लेखक: अरुण तिवारी

हम जगत के प्राणी जो कुछ भी करते हैं, उसका उद्देश्य सुख है। किंतु हम यदि जानते ही न हों कि सुख क्या है, तो भला सुख हासिल कैसे हो सकता है ? यह ठीक वैसे ही बात है कि हम प्रकृति को जाने बगैर, प्रकृति के कोप से बचने की बात करें; जल और उसके प्रति कर्तव्य को जाने बगैर, जल नीति व योजनायें बनायें। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2016 के लिए नारा दिया – ‘लोगों के लिए जल: लोगों के द्वारा जल’। उसने 2016 से 2018 तक के विश्व जल दिवसों की वार्षिक विषयवस्तु भी तय कर ही दी है: वर्ष 2016 – ‘जल और कर्तव्य’; वर्ष 2017 – ‘अवजल’ अर्थात मैला पानी; वर्ष 2018 – ‘जल के लिए प्रकृति आधारित उपाय’। अब यदि हम इन विषय वस्तुओं पर अपने कर्तव्य का निर्वाह करना चाहते हैं, तो हमें प्रकृति, जल, अवजल और अपने कर्तव्य को जानना तो चाहिए कि नहीं ?

जल के बिना जलवायु मंथन !!

याद कीजिए, दिसंबर 2016 – जलवायु परिवर्तन को लेकर 195 देश पेरिस में जुटे। विचारणीय तथ्य है कि वहां सभी ने वायुमंडल में नुकसानदेह गैसों के उत्सर्जन और अवशोषण पर तो चर्चा की, किंतु जल को भूल गये; भूल गये कि जल और वायु के मेल-मिलाप से ही जलवायु बनती है। क्या जल की चिंता किए बगैर, जलवायु निर्धारण के सभी कारणों और कारकों पर समग्र चिंता और चिंतन संभव है ? भारतीय पौराणिक ग्रंथ कभी नहीं भूले कि जल में भी ऊर्जा तत्व मौजूद होता है। उनमें उल्लेख है कि जल में मौजूद यह ऊर्जा तत्व भी पृथ्वी के तापमान को प्रभावित करने की क्षमता रखता है, किंतु पेरिस सम्मेलन जल के इस गुण को याद नहीं रखा सका। अतः वहां इस पर कोई संजीदा चर्चा नहीं हुई कि तापमान वृद्धि को रोकने के लिए, हम कौन-कौन से सकारात्मक जल कदम उठा सकते हैं। इसे हम अपनी जलसाक्षरता मानें या निरक्षता ?

पोंगा नहीं, पुरातन  

हम भले ही ठीक से न जानते हों कि प्रकृति क्या है, किंतु प्रकृति हमेशा जानती है कि कब और कहां वर्षा हो ? कब शीत, ग्रीष्म अथवा शरद का आगमन हो ? किस प्रवाह का कहां से उद्गम हो और कहां मिलन ? यदि हम जानते होते, तो नदियों को जोङने की जिद्द नहीं ठानते और न ही कृत्रिम वर्षा कराने का दंभ दिखाते।

सभी जीव गर्भ धारण करते हैं, किंतु क्या मेघ भी गर्भ धारण करते हैं ? हां, मेघ भी गर्भ धारण करते हैं। मेघों को भी गर्भपात होता है। हाइड्रोलाॅजी (जलविज्ञान) के पाठ्यक्रम में क्या यह हमें पढ़ाया जाता है ? वराह मिहिर रचित बृहत संहिता पढ़ने वालो को यह पढ़ाया जाता है।

बृहत संहिता ने गर्भ और गर्भपात..दोनो की पुष्टि के लक्षण बताये। गर्भधारण के 195 दिन बाद वर्षा के रूप में संतानोत्पत्ति और उसका रूप-स्वरूप बताया।

मेघ ही नहीं, वायु धारण करने की भी विशेष तिथियां, लक्षण  व परिणाम होते हैं। पुराने को पोंगा समझकर, यदि मैं पौराणिक ग्रंथों को हाथ न लगाता, तो स्वयं को पानी पर लगातार लिखने वाला मेरे जैसा लिखाङ भी इस मामले में निरक्षर ही रहता।

