लेखक: अरुण तिवारी
मैने उनका बैंक बैलेंस नहीं देखा। न मैने उनकी बहस सुनी है और न अदालती मामलों में जीत-हार की सूची देखी है। मैंने सिर्फ उनकी सादगी और पर्यावरण के प्रति समर्पण देखा है। मैने उन्हे कई सभाओं में आकर अक्सर पीछे की कुर्सियों में बैठते हुए देखा है। पेंट से बाहर लटकती सादी कमीज़, हल्की सफेद दाढ़ी, चेहरे पर शांति, बिन बिजली बैठकर बात करने में न कोई इंकार और न चेहरे पर खीझ। यूं वह मितभाषी हैं, लेकिन पर्यावरण पर बात कीजिए, तो उनके पास शब्द ही शब्द हैं; चिंतायें हैं; समाधान हैं। 69 की उम्र में भी पर्यावरण को बचाने के लिए कुछ कर गुजरने की बेचैनी है और जीत का भरोसा है। वह प्रतीक हैं कि कोई एक व्यक्ति भी चाहे, तो अपने आस-पास की दुनिया में बेहतरी पैदा कर सकता है।

वह कश्मीर के खुदा और भगवान में फर्क करना नहीं जानते। वह बस इतना जानते हैं कि पूरे भारत के पर्यावरण को उस कश्मीर जैसा महफूज करने के काम में ही भारत की भलाई है, जिसके बारे में कहा जाता था ”गर फिरदौस बर रूये ज़मीं अस्त, हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त” अर्थात ”यदि धरती पर यदि कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है।” 

उनकी इसी सादगी, समझ, क्षमता, बेचैनी और जीत के भरोसे ने मुझे उनके बारे में लिखने को प्रेरित किया। उनका नाम है – श्री एम. सी. मेहता।

वकालत इनका पेशा, पर्यावरण इनका जुनून

श्री मेहता ‘जीवन के अधिकार’ में ‘सेहतमंद पर्यावरण के अधिकार’ को आवश्यक रूप से शामिल कराने की मुहिम के अगुवा हैं। वह एक ऐसे वकील हैं, जिनकी उंगली पकङकर आज़ाद भारत की न्यायपालिका ने पर्यावरणीय न्याय को संजीदगी से सोचना, समझना और स्वीकारना शुरु किया। आज़ाद भारत के पर्यावरणीय न्याय के इतिहास में दर्ज सबसे अह्म फैसलों के वाहक वही हैं। पर्यावरण के प्रति समर्पण की दृष्टि से भारत में आज उनकी हैसियत का कोई दूसरा वकील नहीं है। मुकदमों की तैयारी के लिए उनके द्वारा किए जाने वाले होम वर्क और उनके पर्यावरण के प्रति समर्पण को लेकर पूर्व अटार्नी जनरल सोली सोराबी से लेकर कपिल सिब्बल जैसे नामी विपक्षी वकीलों ने भी उनकी तारीफ की है। स्वति गेते उन्हे ‘वन मैन एन्वायरो लीगल ब्रिगेड’ की तरह देखती हैं। बकौल मेनका गांधी, एम. सी. मेहता की सबसे बङी जीत यही है कि पर्यावरण को लेकर लोगों का न्यायपालिका पर विश्वास बढ़ा है। इससे पहले लोग ऐसे मामलों को लेकर अदालतों में नहीं जाते थे। 

