लेखक: अरुण तिवारी

चातुर्मास का मतलब है, आषाढ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से लेकर कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी तक के चार महीने। इन चार महीनों में मौजूद भारत के पारंपरिक ज्ञानतंत्र की इस खूबी को अत्यंत बारीकी से समझने की जरूरत है कि एक ओर तो वह चौमासे के दौरान देवों में प्रमुख देव श्री विष्णु के सो जाने का तर्क सामने रखकर विवाह लग्न आदि कई शुभ कार्यों की इजाजत नहीं देता, दूसरी ओर इस पावसी चौमासे में इतने महत्वपूर्ण मौके आते हैं कि उन्हे पूरी श्रृद्धा और नियम से निभाने का प्रावधान है। गुरु पूर्णिमा, हरियाली तीज, नागपंचमी, रक्षाबंधन, कृष्ण जन्माष्टमी, विजयदशमी, अहोई अष्टमी, करवाचौथ, दीपावली, भैया दूज, छठ पूजा और नदी स्नान के विशेष महत्व वाली कार्तिक पूर्णिमा ऐसे ही मौके हैं। चातुर्मास में ‘पितृपक्ष’ का पखवाङा और नवरात्र के नौ दिन ऐसे अवसर होते हैं, जब स्वास्थ्य और अध्यात्म दोनो की दृष्टि से आम गृहस्थ को विशेष निर्देश की जरूरत होती है। रोजे का पाक महीना भी इसी चौमासे में आता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो यह ऋतु बदलाव का समय होता है। वर्षा ऋतु के अवसान और हेमंत ऋतु के आगमन के बीच का इस समय और उधर बसंत और ग्रीष्म ऋतु के बीच का वह समय, जब रामनवमी और गुड फ्राइडे से पहले के 15 शाकाहारी प्रार्थना दिवस आता है; ये दोनो अंतराल शरीर और मन के संयम की विशेष मांग करते हैं। ऐसे विशेष समय में यदि जगत के पालनहार सो जायें, तो फिर जीवन के निर्देश लेने आम गृहस्थ कहां जायें ?

चातुर्मास : गुरुज्ञान का खुला अवसर

गुरु गोविंद दोउ खङे, काके लागऊं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय।।

गुरु का स्थान गोविंद से आगे यूं ही नहीं माना गया। चातुर्मास में भूलोक की पालना का भार गुरुवर्ग के भरोसे छोङकर ही भगवान श्री विष्णु शयन करने पाताल लोक जाते हैं। इसीलिए गुरु भी इस चातुर्मास में कहीं नहीं जाते। शिष्यों को पूर्व सूचना के साथ पूर्व निर्धारित एक ही स्थान पर रहते हैं। इसीलिए चातुर्मास की पहली पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहा जाता है। शिष्य गुरु को साक्षात् अपने सामने बिठाकर पूजा करते हैं।

गौर करने की बात है कि यह वह समय होता है, जब आषाढ की खेती बो चुका किसान फुर्सत में होता है। अगले दिन से लगने वाले सावन की झिरी घर से बाहर निकलने नहीं देती। बेटियां चाहे साल भर मायके न जायें, लेकिन सावन में जरूर जाती हैैं। ऐसे में गुरु का सानिध्य शिष्य के लिए हर पल सौभाग्य का पर्व लेकर आता हैै। गुरु भी फुर्सत से शिष्य को जीवन-रहस्य से लेकर जीवन जीने की कला के ज्ञान का भान कराते हैं। जेठ में भटा, आषाढ में टपा (टपका आम), सावन में तसमई (खीर), भादों में घटा – किस महीने में क्या खाना, कैसे रहना; ये गुर भी गुरु इसी चातुर्मास में ही बताया करते थे। सूर्य से संपर्क कम होने के कारण चौमासे में हमारी जठराग्नि मंद पङ जाती है। इसीलिए जठराग्नि चुस्त रखने वाले बेल को शिव पर चढाकर प्रसाद के रूप में पाने का विधान है। सावन में दही पर रोक और खीर बेरोकटोक खाने का प्रावधान है। ऋतु परिवर्तन के वक्त पहले श्रृाद्ध और फिर नवरात्रों के दौरान निर्देशित संस्कार व संयम ही पर्यावरण व सेहत संरक्षण की भारतीय निषेधाज्ञा है।

