नदी जोङ परियोजना के खतरे से 
आगाह करता 
एक विश्लेषणात्मक लेख   
लेखक : सुरेन्द्र बांसल

हरियाणा के एक गांव है – मुगलवाली। मुगलवाली में पिछले दिनों विलुप्त सरस्वती नदी का स्रोत मिलने की खबर आई। खबर मिलते ही क्या पत्रकार, क्या नेता और क्या पुजारी.. सभी धड़ाधड़ हरकत में आ गए। अन्य लोगों की बनिस्बत पुजारी ज्यादा जल्दी हरकत में आए। उन्होंने फटाफट नारियल फोड़ा, चावल चढ़ाये और पूजा.अर्चना शुरू कर दी। पानी के फूटे एक छोटे से सोते के कारण बिना किसी सोच और धीरज के बयानबाज़ी की बाढ़ आ गई। किसी उत्साही नेता ने तो तुरत-फरत यहां तक कह दिया – ’’हां जी, हमने सब जांच.परख कर ली है। यह जल सरस्वती का ही है।’’ किसी ने पलट कर उन महाशय से नहीं पूछा कि भइया रे, किस लॉकर में सरस्वती के जल को संभाल रखा था ? आपने आपने जल के नमूनों का मिलान किस जल से किया ?

खैर, ये तो हुई मज़ाक की बात लेकिन यहां हम पड़ताल करते हैं विलुप्त हुई सरस्वती नदी के बहाने हरियाणा में बहने वाली वाली यमुना, घग्गर, मारकंडा और टांगरी नदियों की, जो कि लगभग शरशय्या पर हैं। प्रदूषण का कालिया इन सभी नदियों में पूरी तरह फैल चुका है। इन नदियों को जीवन देने वाले जीव.जंतु लगभग निपट चुके हैं। घग्गर को बचाने के लिए हरियाणा.पंजाब सरकारें कई बार मिल बैठ चाय-पकौड़े खा चुकी हैं, लेकिन संकट ज्यों का त्यों है। इन बैठकों में हिमाचल सरकार को भी शामिल होना होता है, किंतु  लेकिन ऊँचे पहाड़ पर होने के कारण हिमाचल सरकार जल्दी ज़मीन पर उतर नहीं पाती। उलटे उसकी काला अम्ब और नाहन की औद्योगिक इकाइयां धड़ल्ले से इन नदियों में तमाम कचरा सरका रही हैं।

नदी पङताल : यमुना, टांगरी और घघ्घर 

रही बात यमुना की, तो हरियाणा में यमुना का मात्र नाम ही बचा है। यमुना कार्य योजना के तहत् गुडग़ांव, फरीदाबाद, यमुनानगर, करनाल, पानीपत और सोनीपत में बने ट्रीटमेंट प्लांट ज़मानत ज़ब्त हुए नेताओं की सी शक्लें लिए खड़े हैं। पिछली सरकार ने यमुना बचाने के लिए अनेक घोषणाएं कीं थी। किंतु उनकी घोषणाएं मात्र किसी नेता के पेट में बने प्रदेश सेवा के अफारे का डकार ही साबित हुईं। हकीकत यह है कि पिछले तीस सालों में यमुना सफाई में लगभग नौ सौ करोड़ रुपए खर्च हुए, लेकिन यमुना नौ रुपए की भी साफ नहीं हो पाई; बल्कि यमुना पहले से अधिक प्रदूषित और ज़हरीली हुई है। टांगरी और घग्गर के हालात ये हैं कि उसके किनारे खेती करने वाले किसान अपने खेतों के लिए इन नदियों का पानी लेने से पहले सौ बार सोचते हैं। बीते बीस-पच्चीस सालों में यमुना की अनेक सखी नदियां लुप्त हो चुकी हैं। 1376 किलोमीटर लम्बी नदी के साथ.साथ मात्र उसकी सात-आठ सखी नदियां ही बची हैं, जिन्हें थोड़ा जीवित कहा जा सकता है। शेष नदियों का मर्दन प्रदूषण नामक कालिया कर चुका है।

