14 जून, 2016  – गंगा दशहरा पर विशेष
लेखक: अरुण तिवारी
(14 जून, 2016  आज गंगा दशहरा है। धार्मिक पर्व पर गंगा का पौराणिक महत्व बताना अच्छा होता; किंतु गंगा के बदतर होते हालात और संवेदनाशून्य समाज को जगाने के लिए जरूरी है कि गंगा का आर्तनाद सीधे समाज तक पहुँचाया। सीधे चोट के बगैर काम चलने वाला नहीं। शायद इसी से सुप्त आत्मायें जागें; शायद इसी से कुछ मन संकल्पित हों। इसी दृष्टि से अरुण तिवारी जी द्वारा लिखा लेख हम आप तक पहुंचा रहे हैं।

विशेष निवेदन है कि कृपया पढ़ें और यदि लेख में निहित मां गंगा की वेदना की संवेदना आपके मन को संवेदनशील करने में सफल हो और आपका मन गंगा समृद्धि के लिए अपने स्तर पर करने योग्य एक कदम भी तय करने को संकल्पित हों, तो हमें खुशी होगी; चूंकि गंगा नदी घाटी की समृद्धि पर कम से कम आधे भारत की समृद्धि निर्भर करती है। यह गंगा नहीं, स्वयं के संरक्षण का संकल्प होगा। – पानी पोस्ट टीम )
आज गंगा दशहरा है; गंगा अवतरण की तिथि। कहते हैं कि आज ही के दिन मैं इस धरा पर आई थी; भगीरथ के पुरखों को तारने। ”गं अव्ययं गम्यति इति गंगा” – तुमने ही कहा कि मैं तुम्हे स्वर्ग ले जाने आई थी। मुझे तुम्ही इस धरा पर लाये थे। अब तुम्ही इस गंगा दशहरा पर मुझे मार क्यों नहीं देते ? तुमने मुझे मां से महरी तो बना ही दिया है; कोमा में भी पहुंचा ही दिया है; अब मुझे वापस मेरे लोक भी पहुंचा दो। मुझे स्वर्गवासी बना दो। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। तिल-तिल कर मरने-मारने से तो अच्छा ही है कि आज किस्सा ही खत्म कर डालो एक साथ। बोलो, करोगे इस गंगा दशहरा पर यह पुण्य कर्म ?’’
इसे चाहे गंगा की अनुनय-विनय समझें या चीत्कार; आखिर गंगा के पास और चारा ही क्या बचा है सिवाय मर जाने के ? गंगा क्या करे ? गंगा देख रही है हर बरस। गंगा किनारेे दुनिया का पानी का सबसे बङा मेला लगता है। करोङों दीपदान होते हैं। कोटि-कोटि हाथ… एक नहीं, कई-कई बार गंगा के सामने जुङ जाते हैं। हर हर गंगे ! जय जय मैया !! गाते हैं, लेकिन यही कोटि-कोटि हाथ गंगा के पुनरोद्धार के लिए एक साथ कभी नहीं जुटते। 
अजीब बात है कि गरीब से गरीब परिवार भी अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा खर्च करके गंगा दर्शन के लिए आता है, लेकिन वह गंगा रक्षा के सिद्धांत को कभी याद नहीं करता। 
कांवरियों के मन में यह प्रश्न कभी नहीं उठता कि मल बन चुका गंगाजल, शिव को स्वीकार्य नहीं है। 
कभी नहीं सोचते कि एक दिन जब गंगा ही शव हो जायेगी, तो कहां से लायेंगे गंगाजल ? 
क्या चढ़ायेंगे शिव को ? 
तब कहां लगेगा माघ मेला ? 
हम कहां मनायेंगे गंगा दशहरा … कहां टेकेंगे माथा ?? 
मृत्यु पूर्व दो बूंद गंगाजल की अभिलाषा की पूर्ति करने तब हम कहां जायेंगे ??
करना अस्थियां प्रवाहित किसी नाले में जाकर ।
तुम इसी योग्य हो ।
हम संतानों का उलट व्यवहार