वनस्पतियों में भी संवेदना होती है। नामी वैज्ञानिक जगदीशचन्द्र बसु ने तो यह बात लंबे शोध के बाद बहुत बाद में बताई। भारत के पारंपरिक ज्ञानतंत्र के वाहकों ने वनस्पतियों के प्रति संवेदना बहुत पहले दर्शाई। नीम और तुलसी को मां मानकर पूजा की। अलग-अलग गोत्र के लिए अलग-अलग वृक्ष विशेष को काटना निषेध बताया। ऐसे वृक्ष विशेष को उस गोत्र की ’धराङी’ कहते हैं। शास्त्र ने बहुत पहले कहा कि चातुर्मास के दौरान मां धरती भी गर्भवती होती है। मां धरती के गर्भ में पल रहे ये अनन्त जीव होते हैं, नन्हे पौधे… वनस्पतियां। चातुर्मास में धरती की खुदाई-जुताई नहीं करनी चाहिए।

पारंपरिक ज्ञान का वाहक है चातुर्मास 

दरअसल, शास्त्र पढकर समझना आम गृहस्थ के लिए इतना सहज कभी नहीं रहा। अतः चातुर्मास के दौरान गुरु-शिष्य सानिध्य के जरिए ही पारंपरिक ज्ञान पीढी-दर-पीढी स्थानान्तरित किया जाता रहा है। इसका दूसरा मौका, माघ मास की मकर संक्रान्ति के बाद का माघ व कुंभ मेले होेते हैं। इस समय भी किसान परंपरागत खेती के कार्य से लगभग मुक्त ही होता है। वह कल्पवास करने इन मेलो में आज भी जाता है। कल्प का मतलब ही होता है – परिवर्तन। कल्पवास, गुरु द्वारा शिष्य के जीवन की कायापलट कर देने वाले अवसर का ही एक नाम है।

एक जानकारी के मुताबिक कुंभ का स्वरूप पहले आज की तरह दिखावटी न था। कुंभ, सिर्फ स्नान का पर्व तो कभी नहीं रहा। शोध करने के बाद भारतवर्ष के ऋषि उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर स्थित नैमिशारण्य के पौराणिक स्थल पर एकत्रित होते थे। धर्माचार्यों के बीच अपने शोधों और संसार के लिए उपयोग पर चर्चा करते थे। चर्चा से हासिल निष्कर्ष को लेकर धर्मगुरु कुंभ में एकत्र होते थे। नित्य जीवन में उन शोधों के उपयोग को कल्पवासी शिष्यों के बीच प्रसारित करते थे। समाज के लिए नियमों को भी इसी दौरान प्रसारित किया जाता था। कल्पवासी शिष्य वापस लौटकर प्राप्त ज्ञान का अपने गांव-परिवार में उपयोग व प्रसार करते थे। बताते हैं कि कालांतर में समाज का कारीगर वर्ग भी अपने बनाये औजारों व कलात्मक रचनाओं को प्रदर्शन के लिए कुभ/माघ मेला आदि में लाने लगा। ऋषियों की वैज्ञानिक खोजों, कारीगरों की कारीगरी, कला और धर्माचार्यों द्वारा समाज के नियमन व मार्गदर्शन के मौके देने का काम इसी तरह चैमासे व मेलों में सदियों से होता रहा है। यह बात अलग है कि अब कुंभ धर्माचार्यों व प्रवचकों के लिए अपने ठाठ-बाट के दिखावे और महज् स्नान का मौका होकर हो गया है। चौमासे का उपयोग भी अपने मूल मंतव्य व मूल्यों से भटक गया है।