वैदिक नदी – शतदू और बिपासा

ये हालात सिर्फ हरियाणा की नदियों की नहीं है; भारत की तमाम नदियों की दुर्गति देखें, तो रूह कांप जाती है। सरस्वती के लुप्त होने के बेशक कुछ भौगोलिक और कुछ प्राकृतिक कारण रहे होंगे। किंतु आज देश में नदियों से जिस तरह खिलवाड़ किया जा रहा है, उसे देखकर आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि उस काल की सरस्वती नदी भी हम इंसानों की नापाक हरकतों का शिकार हुई होगी। वैदिक नदी शतद्रू  (सतलुज ) को ही लें।
सतलुज नदी पर सबसे पहले भाखड़ा में भीमाकार बांध बना।

नेहरू जी ने इस बांध को ‘विकास का मंदिर’ कहा। इससे बिलासपुर के कई ऐतिहासिक मंदिर, भवन और करीब तीन सौ गांव जलमग्न हो गए। ‘विकास के मंदिर’ के कारण बेघर हुए हजारों लोग आज भी विस्थापितों की स्थिति में हैं; बावजूद इसके सतलुज पर अभी भी बांध पर बांध बनाए जा रहे हैं। नतीजे में सतलुज हर साल नदी अपना विकराल रूप दिखाती है और तबाही मचाती है। किंतु हम हैं कि गैरज़रूरी सुविधाओं की लत से वशीभूत होकर हम इस तबाही को अनदेखा कर देते हैं।

वैदिक नदी बिपाशा ( व्यास )  भी इंसानी छेड़छाड़ से नहीं बची । व्यास को मंडी जिले में पंडोह के पास रोककर उसका पानी नहर से सतलुज में डाल दिया गया है। पंडोह से नीचे रास्ता तो व्यास का है, लेकिन पानी उसकी सहायक नदियों और खड्डों का है। यह रास्ता भी व्यास को रोककर बनाई गई नहर की गाद से भरता जा रहा है। बराएनाम रही इन नदियों के ये रास्ते भी खत्म हो जाएंगे। कालांतर में हमारी संततियां सतलुज और व्यास नदियों के लुप्त होने के कारण ढूढ़ती रहेंगी और निष्कर्ष निकालेंगी। वे समझेंगी कि भौगोलिक और प्राकृतिक कारणों से ये नदियां विलुप्त हुई होंगी, लेकिन आज की हक़ीक़त तो हमारे सामने है।

इस बर्बादी में इंसानी भूमिका

हमें समझना चाहिए कि ये सब क्यों है ? शायद इसीलिए कि भारत जैसे आध्यात्मिक देश में आज हर चीज बाजारवाद और विकास के बायवाद की भेंट चढ़ रही है। बांध सरीखी परियोजनाएं प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को मिटा देती हैं। टिहरी बांध इसका पुख्ता सुबूत है। सदियों से करोड़ों.करोड़ लोगों की आस्था का आधार बनी हमारी गंगा, विकास के नाम पर बांध दी गई है। गंगा बेसिन में करीब डेढ़ दर्जन पन बिजली परियोजनाएं विचाराधीन हैं। यह सब नदियों से गैरज़रूरी छेड़छाड़ है। घातक परिणाम सामने हैं और भविष्य में सामने आएंगे भी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। इसी तरह मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी पर कदम.कदम पर बांध बने हुए हैं। भौतिक लिप्सा से भरी हमारी बनावटी जरूरतें सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही हैं। कोई ऐसा हनुमान नहीं है, जो दीर्घ अथवा लघु आकार ग्रहण करके इस सुरसा को संतुष्ट कर सके और हमें विनाश से बचा सके।