इसी अज्ञानता के कारण,  हमारी वर्तमान जलनीति और शुद्धिकरण के ताजा प्रयास, जल और वायु से ज्यादा, बाजार को मदद करने वाले साबित हो रहे हैं। निस्संदेह, इसका एक कारण, जानते-बूझते हुए भी अनुचित करना हो सकता है। यह भी एक तरह का अज्ञान ही है। इससे उबरने के लिए हमारे नेता, अफसर, संत, समाज..सभी को एक बार भारत के पंरपरागत ज्ञानतंत्र से शिक्षित-प्रशिक्षित होने की जरूरत है।

भारतीय ज्ञानतंत्र में मौजूद प्रकृति ज्ञान

गौर कीजिए कि भारतीय ज्ञानतंत्र ने हमें हमेशा बताया कि प्रकृति के अपने नियम हैं। प्रकृति, समय-काल-परिस्थिति अनुसार स्वयं को नियंत्रित करती है। रचना और विध्वंस, दोनो ही प्रकृति की नियंत्रण प्रणाली के हिस्से हैं। भारतीय ग्रंथों में स्पष्ट लिखा है कि जल सहित पृथ्वी, बार-बार प्रकट होती तथा छिपती रहती है। सृष्टि के समय प्रकट होकर, जल के ऊपर रहना और प्रलयकाल में जल के नीचे छिप जाना; यही नियम है। यह उसी की सीख है कि जलवायु परिवर्तन के वर्तमान कालखण्ड को भी हमें प्रकृति द्वारा मानवी गतिविधियों के नियमन के तौर पर ही लेना चाहिए। गौर कीजिए:

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षेये  पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।।

अर्थात ”हे कौन्तेय, कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं और कल्पों के आदि में मैं उन्हे फिर रचता हूं।”


श्रीमाद्भगवत बांचने वाले और सुनने वाले हम, क्या कभी रचना और विध्वंस के इस प्राकृतिक नियम पर विचार कर अपने कर्म का निर्धारण करते हैं ?  

अगला नियम देखिए:
”प्रकृति से उतना ही लेना चाहिए, जितना आवश्यकता हो। यदि मनुष्य इसका ध्यान रखना छोङ देगा, तो प्रकृति का भण्डार ही समाप्त हो जायेगा।”

प्रकृति से लेन-देन में संतुलन ही जल और वायु दोनो के साथ संयम और संतुलन को बनाये रखने का बुनियादी सूत्र है। सोचिए, यदि दुनिया के देशों ने धर्मात्मा युधिष्ठिर के कहे इस कथन को ही ध्यान से पढ़ और व्यवहार में गढ़ लिया होता, तो क्या पेरिस समझौते की जरूरत पङती ? 

हम यज्ञ करते हैं, किंतु क्या इस मंतव्य से परिचित हैं कि यज्ञ मात्र अग्निहोत्रकपरक कर्मकाण्ड न होकर सृष्टा के अनुशासन में भावना, विचार, पदार्थ और क्रिया के संयोग से उत्पन्न होने वाला एक पुरुषार्थ क्रम है ? 


वेदवाणी है कि पहला यज्ञ, ब्रह्म के संकल्प से उत्पन्न सृष्टि का  उद्भव है; दूसरा यज्ञ, उत्पन्न सूक्ष्म तत्व के अनुशासन का विशेष पालन करते सृष्टि चक्र को सतत् प्रवाहमान बनाये रखना है। तीसरा यज्ञ, प्रकृति प्रवाहों को आत्मसात करते हुए उत्पन्न ऊर्जा से स्वधर्म मे रत् रहना और प्रकृतिगत यज्ञीय प्रवाहों को अस्त-व्यस्त न होने देना है। चौथा यज्ञ, वह वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत मनुष्य, प्रकृति के पोषक प्रवाहों को पुष्टि प्रदान करने का प्रयास करता है।
क्या हम ऐसा करते हैं ? यदि करते, तो क्या गंगा जैसे पोषक प्रवाह को पुष्टि देने की बजाय, मल, कचरा और बंधन देते ?

