लेखक : सुरेन्द्र बांसल  

नदी संस्कृति के मामले में भारत कभी सिरमौर था । शिव, हिमालय के अधिष्ठाता हैं दुनिया के किसी भी एक हिस्से की तुलना से ज़्यादा नदियों तो अकेले शिव की जटाओं से निकली  इन नदियों के कारण ही भारत की धरती युगों-युगों से शस्य-श्यामला बनी रही। हम भारतीय अपनी इन नदियों को जीवन का सेतु और आजीविका का स्थायी स्रोत की तरह देखते ज़रूर थे,  लेकिन पर्यावरणीय और पारिस्थितिक संतुलन की मुख्य जीवन रेखा के रूप में नदियों की महत्ता को भूलने की गलती कभी नहीं करते थे।

ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी भी इनमें से एक थी।

करीब पांच हजार वर्ष पहले सरस्वती के विलुप्त होने के कारण चाहे कुछ भी रहे हों, लेकिन सरस्वती की याद दिलाने वाले इस पावन स्तोत्र को करोड़ों-करोड़ लोग आज भी गुनगुनाते हैं :


गंगे! च यमुने! चैव गोदावरी! सरस्वति! नर्मदे! सिंधु! कावेरि! जले अस्मिन सन्निधिं कुरु।।


यही भारत की नदी संस्कृति है । 

नदी संस्कृति के वारिस होने का दावा और दम 

दरअसल, नदी-भक्ति हम भारतीयों की असाधारण विशेषता है। नदियों को हम माता कहते हैं। भारत में गंगा सहित तमाम नदियां मात्र जल से भरी नदियां नहीं मानी जाती हैं, बल्कि मातृ रूप में पूजी जाती हैं। हजारों वर्ष पहले विलुप्त हुई सरस्वती के लिए हमारा दिल आज भी धड़कता है। सरस्वती से जुड़ी मामूली खबर भी सरकारों और जन-मन के लिए कौतूहल का विषय बन जाती है। क्यों न बने ? आखिरकार, नदियों के साथ पूरी मानवता का भविष्य जुड़ा हुआ है। नदियां, मानव सभ्यताओं और संस्कृतियों की जननियां हैं। विश्व की तमाम सभ्यताएं और संस्कृतियां नदियों के किनारे ही तो पल्लवित और पुष्पित हुई हैं। नदियां, जीवनदायी अमृत यानी जल की वाहक हैं। हम कह सकते हैं कि हम भारतीय, नदियों की संस्कृति के वारिस हैं; कह सकते हैं कि  नदियां हमारे जनमानस की स्वच्छता और निर्मलता का प्रतीक हैं किन्तु क्या वाकई ? क्या यह सच नहीं कि आज हमारी गैर जिम्मेदाराना और संवेदनहीन जीवन शैली के कारण नदी समेत तमाम प्राकृतिक जलस्रोत न केवल दूषित होते जा रहे हैं, बल्कि भौतिक लोलुपता के कारण दम भी तोड़ रहे हैं ? 

एहसास जितना जल्दी, उतना अच्छा

स्थितियों की विकटता की चेतावनी  तो यही है कि हम अपने प्राकृतिक जल संसाधनों से औैर खिलवाड़ सहन न करें। हमें इस बात का एहसास जितनी जल्दी हो जाए, उतना ही अच्छा है; नहीं तो पछताने का मौका भी नहीं मिलेगा। अगर हम जल संस्कृति के वारिस होने का दावा बरक़रार रखना चाहते हैं,  तो हमें आज से और अभी से नदियों, तालाबों, जोहड़ों, डबरों, बावडिय़ों, कुओं और अन्य जलस्रोतों को पुन: सजीव करने के लिए युद्ध स्तर पर जुटना होगा। हमे याद रखना होगा कि नदियों को खत्म करने का मतलब है, धीरे-धीरे सभ्यताओं और संस्कृतियों को खत्म करने का सामान तैयार करना। क्या व्यक्ति, क्या समाज और क्या सरकार, सभी को अपना दायित्व समझकर जलस्रोतों और नदियों को बचाने की मुहिम में जुटना होगा; तभी हम काल के अभिशाप से बचेंगे। अगर हम आज नहीं चेते, तो कल हमें अभिशाप देगा। रसूल हमजातोव के शब्दों में कहें तो अगर तुम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलाओगे, तो भविष्य तुम पर तोप से गोले बरसाएगा। जब भविष्य तोप से गोले बरसाएगा, तब हमें बचाने शायद ही कोई आएगा।