प्रकृति विरुद्ध नदी जोङ

नदियों को लेकर केंद्र सरकार का रवैया विरोधाभासी हैं। एक ओर तो सरकार नदियों को निर्मल करने की बड़ी.बड़ी योजनाएं बना रही है, वहीं नदियों को जोडऩे के अप्राकृतिक रास्ते पर चल रही है। दरअसल, नदी जोड़  परियोजना नदियों की साफ.सफाई की परियोजना नहीं, बल्कि नदियों को हमेशा के लिए साफ करने की परियोजना है। नदी से जरूरत के मुताबिक पानी लेने की बात तो समझ में आती है, लेकिन नदी के रास्ते को मोड़ देना गले नहीं उतरता। बेशक, इसके लिए कोई भी तर्क क्यों न दिया जाए। नदियों को जोडऩे का मतलब धीरे.धीरे सभ्यताओं और संस्कृतियों को खत्म करने का सामान तैयार करना। न जाने सरकारों और नीति.नियंताओं को यह बात कब समझ आएगी ? मालूम नहीं  आएगी भी कि नहीं ? यदि नदियों को जोडऩा होता, तो प्रकृति खुद ही जोड़ देती।

भौगोलिक नजरिये से देखें, तो पतित.पावनी गंगा और यमुना, हिमालय में बहुत थोड़े फैसले से ही निकलती हैं। एक बहुत लंबा सफर तय करने के बाद मिलती आकर इलाहाबाद में हैं। नदी का समुद्र तक बह कर जाना भी प्रकृति का बहुत बड़ा नियम और काम है। नदियों को जोडऩा, प्रकृति के नियमों से विशुद्ध छेड़छाड़ है। प्रकृति, देर.सवेर किसी न किसी रूप में इसका प्रतिशोध तो लेगी। नदी का बदला भयंकर होता है और प्रकृति का उससे भी भयंकर।

नदियों पर कर्जदाताओं का कब्जा बनायेगी नदी जोङ

दरअसल,  एक अप्रैल, 2002 को पारित हुई राष्ट्रीय जल नीति की भूमिका में जल को व्यापार की वस्तु मान गया है। नदी जोड़ परियोजना, राष्ट्रीय जलनीति का ही दूसरा संस्करण है। नदी जोङो परियोजना, असल में जलनीति के पैरा संख्या 13 में पानी का मालिकाना हक,  पट्टेदारी, परिवहन और निर्माण निजी कंपनियों को देने के नीतिगत निर्णय को आगे बढ़ाने की ही परियोजना है।  नदियों को जोडऩे की मालिकिन बनने के लिए विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ;आईएमएफद्ध व बहुराष्ट्रीय कंपनियां कर्ज के नाम पर एक हाथ से पैसा देंगी और कंसल्टेन्सी के नाम पर दूसरे हाथ से पैसा वापस ले लेंगी। ’ब्रूट एग्रीमेंट’ के रास्ते से नदियों का मालिकाना हक और पट्टेदारी सब कुछ हासिल कर लेंगे। विश्व व्यापार संगठन इसके लिए बाध्य करेगा ही। अतः नदियां जोडऩे से पहले मोदी सरकार को यह समझना होगा।

परंपरागत जल प्रबंधन को नष्ट करेगी नदी जोङ

समझना होगा कि देश की नदियों को जोडऩे के लिए हमें कर्ज देने वाले न केवल हमारे परंपरागत जल प्रबंधन के ढांचे को तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि इस बहाने पूरी सामाजिक व्यवस्था को ही तोडऩे की गहरी साजिश रच रहे हैं। इसके नतीजे कितने खतरनाक होंगे; यह हम समझ ही नहीं रहे या फिर समझते हुए भी इस ओर से आंखें मूंदे बैठे हैं।

जल, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन के आधार है। नदी जोड़ परियोजना  की आड़ में जो नए रास्ते खुलेंगे, वे हमारे ऐसे आधार पर नियंत्रण करके हमें गुलाम बनायेंगे। जब पानी खरीदने के लिए पैसा नहीं होगा, तब बहुराष्ट्रीय कंपनियां मनमर्जी की शर्तों पर समझौते करने को मज़बूर करेंगी। यदि हम पहले से आकलन कर सकें कि किस राज्य को कितना पानी देकर नदियों को जोड़ा जाएगा, तो  हमें नदी जोङ परियोजना की अव्यावहारिकता और असल मंतव्य समझ में आ जायेगा।

