लेखक: डाॅ. भारतेन्दु प्रकाश
निदेशक, बुन्देलखण्ड संसाधन अध्ययन केन्द्र, छतरपुर (मध्य प्रदेश)
पिछले दिनों वैश्विक जलवायु परिवर्तन पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। समाचार चैनलों तथा अखबारों मे उससे संबंधित खबरों के प्रसारित होने के कारण यह शब्दावली सामान्य जन के बीच भी लोकप्रिय हो गई। इसका नुकसान यह हुआ कि मौसम के हर परिवर्तन को लोग वैश्विक कारणों से जोड़ने लगे हैं । चाहे वह असामयिक वर्षा हो ,अतिवर्षा, अवर्षण या जाड़े की ऋतु में तापक्रम का बढ़ना हो। ऐेसे सभी बदलावों के लिए सभी ओर से बस एक ही आवाज आ रही है कि ये सभी जलवायु में वैश्विक तापमान वृद्धि का दुष्प्रभाव है। कोई इस पर गौर करना या यह समझना नही चाहता कि इन परिस्थितियों के लिए बाहरी से ज्यादा, स्थानीय कारण जिम्मेदार हैं। हां, कुछ विशेष स्थितियों के लिये वैश्विक कारणों को दोष अवश्य दिया जा सकता है। उनका दुष्प्रभाव तब और अधिक बढ़ जाता है, जब स्थानीय परिवेश में सहने की क्षमता बिलकुल न बची हो। 
स्थानीय कारण
मध्य भारत में विन्ध्यक्षेत्र (बुन्देलखण्ड एवं बघेलखण्ड), दक्षिणी मध्यप्रदेश , विदर्भ , मराठवाड़ा , छत्तीसगढ़ या झारखण्ड….सभी जगह बेरहमी से जंगल और पहाड़ नष्ट किए गये अथवा किए जा रहे हैं। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को अवरुद्ध किया जा रहा है। उनसे अनियंत्रित बालू निकाली जा रही है। जलसंग्रह की पारम्परिक प्रणालियों को बरबाद किया गया है। भूगर्भ जल का बेतहाशा दोहन पर कोई रोक नहीं है। भारतीय आबोहवा में बदलाव के लिए ये सभी कारण, अन्तर्राष्ट्रीय कारणों से ज्यादा प्रभावशाली हैं। समस्याओं के आयाम और दुष्परिणामों को दुगुना-तिगुना करने के लिए लिए ये स्थानीय कारण ज्यादा दोषी हैं। 
समस्या मूल पर चिंतन जरूरी
यह बेसमझी है कि हमारी सरकारें और जनसंचार तंत्र भी इन स्थानीय कारणों को समझने-समझाने की आवश्यकता नहीं समझतीं। असल में हमारी सरकारें, प्रभावितों को नाममात्र की राहत वितरण कर अपने कर्तव्य की इतिश्री करने की अभ्यस्त हो गई हैं। पूरे संदर्भ मे इस बात पर कोई गौर नहीं करता कि राहत देकर प्रभावित लोगों को अल्प समय के लिये बचाया तो जा सकता है, किंतु समस्या को अल्पकालिक समझ कर उसका दीर्घकालिक हल नहीं निकाला जा सकता। समस्या के मूल कारणों की ओर आंख मूंदने से समाज के सभी वर्ग अनेकानेक वर्षों तक दुष्परिणाम भुगतने को अभिशप्त रहेंगे। 
प्रभावित सभी
खेती नष्ट होने पर केवल किसान ही नहीं, अपितु समाज के सभी वर्ग प्रभावित होते हैं। चूंकि भोजन मूलभूत आवश्यकता है, अतः अन्न के उत्पादन में कमी सभी कोे प्रभावित करती है। भारत जैसे विशाल देश में भोजन की आवश्यकता, विदेश से खाद्यान्न खरीदकर पूरी नहीं की जा सकती। सरकारी रणनीतिकारों को समझना चाहिए की प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करके सरकार को जितना राजस्व प्राप्त होगा, उससे कई गुना अधिक राशि लगातार हर वर्ष होने वाली विपदाओं ( जो अधिकांश सत्ता एवं समाज द्वारा विकास के नाम पर लाभ एवं लोभ की मानसिकता से किये कार्यों से ही उत्पन्न होती हैं ) में राहत बांटने तथा विदेशी मुद्रा के माध्यम से मंहगे साधनों की पूर्ति पर खर्च हो जायेगी। राहत पाने और राहत पर जिन्दा रहने की मानसिकता, समाज को परमुखापेक्षी तथा अशक्त बनाती है; देश और समाज को कर्ज में डुबोती है। अन्ततः अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को भी धूमिल करती है। अच्छा हो कि सरकारें तथा समाज इस दिशा में  अविलम्ब जागरूकता का परिचय दें; सुनिश्चित करें कि भविष्य में न्यूनतम आवश्यकता से अधिक प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित शोषण न किया जाये। प्राकृतिक सम्पदा के अतिदोहन पर आधारित उद्योगों को बढ़ावा तो देने की नीति पर आगे बढ़ा जाये। 
प्राकृतिक संसाधनों का कोई विकल्प नहीं
भूलें नहीं कि जंगल, पहाड़ या नदी आदि प्राकृतिक संसाधन नष्ट तो किए जा सकते हैं, किंतु इनका पुननिर्माण निर्माण असंभव है। इन्हे बचाया जा सकता है, किंतु बनाया नहीं जा सकता। प्रकृति के संतुलन में इनकी भूमिका की भरपाई अन्य किसी भी साधन अथवा संसाधन से होनी संभव नहीं है। 
हरित क्रांति ने क्या किया ?