नदियों बिना अधूरी भारत गाथा 

मत भूलो कि भारत देश की कोई भी सांस्कृतिक गाथा, नदियों के पुण्यधर्मी प्रवाह को बिसरा कर नहीं लिखी जा सकती। इसलिए हमारी संस्कृति को एक सूत्र में पिरोने वाले वेदों में नदियों की महिमा विस्तार से वर्णित है। संसार में ऐसा दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता, जिसमें किसी समाज ने अपने जीवन प्रवाह को नदियों से इस तरह जोड़कर देखा है। नदियों से ओत-प्रोत जैसा भूगोल अपने देश का है, वैसा विश्व किसी  दूसरे देश  का नहीं।

नदियों के महत्त्व को रेखांकित करते हुए काका कालेलकर ने लिखा है – ”जीवन और मृत्यु..दोनों में आर्यों का जीवन नदी के साथ जुड़ा है। उनकी मुख्य नदी तो है गंगा। यह केवल पृथ्वी पर ही नहीं, बल्कि स्वर्ग में भी बहती है और पाताल में भी बहती है। इसीलिए वे गंगा को त्रिपथगा कहते हैं। जो भूमि केवल वर्षा के पानी से ही सींची जाती है और जहां वर्षा के आधार पर ही खेती हुआ करती है, उस भूमि को ‘देव मातृक कहते हैं। इसके विपरीत, जो भूमि इस प्रकार वर्षा पर आधार नहीं रखती, बल्कि नदी के पानी से सींची जाती है और निश्चित फसल देती है, उसे ‘नदी मातृक कहते हैं। भारतवर्ष में जिन लोगों ने भूमि के इस प्रकार दो हिस्से किए, उन्होंने नदी को कितना महत्त्व दिया था, यह हम आसानी से समझ सकते हैं। पंजाब का नाम ही उन्होंने सप्त-सिंधु रखा। गंगा-यमुना के बीच के प्रदेशों को अंतर्वेदी (दो-आब) नाम दिया। सारे भारतवर्ष के ‘हिंदुस्तान और ‘दक्खन जैसे दो हिस्से करने वाले विन्ध्याचल या सतपुड़ा का नाम लेने के बदले हमारे लोग संकल्प बोलते समय ‘गोदावर्य: दक्षिणे तीरे या ‘रेवाया: उत्तर तीरे ऐसे नदी के द्वारा देश के भाग करते है।” 

कुछ विद्वान ब्राह्मण-कुलों ने तो अपनी जाति का नाम ही एक नदी के नाम पर रखा – सारस्वत। गंगा के तट पर रहने वाले पुरोहित और पंडे अपने-आपको गंगापुत्र कहने में गर्व अनुभव करते हैं। राजा को राज्यपद देते समय प्रजा जब चार समुद्रों का और सात नदियों का जल लाकर उससे राजा का अभिषेक करती, तभी मानती थी कि अब राजा राज्य करने का अधिकारी हो गया। भगवान की नित्य की पूजा करते समय भी भारतवासी, भारत की सभी नदियों को अपने छोटे से कलश में आकर बैठने की प्रार्थना अवश्य करेगा। लेकिन आज हम नदियों को महत्त्व देने वाली बात भूलकर उन्हें बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। इसी का नतीजा है कि चहुंओर जल के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई है।

