पंडित नेहरु की चेतावनी और
21 वीं सदी का आर्थिक साम्राज्यवाद 
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लेखक : अरुण तिवारी
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अपनी आजादी के लिए अकबर की शंहशाही फौजों से नंगी तलवार लेकर जंग करने वाली चांदबीबी की शौर्यगाथा का गवाह बने अहमदनगर फोर्ट में कैद ब्रितानी हुकूमत के एक बंदी ने एक पुस्तक लिखी थी – ‘डिसकवरी ऑफ इंडिया’। पुस्तक के जरिए इसके लेखक पंडित जवाहरलाल नेहरु के भारत को पहचानने की कोशिश की थी।

एक दूसरी पुस्तक ‘ग्लिम्सिस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री’ के जरिए नेहरु ने संयुक्त राज्य अमेरिका के आर्थिक साम्राज्यवाद का खुलासा करते हुए 1933 में लिखा था – ”सबसे नये किस्म का यह साम्राज्य जमीन पर कब्जा नहीं करता; यह तो दूसरे देश की दौलत या दौलत पैदा करने वाल संसाधनों पर कब्जा करता है।…. आधुनिक ढंग का यह साम्राज्य अांखों से ओझल आर्थिक साम्राज्य है।” आर्थिक साम्राज्य फैलाने वाली ऐसी ताकतें राजनैतिक रूप से आजाद देशों की सरकारों की जैसे चाहे लगाम खींच देती हैं। इसके लिए वे कमजोर, छोटे व विकासशील देशों में राजनैतिक जोङतोङ व षडयंत्र करती रहती हैं। ऐसी विघटनकारी शक्तियों से राष्ट्र की रक्षा के लिए चेताते हुए पंडित नेहरु ने इसे अंतर्राष्ट्रीय साजिशों का इतना उलझा हुआ जाल बताया था कि इसे सुलझाना या इसमें एक बार घुस जाने के बाद बाहर निकलना अत्यंत दुष्कर होता है। इसके लिए महाशक्तियां अपने आर्थिक फैलाव के लक्ष्य देशों की सत्ताओं की उलट-पलट में सीधी दिलचस्पी रखती हैं।

भारत : आर्थिक साम्राज्यवाद के चंगुल में  

याद करने की बात है कि प्राचीन युगों में एकतंत्र गणतंत्रों को चाट जाते थे। मगघ साम्राज्य ने बहुत से गणतंत्रों का सफाया कर दिया था। यह आज का विरोधाभास ही है कि आधुनिक संचार के इस युग में भी दुनिया की महाशक्तियां दूसरे लोकतंत्रों को चाट जाने की साजिश को अंजाम देने में खूब सफल हो रही हैं। यह सही है कि यह विरोधाभास किसी एक-दो देश या राजनेता का विरोधाभास नहीं है; यह पूंजी की खुली मंडी का विरोधाभास हैं; जिसे हमने आर्थिक उदारवाद का या वैश्विक अर्थव्यवस्था का नाम दे दिया है। जो भी तंत्र इस मंडी की गिरफ्त में है, वहां आदर्शों का मोलभाव सट्टेबाजों की बोलियों की तरह होता है। इस तरह की पूंजी मंडी में उतर कर देश लोहिया के समाजवादी विचारों की हिफाजत कर पायेगा; यह दावा करना ही एक दुष्कर कार्य हो गया है।
भारत इस मंडी की गिरफ्त में आ चुका है।

मंडी की गिरफ्त में आने के सारे लक्ष्य आज भारत में मौजूद हैं। इस गिरफ्त में आने का ही नतीजा है कि दुनिया में कहीं कोई बङी उठा-पटक नहीं हुई, बावजूद इसके 2013 की दूसरी छमाही के शुरु में भारत का रुपया डॉलर के खेल में बेबस दिखाई दिया। 2013 में जापान-चीन समेत दुनिया के कई राष्ट्रों मे मंहगाई में ऐसी तेजी दर्ज नहीं हुई, जैसी हिंदोस्तान में। देश के पानी-नदी-जंगल जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर कारपोरेट कब्जे का कहर नई चुनौती बनकर देश को तब भी सताता था, अब भी सता रहा है। उत्तर-पूर्व को छोङ दें, तो गैर कृषि उपयोग के लिए… कृषि भूमि के हस्तांतरण की जबरदस्ती के उदाहरण देश के लगभग सभी प्रदेशों में हैं। देश में एक ओर जीडीपी उतर-चढ़ रही है, तो दूसरी ओर किसानों की आत्महत्याओं के आंकङों ने इस वर्ष भी कई रिकार्ड बनाये। एक ओर अरबपति बढ रहे हैं, तो दूसरी ओर कंगालपति। एक ओर प्रोफेशनल युवाओं के पैकेज बढ़ रहे हैं, दूसरी ओर बेरोजगारी का प्रतिशत बढ़ रहा है। नये रोजगार प्राप्ति का आंकङा पिछले पांच साल से लगातार गिर रहा है। 35 करोङ भूमिहीन और चार करोङ विस्थापितों का आंकङें के संकेत क्या हैं ? कभी सोचिए।

अक्षम्य अपराध यह है कि अदृश्य आर्थिक साम्राज्यवाद के दृश्य हो जाने के बावजूद हमने इसके खतरों की अनदेखी की। प्रश्न यह है कि पंडित नेहरु द्वारा दी चेतावनी के बावजूद ऐसा क्यों है ? प्रश्न यह भी है कि क्या ठीकरा सिर्फ आर्थिक साम्राज्यवाद की साजिशों के सिर फोङकर बचा जा सकता है ?

