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लेखक: अरुण तिवारी

मूल तत्व पॉलीमर रसायन के कारण पॉलिथीन घातक सिद्ध हो रहा है। दूध, दही, जूस, मिठाई, फल सब्जियों जैसे आद्र पदार्थों के साथ क्रिया कर यह रसायन उन्हे जहरीला बना देता है। गर्म पदार्थों के साथ इसका संयोग तो मारक है ही। किडनी फेल होने से लेकर आमाश्य आदि की तमाम बीमारियों का कारण आज यही बन रहा है। हम सभी जानते हैं कि कचरा बनकर पॉलिथीन आज यह हमारी धरती की नसों को चोक कर रहा है। इससे पानी का प्रवाह तो बाधित हो ही रहा है। नदियां कचराघर बन ही रही हैं। भूजल संचयन के ढांचे बर्बाद हो ही रहे हैं। धरती बंजर हो रही है। पॉली कचरे को जलाने से उठी गैसों के कारण आबोहवा विषाक्त हो रही है। हम बीमार हो रहे हैं। हम मर रहे हैं। बावजूद इसके काली झिल्लियों में गर्मागर्म जलेबी और घटिया किस्म के प्लास्टिक कप में गांव-गांव… शहर-शहर चाय परोसने का चलन है कि रूक ही नहीं रहा। भोजों मे प्लास्टिक पत्तल-दोनों का बोलबाला है। खाली हाथ झुलाते जाने और पॉलिथीन की झिल्लियों में लटकाकर ढेर सारा सामान ले आने में हम गर्व महसूस करते हैं। झोला ले जाना हमें पिछङापन लगता है। 

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हम भूल जाते हैं कि हम सामान के साथ साल भर में कई किलो पॉली कचरा भी अपने घरों में ढो लाते हैं। कंपनियां भी गुणवत्ता के नाम पर सामानों को पैकिंग उतारने में रूचि रखती हैं; जबकि हकीकत में नकली पैकिंग के सामानों से बाजार अटे पङे हैं। नतीजे में हर गांव-शहर के किनारे नीली-काली पन्नियों के पॉली कचरे से अटे पङे हैं। सङक के किनारों से लेकर रेल की पटरियों तक पाली संस्कृति के दर्शन कर भी हम चेतते नही।

इसे देखते हुए ही कई राज्यों ने पॉलिथीन पर प्रतिबंध लगाया है। राष्ट्रीय हरित पंचाट की पहल पर अभी हरिद्वार आदि में भी यह प्रतिबंध लगा है। गुटके पर भी कई राज्यों में प्रतिबंध है। पॉली झिल्लियों के लिए न्यूनतम 40 माइक्रान का न्यूनतम मानक बनाया गया है। प्लास्टिक एंड अदर बायोडिग्रेडेबल गार्बेज रेगुलेशन एंड डिसपोजेबल एक्ट-2002 के तहत् प्रतिबंध के उल्लंघन पर जुर्माने तथा सजा तक का प्रावधान है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंगा किनारे से दो किलोमीटर की परिधि में पॉलिथीन के प्रयोग पर रोक लगा रखी है। कुंभ मेला क्षेत्र को पूर्णतः पॉलिथीन प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया जा चुका है। बावजूद इसके ये प्रतिबंध कागजी साबित हुए हैं। गंगा अभी भी पन्नियों से पटी पङी है। बाजार में उपयोग में लाई जा रही पॉली झिल्लियों में से ज्यादातर भी न्यूनतम 40 माइक्रान के मानक का पालना नही करते। क्यों ? क्योंकि समाज व सरकार दोनो के संकल्प में कमी है। बिना संकल्प प्रतिबंध हमेशा नाकाफी ही सिद्ध होता है। वही हो रहा है। ऐसा नहीं है कि बढते पॉलिथीन कचरे को रोका नहीं जा सकता या पॉलिथीन का कोई विकल्प नहीं है। विकल्प है और कचरे को रोका भी जा सकता है; किंतु इस इस दिशा में सरकारों का सचमुच ही कोई संकल्प नहीं है। पॉलिथीन बिक्री के स्थान पर सीधे उत्पादन पर ही रोक लगा देने के अलावा फिलहाल कोई रास्ता भले ही न दिखता। लेकिन हम उसकी प्रतीक्षा में बैठे नहीं रह सकते। संकल्प व प्रेरणा से रास्ते खुल सकते हैं।
जलबिरादरी के अगुवा जलपुरुष राजेन्द्र सिंह, जलबिरादरी के अपने साथियों को कभी संकल्प दिलाते थे कि वे न तो प्लास्टिक की पत्तल-दोने में खायेंगे और न ही प्लास्टिक गिलास-कप में पीयेंगे। बाजार का सामान पॉलिथीन की झिल्लियों में नहीं लायेंगे। पैकिंग वाले सामान के स्थान पर शुद्धता का ध्यान रखते हुए खुले सामान को प्राथमिकता देंगे। कितने ही अवसरों पर मुझे ख्याल है कि संकल्प पक्का होने के कारण हमेशा रास्ता निकला।
गंगा लोकयात्रा करते हुए कासगंज के आसपास आयोजकों ने एक सरस्वती शिशु मंदिर में हमारे भोजन का इंतजाम किया था। प्लास्टिक की पत्तल सामने आते ही राजेन्द्र भाई ने कहा- “हम हाथ में रोटी-सब्जी खा लेंगे। अंजुरी से पानी पी लेंगे। ये पत्तल-गिलास हटा लो” हमारे साथ एक विदेशी मीडिया टीम भी थी। सबने पत्तल-गिलास अपने सामने से हटा दिए। नतीजा देखिए! पांच मिनट में स्टील के गिलास व थालिया सज गये। भोजन करके हम सबने अपने बर्तन खुद धोये। बर्तन धोने की उनकी उलझन मिट गई और इस कवायद ने कई को प्लास्टिक में न न खाने-पीने के लिए संकल्पित कर दिया। हमें भी सीख मिली। आगे की यात्रा के लिए हमने पत्तों की पत्तल तथा कुल्हङ खरीद के गाङी में रख लिए।

ऐसी सीख से ही परिवर्तन आयेगा। इसी से मन संकल्पित होंगे। इसी संकल्प के साथ ग्लोबल ग्रीन नामक एक संस्था ने इलाहाबाद में नगरनिगम के साथ मिलकर ग्रीन कुंभ की संकल्पना रखी थी। मालूम नहीं वह संकल्पना हरिद्वार में चल रहे वर्तमान अर्धकुंभ में लागू है या नहीं ?

प्रार्थना और सहयोग कीजिए कि 23 अप्रैल से उज्जैन में होने वाला सिंहस्थ कुंभ, एक हरित कुंभ हो यानी पॉली कचरा मुक्त कुंभ।
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