हमारे उत्तरी क्षेत्र को गंगा और यमुना ने ही संसार का सबसे विस्तृत उर्वर क्षेत्र बनाया है। पश्चिम अपनी पांच नदियों के कारण पंचनद प्रदेश कहलाता है। ये पांचों नदियां वैदिक और पौराणिक काल की हैं। इनमें से सतलुज नदी वेदों-पुराणों में जहां शतद्रू के नाम से विख्यात थी, वहीं ब्यास बिपाशा के नाम से जानी जाती थी। नर्मदा, महानदी, ताप्ति और सोन नदियां जहां मध्य भारत का गौरव हैं, वहीं दक्षिण भारत कृष्णा, कावेरी और गोदावरी के कारण धन-धन्य से भरपूर रहा है। उत्तर-पूर्व भारत में ब्रह्मपुत्र और तीस्ता के उपकारों को भला कौन भूल सकता है। इन सबके बीच भी सैकड़ों नदियां ऐसी हैं, जो सदियों से देश के जन-गण के लिए प्राकृतिक नीति आयोग का काम करती आ रही हैं। न तो हम भगवान राम के जीवन चरित की साक्षी सरयू को भूल सकते हैं न गौतम बुद्ध, महावीर के बिहार में विहार करती गंडक नदी को भूल सकते हैं और न ही लाखों भारतीयों के आध्यात्मिक समागम कुंभ को अनदेखा कर सकते हैं।

कालबोध को कमज़ोर करती पढ़ाई 

पुण्यदायिनी इन नदियों का ही प्रताप है कि जितनी विविधता भरी और उपजाऊ भूमि भारत में है, उतनी दुनिया में और कहीं नहीं। लेकिन अफसोस की बात है कि पिछले दो सौ वर्षों की अंगरेजी समझ की पढ़ाई और साठ वर्षों की कुशिक्षा ने हमारे लहलहाते काल-बोध को कमजोर कर दिया है। क्या यह सच नहीं कि हमारे राजनेताओं की जमात ने देश के भूगोल को उपेक्षित न बनाया होता, तो आज पाठ्यक्रमों से मिट चुके देश को बच्चे ठीक से पढ़ पाते ? काश ! हमारे बच्चे जान पाते कि अपने देश की नदियों और पहाड़ों के कितने सुंदर नाम और कितना महत्त्व था  कितना अच्छा होता, गर हमारे बच्चे अपने पुरखों की कमाई नेकियों से रू-ब-रू होते। लेकिन भारत का मूल मिटाने वाली वोटजुटाऊ राजनीति ने योजनाबद्ध तरीके से स्कूली पाठ्यक्रमों से देश लगभग मिटा ही डाला है।
उम्मीद है तो बस यही कि भारत का जनमानस नदियों की निर्मलता से आज भी अपने जीवन को निर्मल और पवित्र बनाए रखने की प्रेरणा लेता है। विकास की गाद, बेशक इन नदियों के पाट समेटने में लगी हुई है; बावजूद इसके आम जनता आज भी इन रूखी-सूखी नदियों में अपने जीवन का स्रोत और सार खोजती है। हमारा वैदिक और पौराणिक साहित्य नदियों की स्तुतियों और पूजा-अर्चना से भरा पड़ा है। प्रत्येक नदी के स्तोत्र हैं; आरती-पूजा का विधान है। लेकिन इन्हें बचाए रखने का विधान कहीं खो गया लगता है; तभी तो सरस्वती लुप्त हुई कई और नदियां विलुप्ति की कगार पर हैं।

बिसराओ न काका का कहा 

काका कालेलकर एक जगह लिखते हैं – ”वेदकाल के ऋषियों से लेकर व्यास, वाल्मीकि, शुक, कालिदास, भवभूति, क्षेमेंद्र, जगन्नाथ तक किसी भी संस्कृृत कवि को ले लीजिए, नदी को देखते ही उसकी प्रतिभा पूरे वेग से बहने लगती है। हमारी किसी भी भाषा की कविताएं देख लीजिए, उनमें नदी के  स्रोत अवश्य मिलेंगे और हिंदुस्तान की भोली जनता के  लोकगीतों में भी आपको नदी के  वर्णन कम नहीं मिलेंगे। कवि जिस माटी के गुण गाते थकते नहीं थे, आज वह माटी ही थक चली है। सुजला, सुफला, शस्य-श्यामला धरती बंजर बनती जा रही है।”

