कितने सहायक बजट और मनरेगा ?

लेखक : अरुण तिवारी 

केन्द्रीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने ग्रामीण क्षेत्र का उल्लेख ’गांधी के दिल को प्रिय क्षेत्र’ के रूप में किया। अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री ने यह प्रतिबिम्बित करने की भी पूरी कोशिश की कि ’गांधी के दिल को प्रिय क्षेत्र’ इस बजट की प्राथमिकताओं में भी सबसे प्राथमिक है। उन्होने गांव और कृषि क्षेत्र को अपनी सरकार की नजर में ऐसा क्षेत्र बताया, जिससे समझौता नहीं किया जा सकता। श्री जेटली ने कहा -”महात्मा गांधी की 150वीं जयंती तक एक करोड़ परिवारों को गरीबी से बाहर निकालने तथा 50 हजार ग्राम पंचायतों को गरीबीमुक्त बनाने के लिए हम जवाबदेही, परिणाम और अभिसरण पर पूरा ध्यान केन्द्रित करते हुए मिशन अंतोदय शुरु करेंगे।” गौरतलब है कि न तो गरीबी मुक्ति की यह घोषणा नई है और न ही मिशन अंतोदय; नया है तो गरीबी मुक्ति लक्ष्य का संख्याबद्ध और समयबद्ध होना। भारत में कुल दो लाख, 38 हजार, 617 ग्राम पंचायतें हैं। इस नाते उक्त घोषणा को हम पंचायती गांवों की गरीबी मुक्ति हेतु वित्त वर्ष 2017-18 के केन्द्रीय बजट की आधारभूत और चरणबद्ध घोषणा भी कह सकते हैं।

वित्तीय घोषणाओं में कितना दम ?

मनरेगा के लिए 48 हजार करोड़, प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना हेतु 23 हजार करोड़, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में राज्यों की हिस्सेदारी मिलाकर 27 हजार करोड़, दीनदयाल उपाध्याय ग्रामज्योति योजना हेतु 4,814 करोड़, अनुसूचति जाति कल्याण हेतु 52,393 करोड़, अनुसूचित जनजाति कल्याण हेतु 31,920 करोड़, ग्राम महिला शक्ति केन्द्र हेतु 500 करोड़, कृषि क्षेत्र को 51,026 करोड़, नाबार्ड का 40 हजार करोड़ का दीर्घकालिक सिंचाई संग्रह कोष; फसल बीमा योजना हेतु 9000 करोड़ और दीनदयाल उपाध्याय योजना (राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन) बजट में 4500 करोड़ की वृद्धि – ग्रामीण क्षेत्र संबंधी सभी वित्तीय घोषणायें गांवों की गरीबी मुक्ति की आधारभूत घोषणा को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पुष्ट करने का आर्थिक आश्वासन हैं। बकौल वित्तमंत्री गांव, कृषि और संबंधित क्षेत्रों के मद में दिया गया कुल मिलाकर बजट 1,87,223 करोड़ रुपये बैठता है। वित्त मंत्री ने इस बजट प्रावधान को पिछले वित्त वर्ष की तुलना मंे 24 प्रतिशत अधिक बताया। अर्थशास्त्री इस दावे को गलत बता रहे हैं। अर्थशास्त्री पूछ रहे हैं कि 2017-18 बजट में कृषि क्षेत्र को कुल 51,026 करोड रुपये का आवंटन हुआ, तो किसानों को कर्ज का लक्ष्य 10 लाख करोड रुपये कैसे हो गया ? उनका सवाल है कि खेती से संबद्ध प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और जलवायु परिवर्तन मद में बजट क्यों घटा दिया ? फसल बीमा विज्ञापन मद में खर्च किए गये 1200 करोड़ रुपये को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं। अर्थशास्त्री यह भी सवाल कर रहे हैं कि भारत की 72.2 फीसदी से अधिक आबादी की आजीविका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अभी भी गांव और खेती पर ही निर्भर है, लेकिन 21.47 लाख करोड़ रुपये के कुल बजट में हमारे गांवों का हिस्सा मात्र 0.8720 प्रतिशत क्यों है ?