फिर भी अनुशासित नहीं हम

सभी जानते हैं कि बांधों, बैराजों में ठहरे पानी से हानिकारक गैसों की उत्पत्ति होती है; बाँध और बैराज प्रवाह और प्राणवायु को नदी से छीनने का काम करते हैं; फिर भी हम बांध-बैराज की पूरी ऋंखला ही बना रहे हैं; नदियों को सुरंगों में डाल रहे हैं। ‘नमामि गंगे’ परियोजना एक ओर तो गंगा किनारे की आबादी के बीच जनजागरण के लिए कई मंत्रालयों को जोङकर ज्ञान व व्यवहार बढ़ाने की अच्छी कवायद करती दिखाई दे रही है; राष्ट्रीय साक्षरता मिशन ने जल साक्षरता को विशेष जगह देना तय किया है; दूसरी ओर यह अज्ञान कि गंगा के गले में बांधों का फंदा डालने का काम रोकने में केन्द्र सरकार कोई दिलचस्पी नहीं ले रही।

सात जुलाई, 2016 कोे सरकार द्वारा ‘नमामि गंगे’ की अनेक परियोजनाओं की शुरुआत की। ये परियोजनायें सीवेज निष्प्पादन, नये घाटों का निर्माण, सतह की सफाई, वृक्षारोपण और जैव विविधता संबंधित है। क्या इनमें से एक भी परियोजना ऐसी है, जो गंगा को नैसर्गिक प्रवाह अथवा पर्यावरणीय प्रवाह देने का संकल्प दर्शाती है ?

यह गंगा नहीं, बल्कि भारत की जनता का दुर्भाग्य ही है कि स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद समेत तमाम विशेषज्ञों द्वारा याद दिलाने के बावजूद पर्यावरण मंत्री भूल रहे हैं कि गंगाजल के अमरत्व का कारण सिर्फ बैक्टिरियोफाॅज नहीं, उसकी अनोखी गाद भी है। इसी कमजोर याददाश्त के कारण, शासन अकेले गंगा की मूल धाराओं पर 54 जलविद्युत प्रस्तावों को आगे बढ़ाकर गाद को जलाश्यों में कैद करने की योजना बना चुका है।
मंथन करके विष और अमृत को अलग-अलग रखने की कथा बहुत पुरानी है। हमने इसे पढ़ा बहुत; प्रवचनों में सुना और सुनाया भी बहुत, किंतु अपने खुद के मल और कचरे को अमृत जैसे नदी जल में बहाने पर कभी मलाल नहीं किया। क्या यह किसी राज या समाज के ज्ञानी और अनुशासित होने के लक्षण हैं ?  

अज्ञानता की पराकाष्ठा

हमारे अज्ञानता और लापरवाही की पराकाष्ठा देखिए: समुद्र में प्राप्त मूंगा मूंगा भित्तियों को हम जीवन की प्रथम नर्सरी मानते हैं। इन्हे कार्बन अवशोषण की सर्वश्रेष्ठ प्राकृतिक प्रणाली भी मानते हैं। जानते हैं कि इनका स्थान, समुद्र में  है। समुद्रों का तापमान बढ़ने से मूंगा भित्तियों का बङा क्षेत्रफल तेजी के साथ नष्ट हो रहा है। समुद्र का तापमान कम करने का काम, नदियों से आने वाले मीठे और शीतल जल का है। यह जानते हुए भी हम नदियों को सुखा रहे हैं। दूसरी ओर परिवहन मंत्री श्री नितिन गडकरी जी जल परिवहन की व्यापक योजना बना रहे हैं। नदियों से बहकर आने वाले मीठे पानी को बांधों, बैराजों, नहरों में रोककर घटा रहे हैं। वह सोच नहीं रहे हैं कि इससे नदियों को नफा होगा या नुकसान। हकीकत यह है कि इसका दुष्प्रभाव समुद्री तटों पर बसे इलाकों मिट्टी, खेती और सेहत पर दिखाई देगा। यह चित्र और बढ़ेगा। साथ ही पानी का बाजार भी।

आखिर कोई विषय विशेषज्ञ यह कैसे भूल सकता है कि नदी जोङ परियोजना के जरिए हम समुद्री जल में नदी के मीठे पानी की मात्रा घटा देंगे। इससे समुद्र का खारापन बढ़ेगा और पहले से तेजी से बंजर हो रहे भारत में खारी-बंजर ज़मीन के आंकङे बढ़ जायेंगे। समुद्र किनारे के इलाकों में पेयजल का संकट बढ़ेगा। दूसरी ओर नदी के पानी का एक काम, समुद्र के तापमान को भी नियंत्रित करना है। नदी जोङ परियोजना को ज़मीन पर उतारकर, हम नदी के इस काम में अवरोध उत्पन्न करेंगे।

