प्रस्तोता: अरुण तिवारी

(यह प्रस्तुति, इसी जुलाई के दूसरे सप्ताह में स्वामी सानंद से हुई बातचीत के अंशों पर आधारित है )


21वें कथन के साथ ‘स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद श्रृंखला’ संपन्न हुई, तो अलग-अलग सवाल कई के मन में उठे; गांधी शांति प्रतिष्ठान के आदरणीय रमेश भाई, यमुना जिये अभियान के श्री मनोज मिश्र, नदियों के हालात से निराश डाॅ. ओंकार मित्तल व कई अन्य समेत स्वयं मेरे मन में भी। यह स्पष्ट है कि स्वामी जी ने पुरी के शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती जी के आश्वासन पर अपना पूर्व अनशन संपन्न किया था। स्वामी श्री निश्चलानंद जी ने स्वामी सानंद को आश्वस्त किया था कि यदि भाजपा सत्ता में आई, तो वह गंगा के पक्ष में निर्णय करेगी। अनशन संपन्न करते हुए स्वामी सानंद ने कहा था कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद तीन महीने प्रतीक्षा करुंगा। यदि तीन महीने में प्रधानमंत्री ने अनुकूल घोषणा नहीं की, तो अपने निर्णय पर पुनः विचार करुंगा।

प्रश्न ये थे कि भाजपानीत केन्द्रीय सरकार ने गंगा के संबंध में अब तक जो निर्णय लिए हैं, स्वामी सानंद उन्हे गंगा के पक्ष में मानते हैं अथवा नहीं ? यदि पक्ष में नहीं मानते हैं, तो तीन महीने बीते तो काफी अरसा हो गया; उन्होने क्या विचार किया ? यदि कुछ विचार किया, तो पूर्व की तरह उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया ? कहीं ऐसा तो नहीं, कांग्रेस शासन के दौरान उनकी गंगा निष्ठा कुछ और थी और अब भाजपा शासन के रहते कुछ और है ??

दूर हुआ प्रस्तोता का द्वंद

हालांकि आखिरी सवाल स्वामी जी की निष्ठा पर सवाल करने जैसा है। मेरे मन का द्वंद यह भी था कि गंगा पर गलत-सही जो भी हो रहा है, उस पर प्रतिक्रिया देने की सारी जिम्मेदारी क्या स्वामी सानंद जी की ही है ? हम सारी अपेक्षायें उन्ही से क्यों करें ? हमने खुद गंगा निर्मलता के लिए क्या किया है ? दूसरी ओर मेरे मन में यह विचार भी आया कि जिसने जिस बाबत् सार्वजनिक आदर्श व निश्चय प्रस्तुत किया हो, उस पर उसे निभाने की जवाबदेही ज्यादा होती है। उसे जवाबदेह होना ही चाहिए। संयोगवश, मेरा यह द्वंद ज्यादा दिन नहीं रहा। श्रृंखला संपन्न होने के कुछ दिन बाद ही स्वामी सानंद द्वारा मुझे भेजे एक पत्र ने मेरा यह द्वंद दूर कर दिया।

हाय रे मेरी दुर्बलता

उन्होने लिखा – ”शायद आप सरीखे स्नेही मेरी वर्तमान मनःस्थिति जानना चाहें, तो पिछले दो-तीन वर्षों में गंगाजी के क्षेत्र मे जो कुछ भी हो रहा है या उससे भी महत्वपूर्ण जो जरा भी नहीं हो रहा है, उससे बस यही मन में रहता है:
अरे मां गंगे ये कैसे दुर्दिन आ गये,
सुलाले गोदी में बहुत दिन जागा, कर दया।
और फिर
मत कोई मुझ को याद करे,
इस हारी निराश ज़िन्दगी पर ना वक्त अपना बर्बाद करे,
पर हाय रे मेरी दुर्बलता, एक छलांग लगा देने का निश्चय भी तो नहीं जुटा पा रहा
।”

हालांकि उक्त पंक्तियों से ’नमामि गंगे’ के दो वर्षीय क्रियाकलापों को लेकर स्वामी सानंद की निराशा काफी-कुछ स्पष्ट थी, फिर भी स्पष्टता को तर्क देने की दृष्टि से मैने स्वामी जीे से सफाई मांगने जैसे अंदाज में सवाल पूछने की धृष्टता की।