क्या सिर्फ बजट ही है काफी ?

मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूं। मैं एक गंवई पत्रकार हूं। बजट विश्लेषण के मेरे आधार भिन्न हैं। मेरा मानना है कि यदि बजट घोषणाओं से ही आर्थिक गरीबी दूर हो सकती, तो गांवों के हिस्से की बजट राशि को सीधे-सीधे लक्ष्य एक करोड़ ग्रामीण परिवारों के खाते में पहुंचा देने से ही उनकी गरीबी-मुक्ति हो जाती। मेरा आकलन है कि बजट का ज्यादातर पैसा तो योजनाओं को चलाने वालों की तनख्वाहों, सुविधाओं, दफ्तरों के रख-रखाव और विज्ञापनों में ही खर्च हो जाता है; लक्ष्य लाभार्थी तक तो अंशमात्र ही पहुंचता है; इस चित्र को उलट देना चाहिए। अब तक का चित्र यह है कि गरीबी मुक्ति की सरकारी योजनायें और घोषणायें गांव से ज्यादा, पंचायत प्रतिनिधियों को धनी बनाने वाली साबित हुई हैं। 50 हजार पंचायतों को गरीबी मुक्त बनाने की घोषणा, 50 हजार पंचायती गांवों की गरीबी मुक्ति की घोषणा साबित हो; इसके लिए वित्तीय प्रावधानों से ज्यादा, उन प्रावधानों का विश्लेषण जरूरी है, जो कि गरीबी मुक्ति के सपने को सच करने के लिए जरूरी हैं।

कैसे हो गरीबी मुक्ति ?

आर्थिक गरीबी से मुक्ति के आधार सूत्र दो ही हैं : अधिक से अधिक कमाई और अधिक से अधिक बचत। अधिक से अधिक कमाई के लिए हमारे गांवों को पांच व्यवस्थायें चाहिए : कृषि योग्य भूमि का मालिकाना, मौजूद हुनर के हिसाब से अधिकतम काम, काम के हिसाब से अधिकतम मजदूरी तथा गांव में पैदा अथवा निर्मित सामान का अधिकतम संभव दाम। आंकड़ा, उत्पादन पश्चात् खासकर सब्जी व बागवानी उत्पादों के 40 प्रतिशत तक नष्ट हो जाने का है। अतः कृषि उत्पाद को रोककर रखने की किसान की क्षमता बढ़ाने संबंधी व्यवस्था की जरूरत पांचवी है। उपलब्ध काम के हिसाब से हुनर सिखाने को आप अतिरिक्त प्राथमिकता पर रख सकते हैं। गांवों में खर्च के मुख्य मदों को देखें, तो अधिक से अधिक बचत के लिए 10 व्यवस्थायें चाहिए: सस्ती दवाई, सस्ती पढ़ाई, सस्ती सिंचाई, सस्ता ईंधन, सस्ते कृषि उपकरण, सस्ती खाद, टिकाऊ बीज, नशामुक्ति, खर्चीली शादी से मुक्ति और थाना-कचहरी से मुक्ति। क्या केन्द्रीय बजट 2017-18 में इनका प्रावधान है ? आइये, जांच करें।

बचत का जरिया

”एक करोड़ गरीब ग्रामीण परिवारों को वर्ष 2019 तक पक्का मकान बनाने का लक्ष्य, मार्च, 2018 तक डेढ़ लाख पंचायतों में तेज स्पीड वाली ब्राॅडबैंड सेवा की उपलब्धता, ब्राॅडबैंड सेवा का उपयोग कर टेलीमेडिसन के जरिये स्वास्थ्य संबंधी मसलों पर गांववासियों की मदद तथा पांच लाख और नये तालाब बनाकर ग्राम पंचायतों को सूखामुक्त बनाने का लक्ष्य’ – बजट भाषण में उल्लिखित ये लक्ष्य लाभार्थियों के क्रमशः आवास, दवाई और सिंचाई खर्च को कम करेंगे। अतः ये बचत कराने वाले कदम हैं। गांवों की बचत सुनिश्चित कराने वाले अन्य मदों पर वर्तमान बजट या तो कुछ नहीं कहता अथवा विपरीत कहता है।