जरा सोचिए, समुद्र का तापमान नियंत्रित नहीं होगा, तो क्या होगा ? मूंगा भित्तियां कितनी बचेंगी ? यह मौसमी-मानसूनी अस्थिता तथा भौगोलिक बदलाव का कालखण्ड है। हमारे मानसून का क्या होगा ? उलटबांसी देखिए कि बावजूद इन सवालों के हम नदी जोङने का दुस्साहस दिखा रहे हैं।

समझना-समझाना जरूरी

प्रकृति में इतने ग्रह हैं। सभी अपनी कक्षा में  चलते हैं। सभी अपना गंतव्य खोजते हैं। कोई दूसरे की कक्षा में जाकर दूसरे को रोकने की कोशिश नहीं करता। सामान्यतया, कोई ग्रह नियम नहीं तोङता। ग्रह जानता है कि वह जब भी नियम तोङेगा, सर्वनाश होगा। अतः वह अपवादस्वरूप ही ऐसा करता है,किन्तु  हम तो नित् ही नियम तोङते हैं और चाहते हैं कि सर्वनाश न हो; यह कैसे हो सकता है ?

सर्वनाश से बचना है, तो अब हमें समझना चाहिए कि ग्लेशियरों पिघलने की रफ्तार जितनी तेज होगी, हवा में उत्सर्जित कार्बन का भंडार उतनी ही तेज रफ्तार से बढ़ता जायेगा। अंततः समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा। पृथ्वी के कोणीय झुकाव में बदलाव होगा। दिन-रात के तापमान और लंबाई में अंतर बढ़ेगा; परिणामस्वरूप गर्मी, सर्दी, वर्षा के पंरपरागत क्षेत्र व समय में परिवर्तन की पूरी संभावना रहेगी।

मौसम में ऐसे बदलाव बाढ, चक्रवात, सूखा लायेंगे तथा प्रदूषण को और बढ़ायेंगे। जहां जोरदार बारिश होगी, वहीं कुछ समय बाद सूखे का चित्र हम देखेंगे। 100 वर्ष में आने वाली बाढ़, दस वर्ष में आयेगी। हो सकता है कि औसत वही रहे, किंतु वर्षा का दिवसीय वितरण बदल जायेगा। हम यह बात मनुस्मृति के प्रलयखण्ड से सीख सकते थे। 

ऐसे में जलोपयोग में अनुशासन और जल संचयन कितने जरूरी हैं ? धर्मात्मा युधिष्ठिर के इस कथन में यह सीख स्वतः निहित है कि बहती नदी मिले या पानी का सागर, उसमें से प्यास भर पानी लो, पर उस पर अपना अधिकार न जताओ। 

रेन वाटर हार्वेस्टिंग’ की नूतन शब्दावली तो अभी पिछले तीस सालों में आई, विदुर ने अपने इस कथन में वर्षा जल संचयन का महत्व कितना पहले बताया था – ”यदि वर्षा हो और धरती उसके मोती समेटने के लिए अपना आंचल न फैलाये, तो वर्षा का महत्व नहीं।” 

इस उपलब्ध ज्ञान के बावजूद यदि हम भारतीय, जल संचयन की जगह अर्थ संचयन को अपनी प्राथमिकता बना रहे हैं; जल बजट की प्राथमिकता में जल संचयन की बजाय, जल निकासी तंत्र को बढ़ावा देने वाली योजनाओं/परियोजनाओं को रख रहे हैं, तो इसके लिए कोई ज्ञानी हमें किसी कुपढ़ की श्रेणी में रख दे, तो हम क्यों एतराज करें ?

