समीक्षक : अरुण तिवारी 
जनाब लोरेन आइसली का एक बयान है – ”यदि धरती पर कोई जादू है, तो वह पानी में है।”
इस बयान की पुष्टि करते कारनामे भी आज कई हैं और फिल्में भी कई।  ऐसी फिल्मों की श्रृंखला को आगे बढ़ाती एक फिल्म देखने का मौका मुझे मिला।
फिल्म का नाम है – रिसर्जेन्स यानी पुनरोत्थान।
फिल्म – ‘रिसर्जेन्स’, पूर्वी राजस्थान के ज़िला करौली के गांव भूड़खेडा, गांव मंडौरा और फैदल का पुरा में हुए एक सफल पानी प्रयास पर केन्द्रित है।
दिल्ली स्थित युवा आर्ट्स के बैनर तले बनी यह फिल्म,
युवा निर्माता-निदेशक श्री अंकित शर्मा की कल्पनाशीलता और तथ्यपरक समझ का एक सरल-निर्मल प्रतिबिम्ब है। 
 
‘रिसर्जेन्स का भूगोल
 
कथानक है कि यशोदा की कोख में जन्मी जिस कन्या को कंस ने मारने का प्रयास किया, वह कंस के हाथ से छूटकर जिस स्थान पर आई, वही आज ज़िला करौली है। उस कन्या के नाम पर आज यहां कैलादेवी का प्रसिद्ध मंदिर है। कभी यहां चंबल का पानी पीकर बडे़ हुए बागियों की दहाडें थी। उन दहाड़ों के कारण ही तथाकथित विकास के लिए भूमि कब्जाने वाले करौली में कम ही पहुंचे। लिहाजा, यह इलाका लंबे अरसे तक आधुनिक विकास के संत्रास से बचा रहा।
फिल्म, ज़िला करौली को ‘एक अल्प विकसित ज़िला’ कहती है; मैं इस तथाकथित ‘अल्प विकास’ को ही करौली की प्राकृतिक वैभव संरक्षण की दिशा में राहत की सबसे बड़ी बात मानता हूं।
 
‘रिसर्जेन्स’ की कथावस्तु
 
फिल्म की कथावस्तु 60 परिवारों के जिस गांव – गढ़ मंडौरा से शुरु होती है, वहां कभी पानी का संकट था। कुएं-बोरवैल सब फेल हो रहे थे। निवासी भैरोंसिंह समेत सभी ग्रामीणों की पेशानी पर चिंता के निशान दिखाई देने लगे थे। नजदीक गांव महाराजपुरा में तरुण भारत संघ नामक संस्था के सहयोग से हुए काम ने बंजर भूमि में आशा और जीवन की किरणों का संचार किया था। इस संचार से प्रभावित गांववासियों ने भी अपना हौसला बांधा। खर्च का एक-तिहाई जोड़ा। हर स्तर पर हिस्सेदारी की। जादू यह हुआ कि अगले मानसून में जो भी बूंदे बरसी, वे व्यर्थ नहीं गई। हनुमानसागर (150 लाख लीटर), पीपरवाड़ी पोखर (140 लाख लीटर), काचरेवाला ताल (2900 लाख लीटर) और संदन वाला ताल (700 लाख लीटर) ने मिलकर एक ही बारिश में 3790 लाख लीटर की विशाल जलराशि संजो ली। इस संजोई जलराशि के कारण धरती का पेट भरा, तो बंजर धरती भी तीन गांवों गांव का पेट भरने लायक हो गई।
बकौल तरुण भारत संघ अध्यक्ष श्री राजेन्द्र सिंह, जो हाथ कभी दूसरों की मज़दूरी करते थे, वे दूसरों को मज़दूरी देने लायक हो गये।
यह पानी का जादू नहीं तो और क्या है ?
 
