…. ताकि लातूर बनने 
से बचा रहे
 मेरठ


( नीर फाउंडेशन, मेरठ के निदेशक श्री रमन त्यागी से प्राप्त फोटो और जानकारी पर आधारित लेख: पानी पोस्ट  टीम )

गंगा-यमुना के दोआब का मतलब ही है, मीठे पानी व उसकी प्रचुर उपलब्धता वाला इलाका। किंतु अब गंगा-यमुना का दोआब अपनी यह पहचान खो रहा है। पानी का संकट अब इस दोआब से दूर नहीं। पानी का प्रदूषण अब यहां भी एक गंभीर समस्या है।

जी हां, हम बात कर रहे हैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश की। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर तालाब अतिक्रमण के शिकार हैं। जो बच गये हैं, उनमें पानी से ज्यादा गंदगी है। यही कारण है कि जो तालाब कभी गांव के जीवन उत्सव और साझे के गवाह हुआ करते थे, वे अब गांववासियों के लिए धीमी मौत का कारण बन रहे हैं। आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांव के गांव जानलेवा बीमारियों की चपेट में हैं। भूजल स्तर, उतरकर पाताल का एहसास करा रहा है। कितना दुखद है कि गंगा-यमुना का यह दोआब, तेजी से होते जलाभाव व जल प्रदूषण वाला क्षेत्र बन गया है !

सामने आये नीर फाउंडेशन के जलदूत

हालात की गंभीरता से चेतते हुए नीर फाउंडेशन ने जल संचरनाओं को बचाने की शुरुआत काफी पहले कर दी थी। नीर फाउंडेशन, मेरठ जिले में स्थित है और पानी और पर्यावरण के मसलों पर लंबे अरसे से कार्य कर रहा है। फाउंडेशन के निदेशक श्री रमन त्यागी द्वारा ने बताया अब वे ‘तालाब बचाओ-तालाब बनाओ’ के नाम से बाकायदा एक अभियान चला रहे हैं। उन्होने बताया कि ‘तालाब बचाओ-तालाब बचाओ’ अभियान के तहत् जहां नए तालाब बनाने का कार्य किया जा रहा है, वहीं पुराने तालाबों को पुनर्जीवित करने के प्रयास भी लगातार जारी हैं। तालाबों की कब्जामुक्ति भी इस अभियान का एक हिस्सा है।

मुहिम को अंजाम देने के लिए नीर फाउंडेशन ने जलदूत तैयार किए हैं। कहते हैं कि नीर फाउंडेशन के ये जलदूत जहां गांव-गांव जाकर समस्याग्रस्त तालाबों के चिन्हीकरण से लेकर उनके समाधान के लिए स्थानीय समुदाय को प्रेरित व प्रोत्साहित करने का काम करते हैं। नए तालाब बनाने के इच्छुक किसानों को आवश्यकतानुसार तकनीकी व आर्थिक सहायता तथा प्रशासनिक सहयोग सुनिश्चित कराने में भी जलदूतों की अह्म भूमिका रहती है।

मेरठ जनपद के गंगोल सरोवर ( गांव-गंगोल), गांधारी सरोवर (कस्बा-परीक्षितगढ़), जरत्कारू ऋषि का तालाब (कस्बा-परीक्षितगढ़), पूठी गांव का तालाब,  सूर्यकुण्ड, गांव कल्याणपुर का तालाब (ब्लाॅक-रोहटा), आलमगीरपुर का तालाब (ब्लाॅक-रोहटा), मोहम्मदपुर धूमी का तालाब का पुनर्जीवन इन जलदूतों के हौसले और प्रेरणा की कहानी खुद-ब-खुद कह देते हैं।