क्या यह कुपढ़ होने का परिणाम नहीं कि दुनिया में 40 प्रतिशत मौत पानी, मिट्टी और हवा में बढ़ आये प्रदूषण की वजह से हो रही हैं ? हमें होने वाली 80 प्रतिशत बीमारियों की मूल वजह, पानी का प्रदूषण, कमी या अधिकता ही बताया गया है। पानी में क्रोमियम, फ्लोराइड, लैड, आयरन, नाईटेªट, आर्सेनिक जैसे रसायन तथा बढ आये ई-कोलाई के कारण कैंसर, आंत्रशोथ, फ्लोरिसिस, पीलिया, हैजा, टाइफाइड, दिमाग, सांस व तंत्रिका तंत्र में शिथिलता जैसी कई तरह की बीमारियां सामने आ रही हैं।

भारत में आज कितने ही इलाके ऐसे हैं, जहां बारिश में बाढ़ आती है और बारिश गुजर जाने के मात्र तीन महीने बाद ही नदियां सूख जाती हैं और भूजल खुद में एक सवाल बनकर सामने खङा हो जाता है। यह सवाल ‘तालों में ताल भोपाल ताल’ के इलाके के पानी पर भी हैं और कभी झीलों के लिए प्रसिद्ध रहे बंगलुरु के पानी पर भी। न्यूनतम 100 मिलीलीटर बारिश वाला जैसलमेर भी आज पेयजल की कमी वाले इलाके में शुमार है और अधिकतम 11,400 मिलीमीटर वर्षा वाला चेरापूंजी भी और नदियों के शानदार संजाल वाला उत्तराखण्ड भी।

दिलचस्प है कि भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे खतरनाक रसायन वाले इलाके सबसे अधिक बाढ़ वाले बिहार में भी मौजूद हैं और हर साल सुखाङ से सीखते राजस्थान मेें भी। गुणवत्ता को लेकर पंचनद वाले पंजाब के भूजल पर भी आज सवालिया निशान है और अपनी सब स्थानीय नदियों को सुखा चुकी दिल्ली के भूजल पर भी।

स्मार्ट सिटी और जल संबंध

वर्तमान सरकार ने स्मार्ट सिटी का सपना ले लिया है, किंतु क्या स्मार्ट सिटी की पहली सूची तैयार करने से पहले उन नगरों के जल स्थिति का जायजा या जल स्वावलंबन का सपना लिया ? 

भारत में सबसे कम औसत वर्षा वाले इलाके में भी नगर नियोजकों ने जैसलमेर के लिए ऐसी जगह का चुनाव किया, जो पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित है; जहां मीठे पानी के अनेक स्त्रोत थे। एक विशाल कुआं ऐसा था, जिसके बारे में किवदन्ती है कि उसे श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से बनाया। जगह का ढाल ऐसा शानदार था कि सन् 1367 में जैसलमेर के राजा घङसी रावल द्वारा बनाये तालाब घङीसर का पानी आज भी कभी नहीं सूखता। इसका आगोर इतना विशाल है कि एक ओर का विस्तार ही 20 किलोमीटर है। हर बारिश से पहले राजा खुद शामिल होकर पूरे आगोर को साफ कराता था। घङीसर में नहाने व मवेशियों को पानी पिलाने वालों को राजा स्वयं दंडित भी करता था। विजयनगर, बुरहानपुर, हैदराबाद, गोलकुण्डा, तक्षशिला जैसे पुरातत्व महत्व के नगरों से लेकर चंडीगढ, बंगलुरु, पुणे, नवी मुंबई, साल्टलेक सिटी जैसी नई बसावट तक के लिए जगह के चुनाव में पानी एक खास कारक रहा है।

दुनिया के प्रथम नगर फिलस्तीन और इराक में थे। उन्होने भी अपनी स्थापना से पूर्व कई पीढियों की जरूरत के पानी का इंतजाम किया; कुण्ड बनाये। हङप्पाकालीन नगर अवशेषों में 30 मीटर चौड़ी और  25-30 किलोमीटर लंबी नहरें मिलीं। हर तीसरे घर के सामने एक कुआं मिला। सिंधु घाटी सभ्यता इतनी सुनियोजित थी कि जलनिकासी की उतनी अच्छी व्यवस्था के लिए हम आज भी उसके योजनाकारों पर गर्व कर सकते हैं, किंतु क्या हम स्मार्ट सिटी की सूची पर गर्व करें ? 

स्मार्ट सिटी की सूची में दिल्ली का भी नाम है। पानी के मामले में दिल्ली, एक परजीवी शहर है।
क्या कोई परजीवी शहर, स्मार्ट हो सकता है ? 

हम जानते हैं कि पानी के अपने दीर्घकालिक स्वावलंबी इंतजाम न कर पाने के कारण ही दिल्ली की आबादी ने कई बार अपने ठिकाने बदले; बावजूद इसके ‘मिलेनियम सिटी’ गुङगांव का नियोजन करते वक्त सोचा ही नहीं गया कि इस जगह की जलसंसाधन क्षमता सात लाख से अधिक आबादी झेलने की नहीं है। कल यदि आबादी 25 लाख पहुंच गई, तो पानी कहां से आयेगा ?

