सूखा पानी का या दिमाग का  ?
लेखक : अरुण तिवारी 

यह सच है कि 1960 के दशक में अमेरिका की औद्योगिक चिमनियों से उठते गंदे धुएं के खिलाफ आई जन-जागृति ही एक दिन ’अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी दिवस’ की नींव बनी। यह भी सच है कि धरती को आये बुखार और परिणामस्वरूप बदलते मौसम में हरित गैसों के उत्सर्जन में हुई बेतहाशा बढ़ोत्तरी का बङा योगदान है। इस बढ़ोत्तरी को घटोत्तरी में बदलने के लिए दिसंबर, 2015 के पहले पखवाङे में दुनिया के देश पेरिस में जुटे और एक समझौता हुआ।

गौर करने की बात यह है कि पेरिस जलवायु समझौता कार्बन व अन्य हरित गैसों के उत्सर्जन तथा अवशोषण की चिंता तो करता है, किंतु धरती के बढ़ते तापमान, बदलती जलवायु और इसके बढ़ते दुष्प्रभाव में बढ़ती जलनिकासी, घटते वर्षा जल संचयन, मिट्टी की घटती नमी, बढ़ते रेगिस्तान और इन सभी में खेती व सिंचाई के तौर-तरीकों व प्राकृतिक संसाधनों को लेकर व्यावसायिक हुए नजरिये की चिंता व चर्चा… दोनो ही नहीं करता। हमें चर्चा करनी चाहिए कि भारत के 11 राज्यों में सुखाङ को लेकर आज जो कुछ हायतौबा सुनाई दे रही है, क्या उसका एकमेव कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि अथवा परिणामस्वरूप बदली जलवायु ही है अथवा दुष्प्रभावों को बढ़ाने में स्थानीय कारकों की भी कुछ भूमिका है ?

इस चर्चा के लिए आज हमारे सामने दो चित्र हैं :

पहला चित्र

भारत में पानी की सबसे कम वर्षा औसत (50 मिलीमीटर) वाले जिला जैसलमेर का है, जहां गत वर्षों में चार मिलीमीटर के निचले स्तर तक जा पहुंची वार्षिक बारिश के बावजूद न आत्महत्यायें हुईं, न पानी को लेकर कोई चीख-पुकार मची और न ही किसी आर्थिक पैकेज की मांग की गई। 1100 मिलीमीटर के हमारे राष्ट्रीय वार्षिक वर्षा औसत की तुलना में पश्चिमी राजस्थान का वार्षिक वर्षा औसत मात्र 313 तथा पूर्वी राजस्थान में 675 है। वार्षिक वर्षा गिरावट में राष्ट्रीय और राजस्थान राज्य स्तरीय औसत ( राष्ट्रीयरू 42 फीसदी, राजस्थानरू 40.19 फीसदी ) में मामूली ही अंतर है। इस दृष्टि से देखें तो देश के अन्य राज्यों की तरह राजस्थान के भी कई जिलों को भी तीन साल से सूखाङग्रस्त कहा जा सकता है। किंतु यहां सूखाङ में भी खेती है, पीने के पानी का इंतजाम है और शांति है।

दूसरा चित्र

मराठवाङा, मध्य महाराष्ट्र और विदर्भ का हैं, जहां के वार्षिक वर्षा औसत क्रमशः 882, 901 और 1,034 मिलीमीटर हैं। सबसे ज्यादा चीख-पुकार वाले जिला लातूर का वार्षिक वर्षा औसत 723 मिलीमीटर है। 50 फीसदी गिरावट के बाद लातूर में हुई 361 मिलीमीटर वर्षा का आंकङा देखें। यह आंकङा भी जैसलमेर की सामान्य वर्षा से सात गुना है।

गौर कीजिए कि महाराष्ट्र में पानी को लेकर चीख-पुकार इस सबके बावजूद है कि पिछले 68 वर्षों में सिंचाई व बाढ़ नियंत्रण के नाम पर देश के कुल बजट का सबसे ज्यादा हिस्सा महाराष्ट्र को हासिल हुआ है। सिंचाई बांध परियोजनाओं की सबसे ज्यादा संख्या भी महाराष्ट्र के ही नाम दर्ज है। वर्ष 2012 में केन्द्रीय जल आयोग द्वारा जारी आंकङों के मुताबिक भारत में कुल जमा निर्मित और निर्माणाधीन बांधों की संख्या 5187 है, जिसमें से 1845 अकेले महाराष्ट्र में है।

