ऐसे कैसे स्वच्छ होगी गंगा ??

लेखक: विमलभाई
 (उत्तराखंड में गंगा, बांध व पर्यावरण पर कार्यरत माटू जनसंगठन के समन्वयक)

सरकार ने क्या अच्छी पहल की है! वाह! गंगाजल को अब डाक के द्वारा भेजा जायेगा; ताकि लोग ‘दो बूंद गंगाजल’ घर बैठे पा सकें। गंगाजल कहाँ से दिया जायेगा? जानकारी के अनुसार गंगाजल हरिद्वार व ऋषिकेश से लिया जायेगा। यह एक अच्छी शुरुआत है। अब शायद उत्तराखंड में गंगा के बांधों के नीचे रहने वालों को अंतिम संस्कार के लिये बहती गंगा ना मिले। कोई बात नहीं पर डाक विभाग के माघ्यम से हरिद्वार व ऋषिकेश से इतना गंगाजल भेजा जा सकेगा, कि वे उसे अंतिम संस्कार के लिये सूखी गंगा में डालकर नदी को बहती बना दे।
है ना, गंगा की भक्त सरकार का कमाल!! 

यह आस्था है या व्यापार ?

एक हिन्दू परिवार में जन्म लेने के कारण मैं गंगाजल का महत्व बखूबी समझता हूँ, पर साथ ही अन्य धर्मावलंबियों की जरुरतों का भी मान करता हूँ। मैं एक बहुधर्मी देश में रहता हूँ। शायद अबदेश में अब मुसलमानों के लिये ‘आबे जमजम’ भी अरब से मंगवाया जायेगा और लोगों तक पहुँचाया जायेगा। नागपुर से बाबा साहेब अम्बेडकर जी के स्थल की मिट्टी को, गयाधाम बिहार से भी कुछ मंगवाया जायेगा( पर ऐसा कुछ नहीं होनेवाला है।

वास्तव में मोदी सरकार अपने हिन्दुत्व के एजेंडे के लिये सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर रही हैं। आॅनलाइन खरीददारी की अग्रणी कंपनी – अमेज़न 299 रुपये प्रति लीटर की दर से गंगाजल पहले ही बेच रही है। अब सरकार भी मां गंगा का व्यापार करेगी। यह स्वयं को राष्ट्रवादी व भारतीय संस्कृति की पोषक कहने वाली भाजपा सरकार द्वारा मां गंगा का उपहास भी है और एक मां का व्यापार भी; फिर भी मोदी जी और साध्वी उमा भारती जी चुप हैं।

क्या यही है भारत के प्रधानमंत्री और एक साध्वी का गंगा प्रेम ?

बांधों के बंधन का प्रश्न 

क्या यह सच नहीं कि भारत का गंगा  प्रेम आरती से नहीं, वरन् गंगा को उद्गम से गंगासागर तक स्वच्छ व निर्बाध बहने देना सुनिश्चित करने से होगा। पर्यावरणविद् व चिपको नेता श्री सुंदरलाल बहुगुणा ने ’80 के दशक में नारा दिया था – ”गंगा को अविरल बहने दो गंगा को निर्मल रहने दो।”  गंगा की सेवा में उन्होने अपना शरीर तक खराब कर लिया। वह सेनानी बिस्तर पर रहकर अभी भी हिमालय चिंतन करता है; प्रेरणा देता है। वह किसी बड़ी सरकारी नौकरी के बाद गंगासेवक नहीं बना; वह तो जीवन भर लड़ा। आज की गंगा मंत्री से तो उन्होने 20 वर्ष पहले ही टिहरी बांध रोकने की प्रार्थना की थी।

फिलहाल महत्वपूर्ण यह है कि क्या आस्था की आड़ में आस्थावानों को स्वच्छ गंगाजल दिया जायेगा या हानिकारक जल दिया जायेगा। इसके लिये समझना होगा कि गंगा के मायके यानी गंगा का जहाँ से उद्गम होता है वहां  से, सभी प्रमुख सहायिकाओं से मिलकर जब देवप्रयाग में धारा ‘गंगा’ नाम का धारण करती है; वहां तक गंगा की स्थिति क्या है?