चौमासे से चूकने का नतीजा यह ह्यस

इस भटकाव का ही नतीजा है कि अब हम अपने पारंपरिक प्रकृति दिवसों को उनके मूल मंतव्यों के अनुकूल से तरीके से मनाने की बजाय दिखावटी तरीके से मनाने लगे हैं। हम भूल गये हैं कि प्रकृति-पर्यावरण संरक्षण के काम सभी के शुभ के लिए होते हैं। शुभ काम के लिए मुहुर्त भी शुभ ही होना चाहिए। कार्तिक में देवउठनी एकादशी और बैसाख में अक्षया तृतीया अबूझ मुहुर्त माने गये हैं। इन दो तारीखों को कोई भी शुभ कार्य बिना पंडित से पूछे भी किया जा सकता हैं। देवउठनी को देवता पुनः जागते हैं और अक्षया के नामकरण के पीछे मान्यता है कि इस दिन शुरु किए काम का कभी क्षय नहीं होता। ये हमारे पारंपरिक जल दिवस हैं, किंतु हम जल दिवस मनाते हैं, 22 मार्च को; क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी ने हमें ऐसा बताया है।

गौरतलब है कि देवउठनी एकादशी वर्षा के बाद की वह तिथि है, जब मिट्टी नर्म होती है; उसे खोदना आसान होता है। नई जल संरचनाओं के निर्माण के लिए इससे अनुकूल समय और कोई नहीं। खेत भी खाली होते हैं और खेतिहर भी। दूसरा जल दिवस है- अक्षया तृतीया! यानी बैसाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि। यह तिथि पानी के पुराने ढांचों की साफ-सफाई तथा गाद निकासी का काम की शुरुआत के लिए एकदम अनुकूल समय पर आती है। बैसाख आते-आते तालाबों में पानी कम हो जाता है। खेती का काम निपट चुका होता है। बारिश से पहले पानी भरने के बर्तनों को झाङ-पोछकर साफ रखना जरूरी होता है। हर वर्ष तालों से गाद निकालना और टूटी-फूटी पालों को दुरुस्त करना। इसके जंिरए ही हम जलसंचयन ढांचों की पूरी जलग्रहण क्षमता को बनाये रख सकते हैं। ताल की मिट्टी निकाल कर पाल पर डाल देने का यह पारंपरिक काम अब नहीं हो रहा। नतीजा ? इसी अभाव में हमारी जलसंरचनाओं का सीमांकन भी कहीं खो गया है… और इसी के साथ हमारे तालाब भी।

बैसाख-जेठ में प्याऊ-पौशाला लगाना पानी का पुण्य हैं। खासकर बैसाख में प्याऊ लगाने से अच्छा पुण्य कार्य कोई नहीं माना गया। इसे शुरु करने की शुभ तिथि भी आखातीज ही है। लेकिन अब तो पानी का शुभ भी व्यापार के लाभ से अलग हो गया है। भारत में पानी अब पुण्य कमाने का देवतत्व नहीं, बल्कि पैसा कमाने की वस्तु बन गया है। 50-60 फीसदी प्रतिवर्ष की तेजी से बढता कई हजार करोङ का बोतलबंद पानी व्यापार! शुद्धता के नाम पर महज एक छलावा मात्र!! सच यह है कि यदि हम भारतीय तिथियों को इनके पारंपरिक तथा वैज्ञानिक महत्व के साथ मनाये, तो पर्यावरण संरक्षण में हमारा योगदान खुद-ब-खुद हो जायेगा। चौमासा इनमें से एक है।

