प्रस्तुति: अरुण तिवारी 

प्रो जी डी अग्रवाल जी से स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी का नामकरण हासिल गंगापुत्र की एक पहचान आई आई टी, कानपुर के सेवानिवृत प्रोफेसर, राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय के पूर्व सलाहकार, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रथम सचिव, चित्रकूट स्थित ग्रामोदय विश्वविद्यालय में अध्यापन और पानी-पर्यावरण इंजीनियरिंग के नामी सलाहकार के रूप में है, तो दूसरी पहचान गंगा के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा देने वाले सन्यासी की है। जानने वाले, गंगापुत्र स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद को ज्ञान, विज्ञान और संकल्प के एक संगम की तरह जानते हैं।

पानी, प्रकृति, ग्रामीण विकास एवम् लोकतांत्रिक मसलों पर लेखक व पत्रकार श्री अरुण तिवारी जी द्वारा स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी से किए गये लंबे संवाद की श्रृंखला के अगले कथन को हम, प्रत्येक शुक्रवार को आपको उपलब्ध कराते रहेंगे। यह हमारा निश्चय है।


आपके समर्थ पठन, पाठन और प्रतिक्रिया के लिए फिलहाल प्रस्तुत है:
स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद – 16वां कथन


तीन विषय में आॅनर्स

बीएचयू में ऐसा नियम था कि जिस विषय में आॅनर्स करना हो, तो मेन पेपर और आॅनर्स पेपर..दोनो में 60-60 प्रतिशत हो, तब मिलती थी आॅनर्स की डिग्री। मैने तीनो विषय में आॅनर्स लिया था। गणित में आॅनर्स के लिए स्टेटस्टिक्स, फिजिक्स में एयरोडाॅयनमिक्स और कैमिस्ट्री में थर्मोडायनमिक्स का अतिरिक्त पेपर देना पङता था। तीनो विषय में आॅनर्स लेने से मुझे रुङकी के कम्पटीशन में तथा इंजीनियरिंग की पढ़ाई में लाभ हुआ।

जनमत के साथ वाक आउट

बी.एससी. फाइनल में फिजिक्स का सेकेण्ड पेपर कठिन लगा। कई प्रश्न या तो आउट आॅफ कोर्स थे या पढ़ाये नहीं गये थे। नतीजा यह हुआ कि प्रश्न पत्र आने के 10 मिनट बाद ही परीक्षा हाॅल में आपस में कुछ इशारेबाजी होने लगी और स्टुडेन्ट्स कक्षा से वाक आउट कर गये। 97 में से 75 स्टुडेन्ट्स वाक आउट कर चुके थे। मैं भी उन 75 में ही था; जबकि सच यह था कि मैं छह में से चार प्रश्न के उत्तर कर ही सकते थे। हम मानकर चल रहे थे कि हमारे वाक आउट के कारण यूनिवर्सिटी को परीक्षा दोबारा करानी पङेगी। किंतु यूनिवर्सिटी ने ऐसा नहीं किया। यूनिवर्सिटी ने तय किया कि जिन्होने वाक आउट नहीं किया है, उन्हे प्राप्त शेष नंबरों में दो प्रश्नों के नंबर जोङ दिए जायें। इस तरह फिजिक्स में जीरो मिला। 

मैस मैनेजर भी अच्छा और कैमिस्ट भी

फोर्थ इयर में मुझे मैस का मैनेजर बना दिया गया। हमारा मैस कम चार्ज में अच्छा खाना देने के लिए प्रसिद्ध हो गया था।

मुझे एम. एससी. (कैमिस्टी) में प्रवेश मिला था। हमारे प्रोफेसर मुझे रिसर्च में ले जाना चाहते थे। मामा और मां इंजीनियर बनाना चाहते थे। सो, रुङकी में इंजीनियरिंग प्रवेश की परीक्षा दी; पास हुआ और रुङकी यूनिवर्सिटी ज्वाइन की। लेकिन एक बात बताना चाहता हूं कि कैमिस्ट्री हमेशा मेरी ताकत रही। 

अमेरिका में था, तो डाॅ. पियरसन कहते थे – ”तुम इंजीनियर कम, कैमिस्ट ज्यादा हो।”

पहली बार पतलून कोट 

खैर, अब रुङकी की सुनो। सुना था कि रुङकी यूनिवर्सिटी में रैगिंग होती है। बीएचयू तक तो मैं धोती या फिर कुरता-पायजामा ही पहनता था। बीएचयू में नियम था – ”नो कोट, नो टाई।” रुङकी में उल्टा था। सो, रुङकी के लिए मैने पतलून सिलाई। अक्तूबर में पहले-पहल यूनिवर्सिटी गया, तो कोट और पतलून पहनकर। गेट पर जो लङके मिले, वे बोले कि टाई लगाकर आओ। मेरी शर्ट, टाई काॅलर वाली नहीं थी। अब समस्या थी कि उसमें टाई कैसे लगे। रिश्तेदार से शर्ट उधार ली गई। इस तरह मैने पहली बार पतलून, कोट और टाई पहने।

