भारत की राष्ट्रीय जलनीति का पुनर्संशोधित प्रारूप भले ही पानी को ’आर्थिक वस्तु’ के रूप में बिक्री हेतु स्थापित करना चाहता हो, लेकिन भारतीय धार्मिक आस्था पानी को आज भी इन्द्र-वरूण आदि के रूप में ही पूज्य और पवित्र ही मानती है। इस आस्था का व्यापक आधार भारत का परंपरागत ज्ञान तंत्र और उसका विज्ञान है। आप भारतीय वेद, पुराण, उपनिषद…कोई भी ग्रंथ उठाकर देख लीजिए इस ज्ञानतंत्र और उसके विज्ञान ने पानी की बूंद, बादल, हिम, बादल या किसी अन्य स्वरूप को ‘एच2ओ’ कहकर कभी संबोंधित नहीं किया। क्योंकि वह जानता था कि पानी के जिस स्वरूप को हम देखते हैं, वह  सिर्फ ‘एच2ओ’ है ही नहीं। यदि पानी सिर्फ ‘एच2ओ’ होता, तो सिंथेटिक रक्त बना लेने वाला आधुनिक विज्ञान कभी का पानी बना चुका होता। हम हर छोटी-बङी प्रयोगशाला में पानी बनाकर पानी की कमी को धता बता रहे होते। एक जीवंत स्पंद के स्पर्श के बगैर एच2 और ओ आपस में जुङ ही नहीं सकते.. ‘एच2ओ’ पानी का दृश्य स्वरूप पा ही नहीं सकता। इसीलिए फिलहाल आधुनिक विज्ञान ने भी पानी बनाने के मामले में हाथ खङे कर दिए हंै। उसने बता दिया है कि पानी जीवंत है, महज् एक वस्तु नहीं, जिसे निर्मित किया जा सके।
नदी: एक जीवंत प्रणाली
नदियों के मामले में भी यही बात सच है। नदियां कुदरत बनाती है। अतः इस सच से अवगत होना जरूरी है कि हमारी सरकारें श्री अटलबिहारी सरकार द्वारा प्रस्तावित नदी जोङ परियोजना को भले ही सङक जैसा निर्जीव मानकर जहां चाहे तहां जोङ लेने की जिद् ठाने बैठी हों, लेकिन भारतीय आस्था इसकी इजाजत नहीं देती। वह कभी मानती कि नदियां मृत होती हैं। वह हमेशा से मानती रही है कि कोई भी नदी सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवंत प्रणाली होती हैं। जैसे हमारा मानव शरीर। नदियों को जीवंत मानने वाली गहरी धार्मिक आस्था को अब आधुनिक विज्ञान ने भी स्वीकार लिया है। 
इक्वाडोर व न्यूजीलैंड ने की पहल: जीवंतता को दिया संवैधानिक दर्जा
इसी जीवंतता को आधार बनाकर नदियों को ’नैचुरल पर्सन’ का सवैंधानिक दर्जा देने की एक शानदार पहल का श्रेय आज विश्व के जिन दो देशों को जाता है, वे हैं- इक्वाडोर और न्यूजीलैंड। …तो क्या अब जिस भारत की आस्था व ज्ञानतंत्र ने आधुनिक विज्ञान से पहले यह बात दुनिया को बताई, वहां नदियों को यह संवैधानिक दर्जा नहीं मिलना चाहिए ? मुझे इस छोटे से सवाल सेे हमारी नदियों की हकदारी हासिल करने की दिशा में एक बङी खिङकी खुलती दिखाई दे रही है। 
हो सकता है कि कोई यह कहकर इसे बहस का मुददा बना दे कि भारत का जनमानस तो नदियों को मां मानता ही है; संविधान यह मान्यता दे न दे… इससे क्या फर्क पङता है ? गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा देने से क्या फर्क पङ गया, सिवाय इसके कि गंगा के नाम पर कुछ हजार करोङ रुपये और खर्च हो गये ? सचुमच फर्क पङता, यदि मांग के अनुरूप गंगा को ‘राष्ट्रीय नदी’ नहीं, ‘राष्ट्रीय नदी प्रतीक’ का दर्जा दिया गया होता; तब गंगा का अपमान करने वाले जाने कितनो पर अब तक राष्ट्रदोह के मुकदमे टांक दिए होते। 
बहरहाल, इस मांग में दम है कि भारत में भी नदियों की जीवंतता को संवैधानिक दर्जा मिलना ही चाहिए। कारण कि आज भारत अपने ही परपंरागत ज्ञानतंत्र व आस्था को नकारने पर उतारु हो गया है। नदियों के प्रति हमारी संवेदनायें मरी हैं। नदियों के साथ अच्छे व्यवहार के सामाजिक संस्कार कमजोर हुए है। हमने नदियों को मनचाहे तरीके से तोङने-मरोङने वाली परियोजनायें बना डाली हैं। हम बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से नदियों को शोषित-प्रदूषित करने में जुट गये है। हम कुदरत की इस बेशकीमती नियामत को इसका नैतिक हक देने को तैयार नहीं हैं। ऐसे हालात में अब आगे भारत की नदियों का नैसर्गिक व जीवंत बचे रहना मुश्किल दिखाई देता है। अतः जरूरी हो गया है कि इस मामले में हम संविधान द्वारा निर्देशित किए जायें; तभी हमारी नदियों के लिए भारत की गणतंत्रता का कोई मतलब हो सकेगा।
