ? कोई नाला कचरे को पहले ढोकर नदी तक लाये, हमारे संयंत्र फिर उसे साफ करें या कचरे का निस्तारण कचरे केे मूल स्त्रोत पर ही किया जाये ? नदी भूमि को हरित क्षेत्र बनाकर नदी को आजाद बहने दिया जाये या ’रिवर फ्रंट वियु डेवल्पमेंट’, एक्सप्रेस वे और इंडस्ट्रियल काॅरीडोर के बीच में फंसकर मरने के लिए छोङ दिया जाये ? 

अमृत-विष: अलग-अलग

कोई भारतीय सिद्धांत नहीं, जो अमृत में विष को मिलाने की इजाजत देता हो। 1932 में पहली बार कमिशनर हाॅकिन्स ने बनारस के नाले को गंगा में मिलाने का एक आदेश दिया। मालवीय जी की असहमति के बावजूद वह लागू हुआ। इससे पहले नदी में नाला मिलाने का कोई उदाहरण शायद ही कोई हो। अमृत और विष को अलग रखने का कुंभ सि़द्धांत आइना बनकर तब भी सामने था, आज भी है; बावजूद इसके हम नालों को नदियों मे मिला ही रहे हैं। क्या हमें तय नहीं करना चाहिए कि हम पहले कचरे को नदी में मिलने ही नहीं दिया जायेगा। कचरे का निस्तारण उसके मूल स्त्रोत पर ही किया जायेगा। आज हम कचरा जल नदी में और ताजा जल नहरों में बहा रहे हैं। यह सिद्धांत विपरीत है। इसे उलट दें। ताजे स्वच्छ जल को नदी में बहने दें और कचरा जल को शोधन पश्चात् नहरों में जाने दें। यह क्यों नहीं हो सकता ?

सामुदायिक व निजी सेप्टिक टैंकों पर पूरी तरह कामयाब मलशोधन प्रणालियां भारत में ही मौजूद हैं। लखनऊवासी अपना मल-मूल सुलतानपुर-जौनपुर को पिलाते हैं, दिल्लीवासी बृज को। कोलकोतावासी अपना मल नदी में नहीं बहाते। हजारों तालाबों के जरिए वे आज भी निर्मल कथा ही लिख रहे हैं। बंगलूर के हनी शकर्स सेप्टिक टैंक से मल निकाल कर कंपोस्ट में तब्दील कर नदी भी बचा रहे हैं और खेती भी। भारत सरकार के रक्षा अनुसंधान विकास संगठन द्वारा ईजाद मल की जैविक निस्तारण प्रणाली को देखें, पता चलेगा कि हर नई बसावट, सोसाइटी फ्लैट्स तथा काॅमर्शियल काॅम्पलैक्सेस आदि को सीवेज पाइप लाइन से जोङने की जरूरत ही कहां हैं ? लेकिन शासन-प्रशासन को है; क्योकि ये पाइप लाइनें उन्हे सीवेज देखरेख के नाम पर ग्राहक से ढेर सारा पैसा वसलूने का मौका देती है। पाइप लाइनों से जुङे सीवेज के सौ फीसदी शोधन पर अभी तक सरकार गंभीर नहीं हुई है। अभी वह नदी में निवेश और शौच में मुनाफा देख रही कंपनियों का रूट प्लान बनाने में व्यस्त है। उनकी सोच समझाइश से ज्यादा साधी जा रही है नोट से। नोट देकर साधना, सामाजिक खोट का प्रतीक है। समाज के पास वोट हैं। आइये, जन, जीव और प्रकृति की बजाय, पैसा, पद और पार्टी को प्राथमिकता पर रखने वाले नेताओं को मिलने वाले वोट का रास्ता बंद करें। वे खुद-ब-खुद सध जायेंगे। रही बात प्रदूषण और प्रदूषकों को बांधने की, समाज की समग्र सोच और उसे कार्यरूप में उतारने का संकल्प दोनो को बांध सकता है। कामना करें कि यह एक दिन होगा ही। 

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