कमाई के आधार

”वर्ष 2018 तक चार लाख हेक्टेयर से अधिक सूखी ज़मीन को सिंचाई के अंतर्गत लाया जायेगा। वर्ष 2022 तक ग्रामीण क्षेत्रों के पांच लाख लोगों को इमारती मिस्त्री का प्रशिक्षण देने का लक्ष्य है। दीनदयाल उपाध्याय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ग्रामीण इलाकों में कौशल विकास और आजीविका अवसर बढ़ायेगा। स्टैण्ड अप इण्डिया योजना-2016 दलित, आदिवासी और महिला उद्यमियों को हरित उद्यम स्थापित करने और दूसरों को रोजगार देने वाला बनायेगी। फसल पश्चात् उत्पाद को नष्ट होने से रोकने के लिए किसानों को खाद्य प्रसंस्करण इकाई से जोडे़ंगे। सब्सिडी और योजना मद में मिलने वाली समस्त सहायता राशियों को सीधे खाते में डालने का विचार है।” – ये सभी कदम, आय वृद्धि में सहायक कदम हैं; किंतु जब तक भारत के ग्रामीण कर्ज वापसी हेतु सक्षम न हो जाये, किसानों को कर्ज हेतु प्रेरित करती घोषणा को मैं आय वृद्धि का उचित आधार नहीं मानता। विश्लेषण कीजिए कि गत् 20 वर्षों में कर्ज  चुका न पाने के कारण ही भारतीय किसानों ने बड़े पैमाने पर आत्महत्या की। जब तक भारतीय ग्रामीण डिजीटल व्यवहार के लिए तैयार नहीं हो जाते, तब तक ई नेशनल एग्रीकल्चर मार्किट की संख्या बढ़ाने की घोषणा व्यापारियों की आय बढ़ाने वाली ही साबित होगी। किसान को मिलने वाले दाम और खुदरा ग्राहक जिस दर पर सामान खरीदता है, आज दोनो में छह गुने तक का फर्क है। दिलचस्प है कि प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के मंहगा होने से हमारी सरकारें कभी नहीं डरती। हम भी उनको लेकर मंहगाई की चर्चा नहीं करते; लेकिन अनाज, दलहन, तिलहन, सब्जियों के मंहगा होते ही हम सभी हल्ला मचा देते हैं। जबकि सच यही है कि कृषि उत्पादों का उचित मूल्य दिए बगैर किसानों की गरीबी मिटाना लगभग असंभव ही है; फिर भी भारत का केन्द्रीय बजट (2017-18) हमारे गांव में पैदा होने वाले अथवा बनाये जाने वाले उत्पादों को अधिकतम संभव मूल्य दिलाने के बारे में कुछ नहीं कहता। इस पूरे बजट में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी कानून ( मनरेगा ) संबंधी घोषणायें ही ऐसी हैं, जो कि गांव के गरीब की आय भी बढ़ोत्तरी और बचत.. दोनो की बाबत् कुछ आश्वस्त करती हैं।

अकेला बड़ा मनरेगा

हालांकि अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, मनरेगा के लिए बजट आवंटन में 10,000 करोड़ की वृद्धि वास्तविक नहीं हैं। वर्ष 2016-17 के अनुमानित खर्च (38,500 करोड़) के पश्चात् हुए वास्तविक खर्च (47,499 करोड़) की तुलना में देखें तो 2017-18 का मनरेगा बजट (48,000 करोड़) मात्र 501 करोड़ की वृद्धि वाला ही है। इस तरह मनरेगा में कुल बजट वृद्धि के एक प्रतिशत के लगभग ही है; जबकि 3,469 करोड़ रुपये का मनरेगा का बकाया भुगतान का बोझ भी इसी वित्त वर्ष पर पड़ने वाला है। मनरेगा का बजट क्या है  ? मेरी राय में यह प्रश्न ही नाजायज है ? मनरेगा, कोई कार्यक्रम नहीं है। मनरेगा, मांग के आधार पर प्रत्येक ग्रामवासी को 100 दिन का रोज़गार मुहैया कराने की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला क़ानून है। जितनी मांग होगी, उतना रोजगार और तद्नुसार भुगतान सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। मनरेगा के तहत् होने वाले कार्य के बजट की सीमा कोई सरकार कैसे तय कर सकती है ?

