लेखक : अरुण तिवारी

नदी और जनसंचार.. दोनो के लक्ष्य परमार्थी हैं। प्रत्येक नदी और जनसंचार माध्यम की अपनी सामर्थ्य, सीमा, भूगोल, चरित्र और आस्था होती है। इनके अनुसार ही दोनो को अपनी नीति व कार्यों का निर्धारण तथा निष्पादन के तरीके खोजने होते हैं। दोनो का यात्रा मार्ग चुनौतियों से खेलकर ही विस्तार हासिल कर पाता है। दोनो का काम, प्रकृति प्रदत जीवन की गुणवत्ता, जीवंतता और समृद्धि को बनाये रखने में अपना योगदान देना है। दोनो में शामिल होने वाले घटक, इनकी गुणवत्ता और स्वाद तय करते हैं। अतः दोनो के मूल स्त्रोत निर्मल होने चाहिए। दोनो का मालिकाना प्रदूषकों, शोषकों और अतिक्रमणकारियों के हाथ में नहीं होना चाहिए।

दोनो के अपने-अपने पंचतत्व हैं। भ से भूमि, ग से गगन, व से वायु, अ से अग्नि और न से नीर यानी भगवान; यह भगवान, प्रकृति के पंचतत्वों का भी समूह है और नदी के पंचतत्वों का भी। ऊपरी तौर पर देखें तो संपादक, संवाददाता, गैर संपादकीय सहयोगी, मशीनें तथा श्रोता/पाठक/दर्शक के नाम से जाने जाना वाला वर्ग हमें जनसंचार माध्यमों का पंचतत्व लग सकते हैं, लेकिन असल में इन सभी के बीच संवाद, सहमति, संवेदना, सहभाग और सहकार के सूत्र, जनसंचार के पंचतत्वों की समृद्धि के सूत्र हैं। जीवन विकास के डार्विन सिद्धांत को सामने रखें, तो हम पायेंगे कि ये पांच सूत्र, नदी के पंचतत्वों पर भी पूरी तरह लागू होते हैं।

जनसंचार के प्रवाह सूत्र

जनसंचार और नदी ही नहीं, जैसे ही किसी भी संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया व विशेषण का उसे निर्मित करने वाले मूल तत्वों से संपर्क कटेगा, उसकी जीवंतता नष्ट होने लगेगी। वह अपना मूल गुण व गुणवत्ता खोने लगेगा। जब हम नदी को सुरंग में कैद करते हैं; उसके तल से, सूर्य, प्राकृतिक हवा तथा उसके प्राकृतिक तल, ढाल तथा कटावों से उसका संपर्क काट देते हैं। नाद् स्वर से नदी शब्द की उत्पत्ति है। जब हम नदी को बैराजों व बांधों में कैद करते हैं, नदी अपना नाद् स्वर खो देती हैं। इसी तरह राजमार्ग पर दौङ लगाना, कितु पगडंडी से कट जाना; जनसंचार माध्यमों को लोगों की संवेदना और सोच से काट देता है; जनसंचार का नाद् मद्दिम पङ जाता है।

जैसे कोई मलीन नाला जुङकर नदी को प्रदूषित कर देता है, उसकी तरह जनसंचार में काले धन व मलीन विचार के प्रवाह का समावेश प्रदूषण का कारक बनता है। व्यवस्था में निरंतरता और नूतन की स्वीकार्यता का प्रवाह रुक जाये अथवा वह किसी एक वर्ग के हित में बंध जाये, तो उसके चरित्र का पानी सङने लगता है। दुनियाई अनुभव यही हैं और जीवंत बने रहने का बुनियादी सिद्धांत भी यही। अतः जनसंचार, और नदी.. दोनो के लिए जरूरी है कि किसी भी स्थिति-परिस्थिति में इनका इनके पंचतत्वों से संपर्क कटने न पाये। जिस मीडिया साथी समूह तथा उसके पाठकों / श्रोताओं / दर्शकों के बीच निर्मल संवाद, सहमति सहभाग, सहकार व संवेदना की निरंतरता कायम रहती है, वह मीडिया समूह जनसंचार के असल मकसद से कभी कट जाये; यह अप्रत्याशित घटना होगी।