निश्चित ही नहीं। कारण और भी हैं।

कारण और भी 

उल्लेखनीय है कि पंडित जवाहरलाल नेहरु को एक प्रगतिशील विचारधारा का व्यक्तित्व माना जाता है। वह मानते थे कि संस्था चाहे राजनैतिक हो या कोई और… संविधान, सत्ता के आचरण व शक्तियों के निर्धारण करने का शस्त्र हुआ करता है। जो राष्ट्र जितना प्रगतिशील होता है, उसका संविधान भी उतना ही प्रगतिशील होता है। किंतु भारतीय लोकतंत्र आज ऐसे विचित्र दौर से गुजर रहा है, जब यहां लगभग और हर क्षेत्र मेंं तो विशेष शिक्षण-प्रशिक्षण-योग्यता की जरूरत होती है, राजनीति में प्रवेश के लिए किसी प्रकार की शिक्षा-दीक्षा, योग्यता, विचारधारा अथवा अनुशासन की जरूरत नहीं होती।

हमारे माननीय / माननीया जिस संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं; जो पंचायत /  विधानसभा / संसद  विधान के निर्माण के लिए उत्तरदायी होती है, उनके पंचायत प्रतिनिधि / विधायक / सांसद ही कभी संविधान पढ़ने की जरूरत नहीं समझते। इसीलिए भारत का सविंधान आज भी ब्रितानी हुकूमत की प्रतिच्छाया बना हुआ है। इसे हम प्रगतिशील की श्रेणी में नहीं रख सकते हैं। और तो और वे जिस पार्टी के सदस्य होते हैं, जिन आदर्शों या व्यक्तित्वों का गुणगान करते नहीं थकते, ज्यादातर उनके विचारों या लिखे-पढे से ही परिचित नहीं होते। इसीलिए हमारे राजनेता व राजनैतिक कार्यकर्ता न तो संविधान की पालना के प्रति और ना ही अपने दलों के प्रेरकों के संदेशों के अनुकरण में कोई रुचि रखते हैं।

समझ सकते हैं कि क्या कारण हैं कि पार्टियां भिन्न होने के बावजूद हम कार्यकर्ताओं व राजनेताओं के चरित्र में बहुत भिन्नता नहीं पाते।

राजनैतिक गिरावट के व्यापक दुष्प्रभाव का दौर 

दो वर्ष पहले इतिहास ने फिर करवट ली है। जनमानस एक बार फिर कसमसाया। सत्ता बदली। स्वयंभू राष्ट्रवादी कही जाने वाली पार्टी और नेता सत्ता के शीर्ष में आये। किंतु क्या कारण है कि भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रवादी निगाहें भी आर्थिक साम्राज्यवाद के खतरे को नहीं देख पा रहीं। विदेशी निवेश को आकर्षित करने में अपनी सफलता पर पार्टी खुद खुद अपनी पीठ ठोंक रही है। जबकि वैश्विक महाशक्तियां खुश हैं कि भारत को अपने आर्थिक साम्राज्यवाद की गिरफ्त में एक मौका फिर हाथ आया है। वजह यह है कि निवेश की नैतिकता को लेकर भारत भी अभी नींद में ही है।

हालांकि पिछले शासन में सत्ता के प्रति शून्य हुई लोकास्था फिर जगी है; फिर भी किसी भी लोकतंत्र की जीवंतता के लिए इससे अधिक खतरनाक बात कोई और नहीं हो सकती कि उसके प्रति लोकास्था शून्य हो जाये। सभी दलों के राजनेतओं के व्यवहार पर निगाह डालें, तो दुर्योग से यह सिर्फ राजनैतिक आचार संहिताआें के टूटने का ही नहीं, उनके व्यापक दुष्प्रभाव का भी दौर बनता नजर आ रहा है। पार्टी को परिवार का बंधक बना देने के अनैतिक उदाहरण कई हैं हीं। इतिहास का यह अनुभव आज सभी तरफ सत्य होता दिखाई दे रहा है – ”अज्ञात युगों से ऐसे राजनीतिज्ञ होते चले आयें हैं, जिन्होने यह प्रचारित किया है कि राजनीति में आचार नाम की कोई चीज नहीं है। फिर भी पहले कभी अनैतिकता का खेल करने वाले राजनीतिज्ञ एक छोटे से वर्ग से बाहर अपना दुष्प्रभाव नहीं फैला सके थे। अधिसंख्य लोग राज्य के नेताओं और मंत्रियों के आचरणों से दूषित होने से बचे रहते थे। परंतु सर्वाधिकारवाद, जिसके अंदर नाजीवाद-फासीवाद और स्तालिनवाद सभी शामिल है… का उदय हो जाने से यह अनैतिकतावाद विस्तार के साथ लागू होने लगा है। आज समाज का प्रत्येक व्यक्ति इसकी चपेट में आ गया है।”    
  