आज यह प्रश्न इसलिये भी महत्वपूर्ण है,चूँकि मोदी सरकार ने 2014-15 में 20 हजार करोड़ से जो ‘नमामि गंगे’ परियोजना चालू की थी, उसमें आठ राज्य, 47 शहर व 12 नदियां चिन्हित की गई थी। आज वह चिन्हीकरण देश व दुनिया के छलावा मात्र दिख रहा है। गंगा की स्थिति दिन-प्रतिदिन खराब हो रही है।

विदेशी मेहमानों के लिए मोदी जी बनारस के घाट साफ कराते है, किन्तु गंगा के बांधों के बारे में एक भी शब्द नही कहते। 

मायके में गंगा हाल-बेहाल 

भागीरथी: गंगा, अपने मायके में लगभग 60 बड़े बांधों में बंध रही है। भागीरथी गंगा गोमुख से 104 किलोमीटर नीचे मनेरी गांव तक ही स्वतंत्र बहती है। मनेरी बांध एक व दो, टिहरी बांध, कोटेश्वर बांध और उसके नीचे कोटली भेल एक (अ) में गंगा बंध रही है। देवप्रयाग में अलकनंदा को मिलने के बाद जहां इसेे गंगा का नाम मिलता है, वहां वह फिर कोटली भेल (ब) के बाद ही बहती नजर आयेगी।

अलकनंदा: बद्रीनाथ धाम से आनेवाली अलकनंदा गंगा का हाल देखिये। विष्णुप्रयाग से ऊपर जेपी का बांध; उसके नीचे एनटीपीसी का बांध। आगे टीएचडीसी का बांध बन रहा हैै। आगे उतराखंड सरकार की कंपनी दो बांध बना रही है। जीवीके कंपनी का श्रीनगर बांध बना हुआ है। फिर प्रस्तावित है कोटली-भेल एक (ब) परियोजना। इन बांधों से गुजरने के बाद देवप्रयाग में भागीरथी से अलकनंदा का मिलन होता है।

अलकनंदा की उपत्कायें: अलकनंदा की उपत्यकाओं का हाल तो और भी बुरा है। लक्ष्मण गंगा, धौलीगंगा, बिरही, नंदाकिनी, मंदाकिनी व पिंडर सभी को इंच-इंच बांधने की तैयारी है। जो बांध बन चुके, उनसे हो रही दुर्दशा को समझना है तो कभी स्वयं जाकर देखिए। सुरंगों में बांधों के जरिये ठुसने के बाद गंगा अगले बांध तक वर्षा के समय के अलावा कभी बहती नजर नही आती है। बांधों के बंधन, सुरंगों कीे कैद और जलाशयों में मौजूद गंदगी की चादर ने गंगा का पूरा सम्मान ही समाप्त कर दिया है। आज गंगा का स्वतंत्र अस्तित्व ही सवालों के घेरे में है; फिर भी आस्थावानों को गंगाजल डाक से भेजा जायेगा ?
वाह री सरकार ! यह कैसा खेल खड़ा किया जा रहा है!!

बांध दुष्प्रभावों पर चुप्पी क्यों ?

गंगा के स्वास्थ्य के लिये जरुरी है कि गंगा के शैशव स्थल हिमालय की भी देखभाल की जानी चाहिये, किन्तु सरकार क्या कर रही है ?