बांधों में बंधी नदियों को और सुखायेगी नदी जोङ

चित्र देखिए। आजादी से पहले देश में मात्र 282 गांवों में पानी का संकट था, लेकिन आज देश में 3,53,000 गांव पानी के संकट से जूझ रहे हैं। देश का पहला हीराकुंड बांध कटक डेल्टा में पांच हजार वर्ग मील क्षेत्र को बाढ़ से मुक्ति दिलाने के लिए बनाया गया था। लेकिन आज तक कटक का बाढ़ क्षेत्र एक इंच भी कम नहीं हुआ। कम होने की बजाय, बढ़ता ही जा रहा है। इस बांध के बनने से तीन सौ से अधिक गांव डूबकर अपना वजूद खो चुके हैं। देश के सभी बांधों की बुनियादें ऐसी ही दर्दनाक हकीकतों पर टिकी हैं। आज देश की अधिकतर नदियां बरसात का महीना छोड़ शेष महीनों में सूखी रहती हैं। नदियां जोडऩे की कोशिश और नए बांधों का निर्माण समस्याओं का हल कम और संकटों का अंधड़ अधिक है।

आजादी के बाद की कोई भी सरकार बाढ़ और सुखाड़ का क्षेत्र घटा नहीं पाई जबकि देश के सभी बांध बाढ़ और सुखाड़ से निजात पाने के लिए ही बने थे। आजाद भारत में इन्हीं बांधों के कारण अब तक लगभग आठ करोड़ लोग बेघर हो चुके हैं। वे लोग कहाँ हैं ? कैसे हैं ? कैसे चलती है उनकी रोज़ी .रोटी ? इसकी जानकारी सूचना के अधिकार के इस दौर में भी किसी के पास नहीं होगी। देश का प्रत्येक बांध राक्षसों की भांति कुछ बरस बाद किसी न किसी ’हरसूद’ की बलि मांगता है। क्यों ? क्योंकि बांध बनने के बाद नदियों के रास्ते खत्म हो जाते हैं और मामूली बारिश के बाद जब बांध नदी का पानी रोकने में असमर्थ हो जाते हैं। ऐसे में रास्ता भटकी नदी जो तबाही मचाती है, वह हम सभी के सामने है। अप्राकृतिक और दो मिनट वाली सुविधाओं के दुष्परिणाम हम हर रोज भुगत रहे हैं। सोच कर देखें कि जब अप्राकृतिक तरीके से नदियां जोड़ दी जाएंगी, तब क्या होगा ? सवाल है कि क्या नदियों को जोङने से सभी को पानी मिल पाएगा ? क्या हमें सूखे और बाढ़ से मुक्ति मिल पाएगी ? क्या हमारे नीति आयोगों, योजनाकारों और गैरज़रूरी विकास के लिए मछली की तरह तड़पती सरकारों के पास इन साधारण से प्रश्नों के उत्तर हैं ??