जहां तक संकल्पों का सवाल है, हर वह दिवस पर्यावरण दिवस हो सकता है, जब हम संकल्प लें कि मै हर वर्ष एक पौघा लगाउंगा भी और उसका संरक्षण भी करुंगा। उत्तराखण्ड में ‘मैती प्रथा’ है। मैती यानी मायका। लङकी जब विवाहोपरान्त ससुराल जाती है, तो मायके से एक पौधा ले जाकर ससुराल में रोप देती है। वह उसे ससुराल में मायके की याद दिलाता रहता है। यह दिन होता है, उत्तराखण्ड की वधुओं का पर्यावरण दिवस।

गौर करने की जरूरत है कि दुनिया के अमीर देशों की वैश्विक चिंता सिर्फ कागजी है। दुनिया के दूसरे देशों के प्रति उनका असल व्यवहार व संस्कार तो उनका बाजार है। दूसरे की कीमत पर आगे बढना उनका स्वभाव है। किसी के संसाधन लूटकर खुद को समृद्ध करना उनके लिए गौरव की बात है। भारतीय सभ्यता की नींव ऐसे सिद्धांतों पर नही टिकी है। भारत की संस्कृति इसकी अनुमति भी नहीं देती। ऐसे दायित्वों को याद करने का हमारा तरीका श्रमनिष्ठ रहा है। हम इन्हे पर्वों का नाम देकर क्रियान्वित करते रहे हैं।

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश – भारत के लिए ये महज् कोई भौतिक तत्व नहीं हैं। ये जीवन देने वाले देवतत्व हैं। भारत इन पंचतत्वों की पूजा करता हैं। चींटी, कुत्ता, मगरमच्छ से लेकर हाथी, शेर तक सभी को किसी न किसी रूप में पूजकर संरक्षित किया जाता है। तुलसी, नीम, धरती, नदी व हमारा संतोष.. हमारी मातायें हैं। सूर्य-हमारा पिता और मकरसक्रान्ति व छठ पूजा -हमारे सूर्यपर्व हैं। गंगा दशहरा … हमारा नदी पर्व ! बसंतपंचमी-सबसे सुन्दर ऋतु का स्वागत पर्व!! मकर सक्रांति का सामूहिक स्नान हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता विकास के अवसर हैं। लोहङी-होली पर व्यापक अग्निदहन तापमान परिवर्तन के वाहक हैं। शीतलाष्टमी-तुलसी विवाह आदि वनस्पति पूजन की तिथियां हैं, तो दैनिक हवन व यज्ञ.. वायु को शुद्ध करने के नित्य आयोजित पर्यावरण संरक्षण के अवसर।

पोंगापंथी नहीं सब परम्परायें

भारत के पानी, नदी..  पर्यावास पर आसन्न संकट के अनेक कारणों में से एक कारण यही है कि हम गुुरुओं और अपने पुरखों से प्राप्त पारंपरिक ज्ञान को पोंगा और पिछङा कहकर उस पर धूल डालने की लगातार कोशिश रहे हैं। हम ‘कंकर-कंकर में शंकर’ के विज्ञान को भूल गये हैं। भूल गये हैं कि शिवलिंग के रूप में पूजे जाने वाले पत्थरों से टकराकर ही नदी का पानी जिंदा रहता है। पत्थरों से टकराने के कारण ही प्रवाह में आॅक्सीकरण की प्रक्रिया सतत् होती रहती है। यह प्रक्रिया नदी जल की जैव आॅक्सीजन मांग ( बी ओ डी ) को कम बनाये रखने में सहायक होती हैं। इन पत्थरों के बीच ही जीवों के अंडे-बच्चे सुरक्षित रह पाते हैं। नदी की रेत एक स्पंज की भांति होती है। यह रेत ही हमारे लिए पानी का भंडार संजोकर रखती है।