रैगिंग के विरुद्ध

एक महीने तक रैगिंग चलती रही, तो बैठक हुई कि रैगिंग का विरोध होना चाहिए। एक हाॅस्टल में सात कमरे; हर कमरे में दो लङके। मैं भी विरोध में शामिल हुआ। हम में इतनी समझ तो थी कि विरोध ऐसे हो कि हम निकाले न जायें। विरोध के बाद रैगिंग बंद हुई। जब हमारा बैच अगले साल सेकेण्ड इयर में पहुंचा, तो हम में से कुछ ने तय किया कि हम रैगिंग करने वालों में शामिल नहीं होंगे। हालांकि हमारी संख्या छोटी थी, लेकिन हमने सोचा कि इसे रोकना है। कैसे रोकें ? 

….तो हमने सोचा कि अखबार को पत्र लिखें। मुझे जिम्मेदारी दी गई। उस वक्त लखनऊ से ’नेशनल हैरल्ड’ अखबार निकलता था। मैने उसे पत्र लिखा। रैगिंग के पिछले वर्ष के अपने अनुभवों को आधार बनाया। नेशनल हैरल्ड ने वह पत्र छापा। अखबार ने एक काॅपी मुझे भी भेजी थी। उन्होने यह भी लिखा था कि यदि मेरे खिलाफ कोई एक्शन हो, तो मैं अखबार को लिखूं। अखबार मामले को टेकअप करेगा। ऐसा अखबार के संपादक ने मुझे आश्वासन दिया था। 

छपा हुआ पत्र, वैरीफिकेशन व नैससरी एक्शन के लिए यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर के पास भी आया। वाइस चांसलर थे कर्नल वी. सी. हार्ट। कर्नल हार्ट ने माना कि इससें विश्वविद्यालय की बदनामी हुई है। रुङकी यूनिवर्सिटी, एक पायनियर यूनिवर्सिटी थी। अब भला मैं क्यों चाहता कि इसकी बदनामी हो। खैर, वाइस चांसलर महोदय ने मुझे बुलाया। मैने सोच रखा था कि अगर गलती हो, तो दण्ड भुगतने को हमेशा तैयार रहो। यह मेरे बाबाजी की सीख थी।

वी सी महोदय ने कहा – ”मुझे बताना चाहिए था।”

यह सच था कि जब हमारी रैगिंग हुई, तो वह वाइस चांसलर नहीं थे। मुझसे बातचीत के बाद उन्होने हस्तक्षेप किया और रैगिंग खत्म हो गई। हमें संतोष हुआ।

हिंदोस्तानी से अन्याय के विरुद्ध

आगे मैस का चुनाव हुआ। मिडिल क्लास के लङके भी मुझे सपोर्ट करते थे। मैं सेक्रेटरी चुना गया। मैने पूरी कोशिश की। परिणामस्वरूप, मैस का जो बिल 150 रुपये आता था, वह घटकर 120-125 रुपये आ गया। खाने की क्वालिटी में भी सुधार हुआ। उससे मेरी पापुलरिटी भी बढ़ी और आत्मविश्वास भी।

रुङकी यूनिवर्सिटी में एक घटना और हुई। मिस्टर हार्ट की पत्नी काफी इन्टरेस्ट लेती थी। मेजर स्मिथ नामक एक अंग्रेज भी वहां आया। उसने मिसेज हार्ट को पटा लिया। उन दिनों यूनिवर्सिटी डेयरी से ही दूध-मक्खन आता था। एक हिंदोस्तानी उस डेयरी का मैनेजर था। अच्छे से मैनेज कर रखा था। उसका व्यवहार भी अच्छा था। मेजर स्मिथ ने ऐसा खेल किया कि उसे डिग्रेड करके डिप्टी मैनेजर बना दिया और खुद मैनेजर बन बैठा।
यह बात हमारे पास तक आई। 

इस बीच हुआ यह कि कुछ दिनों मैस में जो मक्खन आया, वह खराब आया। मैंने मेजर स्मिथ को एक कङा सा पत्र लिख दिया। वह पत्र वाइस चांसलर के पास पहंुच गया। फिर वी सी के बंगले पर बुलाया गया। फिर डांट पङी -”हाउ यू डेयर टु राइट आवर मैन ?”