उन्होने उत्तर दिया – ’’मैं इतना निराश फील करता हूं कि जैसे मोदी जी ने एक बार कहा था कि कुछ लोगों को निराशा ही दिखती है, तो छोटा-मोटा कुछ हुआ भी हो, तो मुझे दिखाई नहीं देता। जब तक अविरलता की बात न हो, तो निर्मलता की बात करना बेवकूफी है। उसकी बात कोई नहीं कर रहा है। टेनरिज को लेकर कोई नई चीज नहीं हो रही। मैं और सिद्दिकी.. जब कानपुर में थे, तो नीरी का एक पायलट प्रोजेक्ट किया था। कोई फर्क नहीं पङा। आॅनलाइन डाॅटा करने से भी क्या होगा ? हम एनवायरन्मेंट के डाटा देखते रहे हैं। उनकी क्या रिलायबिलिटी होती है ?

उमा जी सामने होती, तो गर्दन पकङ लेता

जब से मोदी जी आये हैं, तो यही हो रहा है कि बनारस में इतना अधिक सीवेज ट्रीट होने लगा है। अस्सी बेहतर होता, तो भी.. मैं तो निराश ही हूं। एक बार तो इतना एक्साइटिड हुआ कि उमा जी सामने होती, तो उनकी गर्दन पकङ लेता।

मैने आर टी आई किया है। एक महीने हो गया, अभी तक कोई जवाब नहीं आया है। आर टी आई में मैने पूछा है कि क्या प्रवाह की बात इररिलेवेंट है ? क्या सोचा है कि सीवेज ट्रीट करने से गंगा साफ हो जायेगी ?

मैं निराश हूं

 

इलाहाबाद तो साहित्यिक नगरी है। ये इलाहाबाद में तीन थर्मल पावर स्टेशन लगा रहे हैं। गंगा जलमार्ग बना रहे हैं। अब गंगाजी पर कोयले के जहाज चलायेंगे। इसके लिए गंगा को खोद रहे हैं। मैने एक खबर पढ़ी थी। टाइटल था – ”कछुओं ने रोका मोदी का जहाज”। मोदी जी को जलमार्ग का 65 मीटर लंबा जहाज लांच करना था। सुना कि वह मालवीय ब्रिज से आगे नहीं जा पाया। कछुआ सेंचुरी से पहले ही उसे रोकना पङा। जहाज को तो बहता हुआ पानी चाहिए नहीं; उसे तो रुका हुआ पानी चाहिए, तो क्या करेंगे ? क्या गंगा का प्रवाह खत्म कर देंगे।
मेरा आकलन है कि जो कुछ हुआ है, वह सब निगेटिव है। मैं निराश हूं।

मोदी जी, आपके के मन में क्या कभी गंगाजी की भी बात आती है ?
 
मैं तो मोदी जी से कहूंगा कि मां ने बुलाया है, तो क्या इसलिए कि गंगाजी को पहले खोद डालो, उसे नोच डालो और फिर एक साङी पहना दो, ऐसे जैसे मान लिया हो कि गंगाजी एक डेड मैटर है।
‘मन की बात’ में कोई कभी उनसे पूछे कि आपके मन में क्या कभी गंगाजी की भी बात आती है ?

जब विकास नहीं था, तब समृद्धि थी

मुझे एक तरफ तो लगता है कि गंगा को लेकर लोग कभी सीरियस थे ही नहीं। जब कोई सीरियस ही न हो, तो फिर किसी भी तरफ मोङ लो। एक प्रोफेसर ने कहा कि यदि विकास ही हर मर्ज की दवा है, तो फिर रूस क्यों टूटा ? जब बर्लिन टूटा, तभी किसी ने कह दिया था कि अब रुस टूटेगा। यह कह रहे हैं कि हमारा एकमात्र एजेण्डा है – विकास। यह लोगों को बेवकूफ बनाना है। क्या इसी से सब हो जायेगा ?  हमारी प्राइमरी प्रोडक्शन क्या है – खेती और माइनिंग। खेती तो बढ़ी नहीं। हां, माइनिंग जरूर बढ़ी है। यह तो मां को नोचकर खा जाना है। यही गंगा के साथ है। यह विकास, गंगा को भी खा डालेगा। जब विकास नहीं था, तब समृद्धि थी।

लोकतंत्र में निर्णय जनता के हाथ

मैने प्रश्न किया कि तो क्या कोई उम्मीद नहीं दिखती है ?