सतीश कुमार के हौंसले को दाद

रमन, मेरठ जनपद के करनावल के किसान सतीश कुमार के हौसले की तारीफ करने से नहीं चूकते। श्री सतीश कुमार, करनावल के प्रमुख भी हैं और नीर फाउंडेशन के जलदूत भी। रमन कहते हैं कि सतीश ने अपनी 25 बीघा जमीन में तीन बड़े-बड़े तालाब खोदकर एक व्यापक संदेश देने शुरुआत की है। सुखद है कि आज ये तीनों तालाब पानी से लबालब भरे हैं। सतीश का यह साहसिक कारनामा प्रेरक सिद्ध हुआ है। भरी जलराशि को देखकर अन्य किसान भी उनसे सम्पर्क करने लगे हैं।

नहीं चेते, तो रूठ जायेगा दोआब का रुतबा

रमन कहते हैं कि हालात इतने गंभीर हैं कि अब जन-जागरुकता, एकजुटता और संकल्प के अलावा अब कोई विकल्प शेष नहीं है। अब भी नहीं जागे, तो गंगा-यमुना का दोआब होने के बावजूद, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खेती और सेहत की बर्बाद होने से रोकना मुश्किल हो जायेगा। आज पानी की कमी और प्रदूषण को लेकर महाराष्ट्र में हायतौबा है। नहीं चेते, तो ताज्जुब नहीं कि आने वाले दस साल बाद यही चीख-पुकार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी होगी। पानी को लेकर मार-काट भी हो, तो ताज्जुब नहीं। क्यों ? क्योंकि जलनिकासी के लिए यदि अकेले लातूर में 90,000 बोरवैल हैं, तो आज अकेले मेरठ में 55,000 ट्युबवैल हैं और वर्षा जल संरक्षण की चेतना को पंख लगने अभी यहां भी बाकी हैं।

क्रांतिद्वार के तालाबों की छिनती आज़ादी 

गौरतलब है कि मेरठ जनपद का कुल क्षेत्रफल 2564 वर्ग किलोमीटर है। मेरठ जनपद में मुख्य शहर व कई छोटे-छोटे कस्बों के अलावा 663 गांव हैं । एक रिपोर्ट तथा राजस्व अभिलेखों के अनुसार, मेरठ जनपद में दर्ज तालाबों का कुल क्षेत्रफल 1238.087 वर्ग हेक्टेयर है; तद्नुसार मेरठ जनपद में कुल 3062 जोहड-तालाब होने चाहिए। किंतु अतिक्रमण की प्रवृति यहां कुछ इस कदर हावी हुई कि 1118 जोहड़-तालाबों के नामोनिशान मिट चुके हैं। मिट चुके 1118 जोहड़-तालाबों के खसरा नबंरों पर आज खेत हैं अथवा इमारतें और सङके खड़ी कर दी गईं हैं।

रमन कहते हैं कि मेरठ नगर में स्थित सूर्यकुण्ड को मेरठ नगर निगम द्वारा बेचा जा रहा था।

एक वक्त नीर फाउंडेशन ने ही हिंदुस्तान अखबार के साथ मिलकर सूर्यकुण्ड बचाने की एक मुहिम चलाई और उसे बिकने से बचाया। इसके बाद इसमें वृक्षारोपण किया, सांकेतिक रूप से इसमें जल प्रवाहित किया तथा मेरठ विकास प्राधिकरण से पैसा आवंटित कराकर इसमें पार्क का निर्माण कराया।

इस तरह मेरठ जनपद आज कुल 1944 जोहड़-तालाब शेष बचे हैं। बचे हुए 1944 जोहङ-तालाबों में से 1543 पर आशिक रूप से अतिक्रमण है। रकबानुसार देखें, तो मेरठ जनपद में सही-सही कुल  401 जोहङ-तालाब पूरी तरह कब्जामुक्त हैं।

( विस्तृत जानकारी के लिए इस लेख के साथ संलग्न तालिकायें देंखे – पानी पोस्ट टीम )