स्कूल और रास्ते ने डाली नींव 

उनकी पत्नी इसका श्रेय श्री मेहता की लगन को देती हैं, तो बकौल मेहता पर्यावरण पर अदालती मामले से उनके जुङाव की औपचारिक शुरुआत एक संयोगवश जरूर हुई, पर पर्यावरण के प्रति जीने-मरने का संकल्प कश्मीर के उस गांव ’धांगरी’ की देन है, 12 अक्तूबर, 1946 में जहां वह पैदा हुए। एक कमरे में चलने वाली प्राथमिक पाठशाला; कभी पेङ के नीचे, तो कभी खुली धूप में और कभी पांचों कक्षा एक कमरे में। आगे की पढ़ाई ज़िला राजौरी में हुई। आना-जाना मिलाकर करीब 14-15 किलोमीटर का पैदल रास्ता और रास्ते में दो नदियों से हर रोज की दोस्ती। श्री मेहता आज तक वही दोस्ती निभा रहे हैं। 69 वर्ष की उम्र में भी एक जवान की तरह सक्रिय हैं। नदी, पानी, समंदर, जंगल, हवा और ज़मीन को न्याय दिलाने के लिए वह आज भी रात में जागते हैं और दिनभर खटते हैं।

श्री मेहता के इस संकल्प के लिए उन्हे 1993 में यूएस ग्लोबल 500 अवार्ड, 1996 में वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार माना जाने वाला यूरोप और अमेरिका का गोल्डमैन एन्वायरमेन्टल प्राइज़, 1997 में मैगासायसाय सम्मान और अब वर्ष 2016 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से नवाजा गया। अब वह पद्मश्री श्री महेश चंद मेहता हैं। 

सक्रिय युवा, सच्चे पत्रकार, स्वतंत्र उम्मीदवार

श्री मेहता, जम्मू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर और कानून स्नातक हैं। अपने जम्मू प्रवास के दौरान वह सामाजिक-राजनैतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। ‘द यूथ एक्शन कमेटी’ के अध्यक्ष रहते हुए वह भेदभाव व भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ बुलंद करते रहे। एक अखबार भी निकाला – ‘प्रीसेजर’। इसमें भी सच्ची और न्याय की खबरों को बिना डरे स्थान दिया। स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर संसद का चुनाव भी लङे, किंतु वकालत के पेशे ने उनका रास्ता दिल्ली की तरफ मोङ दिया। 1983 में वह सुप्रीम कोर्ट के वकील हो गये।

पर्यावरण का पहला मामला, एक संयोग

वह याद करते हैं  – ”पीलू मोदी (वास्तुकार, स्वतंत्र पार्टी के संस्थापक तथा चौथी -पांचवीं लोकसभा तथा 1978 से मृत्यु तक राज्यसभा के सदस्य) मेरी शादी में देहरादून आये थे। 29 जनवरी, 1983 को उनकी मृत्यु हुई थी। मैं उनकी अंतिम विदाई में शामिल हुआ था। वहां एक सज्जन मिले, जो वकीलों को लेकर बहुत निराश थे। कह रहे थे कि वकीलों को तो सिर्फ पैसा चाहिए। कोई नैतिकता ही नहीं बची। मैने उनसे पूछा कि उनका मामला क्या है ? उन्होने ताजमहल को प्रदूषित करते ईंट भट्टे, कांच उद्योग, आॅयल रिफाइनरी तथा यातायात का मसला मेरे सामने रख दिया। हालांकि तब तक मैने ताजमहल को देखा तक नहीं था; फिर भी मैने इसे एक चुनौती समझा और केस अपने हाथ में लेना स्वीकार किया।”

तथ्य गवाह हैं कि 1984 में दायर ताजमहल जनहित याचिका एक ट्रनिंग प्वाइंट बनी; स्वयं श्री मेहता के लिए भी और भारतीय अदालतों के इतिहास में पर्यावरण-प्रदूषण की दिशा में सजगता व शिक्षण की दिशा में भी। तब तक श्री मेहता कोई प्रसिद्ध वकील नहीं थे। अदालत याचिका को स्वीकार करे, इसके लिए उन्हे लंबी तैयारी करनी पङी। ताजमहल मामले के कारण जिन उद्योगों के कर्मचारियों का रोज़गार खतरे में पङ सकता था, वे ताजमहल र्की ईंट-ईंट उखाङकर ले जाने की धमकी दे रहे थे। श्री मेहता को भी दफ़न कर देने की धमकी मिली। किंतु श्री मेहता डटे रहे और अंततः विजय पाई। सुप्रीम कोर्ट ने उद्योग और यातायात को नामी धरोहर ताजमहल से दूर ले जाने का आदेश दिया। 