नदियों के मातृत्व को संवैधानिक बाना पहनाये भारत
मैं कहता हूं कि भारत को चाहिए कि वह इससे भी आगे जाकर नदियों को सिर्फ ‘नैचुरल पर्सन’ नहीं, बल्कि ’नैचुरल मदर’ यानी ’प्राकृतिक मां’ का संवैधानिक दर्जा प्रदान करे। चूंकि भारतीय आस्था में नदियों को सिर्फ एक जीवंत प्रणाली हीे नहीं, बल्कि संतति को जन्म देकर तथा उसे पोषित कर सृष्टि रचना के क्रम को आगे बढाने वाली मां मानती है। यदि हम नाम बदलकर अमानीशाह या नजफगढ नाला बनी दी गई क्रमशः जयपुर की द्रव्यवती व अलवर से बहकर दिल्ली आने वाली साबी जैसी नदियों की बात छोङ दें, तो आज भी भारत में कोई नदी ऐसी नहीं है कि जिसे मां मानकर पूजा या आराधना न की जाती हो। ब्रह्मपुत्र, नद्य के रूप में पूज्य है ही। यह बात और है कि हम भारतीय नदियों को मानते मां है, लेकिन उनका उपयोग मैला ढोने वाली मालगाङी की तरह करते हैं। इसी विरोधाभास के कारण आज नदियां आज संविधान की ओर निहार रही हैं। नदियों को मां का संवैधानिक दर्जा प्राप्त होते ही नदी जीवन समृद्धि के सारे अधिकार स्वतः प्राप्त हो जायेंगे। नदियों से लेने-देने की सीमा स्वतः परिभाषित हो जायेगी। हम कह सकेंगे कि नदी मां से किसी भी संतान को उतना और तब तक ही लेने का हक है, जितना कि एक शिशु को अपनी मां से दूध। दुनिया के किसी भी संविधान की निगाह में मां बिक्री की वस्तु नहीं हैं। अतः यह नदियां को बेचना संविधान का उल्लंघन होगा। अतः नदी भूमि-जल आदि की बिक्री पर कानूनी रोक स्वतः लागू हो जायेगी। मां की कीमत पर कमाई पर रोक होगी। इसके विरोध में रोज-रोज आंदोलन नहीं करने पङेंगे। नदी मां को विष पिलाने वाले उसकी हत्या की कोशिश के दोषी होंगे। उन पर दीवानी नहीं, फौजदारी कानूनों के तहत् हत्या का मुकदमा चलेगा। 
मांग को एकजुटता व संकल्प की दरकार
निष्कर्ष यही है कि नदियां अपनी संतानों के समक्ष गुहार लगाकर वह थक चुकी हैं। अब संविधान के आगे गुहार लगाने के अलावा कोई और रास्ता हमारी नदियों के पास शेष बचा हो तो आप बतायें ? 
पिछले 12 वर्षों से नदी संरक्षण को लेकर चल रहे तमाम प्रयासों के आकलन के मददे्नजर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं। मैं साफ देख रहा हूं कि नदियों को लूटकर अपनी तिजोरी भरने वाले एकजुट हैं। वे नदी संरक्षण के नाम पर लिए गये कर्ज में से भी मुनाफा कमाने की जुगत में लगे हैं। गौरतलब है कि योजना आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष श्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने अपने एक भाषण ने संकेत यही दिया। उन्होने साफ कहा कि  शहरी मल व औद्योगिक अवजल को शोधित करने के क्षेत्र में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप को तेजी से लागू करना है। बजट होगा – 100 बिलियन डाॅलर। नदी जोङ परियोजना और जल परिवहन के प्रस्तावो के संकेत भी यही हैं। भारत में अब तक लागू पीपीपी परियोजनाओं के अनुभव लूट से परे नहीं रहे हैं। तय है कि सरकारें लूट से सहमत हैं। इसीलिए वह कैंसर का इलाज उसके स्त्रोत पर करने की बजाय बाहरी लक्ष्णों पर कर रही है। ताकि कैंसर फैलता रहे, नदी प्रदूषण मुक्ति के नाम पर खर्च बढता रहे और नेता, अधिकारी, ठेकेदार व कंपनियों की कमाई भी। घोषणाओं से आगे नहीं बढ़ती नमामि गंगे के पीछे के अंतर्मत्रालयी द्वंद की मंशा भी यही है।  इस मंशा के खिलाफ, समाज की एकजुटता कहीं नजर नहीं आ रही; जबकि बाजार अपनी मंशा को लेकर एकजुट भी और पूर्णतया नियोजित भी।
अत: आइये! इस मांग को आवाज दें। ’नैचुरल मदर’ का संवैधानिक दर्जा देकर भारत की प्रत्येक नदी के जीवन व समृद्धि के अधिकार को वैधानिक बनाया जाये… उन नदियों के भी जिनका नाम बदलकर हमने नाला बना दिया है। क्या यह अच्छा नहीं होगा ?
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