कब्जामुक्ति को चाहिए एक अभियान

हालांकि नीर फाउंडेशन का दावा है कि वह मेरठ जनपद के (गांव पूठी, खटकी, नारंगपुर, खासपुर, अतराड़ा, सकोती, लाहौरगढ़, देदवा, धन्जु, जलालपुर, जयभीमनगर, महलवाला, माछरा, पूठ खास, सिखैड़ा, रामनगर), मुजफ्रनगर जनपद के (गांव कुटबी, डबल, मोरकुक्का, हुसैनपुर बोपाड़ा, खेड़ी व नावला आदि), बागपत जनपद के (बड़ा गांव, खिंदौड़ा, बरनावा व ढहरा), हापुड़ जनपद के (गांव सबली, छेजा, दत्याना, उपैड़ा व सिखैड़ा) और गाजियाबाद जनपद के (गांव सरना, मोदीनगर व तलहैटा) समेत कई गांवों के तालाबों का कब्जामुक्त कराने में सफल रहा है; बावजूद इसके यह सच है कि प्रशासनिक लापरवाही और सामाजिक निष्क्रियता के कारण माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्ष 2001 में हिंचलाल तिवारी बनाम कमला देवी नामक मामले में दिए आदेश और उसके आधार पर राजस्व परिषद, उत्तर प्रदेश द्वारा जारी अधिसूचना के बावजूद हमारी जल संरचनाओं पर अतिक्रमण करने की प्रवृति पर लगाम लगनी अभी बाकी है।

टें बोलते हैण्डपम्प-ट्युबवैल

रिपोर्ट का यह पक्ष भी हमें सोचने पर मजबूर करता है कि कुल बचे हुए 1944 जोहड़-तालाबों में से 1229 में कुछ पानी है; शेष 715 पूर्णतः सूखे हुए हैं।

गौरतलब है कि मेरठ जनपद की कुल कृषि भूमि 2,03,350 वर्ग हेक्टेयर है। करीब 85 प्रतिशत सिंचाई भूजल निकासी के जरिए ही होती है। नहरों व अन्य जलस्त्रोतों के जरिए मात्र 15 प्रतिशत सिंचाई ही होती है। पेयजल व अन्य दैनिक आवश्यकताओं के लिए जो प्रत्येक घर में एक से दो निजी अथवा इण्डिया मार्का हैण्डपम्प लगे हुए हैं। गिरते जलस्तर के कारण हैण्डपम्पों व ट्युबवेलों ने जहां-जहां हाथ खङे कर दिया हैं, लोग वहां विकल्प के रूप में समर्सिबल ले आये हैं। कल को ये समर्सिबल हाथ खङे कर देंगे, तो वे जेटपम्प ले आयेंगे; किंतु क्या गहरे और गहरे उतरती जलनिकासी सच में कोई समाधान है ?

संवेदना जगाते सवाल

इस सवाल को लेकर गांव-गांव घूमते नीर फाउंडेशन के जलदूत लोगों से सवाल कर रहे हैं कि जिस दिन जेटपम्प टें बोल जायेगा, उस दिन कौन सा पम्प लाओगे ? शादी-ब्याह आदि शुभ कार्यों में कभी कुंआ पूजते थे। अपनी करतूतों के कारण आज हम कुएं की जगह हैण्डपम्प पूजन को विवश हो गये हैं। कुएं न होने के कारण, मन्दिरों तक में सरकारी हैण्डपम्पों से धार्मिक मान्यताओं को पूरा किया जा रहा है। यह हमारी करतूत ही तो है कि कांवङिये, अपनी कांवङ में गंगाजल की जगह, मल लेकर जाने को विवश हैं। कल को जब हैंडपम्प भी चले गये, तब ट्युबवैल और समर्सिबल पूजना।
 कैसा रहेगा ??

सोच का संकट: लोगों ने कुओं को बनाया शौचालयों का सेप्टिक टैंक !