इस मामले की पूरे भारत में चर्चा हुई। श्री मेहता भी चर्चित हो गये। इसके बाद तो पर्यावरण मामलों से श्री मेहता की जैसे सगाई ही हो गई। पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में मुकदमा लङने में बहुत अधिक फीस नहीं मिलती। फीस से ज्यादा धमकिया मिलती हैं और उससे भी ज्यादा लालच। श्री मेहता, इन सभी का पूरी ईमानदारी व नैतिकता से सामना करते हुए गत् 32 वर्षों से बिना रुके, बिना झुके पर्यावरण के मुकदमे लङ रहे हैं।

बेहतरी के मामले 

दिल्ली गैस लीक मामला (1985), दिल्ली से 9000 उद्योगों का स्थानान्तरण मामला (1985), वाहन प्रदूषण मामला (1985), कमलनाथ स्पैम मोटल मामला (1986), पर्यावरण जागृति व शिक्षा मामला, तटीय क्षेत्र मामला (1993), उङीसा-आंध्र प्रदेश-तमिलनाडु तटीय इलाकों पर व्यापारिक खेती के खिलाफ एक्वा एग्रीकल्चर केस (1994), समुद्री तटों पर निर्माण व औद्योगिक गतिविधियों के खिलाफ अलमित्रा पटेल मामले से लेकर गंगा प्रदूषण मामले तक अनेक चर्चित मामले श्री मेहता के ही नाम दर्ज हैं। श्री मेहता श्रेय की चिंता व चर्चा नहीं करते, लेकिन सच यही है कि इन मामलों ने पर्यावरण के मामले में भारत में कई महत्वपूर्ण नीतियों / निर्देशों को आगे बढ़ाने की राह प्रशस्त की।

बेहतरी के निर्देश

सरकार, प्राकृतिक संसाधनों की मालिकिन नहीं, बल्कि सिर्फ एक ट्रस्टी है। यदि ट्रस्टी सौंपी गई संपत्ति की ठीक से देखभाल न करे ,तो उसे ट्रस्टीशिप से बेदखल कर देना चाहिए। ‘पब्लिक ट्रस्टीशिप’ के इस सिद्धांत को स्वयं सुप्रीम कोर्ट द्धारा आगे बढ़ाने का मौका श्री मेहता द्वारा तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ से संबद्ध स्पैम मोटल केस में सामने आया। इस मामले में ब्यास नदी को मोङकर स्पैम मोटल का निर्माण करने का आरोप था। 

आज सिनेमा हाॅल में पर्यावरण की स्लाइड शो के मुफ्त प्रदर्शन का निर्देश है। ऐसा न करने वाले सिनेमा हाॅल का लाइसेंस रद्द करने का निर्देश है। आकाशवाणी व दूरदर्शन के प्रत्येक केन्द्र के लिए अनिवार्य है कि वे पर्यावरण के संबंध में प्रतिदिन पांच से सात मिनट जानकारी प्रसारित करें। स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा अनिवार्य है। स्नातक कोर्स चाहे प्रोफेसल हो, तकनीकी अथवा सामान्य; तीन वर्ष में एक बार इसे एक अलग विषय के रूप में पढ़ना व पास करना अनिवार्य है। ये सभी निर्देश पर्यावरण जागृति व शिक्षा मामले की देन हैं। यदि आज नदियों में अशोधित जल / अवजल फेंकने पर प्रतिबंध है; यदि भारत में ठोस कचरा प्रबंधन को लेकर कोई निर्देश हैं अथवा भारतीय धरोहरों को लेकर थोङी सतर्कता है; तो इसका श्रेय श्री मेहता की पैरवी को जाता है। दिल्ली के आॅटो रिक्शा पहले गैसोलीन के साथ-साथ डीजल का इस्तेमाल कर धङल्ले से धुंआ उङाते घूमते थे। श्री मेहता ने ही उन 70 हजार आॅटो रिक्शा मालिकों को पर्यावरण का आईना दिखाया। श्री मेहता के अनुरोध पर ही अदालत ने दिल्ली के सभी आॅटो रिक्शा को सीएनजी गैस से चलने का आदेश दिया और आज दिल्ली के आॅटो धुआंमुक्त हैं।