नदी से सीखे मीडिया

मुझे लगता है कि मीडिया को आज नदी से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। प्रवाह के मार्ग में मौजूद पत्थरों से टकराने से नदी में ऑक्सीकरण की प्रक्रिया होती है। जिस तरह नदी इस प्रक्रिया से अपने जीवन के लिए ऑक्सीजन ग्रहण करती है, उसी तरह व्यवस्था और जनसंचार माध्यमों को भी चाहिए कि वे चुनौतियों से टकराने से डरें नहीं, बल्कि अपने प्रवाह को बनाये रखते हुए उनसे यह मानकर टकरायें कि उनका संघर्ष उन्हें और शक्ति प्रदान करेगा। इस पूरे घटनाक्रम के बीच नदी का धैर्य और आत्मसंयम भी गौर करने लायक तत्व है।

ध्यान रहे कि नदी अपने धैर्य का तटबंध तोङकर तभी भाग निकलती है, जब बांध-बैराज से उसका गला घोंटने की कोशिश की जाती है अथवा तटबंधों में उसके हाथ-पांव बांध दिए जाते हैं। नदी को यह बेअदबी पसंद नहीं; फिर भी नदी लंबे समय तक यह अत्याचार सहती है। जब उसके भीतर की गाद, दर्द का टापू बनकर खङा हो जाता है, तब वह बंधन का तटबंध तोङकर निकल पङती है, आजादी के किसी नये रास्ते पर। फिर जो भी रास्ते में आता है, नदी उसे भी अपने साथ लेकर आगे बढ जाती है। हमें चाहिए कि हम नदी के ऐसे सबकों से सीखने को हरदम तैयार रहें। क्या जनसंचार के माध्यम इस रास्ते पर हैं ?

कायम उम्मीद का दायित्व

मैं कहता हूं कि एक क्षण को मान भी लिया जाय कि मीडिया सिर्फ एक व्यवसाय हो गया है ? आप कह सकते हैं कि यह विज्ञापन और व्यवसाय की हरी झंडी पर संपादकीय की गाङी को दौङाने का दौर है; बावजूद इसके कुछ साहसी संपादकों की वजह से उम्मीद कायम है। लाभ के साथ शुभ के संयोग की सभी संभावनायें अभी समाप्त नहीं हुई हैं। मीडिया के विकेन्द्रित लाखों हाथों को देखते हुए कह सकते हैं कि उम्मीद अभी जिंदा है; आसमान अभी खुला है। अभी पूरे कुएं में भांग नहीं है। राष्ट्रीय दायित्व की पूर्ति को आर्थिक नफे-नुकसान की तराजू पर नहीं तोलने वाले अभी बहुत हैं। बहुत हैं, जो मानते हैं कि नकरात्मकता को नकराना और सकरात्मकता को फैलाना मीडिया ही नहीं, प्रत्येक नागरिक का राष्ट्रीय दायित्व है। असल चीज है, इन बहुतों की पीठ को थपथपा देना; सम्मान से सिर पर उठा लेना; गलत को टोक देना; रोक देना। यह मीडिया, समाज, साहूकार और सरकार सभी का दायित्व है।

