प्रस्तुति: अरुण तिवारी

 प्रो जी डी अग्रवाल जी से स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी का नामकरण हासिल गंगापुत्र की एक पहचान आई आई टी, कानपुर के सेवानिवृत प्रोफेसर, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रथम सचिव, चित्रकूट स्थित ग्रामोदय विश्वविद्यालय में अध्यापन और पानी-पर्यावरण इंजीनियरिंग के नामी सलाहकार के रूप में है, तो दूसरी पहचान गंगा के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा देने वाले सन्यासी की है। जानने वाले, गंगापुत्र स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद को ज्ञान, विज्ञान और संकल्प के एक संगम की तरह जानते हैं। 

पानी, प्रकृति, ग्रामीण विकास एवम् लोकतांत्रिक मसलों पर लेखक व पत्रकार श्री अरुण तिवारी जी द्वारा स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी से की लंबी बातचीत के हर अगले कथन को हम प्रत्येक शुक्रवार को आपको उपलब्ध कराते रहेंगे यह हमारा निश्चय है।

आपके समर्थ पठन, पाठन और प्रतिक्रिया के लिए फिलहाल प्रस्तुत है:
स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद – 20वां कथन

( स्वामी सानंद एक ज़मीदार परिवार में जन्मे। उस ज़माने में इंजीनियर होना बङी बात थी। नौकरी भी उन्हे अच्छी-खासी ही मिली थी। लंबे समय तक वह किसी ऐसे समाज सेवा के काम में भी नहीं रहे कि विवाह उसमें अङचन होता; बावजूद इसके उन्होने विवाह क्यों नहीं किया ? मेरी इस जिज्ञासा का जो उत्तर मिला, वह क्या दर्शाता है ? कृपया पढ़ें और अपने आकलन से हमें अवगत करायें।: प्रस्तोता)

विवाह न करने का पहला कारण

मैने पहले बताया था न कि हमारे परिवार में एक महात्मा आते थे; वही, जिन्होने मेरा नाम रखा था। वह वेदांती थे। कहते थे -”कामिनी कंचन संग जो रहे, उसका उद्धार नहीं हो सकता।” इधर घर में बाबाजी परिवार से भी थे और ब्रह्मचार्य के पक्षधर भी थे। इस तरह कुछ तो शुरु से ही साधुत्व की ओर रुझान रहा। जब मैं सन्यास लेने लगा, तो छोटे भाई ने कहा – ”आप तो पहले से ही साधु हो। सन्यास लेने की क्या जरूरत है ?”

विवाह न करने का दूसरा कारण

विवाह न करने का एक दूसरा कारण भी था। मैं 14 साल की उम्र में ही मुजफ्फरनगर चला गया था; अपनी चाची के पास। चाची को मैं अम्मा कहता था। चाचा को उनके बच्चे पापा कहते थे। मैं भी पापा ही कहता था। मुझे जैसा स्नेह अम्मा (चाची) से मिला, वैसा कहीं नहीं मिला। उनके स्नेह के आगे और किसी चीज का महत्व नहीं दिखता था। यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के दौरान बनारस और रुङकी में रहा, तो भी मैं तरसता रहा अम्मा (चाची) के पास जाने के लिए। छुट्टी में जाता कांधला ही था, लेकिन दिल अम्मा (चाची) के पास ही रहता था। पापा जी (चाचा) ज्यादा शराब पीने लगे थे। मेरे मन में आया कि यदि पापा जी (चाचा) को कुछ हो गया, तो अम्मा (चाची) का क्या होगा ? उनके बच्चों का क्या होगा ? …तो विवाह न करने के पीछे एक यह बात भी मन जरूर थी, लेकिन असल तो बाबाजी और महात्मा के प्रभाव से ही हुआ।

अम्मा के बच्चों से लगाव अधिक

52 वर्ष की उम्र में पापाजी (चाचा) का निधन हो गया। इस बीच विवाह के लिए दबाव भी पङा। मैने अम्मा (चाची) के बेटे-बेटियों की शिक्षा…पढ़ाई में जब जैसी जरूरत हुई, किया। हालांकि मेरा अपने छोटे भाइयों से भी स्नेह रहा, लेकिन अम्मा (चाची) के बच्चों के साथ लगाव अधिक रहा। मैं आज भी जब कभी मुजफ्फरनगर जाता हूं, तो अम्मा (चाची) के बेटे अनिल के यहां ही ठहरता हूं। भाइयों के घर भी जाता हूं, लेकिन ठहरता अनिल के घर ही हूं। अनिल का बेटा चेतन एन्वायरोटेक में है। छोटा बेटा देहरादून में है। आज मेरी आवश्यकताओं को एस. के. गुप्ता (एन्वायरोटेक के संचालक) और चेतन ही देखते हैं।