 इसका कारण कुछ और नहीं बल्कि नदियों के महत्त्व को बिसरा देना ही है। प्राकृतिक जल स्रोतों और प्रकृति को मात्र भौतिक दृष्टि से देखना, पश्चिम का भोगवादी नजरिया है। हमारी नदियों को किसी भौतिक ऊहापोह में नहीं बांधा जा सकता। आज हमने अपने सारे सरल काम जटिल कर लिए हैं। हम, अपने अनेकानेक सामाजिक दायित्व बिसरा चुके हैं। नदियों के प्रति भी हमारे कर्तव्य बाधित और भ्रमित हो चले हैं। 

अधिकार की गुहार में कर्तव्य की दरकार 

दुर्योग से यह केवल अधिकारों की छीना-झपटी का दौर है ऐसे दौर में कर्तव्यों की चिंता भला किसे हो ! हमारे पुरखों ने नदियों से जुड़े विधि-विधान अपनी जीवनचर्या से जोड़ रखे थे। लेकिन उद्योग बनते सियासी तंत्र में ‘अधिकार हमारे, कर्तव्य तुम्हारे’ का खेल चल पड़ा है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट ही सरकारों की मुख्य नीतियों में शुमार हो चुकी है। हालांकि इसी देश में कुछ बरस पहले ऋषि विनोबा ने कहा था – ”सबै भूमि गोपाल की, नहीं किसी की मालिकी।” लेकिन इस बात को आज कौन समझ रहा है।

योजना हो, तो व्यावहारिक हो 

इसी बीच केंद्र सरकार  ने ‘नमामि गंगे’ का संकल्प जताया है  यदि सरस्वती को वापस लौटना है, तो हरियाणा की राज्य सरकार को संकल्प जताना होगा। हरियाणा सरकार को अपने तमाम जलस्रोतों और छोटी-मोटी सभी नदियों को निर्मल बनाने की सार्थक और व्यावहारिक योजना बनानी होगी । योजना यदि व्यावहारिक नहीं होगी, तो हम किसी ‘सरस्वती’ को विलुप्त होने से रोक नहीं सकेंगे। हरियाणा की नई सरकार का यह दायित्व है कि वह प्रदेशवासियों के साथ मिलकर निर्मल नदी, निर्मल तालाब, निर्मल जोहड़,  निर्मल बावड़ी और निर्मल जल के संकल्प को स्थायी बनाए।

सरस्वती उद्गम को प्लाईवुड से बचाओ 

सरस्वती का उद्गम स्थल आदिबद्री माना जाता है 
हैरानी की बात है कि इस क्षेत्र में प्लाइवुड उद्योग धड़ल्ले से जंगलों पर कुलाड़ी चला रहा है। लगभग चार सौ लाइसेंस पहले से जारी हैं; अभी दो सौ लाइसेंस और देने की बात चल रही है। यमुनानगर के पूरे क्षेत्र में सफेदा और पोपलर वृक्ष अपार संख्या में रोपे गए हैं। प्लाईवुड के लिए तो ये वृक्ष काम आ सकते हैं लेकिन भूजल स्तर को ये कितना नुक्सान देंगे  इसका अंदाज़ा होते हुए भी आँखें मूंदना बेहद घातक होगा

 इसका दुष्परिणाम यह होगा कि  बचा-खुचा भूजल भी सिमटता जाएगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि जीवन को चलाने के लिए कारोबार भी फलने-फूलने चाहिएं, लेकिन जिम्मेदारी और नियमों के साथ। 