किसान के सामने आज विषम परिस्थिति है। हरित क्रान्ति के नाम से विदेशी उपादानों का उपयोग कर हमने क्या किया ? कुछ समय के लिए अधिक उत्पादन तो पाया, किंतु अंततः आज क्या स्थिति है ? स्थानीय महत्व के पारम्परिक कालजयी बीजों की उपेक्षा की। मंहगे बाहरी बीजों, मशीनों, रासायनिक खाद तथा कृत्रिम कीटनाशकों आदि के बल पर भूमि की स्थायी उर्वरता का लोप कर दिया। समाज स्थायी उर्वरता कायम रखने वाली देशी गोबर-गोमूत्र जनित खादों, उपलब्ध पशु शक्ति तथा हजारों वर्षों के परम्परागत ज्ञान से विरत हो गया। भूमि, जल तथा वायु को प्रदूषित करने वाली तकनीकों को बल मिला; लिहाजा, खेती की लागत बढ़ी। हमने कर्ज का आधार बढ़ाया गया। फलतः मौसम की प्रतिकूलता तथा भूमि की प्राकृतिक क्षमता के क्षरण के कारण उत्तम कही जाने वाली खेती, आज किसान के गले की फांस बन गई है। 
विकल्पहीन कृषक
गौर कीजिए, पारिस्थितिकीय परिवर्तनों का प्रभाव सभी पर पङता है, किंतु अन्य के लिए रास्ते हैं, किसान क्या करे ? कारखानेदार अपने उत्पाद की कीमत बढ़ाकर, व्यापारी अपनी वस्तुओं को मंहगे दाम पर बेचकर, सरकारी तथा उद्योगकर्मी आन्दोलन करके अपने मंहगाई भत्ते अथवा वेतन बढ़वाकर , भूमिहीन गांव छोड़कर किसी नगर या दूसरे राज्य में जाकर मजदूरी करके अपने नुकसान की भरपाई कर लेता है। मध्यमवर्गीय किसान की विवशता यह है कि वह न तो अपने गांव, खेत व पशु को छोड़ सकता है और न ही खेती के अपने प्रयास को बंद कर पाता है । दूसरी तरफ बाजार का खेल यह है कि कृषि उपज का जो मूल्य उसे मिलता है, वह उसके परिवार द्वारा किए श्रम की वर्षभर की मजदूरी बराबर नहीं होती। अतः यह सोचना कि पूर्व उत्पादन से उसे कुछ बचत हुई होगी, जिससे वह अगली फसल तक अपना निर्वाह कर लेगा; सर्वथा अव्यावहारिक बात है। सरकार की राहत तो वैसे भी ऊंट के मुह मे जीरा के समान होती है। उसके लिए भी किसान को भिखारी बनना पङ़ता है । समाज के राजनीतीकरण तथा चुनावों मे जातीयता के प्रवेश के कारण गांव का परिवारभाव अब कहीं दिखाई नही देता । परिणामतः किसान ही ऐसा वर्ग है, जो मौसम, मंहगाई तथा कर्ज की मार के कारण आत्महत्या का मार्ग अपनाने के लिये मजबूर हो जाता है।     
संपर्क: निदेशक, बुन्देलखण्ड संसाधन अध्ययन केन्द्र, छतरपुर ( मध्य प्रदेश )
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