विरोधाभास यह है कि
सबसे बङे बजट और ढेर सारी परियोजनाओं के बावजूद अंगूर और काजू छोङकर एक फसल ऐसी नहीं, जिसके उत्पादन में महाराष्ट्र आज देश में नंबर एक हो। कुल कृषि क्षेत्र की तुलना में सिचिंत क्षेत्र प्रतिशत के मामले में भी महाराष्ट्र (मात्र 8.8 प्रतिशत) देश में सबसे पीछे है। सिंचाई क्षमता के मामले में महाराष्ट्र का नंबर आंध्र प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बाद में ही आता है। विचारणीय प्रश्न है कि पानी के नाम का इतना पैसा खाने के बावजूद, यदि आज महाराष्ट्र के कुल 43,000 गांवों में से 27,723 को सूखाग्रस्त घोषित करने की बेबसी है तो आखिर क्यों ? महाराष्ट्र के अधिकांश बांधों के जलाश्यों में पानी क्यों नहीं है ? आखिर यह नौबत क्यों आई कि महाराष्ट्र सरकार को 200 फुट से गहरे बोरवैल पर पाबंदी का आदेश जारी करना पङा है।

इसका पहला उत्तर यह है कि महाराष्ट्र सरकार ने सूखे में भी इंसान से ज्यादा फैक्टरियों की चिंता की। महाराष्ट्र में लगभग 200 चीनी फैक्टरियां हैं। उसने अकेले एक चीनी फैक्टरी को देने के लिए लातूर के निकट उस्मानाबाद के तेरना जलाश्य का पांच लाख क्युबिक मीटर पानी जैकवैल में रिजर्व कर दिया गया। उसने एक बाॅटलिंग संयंत्र को अनुमति दी कि वह इन सूखे दिनों में भी मांजरा बांध से 20 हजार लीटर पानी निकाल रहा है।

दूसरा उत्तर है कि अकेले लातूर जिले में 90,000 गहरे बोरवैल हैं। लातूर ने इनसे इतना पानी खींचा कि वहां भूजल स्तर में गिरावट रफ्तार  तीन मीटर प्रति वर्ष का आंकङा पार कर गई है।

तीसरा उत्तर है कि बगल में स्थित जिला सोलापुर में भूजल पुनर्भरण के अच्छे प्रयासों से लातूर ने कुछ नहीं सीखा।

 चौथा उत्तर वह लालच है कि जो लातूर को गन्ने के लिए 6,90,000 लाख लीटर यानी प्रतिदिन 1890 लाख लीटर पानी निकाल लेने की बेसमझी देती हैय जबकि परंपरागत तौर पर लातूर मूलतः दलहन और तिलहन का काफी मजबूत उत्पादक और विपणन क्षेत्र रहा है। दलहन-तिलहन को तो गन्ने से बीस हिस्से कम पानी चाहिएय फिर भी लातूर को गन्ने का लालच है।

कहना न होगा कि लातूर, को जैसलमेर से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। हकीकत यह है कि यदि लातूर अकेले गन्ने का लालच छोङ दे, तो ही लातूर शहर और गांव दोनो की प्रतिदिन की आवश्यकताओं हेतु पानी की पूर्ति हो जायेगी। लातूर शहर को दैनिक आवश्यकताओं के लिए प्रतिदिन कुल 400 से 500 लाख लीटर और गांव को प्रतिदिन 200 से 300 लाख लीटर पानी चाहिए।

..तो संकट कहां है ? 
आसमान में या दिमाग में ?? 