‘रिसर्जेन्स’ का आलेख व फिल्मांकन
 
फिल्म में तरुण भारत संघ के निदेशक – श्री मौलिक सिसोदिया का एक बयान बताता है कि यह काम सिर्फ पानी का काम नहीं है; यह पानी के काम को प्रवेश बिंदु बनाकर किया गया जलस्वराज और ग्रामस्वावलंबन का काम है।
हकीकत यही है कि तरुण भारत संघ, पिछले तीन दशक में खासकर अलवर के इलाके में इसी दृष्टि के साथ काम करता रहा है। अलवर के कई गांव इस दृष्टि के पुख्ता प्रमाण हैं। भांवता -कोल्याला समेत अनेक गांव अब न अपने जंगल के लिए सरकार की ओर ताकते हैं और न खेती, मवेशी, बुनियादी पढ़ाई, दवाई और रोज़गार के लिए। किंतु यह फिल्म इस दृष्टि को स्थापित करने में थोड़ी चूक गई है; फिर भी यह कहना होगा कि कर्णप्रिय संगीत, तथ्यपरक बयानों और बदलाव स्थापित करते दृश्यों के जरिए फिल्म यह स्थापित करने में सफल रही है कि पानी के जरिए जादू संभव है। यदि इस जादू को करने की तैयारी हो, तो जलवायु परिवर्तन के इस दौर में भी गरीब-गुरबा समुदायों के अस्तित्व का संरक्षण संभव है। 
 
‘रिसर्जेन्स’ के सवाल व प्रेरणा
 श्री मौलिक सिसोदिया ने अपने एक बयान में कुछ बुनियादी सवाल उठाये हैं, जो सूखे को लेकर कोहराम और आत्महत्या वाले इलाक़ों के नीति नियंताओं से हर-हाल में पूछे जाने चाहिए –
”धरती मां को प्यासा किया किसने ?”
”धरती मां की प्यास बुझाये कौन ??”
”क्या इतनी बारिश नहीं होती कि धरती मां की प्यास बुझ सके ??’’
जाहिर है कि जवाब एक ही है कि बारिश होती है, लेकिन उसके पानी को हम व्यर्थ जाने देते हैं। इंजीनियरिंग की ताजा पढ़ाई ने अधिकतम जल निकासी सिखाई; अब हम पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक को जोड़कर अधिकतम जलपुनर्भरण सीखें। 
बकौल श्री गोपाल सिंह, करौली की प्रेरणा यही है और फिल्म की भी।
 
‘रिसर्जेन्स’ का शेष परिचय
 
फिल्म को भारतीय जीवन बीमा निगम हाउसिंग फाइनेन्स लिमिटेड, द फ्लो पाटर्नरशिप, विवेकानंद इंन्सटीट्युट आॅफ प्रोफेशनल स्टडीज तथा तरुण भारत संघ, जलबिरादरी, जल-जन जोड़ो अभियान और जलबिरादरी का सहयोग प्राप्त है। निर्माता-निदेशक श्री अंकित शर्मा के अनुसार, फिल्म – ‘रिसर्जेन्स’ को अभी कई पुरस्कारदाता कमेटियों के पास भेजा गया है। उनकी शर्तों के अनुसार, उनका निर्णय आने तक सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। अतः फिल्म देखने के लिए हमें अभी प्रतीक्षा करनी होगी।
मेरी नजर में ‘रिसर्जेन्स’ एक प्रेरक फिल्म है।
फिल्म की अवधि: 29 मिनट और आलेख की भाषा: अंग्रेजी है। अंग्रेजी दर्शकों की सुविधा की दृष्टि से हिंदी संवादों पर अंग्रेजी ग्राफिक्स दिए गये हैं। जाहिर है कि यह फिल्म, अंग्रेजी दर्शकों के लिहाज से बनाई गई है। हिंदी दर्शकों की सुविधा के लिए अंग्रेजी आलेख पर हिंदी ग्राफिक्स भले ही नहीं दिए गये हों, लेकिन फिल्म जिस प्रवाह में बहती है, वह किसी भी भाषा-भाषी के लिए  फिल्म में दर्शाये बदलाव को समझना मुमकिन बनाती है।
जब मौका आये तो खासकर, ग्रामीण जल प्रबंधन पर काम कर रहे लोगों और पंचायत प्रतिनिधियों को यह फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए।
फिलहाल आप resugencethefilm.com पर फिल्म की एक झलक देख सकते हैं।
 फोटो/वीडियो  साभार : resurgencethefilm.com