विवाद बढ़ायेगी नदी जोङ

सवाल यह भी है कि क्या नदियां भी रेल की भांति चलेंगी ? जिस नदी को जोडऩे के लिए ज्यादा कर्ज मिलेगा, पहला दस्तखत उसी नदी को गिरवी रखने के लिए होगा। फिर क्या होगा ?  फिर वहां की नालियों में पैसा रूपी पानी कल.कल करता बहेगा; फिर मोहल्ले-मोहल्ले और हर पास-पड़ोस में झगड़े शुरू होंगे। नदी जोङ परियोजना के कारण जब लोग लुट.पिट चुके होंगे, तब संसद में बैठा कोई नेता देश सेवा के नाम पर इन झगड़ों को निपटाने के लिए न्यायपालिका की बात उठाएगा। गुहार सुनकर न्यायविदों के दल नदियों के क्षेत्र का ऊपर से नीचे तक दौरा करेंगे; नदी झगड़ों की व्यथा-कथा सुनेंगे। तय करेंगे कि किसे, किसका और कितना पानी मिलेगा। इसके लिए जगह.जगह पानी के मीटर लगेंगे। मीटर पाकर पानी का बाजार उबलने लगेगा। परिणाम में हमारी एकमात्र स्वयंसिद्ध और समयसिद्ध व्यवस्था टूटकर दिल्ली स्थित लुटियन के टीले वाले बांध में आन मिलेंगी। इसके बाद शुरू होगा, नदी जोड़ परियोजना की आड़ में चलने वाला असली खेल।

जैसे कई वर्ष पूर्व बोतलबंद पानी की बिक्री की बात लगती थी, वैसे ही संभव है कि नदी जोङ के कारण पेश उक्त चित्र काल्पनिक लगे । आज देश में दस फीसद से ज्यादा लोग बोतलबंद पानी खरीद कर पीने के आदी हो चुके हैं। कुछ ऐसा ही हाल नदियों का भी होगा। आज बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे राष्ट्रवादी नेताओं से ही यह पाप कराने में जुटी हुई हैं। इसलिए नदियों का जुडऩा, न केवल समाज का टूटना साबित होगा, बल्कि आमजन की जुड़ी अंजुली से पानी छीनने की साजिश का सबब बनेगा। नदी जोड़ परियोजना, हकीकत में हम सभी के घरों का पानी छीनकर कुछ विशेष टंकियों की भरने का परियोजना है। विकास के अंधड़ में इन्सानों की तो कोई कीमत ही नहीं होतीद्ध और पनबिजली परियोजनाओं का हाल केंद्र और राज्य सरकारों को समझना चाहिए।

पहले नदी को समझे सरकार

सरकारों को समझना चाहिए कि नदियां कोई सडक़, रेल पटरी, बिजली अथवा टेलीफोन की तारें नहीं होती कि उन्हें जहां मर्जी आए, वहां से जोड़ दिया जाए। क्योंकि नदियां सडक़ों या तारों की तरह निर्जीव नहीं होती। नदियां, अपने में संपूर्ण एक समग्र, सजीव प्राकृतिक प्रणाली होती हैं। जिन्हे हमने मां कहा, भला वे नदियां निर्जीव कैसे हो सकती हैं ? नदियों का भी हम सबकी तरह जीवन काल होता है। नदियों के जीवन की भी कुछ जरूरतें और नियम होते हैं। इसलिए नदियों को जोडऩा, देश की प्राकृतिक और भौगोलिक व्यवस्था और संपदा के सामने गंभीर संकट खड़ा करना है। नदियों को जोडऩे से नदियों के जीन.बैंक का संतुलन बिगड़ जाएगा, जिससे असाध्य बीमारियां जन्म लेंगी। बाढ़-सुखाङ की समस्याएं और विकराल रूप लेंगी।

सरकारों में अच्छों के जल जोङ से आयेंगे अच्छे दिन

ऐसा नहीं कि सरकारों में अच्छे लोग नहीं होते, बिलकुल होते हैं। इन अच्छे लोगों को सामुदायिक जल, जंगल और ज़मीन के संरक्षण के प्रयास करके जल, जंगल और ज़मीन को बचाने के कामों में जुटना चाहिए। जहां का समाज श्रमदान आधारित ऐसे कामों में जुटा है, वहां की नदियों में आज भी सहज और सरस बहता हुआ बचा है और बचा रहेगा। उसी से पैदावार भी होगी और रोज़गार निकलेगा। दुखी राष्ट्र में सुख की नदियां भी इसी से बहेंगी। अपने देश में सब नदियां बेहद चरित्रवान नदियां हैं। जैसे ही समाज पुनरू नदियों से जुड़ेगा, वैसे ही  नदियां उनसे कट चुके समाज से नाराजगी भुलाकर उसे फिर से धन.धान्य से भरपूर कर देंगी।