गंगा देख रही है कि जो समाज कभी दूसरों को पानी पिलाकर…. बैसाख-जेठ में प्याऊ लगाकर, नवसम्वत्, गगा दशहरा, बसंतपंचमी और गुरुपर्व पर शरबत बांटकर स्वयं को धन्य मानता था; वही समाज अब पानी व नदी खरीद-बेचकर धन्य हो रहा है। जो समाज कभी गंगा किनारे कुंभ लगाकर गंगा के साथ संस्कार और व्यवहार की मर्यादा तय करता था, वही समाज आज गंगा को अंतिम संस्कार के लिए तैयार कर रहा है। 
गंगा के किनारे 36 करोङ तीर्थों की परिकल्पना है। गंगा देख रही है कि जिन साधुओं और संतों को इन तीर्थों में बैठाकर गंगा चैकीदारी का दायित्व सौंपा था, वे ही गंगा से संस्कार की आचार संहिता भूल गये हैं। उनके आश्रमों का कचरा व मल ही गंगा को मलीन करने से नहीं चूक रहा। जब गुरु ही गोरू हो जाये, तो फिर उम्मीद ही कहां बचती है ! इसीलिए आज गंगा आज मरना चाहती है।
हमारे कारण बेबस मां


गंगा, सचमुच अब बहुत बेबस है…. बीमार है….लाचार है। उत्तराखण्ड उसके मायके में ही उसका गला घोंट रहा है। गंगा के वेग को थामने वाले वनरूपी शिव केशों को काट रहा है। ”कंकर कंकर में शंकर” रूपी पत्थरों के चुगान और सांस देने वाली रेत के खदान में ही सारा मुनाफा देख रहा है। उत्तर प्रदेश, गंगा के अमृत में विष घोल रहा है। कमेलों के खूनी कचरा बहाकर उसके फेफङे सङा रहा है। गंगा केे शरीर पर ही कब्जा जमा रहा है। 
उत्तर प्रदेश, गंगा के करोङों जीव और बहमूल्य वनस्पतियों का घोषित हत्यारा है। बिहार, प्रदूषण के अलावा गंगा को किनारों को कटान से क्षत-विक्षत करने का भी दोषी है। झारखण्ड और प. बंगाल धरती का अतिशोषण कर आर्सेनिक को उपर ला रहे हैं और अपनी सेहत का दोषी मां गंगा का बता रहे हैं। 
क्योंकि गंगा अब काॅरपोरेट एजेण्डा है
हम भूल गये हैं कि मां से संतान का संबंध लाड, दुलार, स्नेह, सत्कार और संवेदनशील व्यवहार का होता है; व्यापार का नहीं। किंतु हमारी चुनी हुई हमारी सरकारें तो गंगा को व्यापार की वस्तु बना रही हैं।
दूरसंचार मंत्रालय के पास गंगाजल बेचकर कमाने की जुगत करने वालों के साथ देने की योजना है। परिवहन मंत्रालय के पास गंगा में जल परिवहन शुरु करके कमाने की योजना है। पर्यटन मंत्रालय के पास ई-नौका और घाट सजाकर पर्यटकों को आकर्षित करने की भी योजना है, लेकिन ‘नमामि गंगे’ के पास गंगा को लेकर कोई घोषित गंगा पुनरोद्धार नीति नहीं है। 
मल-अवजल शोधन के कितने भी संयंत्र लगा लिए जायें; जब तक गंगा को उसका नैसर्गिक प्रवाह नहीं मिलता; स्वयं को साफ करने की उसकी शक्ति उसे हासिल नहीं होगी। इस शक्ति को हासिल किए बिना गंगा की निर्मलता हासिल नहीं हो सकती। यह जानते हुए भी मंत्रालय के पास गंगा का नैसर्गिक प्रवाह लौटाने और इसकी भूमि बचाने की कोई योजना नहीं है। सारी योजनायें बजट खपाने और कर्ज बढ़ाने की है। शोधित-अशोधित किसी भी तरह का अवजल गंगा में न आये; मंत्रालय आज तक इस बाबत् कोई लिखित आदेश जारी नहीं कर सका है। 
गंगा जानती है कि पहले नदी को मैला करना और फिर मैले को साफ करने की योजना बनाना, मैले से धन बनाने की मैली नीति है। यह नीति अभी जारी रहेगी, क्योंकि गंगा अब एक काॅरपोरेट एजेण्डा है। 
सोचिए कि जब नीयत कमाने की हो, तो मां को भला बिकने से कौन रोक सकता है ? 
बताइये कि ऐसे में मां गंगा मरना न चाहे, तो और क्या करे ?? 
क्या कोई बतायेगा ? 
इस गंगा दशहरा को प्रतीक्षा है।
……………………………………………………………………………………………………………………………………………….
फोटो साभार  : firstpost.com , ecobusiness.com, slideshare.net, pmindia.gov.in