हम भूल गये हैं कि नदी सिर्फ पानी नहीं होती। नदी-एक संपूर्ण और पोषक जैविक प्रणाली होती है। जीव, वनस्पति, तलछट, उसके कटाव, ढाल और सूर्य का प्रकाश मिलकर भिन्न नदियों में भिन्न गुणों का निर्माण करते हैं। इसीलिए हमने नदियों को मां कहा; इसीलिए एक ही पर्वत से निकलने के बावजूद यमुना… गंगा जैसी अक्षुण्णता नहीं है। इसीलिए पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे अनीश्वरवादी ने भी मृत्यु पश्चात् अपनी भस्म गंगा में प्रवाहित करने की कामना की।
हम कृत्यों के हिसाब से आरक्षित क्षेत्रों की मर्यादा को भी भूल गये। भूल गये कि हरिद्वार का मतलब ही है – ‘हरि क्षेत्र का प्रवेश द्वार’। सघन वनक्षेत्र होने के कारण हरिद्वार से ऋषिकेश तक का इलाका कभी ऋषियों की तपस्थली के रुप में आरक्षित था। इसके ऊपर का क्षेत्र दैव कृत्यों के लिए आरक्षित था। इसमें दानवी व मानवी गतिविधियों के लिए कोई जगह कभी नहीं थी। इसीलिए हमने इस इलाके को देवभूमि कहा – उत्तराखण्ड ! कैलाश मानसरोवर व उनके शैव क्षेत्र का दायरा हमें मालूम ही है। राजा हिमाचल और उनकी पुत्री देवी पार्वती के संदर्भों को हम जानते ही हैं। हिमाचल प्रदेश के जिला किन्नौर की आदिवासियों की बेमिसाल खूबसूरती देख यह भरोसा करना सहज है कि आज का किन्नौर ही कभी इन्द्र के दरबार में नृत्य करने वाले किन्नरों का क्षेत्र रहा होगा।

सच है! जब तक देवभूमि मे दानवी कृत्यों के लिए कोई जगह नहीं रही, तब तक देवभूमि सचमुच स्वर्ग ही थी। हम मानवों के दानवी कृत्यों के कारण ही मां गुस्साने पर मजबूर हुई। पर्वतों के रूप में रक्षक बनकर खङे शिवगणों को बारूद लगाकर नष्ट करने का परिणाम भी हमने भुगता। हमने जंगल नहीं, शिव की जटायें काटी। हमने सोचा ही नहीं कि गंगावतरण से पहले शिव ने गंगा को अपनी विशाल केशराशि में क्यों संजोया ? राजा भगीरथ के पीछे सिर्फ एक ही धारा क्यों प्रवाहित की ? दरअसल शिव की जटायें कुछ और नहीं, बल्कि पहाङों पर फैली विशाल वनराशि ही हैं। वनराशि के खुलते ही गंगा की चेतावनी सच हुई – ”भगीरथ ! मेरा प्रवाह यह धरा रोक नहीं सकेगी।” ऐसी अनेक चेतावनियों के भूलने का नतीजा है देवभूमि में वर्ष २०१३ में आई दुःखद आपदा। संस्कृति के निर्देशों को नकार कर बसी सभ्यतायें विकास की बजाय अंततः विनाश का सबब बनती हैं; यह नजारा हम सबने देखा। जब हमारी गतिविघियां ही असभ्य हों, तो सभ्यता पर संकट आया भी तो क्या आश्चर्य !

चातुर्मास का करें उपयोग

सोचिए! हम कैसे संस्कारवान हैं ? हम अपनी पीढियों को कैसी पूंजी देकर जायेंगे ? सचमुच यह बहुत दुःखद होगा ! यदि हम चाहते हैं कि ऐसा न हो, तो हम कुछ ऐसे संकल्प लें, ताकि भारत की भारतीयता भी कायम रहे और इस बहाने हमारे जीवन मूल्य तथा जीवंतता भी। ऐसे संकल्पों के लिए चौमासे में गुरु चरणों के सानिघ्य से अच्छा अवसर कोई और नहीं हो सकता। आइये, इस चौमासे  में यह कर दिखायें।
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फोटो साभार : hindimilapcom, jaingyan.com