 मैं डांट खाकर आ गया। मुझे ऐसा हो गया कि जैसे मैं रिबेल (विद्रोही) हूं। 

कोर्ट मार्शल हुआ

उन दिनो मैस कमेटी का प्रेसिडेंट एक सीनियर अध्यापक होता था। वाइस प्रेसीडेंट, थर्ड इयर का कोई स्टुडेंट होता था। मैं वाइस प्रेसीडेंट चुन लिया गया। वी सी की पत्नी को यह अच्छा नहीं लगा। उसी समय एन सी सी (नेशनल कैडिट कोर) कैंप की एक घटना है। एन सी सी, सभी के कम्पलसरी थी। दो सप्ताह के लिए कैम्प लगा। हमारा कैम्प, डोरीवाला और ऋषिकेश के बीच मिलटरी प्लाटून में लगा। जुलाई का महीना था। बारिश आते ही बाढ़ आ गई। टैंट में पानी आ गया। मैस का सामान खराब हो गया। बैरे व कुक के टैंट खराब हो गये। 

कमाण्डर ने मुझसे कहा -”तुम मैस इंचार्ज हो। तुम मैनेज करो।”

इस पर बहस हो गई। तय हुआ कि कैंप शिफ्ट करके रुङकी ले चलते हैं। जगदम्बा प्रसाद एडजुटेंट थे। तो बात यह हुई कि यह तो इनडिसीप्लीन है। तीन लङकों के नाम आये। कहा कि मैं नेता था। रुङकी में हमारा कोर्ट मार्शल किया गया। 

एन सी सी से निकासी, एक्सपलेनेशन और वार्निंग

कोर्ट मार्शल करने वाली बेंच में हमारे वी सी कर्नल हार्ट के अलावा मिलिट्री सर्विस के दो रेगुलर आॅफीसर थे। सुनवाई हुई। गवाही हुई। मेरे लिए मेरे टीचर ने ही कहा कि मैने उनको धमकी दी थी कि अगर हमारे अंगेस्ट एक्शन लिया, तो पूरी प्लाटून की विद्रोह कर देगी। मुझे अजीब सा लगा कि मेरा अध्यापक ही मेरे विरुद्ध हो गया ! मैने पूछा कि जब मैने यह कहा, तो और कोई न उस वक्त ? अध्यापक ने कहा कि नहीं।

इस पर मैने कहा – ”आप कहते हैं कि मैने ऐसा कहा। मैं कहता हूं कि मैने ऐसा नहीं कहा। कोई गवाही है आपके पास ?”

इस फिर अनुशासनहीनता करार दिया गया। निर्णय हुआ कि मुझे एन सी सी से निकाल दिया जाये। सर्टिफिकेेट न दिया जाये। सबसे सामने बिल्ला उतार लिया जाये। बाकी दो की भी पट्टी उतारी गई। इस पर मेरे समर्थन में दो क्लासेस के स्टुडेन्ट्स न एक दिन की हंगर स्ट्राइक कर दी। खाना बना, लेकिन किसी ने खाया नहीं।

फिर एक दिन डाकिया आया। उसने रिसीव कराया और एक रजिस्ट्री मुझे दी। उसमें मुझसे एक्सपलेनेशन मांगा गया था और वार्निंग दी गई थी कि भविष्य में कोई हरकत की, तो मुझे यूनिवर्सिटी से निकाल दिया जायेगा।

किताब में दर्ज इतिहास

बाबा जी ने पूछा, तो मैने कहा कि मुझे ट्रेनिंग पर जाना है। चाचा जी को अवश्य मैने सारे अनुभव बताये। उनकी ससुराल में कांग्रेस के एक एम एल सी थे। चाचा जी ने उन्हे बता दिया। 
उन्होने कहा -”अंग्रेज को तो मैं देख लूंगा।”
मैने कहा -”आप परेशान न हों। मैं तो इसे एक अनुभव ही मानता हूं। मिस्टर हार्ट आखिरकार हमारे वी सी हैं। आप यह न करें।” 

मुझे यह भी लगता था कि विरोध करने से कुछ लाभ भी होगा या नहीं ? मैने चाचा जी से कहा कि क्या जरूरत थी नेताजी को बताने की। आगे कुदरती कुछ ऐसा हुआ कि मेरी थर्ड इयर की परीक्षा थी। उसी समय मिस्टर हार्ट के नेहरु से मतभेद हो गये। मिस्टर हार्ट को अपना टर्म पूरा होने से पहले ही वापस जाना पङा। 

वी के मित्तल ने रुङकी यूनिवर्सिटी का इतिहास (1840 से 1948) लिखा है। उन्होने विस्तार से इस पर चर्चा की है। पहले वह रुङकी काॅलेज था। दूसरा भाग 1975 तक के बारे में है। वह बताता है कि सरकारें किस प्रकार हमारे इंस्टीट्युशन्स को नष्ट करती हैं। 

नहीं भूलता वह टेलीग्राम

खैर, एक बात जो मुझे आज भी याद है, वह यह हमारी परीक्षा शुरु होने से पहले यू. के. से मिस्टर हार्ट के दो टेलीग्राम आये। एक बाकी क्लास के नाम था और दूसरा अकेले मेरे नाम। उसमे मिस्टर हार्ट ने मुझे परीक्षा के लिए शुभकामनायें दी थी और लिखा कि उनसे कोई गलती हो गई हो, तो मैं उन्हे माफ करुं।

अगले सप्ताह दिनांक 17 जून, 2016 दिन शुक्रवार को पढ़िए 
स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद श्रृंखला का 17वां कथन 
प्रस्तोता संपर्क: [email protected] / 9868793799
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