सरकारों को भी चाहिए कि प्रकृति का सहजता से चलता खेल समाज के हाथों देने में दे दे; क्योंकि जब समाज प्रकृति से जुड़ता है, तब सब प्रकार की टूट.फूट स्वयंमेव बंद हो जाती है। सनातन परंपरा में यही होता था। गुलामी के दौर में जहां अंगरेजों ने हमारे समाज के तमाम अधिकार छीने, बाद में आजाद भारत की सरकारों ने छीना.झपटी की उस नजरिये को जारी रखा। अब यह नजरिया बदले।

पानी परम्पराओं की पालना से लौटेगा पानी

अपने देश में सर, सरोवरों, तालाबों, बावडिय़ों, जोहड़ों, डबरों, चालों, कुओं आदि का बेहद सुंदर संसार रहा है। ये सभी जल स्रोत हमारे गहन.गंभीर लोक जीवन का बेहद प्रमाणिक हिस्सा रहे हैं। सरकारों में बैठे मंत्री और अफसर कोई कल के बच्चे नहीं।  उनकी सोच में भी सांसों की तरह चलायमान इन प्रमाणों का स्पंदन अवश्य होगा। बात सिर्फ महसूस करने की है। हमारे पुरखों के हजारों साल के तप और त्याग को नए लोगों को जानना.समझना चाहिए। परंपरायें अखबारों की सुर्खियां या ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं होती, जो रोज-रोज बदल जाती हों। परंपराओं के पीछे पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक अदृश्य डोर चलती है, जिसे पकड़ कर निरंतर आगे बढऩा होता है। नीति आयोगों और नीतिकारों को बस परम्परा और संस्कृति की इसी डोर को पकडऩा भर है। अधिकतर संकटों के समाधान अपने.आप मिलते जायेंगे । पानी परम्पराओं के प्रति पीठ मोङना ही नदियों समेत हमारे तमाम जल स्रोतों को बर्बाद करती जा रही है। अगर हमें नदियों को जिंदा रखना है तो तालाबों, बावडिय़ों, जोहड़ों, डबरों, चालों, कुओं समेत तमाम जल स्रोतों को सहेजना होगा। प्रकृति के नियम को मानकर नदियों पर बांध बनाने और नदियों को जोडऩे की अप्राकृतिक योजनाओं पर विराम लगाना होगा। हमें नदी के पानी का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए, लेकिन नदी को बर्बाद करके नहीं।

बस्ते में बंद करो नदी जोङ

राष्ट्रभक्ति की घुट्टी में अनिवार्य शर्त यह होती है कि राष्ट्रभक्तों को देश के भूगोल और मौलिक इतिहास की गहरी समझ होनी चाहिए। पारंपरिक प्रज्ञा का परिपूर्ण ज्ञान होना चाहिए। छोटे.मोटे नारों के दूरगामी परिणाम नहीं होते। श्रद्धा रूपी नीति ही देश की प्रकृति और प्रवृत्ति को टिका कर रख सकती है, कोई आयोग नहीं। श्रद्धा से बड़ा कोई  नीति आयोग नहीं होता। प्रकृति को श्रद्धा, कारसेवा और आत्मीयता से ही सहेजा और संवारा जा सकता है। कोई भी सरकार बताये कि इन तीन शब्दों का उनकी किस नीति में समावेश होता है। अगर सालों से चलते निकम्मे और रद्दी कानून समाप्त किए जा सकते हैं, तो नदी जोड़ जैसी अव्यावहारिक और रद्दी परियोजनाओं को भी बस्ता बंद किया जा सकता है; वरना् नदियां विलुप्त होंगी ही; यह गारंटी है।


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सुरेन्द्र बांसल
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फोटो साभार : thehindubusinessline.com, olivegrow.co.in, gwadi.org, bbmb.gov.in, indian scriptures.com