गंगा के बांधों से विस्थापितों की तो सरकार चर्चा तक नहीं करती। उन्हे तो गंगा किनारे से उजाड़ कर कही-कही फेंक दिया गया है। उत्तराखंड में भागीरथी गंगा की सबसे उपजाऊ ज़मीन टिहरी बांध में डूबो दी। गंगा, बांध कंपनी की बंधक हो गई। जहां गंगा कभी निर्बाध बहती थी, गर्मी के महीनों में वहां अब टिहरी बांध की सूखी झील से रेत के बवंडर उठते हैं ।

वाडिया इन्सटीट्यूट आफ हिमालयन ज्योलाॅजी (देहरादून, उत्तराखंड) के वैज्ञानिक श्री पी. एस. नेगी के अनुसार, उत्तराखंड राज्य बनने के बाद तेजी से वन कटे। 9,500 हेक्टेयर वन सड़कों के लिये, 5,500 हेक्टेयर वन बांधों के लिये तथा 3,100 हेक्टेयर वन पारेषण लाइनों के लिए के लिए काट दिए गये। बांधों के जल संग्रहण क्षेत्रों में वनों को लगाने और संभालने का काम न होने का नतीजा है कि गंगा में पहाड़ों की क्षरण हुई मिट्टी आज बांधों के जलाश्यों में भरती जा रही है।

‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम में आखिर इन सब पर कोई शब्द तक क्यों नही? 

यह नही भूलना चाहिये कि इन बांधों के कारण ही जून, 2013 की आपदा के दुष्प्रभाव ज्यादा व्यापक हुए। उत्तराखण्ड में गंगा घाटी के लोग आज तक उन दुष्प्रभावों को झेल रहे है। जे पी कंपनी के विष्णुप्रयाग बांध व जीवीके कंपनी के श्रीनगर बांधों से हुई तबाही इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैै। जून, 2013 में गंगा ने हर बांध को नकारा था। मालूम नही, गंगा  के प्रति आस्थावान.. धर्मपारायण मोदी सरकार यह क्यों नही समझ पाई ? बांध कंपनियों पर कोई जांच नही बैठाई, उलटे गंगा पर बांधों को आगे ही बढ़ाने के प्रति गंगा किनारे के सासंद के नेतृत्व में सरकार पूरे कर्मनिष्ठ भाव से कार्यरत है।

‘नमामि गंगे’ का हासिल

‘नमामि गंगे’ क्रार्यक्रम सेे असल में दो मकसद से पूरे हुए: पहला, गंगा की सफाई वाला मुद्दा अच्छी तरह प्रचलित हो गया और दूसरा यह कि इसकी आड़ में गंगा की अविरलता का मुद्दा गायब हो गया। गंगा प्रेमियों, नदी संरक्षण और पर्यावरण कार्यकर्ताओं को मोदी सरकार से अपेक्षा थी कि यह सरकार गंगा की अविरलता पर कोई गंभीर कदम उठायेगी। किन्तु इस सरकार ने तो वह मुद्दा ही स्क्रीन से गायब कर दिया।

अब गंगा को जलमार्ग बनाने के लिये गंगा कुछ तो साफ चाहिये ही, तो गंगा सफाई के लिये 20 हजार करोड़ हो ही गये। विदेशों तक में गंगा की सफाई का हल्ला मच गया। वहां से भी चंदा माँगा गया है। कितना मिला या नही मिला; इसकी जानकारी उपलब्ध नही है।

 ‘नमामि गंगे’ का सच यह है कि अगर सरकार जलमार्ग के हेतु सफाई के लिये पैसा इकट्ठा करने की बात करती, तो जलमानस में गंगा प्रेमी सरकार की गलत छवि जाती। 
सरकार ने बहुत चालाकी के साथ ‘नमामि गंगे’ का जाप को आगे  रखा और गंगा जलमार्ग पर चुपचाप काम कर रही है। 


बैराजों में बंधेगा गंगा जलमार्ग 

गंगा पर 65 मीटर उंचा बांध बनाने के लिये कर्ज देने वाले विश्व बैंक के पास अर्थशास्त्री डा. भरत झुनझुनवाला के साथ लेखक भी गया था। यह समझाने कि गंगा के हित में विश्व बैंक को जलमार्ग के लिये कर्ज नहीं देना चाहिये।
यह दुःखद है कि अपनी ही सरकार से असुरक्षित गंगा की सुरक्षा मांगने हमें विश्व बैंक के पास जाना पड़ रहा है। किंतु बैंक तो कर्ज देने वाली संस्था है, उसे गंगा से क्या मतलब?