हालांकि भारत अभी आर्थिक विषमता और असंतुलन ऐसे चरम पर नहीं पहुंचा है कि समझ और समझौते के सभी द्वार बंद हो गये हों। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि समाज और सत्ता के बीच जो समझ और समझौता विकसित होता दिख रहा है, उसकी नींव भी अनैतिकता की नींव पर ही टिकी हैं – ”तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्हे खैरात दूंगा।” जनप्रतिनिधि बनने का मतलब जनप्रतिनिधित्व नहीं, राजभोग समझ लिया गया है। जनता भी वोट का बटन दबाते वक्त यदि तमाम नैतिकताओं व उत्तरदायित्वों को ताक पर रखकर जाति, धर्म और निजी लोभ-लालच के दायरे को प्राथमिकता पर रखती है। उम्मीदवार से ज्यादा अक्सर पार्टी ही प्राथमिकता पर रहती है।

इस नजरिए का ही नतीजा है कि कितनी ही भौतिक, आर्थिक व अध्यात्मिक अनैतिकताओं को आज हमने ‘इतना तो चलता है’ मान लिया है। यही कारण है कि आज सत्ता-अनुशासन के सारी आचार संहितायें नष्ट होती नजर आ रही हैं। यह बात कङवी जरूर है; लेकिन यदि हम अपने जेहन में झांककर देखे, तो आज का सच यही है।

निगाहें बुद्धिजीवियों की ओर

इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्तायें गिरावट के ऐसे दौर में पहुंची हैं, हमेशा बुद्धिजीवियों ने ही प्रतिनिधित्व संभालकर राजसत्ता को अनुशासित करने का उत्तरदायित्व निभाया है। इसके लिए वह दंडित, प्रताङित व निर्वासित तक किया जाता रहा है। दलाईलामा, नेल्सन मंडेला व आंग सू ची से लेकर दुनिया के कितने ही उदाहरण अंगुलियों पर गिनाये जा सकते हैं। अतीत में सत्ता को अनुशासित करने की भूमिका में कभी गुरु बृहस्पति और शुक्राचार्य का गुरुभाव, कभी भीष्म का राजधर्म, कभी अयोध्या का लोकानुशासन, कभी कौटिल्य का दुर्भेद राजकवच, कभी मार्क्स-एंगेल्स का कम्युनिस्ट पार्टी घोषणापत्र…. तो कभी गांधी-विनोबा का राजनीतिक नैतिकतावाद दिखाई देता रहा है। आजाद भारत में यही भूमिका राममनोहर लोहिया के मुखर समाजवादी विचारों और जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन ने निभाई।

‘राजसत्ता का अनुशासन’ नामक एक पुस्तक ने ठीक ही लिखा है कि नैतिक गिरावट के इस दौर में पुनः उत्कर्ष का रास्ता अध्यात्म और भौतिक… दोनो माध्यम से हासिल किया जा सकता है; लेकिन शर्त है कि सबसे पहले सतत् सामुदायिक संवाद के पारदर्शी मंच फिर से जीवित हों। इसके लिए नतीजे की परवाह किए बगैर वे जुटें, जिनके प्रति अभी भी लोकास्था जीवित है; जिनसे छले जाने का भय किसी को नहीं है। बगैर झंडा-बैनर के हर गांव-कस्बे में ऐसे व्यक्तित्व आज भी मौजूद है; जो लोक को आगे रखते हुए स्वयं पीछे रहकर दायित्व निर्वाह करते हैं। गङबङ वहां होती है, जहां व्यक्ति या बैनर आगे और लोक तथा लक्ष्य पीछे छूट जाता है। राष्ट्रभक्त महाजनों को चाहिए कि वे ऐसे व्यक्तित्वों की तलाश कर उनके भामाशाह बन जायें। जिस दिन ऐसे व्यक्तित्व छोटे-छोटे समुदायों को उनके भीतर की विचार और व्यवहार की नैतिकता से भर देंगे, उस दिन भारत पुनः उत्कर्ष की राह पकङ लेगा। रचना और सत्याग्रह साथ-साथ चलें। हालांकि कई नैतिकताओं की रक्षा नेहरु-गांधी परिवार खुद नहीं कर पाया; किंतु अतीत से मिली सीख यही है और सुंदर भविष्य की नींव भी यही।
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फोटो साभार  : nehruportal.nic.in