हमारे नगर नियोजकों को क्या यह सभी नहीं जानना चाहिए ? 

यह भी जल साक्षरता का ही विषय है कि कचरे के अनियोजित निष्पादन ने धरती के नीचे का प्रवाह रोका, तो धरती ने पानी सोखने से इंकार कर दिया। हमने जलनिकासी के परंपरागत मार्गों में कब्जे किए; अवरोध खङे किए तो इन्द्र के प्रहार ने उन नगरों को भी अपनी चपेट में लिया, जहां पहले कभी बाढ़ नहीं आती थी; दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद से लेकर श्रीनगर गढवाल तक।

व्यवहार पर विचार

भारतीत अतीत का ज्ञानतंत्र इतना समृद्ध कि हम गर्व करें और भारतीय राज-समाज का वर्तमान व्यवहार ऐसा कि समग्रता की कमी हर पल महसूस हो ! यह विरोधाभासी परिदृश्य स्वयंमेव प्रमाण है कि भारत का पानी, पानी के अज्ञान अथवा जानबूझकर किए जा रहे कुप्रबंधन का शिकार है।

प्रमाण इस बात के भी हैं कि पानी का प्रबंधन न सरकारों को कोसने से ठीक हो सकता है, न रोने से और न किसी के चीखने-चिल्लाने से।

हम इस मुगालते में भी न रहें कि नोट या वोट हमें पानी पिला सकते है। वोट पानी पिला सकता, तो देश में सबसे ज्यादा वोट वाले उत्तर प्रदेश के बांदा-महोबा-हमीरपुर में पानी की कमी के कारण आत्महत्यायें न होती।

सिर्फ धन से ही यदि पानी का सुप्रबंधन संभव होता, तो सबसे अधिक बांध और हमारी पंचवर्षीय योजनाओं में पानी का सबसे अधिक बजट खाने वाले महाराष्ट्र में सिंचाई और पेयजल का संकट इतना गहराया होता।
यदि कोई कहे कि कोई कच्छ, चेन्नई और कलपक्कम की तरह करोङो फेंककर खारे समुद्री पानी को मीठा बनाने की मंहगी तकनीक के बूते सभी को पानी को पिला देगा, तो यह भी हकीकत से मुंह फेर लेना है।

हकीकत यह है कि हमें हमारी जरूरत का कुल पानी न समुद्र पिला सकता है, न ग्लेशियर, न नदियां, न झीलें और न हवा व मिट्टी में मौजूद नमी। पृथ्वी में मौजूद कुल पानी में सीधे इनसे प्राप्त मीठे पानी की हिस्सेदारी मात्र 0.325 प्रतिशत ही है। आज भी पीने योग्य सबसे ज्यादा पानी (1.68 प्रतिशत) धरती के नीचे भूजल के रूप में ही मौजूद है। हमारी धरती के भूजल की तिजोरी इतनी बङी है कि इसमें 213 अरब घन लीटर पानी समा जाये और हमारी जरूरत है मात्र 160 अरब घन लीटर। भारत सरकार खुद मानती है कि मानसून के दौरान बहकर चले जाने वाली 36 अरब घन लीटर जलराशि को हम भूजल बैंक में सुरक्षित कर सकते हैं।

स्पष्ट है कि यदि आज भी हमें हमारी जरूरत का पूरा पानी यदि कोई पिला सकता है, तो वे हैं सिर्फ और सिर्फ बारिश की बूंदें ;

बावजूद इस जानकारी के अभी तक देश में जलसंरचनाओं के चिन्हीकरण और सीमांकन का काम ठीक से शुरु भी नहीं किया जा सका है। भारत के पास कहने को राष्ट्रीय व प्रादेशिक स्तर पर अलग-अलग जलनीति जरूर है, लेकिन हमारे पानी प्रबंधन की चुनौतियों को जिस जल नीति, नदी नीति, बांध नीति, पानी प्रबंधन की जवाबदेही तथा उपयोग व मालिकाना सुनिश्चित करने वाली नीति, जलस्त्रोत से जितना लेना, उसे उतना और वैसा पानी वापस लौटाने की नीति की दरकार है, वह आज भी देश के पास नहीं है। 