सात जून, 2014 को सड़क परिवहन, राजमार्ग एंव जहाजरानी मंत्रालय के मंत्री नितिन गडकरी ने गंगा जलमार्ग परियोजना सामने रखी थी। इस परियोजना के तहत् हर 100 किलोमीटर पर बैराज़ का भी प्रस्ताव घोषित किया गया था। इलाहाबाद से हल्दिया तक गंगा के इस 1620 किलोमीटर लंबे जलमार्ग के लिए बनारस के पास जलमार्ग टर्मिनल का काम चालू है। टर्मिनल यानी गंगा पर एक बंदरगाह; जहाँ से माल उतारा-चढ़ाया जायेगा। बताया गया था कि गंगा का गहरीकरण किया जायेगा; ताकि जलमार्ग पर 1500 टन के जहाज चल सकें।

जानकारी के मुताबिक, विश्व बैंक के कर्जे से बनने वाले जलमार्ग का पर्यावरणीय आकलन व अन्य अध्ययन अंतिम चरण में है। जलमार्ग हेतु हर सौ कि.मी. पर गंगा में एक बैराज बनाने की योजना के संदर्भ में विश्व बैंक के अधिकारियों ने एक बैठक में कहा था कि हम अभी बैराज के सम्बन्ध में कुछ नहीं कर रहे, किन्तु साथ ही हम उसको पूरी तरह नकार भी नहीं रहे हैं।

गंगा पर बैराज़ योजना का विरोध को देखते हुए सरकार थोडा ठिठकी है। फिलहाल सरकार ने अर्थशास्त्री डा0 भरत झुनझुनवाला के केस में शपथ पत्र दिया है कि वह बैराज नहीं बना रही है। 

इस बात पर सरकार कब तक टिकेगी ? यह समय बतायेगा।

हा !  गंगा दुर्दशा देखी न जाय

गंगा को मां मानने वाली सरकार, गंगा को भारतीय संस्कृति की वाहक मानने वाली सरकार, हिन्दुओं की पवित्र नदी प्रचारित करने वाली सरकार वास्तव में गंगा के साथ कर क्या रही है ? गंगा मन्त्री ने 2014 में दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित भव्य ‘गंगा मन्थन’ कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से कहा था कि जो गंगा के लिये होगा, वही देश में अन्य नदियों के लिये भी लागू करेंगे। गंगा के लिए अच्छा तो क्या हुआ, उलटेे अन्य नदियों की जो दुर्दशा की जा रहीं है उस क्रम को ही गंगा पर भी आरोपित कर दिया।

गंगा आज अपने उद्गम स्थल से लेकर सागर में अपने समर्पण तक विभिन्न यन्त्रणापूर्ण परिस्थितियों में है। ये परिस्थितियां बढ़ने ही वाली है। गंगा की सभी उपत्यकाएँ बांधो में बंध रही हैं और मैदानी क्षेत्र जलमार्गों  और बैराजों में। जलमार्ग पर चलने वाले जहाजों की गन्दगी और तेल गंगा का नया पहरावा होगा, जिससे उसकी जलीय परिस्थिकीय तन्त्र और उसके साथ जलचरों के जीवन पर भी भयंकर खतरा होगा।

एक सवाल, संत समाज की चुप्पी

यहाँ इस प्रश्न का उत्तर जानना भी जरूरी है कि संत समाज का एक बड़ा हिस्सा, बाबा रामदेव व अन्य स्वंयभू गंगापुत्रों सहित जो कोई भी वर्तमान सरकार से पहले गंगा पर बहुत मुखर थे; अब शांत है। क्यों?

नमो नमो नमामि गंगे!
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लेखक संपर्क : [email protected] / 09718479517

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फोटो साभार : amazon.com, ennapadam panchajanyablogspot.com, articles.ecotimes.indiatimes.com,  india.com, skyscrapercity.com, mayin.org