लेखक : परितोष त्यागी (पूर्व अध्यक्ष, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ) 
वर्ष 1986 से गंगा जी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए गंगा एक्शन प्लान नाम की योजना पर काम हो रहा था. अब नमामि गंगे नामक कार्यक्रम में 200 से अधिक प्रोजेक्ट पर काम किया जायगा. गंगा एक्शन प्लान की असफलता सर्व विदित है.
नमामि गंगे के लिए प्रस्तावित धनराशि में बहुत वृद्धि की गयी है, नदी विकास और गंगा पुनर्जीवन के उद्देश्य पूरे करने के लिए नये प्रोजेक्ट सोचे जा रहे हैं और गंगा जी को प्रथम राष्ट्रीय जल मार्ग के रूप में उपयोग करने पर तेजी से काम हो रहा है. जो नहीं बदला, वह है नदी से सम्बंधित कानून.

वर्तमान कानून के रहते नमामि गंगे कार्यक्रम की सफलता की संभावना क्या है इस पर विचार करने पर यह बातें सामने आती हैं :

1. वर्तमान कानून जल प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण से सम्बंधित हैं. इनमें यह प्रावधान तो है कि नदी में गन्दा पानी या कचरा न डाला जाये, पर ऐसा प्रावधान नहीं है कि जो नदी के बहाव को बनाए रखे, नदी के क्षेत्र में अतिक्रमण को रोके और नदी पर निर्भर जीव जन्तुओं और समाज का संरक्षण करे.

2. गंगा जी व अन्य नदियों में जल प्रदूषण के मुख्य स्रोत शहरों, कारखानों और खेतों से आने वाला अपजल (गन्दा पानी) है. नगरपालिका और किसानों पर कोई वश नहीं चलता. सिर्फ कारखानों को डराया-धमकाया जा सकता है और न मानें तो उन पर मुकदमा चलाया जाताहै. इस तरह नदी के प्रदूषण का केवल एक अंश ही नियंत्रित हो सकता है.

3. क्या हो सकता है और क्या हो पाता है ; यह भी विचारणीय है. 
पहले तो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में कर्मचारियों की संख्या कार्यभार को देखते हुए कम होती है. दूसरे, भृष्टाचार जिस तरह समाज में व्याप्त है, उसके कारण अनेक दोषी दण्ड नहीं पाते. तीसरे, जो मुकदमे दायर किये जाते हैं उन पर फैसला होने में बहुत समय लगता है और फैसला यदि आरोपी के विरुद्ध हो तो अपील कर दी जाती है जिसमें और समय लगता है. कुछ दोषी तो समझते हैं कि प्रदूषण दूर करने के बजाय मुकदमा लड़ने में कम खर्च होता है. इस तरह कारखानों से हो रहा प्रदूषण भी काफी कम मात्रा में नियंत्रित हो पाता है.

4. जहां प्रदूषण निवारण के संयंत्र लगा लिए गए हैं वहाँ देखने में आया है कि जब अवसर मिलता है,तो उन संयंत्रों को चलाते नहीं ताकि बिजली और रखरखाव पर होने वाला खर्च कम हो. ऐसा गलत व्यवहार और तो और कुछेक नगरपालिका को भी करते पाया गया है.

गंगा जी की रक्षा करनी है तो नए कदम उठाने होंगे जिनमे कानून और उसे लागू करने के लिए जिम्मेदार संस्था में बड़े परिवर्तन करने होंगे. मंत्रालय बदलना पर्याप्त नहीं है.

अब तक यह सिद्धान्त अपनाया गया है कि प्रदूषित जल का उपचार करके उसे नदी में छोड़ दिया जाय. ऊपर यह वर्णन किया है कि यह व्यवस्था अधूरी रह जाती है. नदी को पूरी तरह बचाना है तो कानून की वर्तमान कमियों को दूर करना होगा और साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि अपजल (गन्दा पानी) नदी तक न पहुंचे, न बिना उपचार किया हुआ और न तथाकथित उपचार किया हुआ. नदी तक पहुंचे केवल वर्षा का पानी और भूमिगत पानी.

अपजल नदी में न जाये, तो कहाँ जाये ?

अपजल जाय टॉयलेट में फ्लश करने के लिए, पार्क और लॉन को पानी देने के लिए, बड़े एयर कंडीशनरों के कम्प्रेशर को ठण्डा रखने के लिए और अगर पास में खेती हो रही हो तो सिंचाई के लिए. ऐसा करने से तीन लाभ होंगे. पहला नदी साफ रहेगी, दूसरा ताजे पानी की खपत घटेगी और तीसरे अपजल के उपयोग का आर्थिक लाभ होगा.

जैसे वन और वन्य जीवों के संरक्षण के लिए कानून हैं वैसा नदी के लिए नहीं है; होना चाहिए. 

इसी तरह गंगा जी के लिए जो श्रद्धा और आदर की भावना देशवासियों में है, उसे देखते हुए गंगा जी से सम्बंधित कानून उसी तरह गंगा जी अपमानित न होने दे, जैसा राष्ट्रीय झंडे के सम्मान के लिए है. इससे भी आगे जाने की जरुरत है क्योंकि अधिकांश जनसंख्या गंगा जी को गंगा मैया संबोधित करती है. किसी पूज्य नारी से दुर्व्यवहार जिस तरह दण्डनीय है उसी तरह गंगा जी से दुर्व्यवहार करने वाले को कठोर दण्ड मिलना चाहिए.

जिन्हें यह सुझाव अटपटा लगे उन्हें शायद मालूम नहीं कि न्यूजीलैंड देश में एक नदी की सुरक्षा के लिये कुछ ही वर्ष पहले एक कानून बनाया गया है, जिसमें नदी को महिला मान कर प्रावधान किये गए हैं. गंगा जी को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया है, जो किसी तरह भी गंगा जी की रक्षा के लिए काफी नहीं है. देश के राष्ट्रीय कैलेण्डर के लिए शक संवत घोषित है पर क्या वह अपनाया गया या न अपनाने पर क्या कोई कार्रवाई की जाती है? गंगा जी को ऐसी श्रेणी में रखना बिलकुल ठीक नहीं.

कानून में बदलाव के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि कानून को लागू करने की विधि ऐसी हो कि दोषी को तुरंत नहीं तो जितना जल्दी हो सके, दण्ड मिलना चाहिए. वर्तमान व्यवस्था, जिसमें वर्षों बाद तक फैसला नहीं होता; बदलनी ही होगी.

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