जल और कर्तव्य

यह सब करने के लिए हमें तीन काम की जरूरत है:

पहला कार्य – भारतीय प्रकृति दर्शन और जलदर्शन को सामने रखकर शासन, प्रशासन, संगठन व समाज के बीच समझ, कर्तव्य व व्यवहार सुनिश्चित करना। एक संजीदा और ज़मीनी कार्ययोजना बनाकर यह किया जा सकता है।

दूसरा कार्य – जलोपयोग में संयम यानी अनुशासन सुनिश्चित करना। समाज की राय से क्षेत्रवार भूजल निकासी की सीमा का निर्धारण व पालना तंत्र पर विचार करना चाहिए।

तीसरा कार्य – जल प्रदूषण, जल का अति दोहन, ओर जल संरचनाओं पर अतिक्रमण रोकना।

ये तीनो कार्य समझाइश, संकल्प और सख्ती के बगैर संभव नहीं है। किंतु एक ओर गंगा में प्रदूषण रोकने के लिए सैनिक कार्यबल की तैनाती और दूसरी ओर इतना समय बीत जाने के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय को प्रदूषक उद्योगों की सूची तक न सौंप पाने का विरोधाभासी चित्र से स्पष्ट होती नीयत के होते यह संभव नहीं होगा।
हमारी जलमंत्री सुश्री उमाजी, गंगा प्रदूषण मुक्ति के नित नये नारे गढ़ती रहें और वन एवम् पर्यावरण मंत्रालय तथा परिवहन मंत्रालय नदी जल के अति दोहन की योजना बनाता रहे; इस विचित्र तालमेल से भी तीनों कर्तव्यों की पूर्ति संभव नहीं। 

तय करें भूमिका

संयुक्त राष्ट्र संघ की विषयवस्तु के मुताबिक, यदि इस वर्ष हमें जल के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करना है, तो राज, संत और समाज को एक-दूसरे की ओर ताकना छोङना होगा। 

धर्मसत्ता को सोचना होगा कि अमृत और विष के मंथन में धर्मक्षेत्र ने कभी क्या भूमिका निभाई थी।

साहूकारों और अन्य समाज को सोचना होगा कि हमारे समाज ने अपनी आय के दो टके का 10 फीसदी कुंआ-बावङी-जोहङ आदि धर्मादे में लगाने वाले सेठ-साहूकारों एक समय तक महाजन यानी ‘महान जन’ क्यों कहा। 

ग्रामसभा, पंचायत व मोहल्ला समितियों आदि प्राथमिक लोकप्रतिनिधि सभाओं को सोचना होगा कि विशः, नरिष्ठा, सभा, समिति, खाँप, पंचायत आदि के नाम वाले संगठित ग्राम समुदायिक ग्राम्य संस्थानों ने जलप्रबंधन को अपनी जिम्मेदारी मानकर क्यों और कैसे निर्वाह किया ?

देखना होगा कि आज भी जहां-जहां समाज ने मान लिया है कि ये स्त्रोत भले ही सरकार के हों, लेकिन इनका उपयोग तो हम ही करेंगे, वहां-वहां चित्र बदल गया है; वहां-वहां समाज पानी के संकट से उबर गया है। जहां-जहां, जिसने जवाबदारी संभाल ली, जल संसाधनों पर नैतिक हक़दारी उसे स्वतः हासिल हो गई। जो काम समाज स्वयं कर सकता है, राज को उसकी जिम्मेदारी समाज पर छोङ खुद सहयोगी भूमिका में आना होगा। जवाबदारी निभाने और हकदारी पाने के मार्ग की बाधायें दूर करनी होंगी। जल से मुनाफे का नहीं, पुण्य का रिश्ता बनाना होगा। 
ये सब कैसे हो ? 
भारतीय जल दर्शन के आइने में जल साक्षरता अभियान चलाकर यह सीखना-सिखाना संभव है।
क्या 21वीं सदी का नया भारत यह सीखना-सिखाना चाहेगा ?
सोचें और तय करें।
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फोटो साभार : its my desh.in, vah gazab.com, archidunlop.com, wikipedia.org, allinhindi.com, blogwsj.com, homeexnora.org, 1080.plus, hydrartelife.org