आठ मई – मातृ दिवस पर विशेष

( मां की बहादुरी और बेबसी से एक साथ आत्म साक्षात्कार की कोशिश में अरुण तिवारी  जी  के हृदय की कुछ वेदना शब्दों में उतर आई है। प्रस्तुत वेदना शहर में जा बसी संतानों की माताओं का भी सच  है और माँ की खातिर, संतानों द्वारा अपनी निजी आकांक्षाओं का त्याग न कर पाने की बढ़ती प्रवृति का भी सच. 

माँ और संतानों के बीच बदलते रिश्तों के इस कटु सत्य से सम्भवतः कभी आपका भी साबका पड़ा हो. 
कृपया साझा करें: पानी पोस्ट  टीम)


गांव की सबसे बङी हवेली
उसमें बैठी मात दुकेली,
हवेली से बाते करते,
दीवारों से सर टकराना,
ईंट नुकीला मन हो जाना,
दूर बैंक से पैसा लाना,
नाज पिसाना, सामान मंगाना,
हर छोटे बाहरी काम की खातिर
दूजों केे सामने गिङगिङ जाना,
किसी तरह घर आन बचाना, 
शूर हो, मज़बूर हो मां, पर पीर तो होती होगी।













देर रात तक कूटना-पछोरना,
भोर-सुबेरे बर्तन रगङना,
गोबर उठाना, चारा लगाना,
दुआर सजाना, खेत निराना,
भूख लगे, तो खुद ही पकाना,
दर्द मचे, तो खुद ही मिटाना,
थकी देह पर चलते जाना,
ही सहारा, न ही छुट्टी
मरे हुए सपनों की जद में 
मज़दूरी सी करते जाना,
उलटी गिनती गिनते जाना,
हाल पूछो तो ठीक बताना, 
शूर हो, मज़बूर हो मां, पर पीर तो होती होगी।








भरी कोख की बनी मालकिन,
बाबूजी का छोङ के जाना,
फिर संतानों का साथ न पाना,
थकी देह पर कहर ढहाना,
झूठे-मूठे प्रेम दिखाना,
सूनी रातें, कैद दिनों में
चौकीदारी सौंप के जाना,
संतानों का कभी तो आना,
कभी बहाना, कभी बहलाना,
मोबाइल से घी पिलाना,
भरे कुनबे का यह अफसाना,
शूर हो, मज़बूर हो मां,पर पीर तो होती होगी।
………………………………………………………………………………………………………………………………………………