परिसम्पत्ति सृजन पर ज़ोर सराहनीय

यहां यह कहना भी जरूरी है कि मनरेगा, केन्द्रीय बजट पर निर्भर एक अनन्तकालीन कानून नहीं हो सकता। सरकार को एक समय सीमा तय करनी ही होगी, जब इस कानून को रद्द कर दिया जायेगा। हालांकि यह तय करना अभी संभव नहीं है, किंतु किस ग्राम पंचायत में किन-किन परिसम्पत्तियों का सृजन होना है; प्रत्येक ग्रामसभा को कम से कम इनका चिन्हीकरण तो कर ही लेना चाहिए। आखिरकार, मनरेगा का दूसरा मुख्य लक्ष्य ऐसी परिसम्पत्तियों को सृजन ही है, जो दीर्घकालिक रोज़गार और आय वृद्धि का ऐसा संसाधन बन सकें, ताकि एक दिन मनरेगा जैसे क़ानून की जरूरत ही न बचे। गौर करने की बात है कि भारतीय गरीब ग्रामीणों में भी सबसे गरीब वे परिवार हैं, जिनके पास कृषि योग्य भूमि नहीं है। इनमें भी सबसे गरीब खेतिहर मज़ूदर हैं। मनरेगा का उपयोग बीहड़-ऊसर भूमि को सुधारने में भी किया जा रहा है। इस सुधरी हुई भूमि को आवंटित करने का अधिकार ग्रामसभा को देकर भूमिहीनों को भूमिधर बनाकर भी गरीबी रेखा से ऊपर उठाया जा सकता है। वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण में इस बारे में केन्द्र सरकार का इरादा पेश किया है। उन्होने कहा – ”हम वर्तमान संसाधनों में प्रति वर्ष वृद्धि करते हुए संसाधनों का और अधिक प्रभावी उपयोग करेंगे। मनरेगा को नये और किसानों के लिए ज्यादा हितकारी तरीके से पेश करेंगे। मनरेगा को ऐसी परिसम्पत्तियां सृजित करनी चाहिए, जो खेत की उत्पादकता और किसान की आय बढ़ाये।”

केन्द्रीकरण से बचें

सरकार ने 2017-2018 वित्त वर्ष में मनरेगा के तहत् पांच लाख और तालाबों के निर्माण का लक्ष्य पेश किया। मनरेगा कार्ययोजना बनाने के लिए अंतरिक्ष तकनीक के उपयोग की बात कही। पानी, आजीविका भी है और जीव-जगत का प्राणाधार भी। निस्संदेह, इससे संबंधित परिसम्पत्तियों का सृजन प्राथमिकता पर होना ही चाहिए। किंतु मनरेगा के तहत् किस गांव में क्या काम होगा; इसका निर्देश केन्द्र से जाये, यह निर्णय का केन्द्रीकरण भी है और मनरेगा में बताये ग्रामसभा के कानूनी अधिकार में हस्तक्षेप भी। इसका परिणाम उल्टा होगा। जहां आवश्यकता नहीं, वहां भी कागज़ पर ऐसी परिसम्पत्तियां सृजित दिखा दी जायेंगी। इससे भ्रष्टाचार भी बढ़ेगा और पैसे की बर्बादी भी। परिसम्पत्तियों की लंबाई, चौड़ाई और गहराई तय करने का काम भी सरकार ने अपने हाथ में ले लिया है। इसका परिणाम सामने है कि मनरेगा के तहत् बने अधिकांश तालाबों मे वर्षाजल रोकने की क्षमता उनके आकार की 10 प्रतिशत भी नहीं है। इसलिए अच्छा हो कि शासन-प्रशासन सिर्फ सलाह, सहयोग और निगरानी कर्ता की भूमिका अपनाये। गांव जिन भी परिसम्पत्तियों का सृजन करना चाहे, उनके आकार, प्रकार, डिजायन से लेकर स्थान चयन तक को तय करने का खुला अधिकार ग्रामसभाओं को सौंप देना चाहिए। जिन गांवों में मिट्टी संबंधी कार्य पूरे हो चुके हों; वहां गांववासियों की रुचि और हुनर के अनुसार, ऐसी सहकारी कुटीर औद्योगिक परिसम्पत्तियों को सृजित करने की छूट दी जानी चाहिए, जिनसे साझा रोज़गार विकसित हो सके। ग्रामसभाओं को सक्षम बनाना जरूरी है ही। ये परिवर्तन,  एक दिन हमारे गांववासियों को ऐसा बना देगा, कि वे दूसरों को रोज़गार देने वाले बन जायेंगे। अलग से मिशन अंतोदय की जरूरत ही नहीं बचेगी।