क्या ऐसा संभव नहीं कि प्रत्येक प्लाइवुड लाइसेंस धारक प्रतिवर्ष अपने लाइसेंस का नवीनीकरण कराने से पूर्व कम से कम पांच सौ पेड़ अवश्य लगाए ? ऐसा संभव है। न हो, तो सरकार को ऐसे नियमों को संभव बनाना चाहिए; ताकि भूजल स्रोतों का खजाना बचा रहे। क्यों ? क्योंकि हरियाणा आज अपनी भूजल संपदा के मामले में बहुत बड़े संकट के मुहाने पर खड़ा है। हरियाणा में कुल जलसंभर क्षेत्र 108 हैं इनमे से 82 डार्क जोन में बदल चुके हैं। मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल के अपने क्षेत्र करनाल के सभी छह ब्लॉक डार्क जोन में बदल चुके हैं। हरियाणा देश के एकमात्र राज्य है, जिसमें कुल रकबे की तुलना में वन क्षेत्र का रकबा गिरकर छह फ़ीसदी के निचले स्तर पर आ पहुंचा है हैं। जिस प्रदेश में वन इतने कम हों, वहां कभी भी अकाल की स्थिति पैदा हो सकती है। 

दफ्तर से बाहर निकले सरस्वती की पुनर्जीवन योजना 

यह हरियाणा का सौभाग्य है कि  प्रदेश में सरस्वती के प्रकट होने की खबरें यदा-कदा आ रही हैं, लेकिन सरकार को मात्र नारियल फोड़ कर, चार चावल चढ़ा कर और तिलक लगा कर अपने कर्तव्य से पल्ला नहीं झाडऩा होगा। उसे सरस्वती के ऐसे स्रोत से प्रेरणा लेकर प्रदेश के सभी पुरातन जल स्रोतों की सार-संभाल का जिम्मा उठाना होगा। 

सरकार, सरस्वती बोर्ड की घोषणा कर चुकी है। संभव है कि घोषणा के तहत कागज़ के सौ -दो सौ रीम खराब कर कोई नदी नीति भी बन ही गई होगी।  संभव है कि  सरस्वती बोर्ड कार्यालय में कोई सज्जन धूपम् – दीपम कर बैठ भी गए होंगे, लेकिन लेकिन क्या  सिर्फ घोषणा से नदी बचेगी ? अगर  दफ्तरों में बैठने मात्र से नदियां बचती होतीं, तो आज ग्यारह राज्यों में सुखाड़ न होता और तैंतीस करोड़ लोग पानी के लिए रेल प्रभु पर निर्भर न होते। 

नदियां जीवित होती हैं तालाब बचाने से; खासतौर पर नदियों के रास्तों  के किनारे गाँवों -कस्बों के तालाब; नदियां जीवित होती हैं  जोहड़-डबरे बचाने से। यही देश की स्वयंसिद्ध और शाश्वत सनातन नदी नीति है। सरस्वती बोर्ड की सार्थकता तभी है जब हरियाणा की नदियां, तालाब, जोहड़, डबरे, बावडिय़ां और कुएं संभाले जाएं।
अक्सर देखा यह जाता रहा है कि ऐसी संस्थाएं कुछ ज्ञात-अज्ञात कार्यकर्ताओं या परिचितों के पेट की भेंट चढ़ जाती हैं।  

हरियाणा की नई सरकार को नए सपनों के साथ प्रदेश की शुष्क पर्यावरणीय स्थिति को श्रद्धा से सींचना होगा। पेड़ों से बड़ा जल संरक्षक कोई नहीं  होता। सभी नदियों के किनारों पर युद्ध स्तर पर देशज पेड़ रोपने होंगे। अगर प्रदेश सरकार पर्यावरण प्रेमियों, जल का महत्त्व समझने वालों, पंचायतों और युवकों को साथ लेकर अपने जल स्रोतों को बचाने में सफल होती है, तो यकीन मानिए कि इससे न केवल दिन-प्रतिदिन विलुप्ति की कंदरा की ओर बढ़ती यमुना भी बच पाएगी और भविष्य में कोई ‘सरस्वती’ फिर कभी लुप्त नहीं होगी। 

आइए,  हरियाणा प्रदेश में फूटे सरस्वती के स्रोत से प्रेरणा लेकर हम सब सुखद भविष्य की रचना में जुटें। 
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फोटो साभार : yamunanagar.nic.in; anandcv.wordrpress.com; ancient.origin.net; tarungoel.in ; tribuneindia.com ; bharatdiscovery.org
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