यह सदी भले ही 21वीं हो; यह दुनिया भले ही वेबसाइटों पर मौजूद जानकारियों से भरी हो, किंतु हमारे समाचार माध्यम सतही जानकारियों का पुलिदां हो गये हैं। 20 वीं सदी की तुलना में आज की पीढी ज्यादा तर्क और जानकारी मांगती है। लिहाजा, विज्ञान के साथ तथ्यों को पेश करने की जरूरत आज ज्यादा है। उस दौर की तुलना में आज पर्यावरण और सामाजिक सरोकारों के समक्ष ज्यादा बङी चुनौतियां पेश हुईं हैं; बावजूद इसके जनसंचार माध्यमों में आज भी प्रतिदिन फिल्म, खेल, अर्थिकी और राजनीति के लिए ही विशेष पन्ने हैं। किसी भारतीय दैनिक, टेलीविजन अथवा रेडियो समाचार चैनल ने प्रकृति के लिए प्रतिदिन कोई पन्ना अथवा समय आरक्षित किया हो, यह अपवाद ही होगा। पाठकों / दर्शकों / श्रोताओं तक शोधपरक जानकारी और समझ के न पहुंचा पाने की वर्तमान मीडिया शैली के कारण हमारी सरकारें जानबूझकर की जा रही अपनी बेसमझी और शब्दों को लोगों की समझ और जुबान पर बिठाने में कामयाब हुई है। हमारी नदियां भी इसका शिकार हुईं हैं।

 नदी सरोकार को मीडिया समझ जरूरी

फरक्का बैराज के कारण कष्ट भोगती बंगाल-बिहार की जनता का कष्ट प्रत्यक्ष रूप से सामने है, लेकिन गंगा जलमार्ग को लाभ का मार्ग मानकर, सभी के शुभ की उपेक्षा हो रही है और मीडिया में चिंता और चिंतन के प्रयास दिखाई नहीं दे रहे। तटबंध को लेकर कोसी, हर साल अपना दर्द बयां करती है। लेकिन फिर भी उत्तर प्रदेश सरकार गंगा एक्सप्रेस-वे को बनाने की जिद्द पर अङी है। पिछली मायावती शासन में प्रशासन ने इसके लिए गोलियां तक चलाने से परहेज नहीं किया। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा रोक के आदेश के बावजूद, बिना राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की मंजूरी मिले वर्तमान अखिलेश सरकार ने नया टेंडर निकालने की तैयारी कर ली है। मीडिया इसे एक अच्छी कोशिश के रूप में पेश कर रहा है। प्रबंधन में व्याप्त लापरवाही, व्यापक खामियों तथा झूठ पर आधारित पर्यावरण प्रभाव अध्ययन रिपोर्ट के बावजूद, भारतीय जलवि़द्युत परियोजनाओं को लेकर मैने मीडिया के कई वरिष्ठ साथियों के मन में दुविधा देखी।

बाढ-सुखाङ को लेकर, सरकार की तरह मीडिया के कई साथियों को आज भी लगता है कि सभी नदियों को जोङ दें, तो सब जगह पानी-पानी हो जायेगा; सब संकट मिट जायेगा। जलापूर्ति के लिए पीपीपी मॉडल अपना लिया जाये, तो सभी को स्वच्छ पानी मिल जायेगा। मीडिया, जल-मल शोधन संयंत्रों को छोङकर नदी सफाई के अन्य विकल्पों पर कभी-कभी ही चर्चा करता है। जब मैंने लिखा कि घर-घर शौचालयों का सपना हमारी नदियों को मलीन बनायेगा, तो मेरे कई मीडिया साथी इसे सहज् स्वीकारने को तैयार नहीं हुए।

यह सब क्यों है ?

क्योंकि हमने कभी नदी, नहर, कृत्रिम नाले और पानी के बीच के फर्क को समझने-समझाने की कोशिश ही नहीं की। हमने नदी को नेट पर ज्यादा खंगाला, नदी के पास जाकर उससे बातचीत की कोशिश कम की। इसकी एक अन्य और ज्यादा सटीक वजह मैं देखता हूं कि हमारे कई संपादक विषय की हकीकत से ज्यादा, इस पक्षपात को ध्यान में रखकर विषय का पक्ष-विपक्ष पेश करते हैं, कि उनके मालिक किस राजनैतिक दल अथवा विचारधारा समूह का समर्थन करते हैं।