विसंगतियों से पार पाने की कोशिश

मनरेगा के तहत् हो दिए गये कार्य, कार्य वितरण और  मज़ूदरी में कई विसंगतियां हैं।  2016-17 की आर्थिक समीक्षा पेश करते हुए वित्त मंत्री ने स्वयं माना कि जिन राज्यों में भारत के 50 प्रतिशत गरीब रहते हैं, वहां मनरेगा के तहत् कुल खर्च का एक-तिहाई ही खर्च किया गया। संभवतः वह यह बताना भूल गये कि इसका एक कारण मनरेगा आयुक्तों को कम कार्य दिवस सर्जित करने संबंधी निर्देश भी था, जो कि ग्रामीण विकास मंत्रालय ने गत् वर्ष अपने व्हाट्सअप समूह ‘एनकोर’ के जरिये ‘आॅफ द रिकाॅर्ड’ दिया दिया। यदि यह सच है, तो यह गंभीर बात है। भुगतान में चोरी और फर्जी जाॅब कार्ड के मामले हैं ही। किसी राज्य में मजदूरी कम है, तो कहीं ज्यादा। 12 राज्यों में मनरेगा के तहत् मिलने वाली मजदूरी, राज्य की न्यूनतम मजदूरी से भी कम है। मनरेगा कार्यों को ऐसी विसंगतियों से पार पाना होगा।

इन विसंगतियों से पार पाने के लिए सरकार ने कदम उठाने शुरु कर दिए हैं। आठ फरवरी को जारी एक बयान में सरकार ने एस. महेन्द्रदेव समिति की सिफारिश लागू करने पर विचार करने की बात कही है। समिति की सिफारिश है कि मनरेगा के तहत् मिलने वाली मजदूरी, राज्य की न्यूनतम मजूदरी दर से कम नहीं होनी चाहिए। मनरेगा मजदूरी दर, अभी ग्राहक मूल्य सूचकांक (कृषि मजूदर) से तय होती है। मनरेगा मजदूरों को मंहगाई से सुरक्षित रखने के लिए समिति ने उनकी मजदूरी दर को राज्य में न्यूनतम मजदूरी दर अथवा ग्राहक मूल्य सूचकांक (कृषि मजदूर) में से जो भी ज्यादा हो, उसके आधार पर तय करने की सिफारिश की है। समिति ने मजदूरी दर को ग्राहक मूल्य सूचकांक (ग्रामीण मजदूर) से जोड़ने की बात भी कही है। विलम्ब व चोरी रोकने के लिए भुगतान को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण से जोड़ा जा रहा है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के जरिये भुगतान का काम केरल में एक वर्ष पूर्व ही शुरु कर दिया गया था। इस वर्ष के अंत तक 10 और राज्यों में शुरु कर देने का लक्ष्य है। फर्जी जाॅब कार्ड चिन्हित और रद्द करने का काम शुरु हो चुका है। 1.98 लाख जाॅब कार्ड रद्द किए जाने की ताज़ा खबर असम सरकार की तरफ से आई।