स्वामी सानंद का उत्तर था – ”लोकतंत्र में निर्णय समाज या जनता करती है। जब जनता को ही गंगा की अविरलता की चिंता नहीं है, तो क्या उम्मीद ? किसान गन्ना के भुगतान के लिए आंदोलन कर सकते हैं, गन्ना मिलों से होने वाले प्रदूषण के खिलाफ आंदोलन नहीं कर सकते। वह यह ही तय कर लें कि अपने प्रदूषण का उचित निष्पादन नहीं करने वाली मिलों को गन्ना नहीं देंगी। दरअसल, गंगा ही नहीं, पूरे पर्यावरण की स्थिति का ह्यस हुआ है।”

आदिगंगा की चिंता किसे है ?

”आदिगंगा, कलकत्ता में है। इसी के किनारे कालीघट है; श्मशान है। ये बताते हैं कि एक वक्त में गंगा की मुख्य धारा यही थी। चातुर्मास के दौरान मैने जाकर इसका अवलोकन किया था। चूंकि यह चौड़ी थी; जहाज चलाने के उपयुक्त थी, सो आदिगंगा को हुगली में जोङ दिया।  हुगली से मिलने के बाद क्या हुआ ? बाकी का विकास हो गया; आदिगंगा दो किलोमीटर से सिकुङकर 15 मीटर हो गई। इसके ऊपर मेट्रो की इमारत बन गई। यह एक तरफ तो हुगली से मिलती है, दूसरी ओर कहीं जाती नहीं। ज्वार आता है, तो इसका पानी चढ़ जाता है; भाटा आता है, तो उतर जाता है। इसके साथ-साथ कचरा भी वहीं रोल करता रहता है। इसके किनारे ममता जी (प. बंगाल की मुख्यमंत्री) का घर है। चातुर्मास में मैने गुरुजी से कहा था कि ममता जी से मिलकर कहते हैं कि इसे दूसरी तरफ से जोङ दें। वह हो न सका। इतने सारे नेता हैं…किसको कहां इन सब बातों की चिंता है।”

अपनी सीमा भूला इंसान

”मनुष्य अपनी सीमा को भूल जाता है और सामथ्र्य को बढ़ा-चढ़ाकर करना चाहता है। भगवतीचरण वर्मा का एक उपन्यास है – ‘सामर्थ्य और सीमा’। आपको इसे पढ़ना चाहिए। इसमें तराई के बांध को लेकर उस काल में समझ का चित्र है।
सोचता हूं कि मेरे करने से हुआ क्या ?”

”सबसे पहले गिरधर महाराज से मिलकर ही मुझे गंगा पर अपने दायित्व निर्वाह की प्रेरणा हुई थी। मैं कल शाम को उनसे मिलने उत्तरकाशी जा रहा हूं।”

उत्तरकाशी से स्वामी के लौटने पर मैं उनसे पुनः मिलने गया। उम्मीद थी कि वहां से मन में जरूर वह कोई निर्णय लेकर लौटे होंगे।

बोले – ”गिरधर महाराज ने मुझसे कहा कि तुम्हारा जो काम था, वह तो तुमने कर दिया। उनकी यह बात यूं तो खुद को संतोष देने के लिए काफी है, लेकिन मैं सोचता हूं कि इससे हुआ क्या ?”

वेग टर्म्स में दिए उमा बयानों का कोई मतलब नहीं

”वहां जाकर कई बातें अपडेट हुईं। पता चला कि पर्यावरण, वन एवम् जलवायु परिवर्तन मंत्रालय छह बांधों को क्लियरेंस देने की बात कहता है। गंगा पुनर्जीवन, नदी विकास एवम् जल संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट इसके खिलाफ है। उसने इसके खिलाफ एफीडेविट भी दिए हैं। मैने एफीडेविट देखे। उसके बाद मिनिस्टर्स की मीटिंग हुई। प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी उसमें प्रतिनिधित्व किया। हालांकि यह बात अपुष्ट ही है, किंतु मुझे तो किसी ने कहा कि उमाजी ने यहां तक कहा कि उक्त बांधों को क्लियरेंस दी गई, तो वह धारी देवी से अलकनंदा में छलांग लगा लेंगी।”