 नदी समझे-समझाये मीडिया
समझने और समझाने की जरूरत है कि नदी की निर्मल कथा टुकङे-टुकङे में लिखी तो जा सकती है, सोची नहीं जा सकती। कोई नदी एक अलग टुकङा नहीं होती। नदी सिर्फ पानी भी नहीं होती। नदी एक पूरी समग्र और जीवंत प्रणाली होती है। अतः इस इसकी निर्मलता लौटाने का संकल्प करने वालों की सोच में समग्रता और दिल में जीवंतता व निर्मलता का होना जरूरी है। नदी की समग्र सोच यह है कि झील, ग्लेशियर आदि मूल स्त्रोत हो सकते हैं, लेकिन नदी को प्रवाह को जीवन देने का असल काम नदी बेसिन की जाने छोटी-बङी वनस्पतियां और उससे जुङने वाली नदियां, झरने, लाखों तालाब और बरसाती नाले करते हैं। ‘नमामि गंगे’ के योजनाकारों से पूछना चाहिए कि इन सभी को समृद्ध रखने की योजना कहां है ?

 नदी के सवाल उठाये मीडिया

आपको जानकर दुख होगा कि कोर्ट के आदेश पर नदी के किनारे अभी से नासिक म्युनिसपलिटी के बोर्ड लगे हैं- ”गोदावरी का पानी उपयोग योग्य नहीं है।’
कोई सरकार से पूछे कि इस दुर्दशा बावजूद,  नालों को नदियों में मिलाना क्यों जारी है ?
आज भारत की सरकारें नदियों पर कार्य योजनायें तो बना रही हैं, नदी प्रबंधन का सिद्धांत उसने आज तक क्यों नहीं बनाया ?
किस नदी को साल के किस अवधि में किस स्थान पर न्यूनतम कितना पानी मिले जिससे कि नदी का पर्यावास सुरक्षित रह सके ?
नदी में कब-कहां और कितना रेत-पत्थर-पानी निकालने की अनुमति हो ?
इसका कोई तय सिद्धांत होना चाहिए कि नहीं ?

नदी निर्मलता का सिद्धांत क्या हो ?
नदी को पहले गंदा करें और फिर साफ करें या नदी गंदी ही न होने दी जाये ?
कोई नाला कचरे को पहले ढोकर नदी तक लाये, हमारे संयंत्र फिर उसे साफ करें या कचरे का निस्तारण कचरे के मूल स्त्रोत पर ही किया जाये ?
नदी भूमि को हरित क्षेत्र बनाकर नदी को आजाद बहने दिया जाये या ‘रिवर फ्रंट वियु डेवल्पमेंट’, एक्सप्रेस वे और इंडस्ट्रियल कॉरीडोर के बीच में फंसकर मरने के लिए छोङ दिया जाये ?
ये सवाल पूछे जाने चाहिए कि नहीं ?

प्रेस क्लबों को जनसंचार जंक्शन बनायें मीडिया

बहुत जरूरी है कि व्यापक सरोकार के विषयों पर मीडिया के साथी आपस में सतत् संवाद करें। इसके लिए हर स्तर पर मीडिया चौपालें आयोजित हों, जिनमें विषय की बुनियादी समझ विकसित करने की कवायद हो। विषय को लेकर फैले भ्रम और हकीकत के बीच की खाई पाटी जाये। दिमागों के जाले साफ करने के नैतिक प्रयासों को भी गति दी जाये। शोध, समझ और संवेदना का दौर वापस हो, तो नदियों के साथ संवेदना रखने वाले जी उठेंगे; साथ-साथ नदियों के जीने की उम्मीद भी। इसमें प्रेस क्लब और पत्रकार संघों की भूमिका अह्म हो सकती है। किंतु इसके लिए उन्हे खान-पान और निजी सरोकारों का अड्डा बनने के बजाय, व्यापक सरोकारों पर पहल के वास्तविक जनसंचार जंक्शन में तब्दील होना होगा। क्या वे होंगे ?
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फोटो साभार  : scroll.in, shepherdhills-school.org, the hindu.com