परिवार को चेतावनी

हमारे परिवारों में आपस में काफी स्नेह है। पिछले वर्ष मैने परिवार को भी चेतावनी दे दी थी कि जो मेरे स्वास्थ्य की बात करेगा, वह मेरा शत्रु होगा। मैने कह दिया था कि आना, तो मेरी स्वास्थ्य की चिंता व चर्चा न करना।


( मुझे लगा कि पाठकों को स्वामी जी का पारिवारिक परिचय न मिला, तो यह श्रृंखला अधूरी रह जायेगी। इस बारे में जिज्ञासा पर स्वामी जी कुछ क्षण चुप रहे। तारीख – एक अक्तूबर, 2013; स्वामी जी के अनशन का 111वां दिन था। मैने सोचा कि यदि अभी न मालूम हो सका, तो मालूम नहीं कल हो न हो। अतः कई बार अनुरोध करने पर उन्होने थोङा-बहुत बताना स्वीकार किया। – प्रस्तोता)

एन्वायरोटेक और पी. एस. आई. से अपेक्षा

मैं नहीं मानता कि एक व्यक्ति के नाते मेरा कोई महत्व है। मैं यह भी नहीं मानता कि मेरी कोई जीवनी लिखी जाये। हो सके, तो एयर पाॅल्युशन (वायु प्रदूषण) के बारे में एन्वायरोटेक लिखे। (एन्वायरोटेक, दिल्ली में ओखला स्थित एक कंपनी है, जिसके प्रमुख संचालक श्री एस. के. गुप्ता हैं।) पवित्र, पी.एस.आई. (पीपुल्स साइंस इंस्टीट्युट, देहरादून) के हैं। उनके पास बहुत सामग्री है। जल-नदी प्रदूषण के बारे में पी.एस.आई. लिखे।

पारिवारिक परिचय

आपने मेरे परिवार के बारे में पूछा है। मेरे पिता का नाम श्री आनन्द स्वरूप है और माता जी का नाम श्रीमती लीला देवी। तरुण मेरा दत्तक पुत्र है। मेरे हिस्से में जो भी संपत्ति है, वह मैने तरुण को ही उत्तराधिकार में दी है।

एक बहन, पांच भाई

मेरी एक सगी बहन है – स्नेहलता। स्नेह के पति भिलाई-स्टील में इंजीनियर हैं। हम भाइयों में उत्तमस्वरूप अग्रवाल मेरा पांचवां भाई है। एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग करके प्राइवेट एजुकेशन के क्षेत्र में है। चौथा, निरंजन स्वरूप अग्रवाल है। निर्विकारस्वरूप, मेरा तीसरे नंबर का भाई था। वह इमरजेंसी के दौरान कांधला में ज्यादा सक्रिय रहे। वह सीधे-सीधे जे पी (लोकनायक जयप्रकाश नारायण) को मानते थे। निर्विकारस्वरूप के एक बेटा और एक बेटी है। दामाद, कम्पयुटर हार्डवेयर इंजीनियर है। बेटा, नोएडा स्थित शारदा यूनिवर्सिटी के कम्पयुटर इंजीनियरिंग विभाग का अध्यक्ष है। दूसरे नंबर के भाई का नाम ओमप्रकाश है। ओमप्रकाश का बेटा, पाॅलीटेक्निक में प्रिसिंपल है। बेटी-दामाद डाॅक्टर हैं।

चौथे नंबर वाले निरंजन खेती करते हैं। उनकी पहली पत्नी की पहली डिलीवरी में डेथ हो गई थी। बच्चा-जच्चा दोनो का देहांत हो गया था। उससे निरंजन काफी विक्षिप्त हो गया था; एबनाॅरमल। हम उनका दूसरा विवाह चाहते थे। उन्होने विधवा से विवाह किया। जिससे विवाह किया, उनका एक बच्चा भी था; एक साल का। बच्चे के बाबा उसे अपने पास रखना चाहते थे।

तरुण की चिंता

तरुण ही वह बच्चा है। बच्चा घर आया। उसी वक्त मैने आई. आई. टी. छोङा था। मुझे तरुण से लगाव हो गया। उधर नई ब्याहता से निरंजन को लङकी हो गई। 1982 में लङका भी हो गया। उसके बाद तरुण के प्रति निरंजन का रुख बदल गया। तरुण की पैदाइश सन् 76 की है। 1982 में तरुण छह साल का हो गया था। तब मैं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नौकरी में था। मेरी सगी बहन ने मुझे ये सब बताया। मैं तरुण के भविष्य के प्रति चिंतित हुआ।
मैने सोचा कि मैं क्या कर सकता हूं ? 

अगले सप्ताह दिनांक 15 जुलाई, 2016 दिन शुक्रवार को पढ़िए 
स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद श्रृंखला का 21वां कथन 
प्रस्तोता संपर्क: [email protected] / 9868793799
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फोटो साभार : श्री अभिषेकस्वरुप