रिपोर्ट के अनुसार, मेरठ जनपद में कुल 2086 कुएं मौजूद हैं। उनमें से 1541 कुओं की अवस्था जीर्ण-शीर्ण है। मात्र 545 कुओं में ही पानी मौजूद है। रमन इसे सोच का संकट ही मानते हैं कि तथाकथित आधुनिकता में फंसकर हमने अपने पूजनीय कुओं को कूङेदानों में बदल दिया है। बेसमझी की हद यह है कि लोगों ने अपने शौचालयों के मलनिकासी पाइप तक कुओं से जोङ दिए हैं। क्या यह किसी समाज के सभ्य और सुसंस्कृत होने के लक्षण हैं ? मनुस्मृति, वेद, कुरान से लेकर बाइबल तक में पानी को गंदा न करने तथा नदी-तालाबों को संरक्षित करने के निर्देश हैं। सिख स्वयंसेवक, अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर स्थित पवित्र ताल को प्रत्येक वर्ष जिस श्रृद्धा के साथ स्वच्छ करते हैं, वह जल संरचनाओं के प्रति सिख स्वयंसेवकों की आस्था और व्यवहार का बेमिसाल उदाहरण है। किंतु क्या समूचे भारतीय समाज का व्यवहार यही है ?

आ अब लौट चलें

रमन कहते हैं कि हमारे पूर्वजों ने जिस सोच के साथ इतने अधिक जल स्रोतों का निर्माण किया; जिस समझदारी के साथ निचले स्थानों पर तालाब-जोहड़ बनाये और ऊंचे स्थानों पर कुएं; हमें अपने भीतर उस सोच और परंपरागत ज्ञान के प्रति सम्मान लौटाना ही होगा। तालाबों से मिट्टी निकालने की प्रथा नियम से प्रत्येक वर्ष पूरी की जाती थी।  घर की महिलाएं एक दीया लेकर गीत गाते हुए गांव के बाहर बने तालाब तक जाती थीं और मिट्टी निकालकर घर ले आती थी। घर-आंगन की लिपाई के लिए तालाब की मिट्टी सबसे पवित्र मानी जाती थी। इस बहाने तालाब बचे रहते थे और तालाबी मिट्टी के प्रति श्रृद्धा भी।

स्थायी समाधान की सोच व संकल्प जरूरी

ट्रेनों से पानी पहुँचाना, पाइपों से नहरों का पानी दूसरे राज्यों या शहरों में पहुँचाना तथा टैंकर से पानी पहुंचाना, इन तीनों उपायों में से कोई भी दूरगामी नहीं है। तुरंत राहत के लिए इनमें से किसी विकल्प को स्थिति के अनुसार अपनाया जा सकता है लेकिन तब क्या होगा जब ट्रेन में भरे हुए पानी का मालिक (जिस राज्य या स्थान से ट्रेन में पानी भरा गया है) विरोध करेगा; कहेगा -’’ अरे भाई, हम अपनी जमीन के नीचे का पानी दूसरी जगह क्यों जाने दें ?’ वर्षा जल पुनर्भरण करने वाला समाज यह भी कह सकता है कि उसने अपनी सारे साल की जरूरत के लिए ही पानी को अपनी जल तिजोरी में बचाकर रखा है। उस पर सबसे पहले उसका ही हक है।

निकासी का यदि क्रम जारी रहा, तो एक दिन टिहरी का जलाश्य भी हाथ खङा कर सकता है। वह कह सकता है – ’’भाई, दिल्ली केे सिर पर भी पानी बरसता है, तुम अपने पानी का इंतजाम खुद करो।’’

ऐसा कठिन व डराने वाला समय अब दूर नहीं। अतः जरूरी है कि हम अभी चेतें। अपने सिर पर बरसने वाली बेशकीमती बूंदों को धरती मां के गर्भ में पहुंचाये। पानी के कटोरे बनायें भी और बचायें भी। जलोपयोग का अनुशासन सुनिश्चित करें। यही स्थायी समाधान है। 
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