महाराष्ट्र में गत् 60 वर्षों का सिंचाई पैटर्न देखिएरू सिंचित क्षेत्र में बाजरा, ज्वार, अन्य अनाज, दाल, तिलहन और कपास की फसल करने की प्रवृति घटी हैय धान, गेहूं और गन्ना की बढ़ी है।

फसल चयन की उलटबांसी देखिए कि सिंचित क्षेत्र में इन फसलो को प्राथमिकता इसके बावजूद है कि महाराष्ट्र में इन फसलों का सिंचाई खर्च अन्य राज्यों की तुलना में काफी अधिक है। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश की तुलना में महाराष्ट्र में गन्ना उत्पादन में पानी खर्च साढे़ नौ गुना तक, धान-गेहूं में सवा गुना तक, कपास में दस गुना तक और सब्जियों में सवा सात गुना तक अधिक है।

सब जानते हैं कि ‘हरित क्रांति’ का ढोल बजाने में जो-जो राज्य आगे रहे, आज उनके पानी का ढोल फूट चुका है; फिर भी व्यावसायिक खेती की जिद् क्यों ? पानी नहीं है तो किसने कहा कि महाराष्ट्र के किसान केला, अंगूर, गन्ना, चावल और प्याज जैसी अधिक पानी वाली फसलों को अपनी प्राथमिक फसल बनायें ?

यही हाल जिलावार 153 मिलीमीटर से लेकर 644 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा औसत वाले बुंदेलखण्ड का है। चंदेलकालीन तालाबों के मशहूर बुंदेलखण्ड आज खदान, जंगल कटान और जमीन हङपो अभियान का शिकार है। समाधान के रूप में  वहां नदी जोङ, बोरवैल और पैकेज जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार 80,000 करोङ का पैकेज मांग रही है।

यह समाधान नहीं है। 

कम बारिश हो, तो खेती सिर्फ आजीविका का साधन हो सकती है, सारी सुविधायें और सपने पूरे करने का नहीं। अतः जैसलमेर ने अपने को खेती पर कम, मवेशी और कारीगरी पर अधिक निर्भर बनाया है। यही रास्ता है। यदि जैसलमेर यह कर सकता है, तो मराठवाङा और बुंदेलखण्ड क्यों नहीं कर सकते ? वे क्यों नहीं कम अवधि व कम पानी वाली फसलों को अपनी प्राथमिक फसल बना सकते ? महाराष्ट्र शासन को किसने बताया कि जल के दुरुपयोग को बढ़ावा देने वाली नहरी सिंचाई को बढ़ावा दे ? उसे किसने रोका कि वह बूंद-बूंद सिंचाई व फव्वारे जैसी अनुशासित सिंचाई पद्धतियों को न अपनाये ? कम पानी की फसलों को बढ़ावा देने के लिए उनके न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि जरूरी है। इसे लेकर महाराष्ट्र सरकार के हाथ किसने बांधे हैं ? ‘खेत का पानी खेत में’ और ‘बारिश का पानी धरती के पेट में’ जैसे नारों पर कहां किसी और का एकाधिकार है ?

सब जानते हैं कि रासायनिक खाद, मिट्टी कणों को बिखेरकर उसकी ऊपरी परत की जल संग्रहण क्षमता घटा देती है। गोबर आदि की देसी खाद, मिट्टी कणों को बांधकर ऊपरी परत में नमी रोककर रखती है। इससे सिंचाई में कम पानी लगता है। खेत समतल हो, तो भी कम सिंचाई में पानी पूरे खेत में पहुंच जाता है। ग्रीन हाउस, पाॅली हाउस, पक्की मेङबंदी, आदि क्रमशः कम सिंचाई, कम पानी में खेती की ही जुगत हैं। इन्हे अपनाने की रोक कहां हैं ?

कहना न होगा कि वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन को दोष देने से पहले, हमें अपनी स्थानीय कारगुजारियों को सुधारना होगा। वर्षा जल संचयन और उपयोग में अनुशासन का कोई विकल्प नहीं है। उपयोग योग्य उपलब्ध कुल जल में से 80 प्रतिशत का उपयोग करने वाले किसान पर इसकी जिम्मेदारी, निस्संदेह सबसे अधिक है।
जैसलमेर की सीख यही है। 
क्या हम सीखेंगे ?
……………………………………………………………………………………………………………………………….
फोटो साभार : livemint.com; thehindu.com; welcomenri.com; economictimes.indiatimes.com