”अब यदि जलमंत्री यह कहती है, तो एक तरफ तो लगता है कि उन्होने हिम्मत तो दिखाई। दूसरी तरफ, उमा जी बार-बार गंगा को लेकर मदनमोहन मालवीय समझौते की बात करती हैं। वह कहती हैं कि अब तक की किसी सरकार ने उसकी पालना नहीं की; मोदी सरकार करेगी। इसका क्या मतलब है ? वह समझौता तो सिर्फ हरिद्वार के लिए था। उसमें हरिद्वार से हर समय 1,000 क्युसेक प्रवाह देने की बात थी। उन्हे स्पष्ट कहना चाहिए। अब यदि वह कहें कि उत्तरकाशी में हर समय 1,000 क्युसेक प्रवाह देंगी, तो वहां तो सर्दियों में 1,000 क्युसेक प्रवाह नहीं रहता; तो क्या सर्दियों में मनेरी-एक, मनेरी-दो प्रोजेक्ट बंद कर देंगी ? इसी तरह यदि वह कहें कि इलाहाबाद में 1,000 क्युसेक प्रवाह देंगी, तो क्या इलाहाबाद में इससे काम चल जायेगा ? यह तो स्वीकार्य ही नहीं होगा।”

”उमाजी ने कहा कि अक्तूबर, 2016 में गंगा में सफाई का असर दिखने लगेगा। इसका क्या मतलब हुआ ? यह साफ बीओडी के स्तर में दिखने की बात है या आंखों से दिखने की ? यूं कोई कहे कि सितम्बर की तुलना में अक्तूबर में गंगा ज्यादा साफ दिखेंगी, तो यह बेमतलब है। टेम्स में था कि 1985 की तुलना में इतना इम्पू्रवमेंट हुआ। गंगा के लिए भी यह बात होनी चाहिए। सफाई की बात करें, तो वर्ष, स्थान के आधार पर तुलनात्मक बात करें या तत्व आधारित अन्य पैरामीटर रखें। ऐसे वेग टर्म्स में दिए बयानों को कोई मतलब नहीं।”

दवे की तरफ से भी ब्यूरोक्रेसी ही बोलेगी

मैने कहा कि अब तो पर्यावरण मंत्री बदल गये हैं। नये मंत्री अनिल माधव दवे तो नदी को समझने वाले माने जाते हैं। मंत्री बनने के बाद उन्होने अपने बयान में कहा भी है कि नदी को बहते रहना चाहिए। अब तो आपको उम्मीद करनी चाहिए।

स्वामी जी नाउम्मीद ही दिखे; बोले – ”मालूम नहीं, आप उन्हे किस रूप में जानते हैं। नर्मदा महोत्सव की प्लानिंग के लिए उनके बुलाने पर एक बार मैं गया था। उनसे दो घंटे बात कर मुझे तो निराशा ही हुई थी।…. तब से जो उन्होने किया, मैं उसका प्रशंसक नहीं हूं और जो मैने किया, वह उसके प्रशंसक नहीं हैं।

मेनका गांधी को जीव प्रेमी बताई जाती हैं। आप ही बताइये कि पर्यावरण मंत्री रहकर उन्होने क्या किया ? अखिलेश तो पर्यावरण इंजीनियरिंग वाले हैं। नीतीश ने ही क्या किया ? मेरा मानना है कि जावेङकर के पर्यावरण मंत्री रहते हुए उनकी तरफ से  ब्यूरोक्रेसी ही बोलती थी, दवे की तरफ से भी ब्यूरोक्रेसी ही बोलेगी।”

नये गंगा राज्य मंत्री के बयान से निराशा

‘जिस दिन उमा जी ने हरिद्वार में 231 परियोजनाओं की लांचिंग की, उसी दिन नये जल संसाधन राज्य मंत्री संजीव बालियान ने मुजफ्फरनगर के शुक्रताल में आयोजन किया। रुङकी से आने वाली सौलानी नदी आकर गंगा में मिलती है। उसमें पेपर मिल का कचरा मिलता है। उस मौके पर संजीव बालियान बोले – ”गंगा की धारा प्यार से आये या उसेे जबरदस्ती लाना पङा, तो हम उसे किनारे ले आयेंगे।” अब गंगा पुनर्जीवन का मंत्री यदि गंगा के साथ जबरदस्ती की बात करे, तो क्या इससे गंगा का पुनर्जीवन होगा ?’’
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फोटो साभार : अभिषेक स्वरुप