अदालत के बाहर ग्रीन मार्च

पर्यावरण सचेतक के रूप में श्री मेहता का एक कर्मक्षेत्र, अदालत से बाहर भी है। देशभर में ‘ग्रीन मार्च’ कर पर्यावरण के ज़मीनी काम करने वालों को हौसला देने का काम करते श्री मेहता; अपने देहरादून स्थित आश्रम में नौजवान वकीलों को आमंत्रित कर पर्यावरण कानूनों की समझ व संजीदगी पैदा करते श्री मेहता; सभी की समझ व अनुभवों को समृद्ध करने के लिए किताब लिखते श्री मेहता। अपने 12 खास मुकदमों की स्मृतियों पर आधारित उनकी पुस्तक का नाम है – ‘इन द पब्लिक इन्टरेस्ट’। ‘एम.सी.मेहता एन्वायरन्मेंटल फाउडेण्शन’ और ‘इंडियन काउंसिल फाॅर एन्वायरो-लीगल एक्शन’ के जरिए वह पर्यावरण सचेतकों की एक बङी दुनिया संवारने में लगे है। श्री मेहता कहते हैं कि हमें आगे आने वाली पीढ़ी के लिए पर्यावरण बचाना है। वह पीढ़ी में अपनी बेटी को देखते हैं। आखिर क्यूं न देखें, पर्यावरण बचाना, बेटी बचाने से कम महत्वपूर्ण नहीं।

पर्यावरण के लिए भारतीय भाषाओं के हिमायती 

पर्यावरण के प्रति जागृति में भाषा के योगदान के बारे में कहना वह नहीं भूलते। वह मानते हैं कि यदि पर्यावरणीय कानूनों व पहलुओं की जानकारी ज्यादा से ज्यादा हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं के माध्यम से पहुंचाने की कोशिश बढ़नी चाहिए। हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में अंग्रेजी के दबदबे के नुकसान की ओर भी श्री मेहता ने इशारा किया।

हम होंगे कामयाब

श्री मेहता जानते हैं कि पर्यावरण की समृद्धि गई, तो भारत की आर्थिक, सामाजिक व सेहत संबंधी समृद्धि भी बच नहीं पायेगी। अतः अपने 32 वर्षीय अदालती संघर्षों के बावजूद श्री मेहता बेचैन है कि आने वाले कल में भारत का क्या होगा ? जबाव में मैने पूछा – ”अब आप एक नामी शख्सियत हैं। एक बार इलेक्शन भी लङ चुके हैं। रोज-रोज अदालती लङाई लङने की बजाय, स्वयं उस सदन में जाने के बारे में अब क्यों नहीं सोचते, जो पूरे देश के पर्यावरण के लिए कानून व नीतियां बनाता है ?”  बोले – ”वह पुरानी बात हो गई। तब माहौल और था, अब और। जब मौका मिलता है, विधायकों-सांसदों से भारतीय पर्यावरण की चिंता साझा अवश्य करता हूं। स्थाई रास्ता जनता ही निकालेगी। इसलिए मैं इतना जानता हूं कि लोगों को अपनी बात, अपना दर्द कहना जरूर चाहिए।”
 मैने पाठकों के लिए संदेश पूछा तो श्री मेहता ने एक पंक्ति कहकर मेरा विश्वास बढ़ा दिया; बोले – ”हम होंगे कामयाब एक दिन…’

फोटो साभार –  M C Mehta Environmental Foundation – Facebook Page