सुधारों को गति

मनरेगा संबंधी सुधार कदमों को और गति देने का संकेत देते हुए श्री जेटली ने मनरेगा के तहत् सृजित परिसम्पतियों को ’जियो टैग’ देने तथा उनके विवरण को पब्लिक डोमेन में डालने की बात कही। उन्होने उल्लेख किया कि गरीबी मुक्त प्रत्येक पंचायत में गरीबी रेखा से ऊपर लाने के प्रयासों  की निगरानी हेतु संयुक्त सूचकांक विकसित किया जायेगा। पंचायतीराज संस्थानों में मानव संसाधन की कमी को देखते हुए ‘परिणाम के लिए मानव संसाधन सुधार कार्यक्रम’ शुरु करेंगे। जवाबदेही, परिणाम और अभिसरण की बात आधारभूत वाक्य में है ही। भ्रष्टाचार पर लगाम और कार्यकुशलता में बढ़ोत्तरी की दृष्टि से ये सभी प्रयोग करके देखने चाहिए। अच्छा हो कि केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों के माध्यम से प्रत्येक ग्राम पचायत से उन परिसम्पत्तियों की सूची मांगे, जिन्हे उसकी ग्रामसभा ने वित्त वर्ष विशेष के दौरान सृजित करने हेतु चिन्हित किया है। यदि पंचायतें अग्रिम तिमाही हेतु कार्यदिवस का मांगपत्र पहले ही तैयार कर सके, तो इससे भी पारदर्शिता आयेगी तथा कार्य सुचारु होगा। किंतु यदि हम चाहते हैं कि मनरेगा, गरीबी-मुक्ति का एक प्रबल औजार बने, तो सबसे ज्यादा जरूरी होगा कि प्रत्येक ग्रामसभा पूरी सक्रियता, सजगता और विवेक के साथ अपनी भूमिका निभाने के लिए संकल्पित हो।

मिशन अंतोदय

दीनदयाल उपाध्याय अंतोदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ही मिशन अंतोदय है। मूल रूप से स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के रूप में वर्ष 1999 में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने शुरुआत की। जून, 2011 में आजीविका – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का रूप दिया। नवंबर, 2015 में नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय अंतोदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन कर दिया गया।

मिशन अंतोदय, गरीबों को उनकी आजीविका हेतु स्वयं सहायता समूह उपक्रम के रूप विकसित करने का मिशन है। मिशन के दस्तावेजों में कहा गया है कि यह सुनिश्चित करेगा कि पंचायत और स्वयं सहायता समूहों जैसे गरीब के उपक्रम के बीच इस तरह का संबंध विकसित हो, ताकि पंचायतीराज संस्थायें मिशन की गतिविधियों में सक्रिय भागीदार तो हों, लेकिन स्वयं सहायता समूहों की स्वायत्तता खतरे में न पडे़। हमें, हमारी पंचायतीराज संस्थाओं को इस सावधानी के लिए मजबूर करना ही होगा। इस सावधानी के न रखने का ही परिणाम है कि पिछले 70 वर्ष में तमाम पैसा झोंक देने के बावजूद हमारे गांवों की अभी भी एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। श्री जेटली ने अपने बजट भाषण में कहा कि मिशन अंतोदय, प्रत्येक गरीब परिवार की टिकाऊ आजीविका के लिए सूक्ष्म कार्ययोजना पर ध्यान केन्द्रित करेगा। 36 प्रतिशत ग्रामीण अभी भी अनपढ़ हैं। साक्षर ग्रामीणों में 64 प्रतिशत पांचवीं से आगे नहीं पढे़; 5.4 प्रतिशत हाई स्कूल से आगे नहीं बढे़। मात्र 3.4 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं, जिनका कोई सदस्य स्नातक है। क्या यह सूक्ष्म कार्ययोजना में गांवों की शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थियों की गुणवत्ता विकास पर भी गौर करेगी ? काश! कि ऐसा हो।

  (  यह लेख, तनिक संपादन के पश्चात् कुरुक्षेत्र हिंदी पत्रिका के मार्च – 2017 अंक में प्रकाशित हो चुका है। )

फोटो साभार : India.com