पुर का टांडा नहीं, कालूवाला राय पहाड़ी का कुण्ड है हिण्डन नदी का मूल स्त्रोत 

नीर फाउंडेशन  निदेशक – श्री रमन त्यागी द्वारा तैयार एक विस्तृत रिपोर्ट

 

गंगा-यमुना दोआब के बीच से बहने वाली तथा यमुना की प्रमुख सहायक नदी हिण्डन का वास्तविक उद्गम स्थल मेरी हिण्डन-मेरी पहल की टीम ने खोज निकाला है। जबकि सरकार द्वारा यहां तक पहुंचने की जहमत ही नहीं उठाई गई थी और सरकार एक गांव को ही नदी का उद्गम मानकर चल रही थी। इस टीम में अरण्या के संजय कश्यप, डा0 मौहम्मद सैफ, नीर फाउंडेशन के रमन कान्त, 2030 डब्ल्यू आर जी की एनालिका मारग्रीट लनिंगा, शौर्य, पूजा, आई डब्ल्यू पी की भावना तथा कृष्णपाल मौजूद थे।
हिण्डन नदी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सात प्रमुख जनपदों सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, मेरठ, गाजियाबाद व गौतमबुद्धनगर से होकर गुजरती है और अंत मंे जाकर यमुना नदी में समाहित हो जाती है। इस दौरान हिण्डन में इसकी दो प्रमुख सहायक नदियां काली पश्चिम व कृष्णी क्रमशः मेरठ व बागपत जनपदों में हिण्डन में विलीन हो जाती हैं। इससे पहले हिण्डन में सहारनपुर में ही अन्य दो छोटी नदियां धमोला व पांवधोई भी मिल चुकी होती हैं। दो अन्य अत्यंत छोटी धाराएं चांचां रौ व नागदेह रौ भी हिण्डन में उद्गम स्थल के दौरान की मिल चुकी होती हैं।
हिण्डन व उसकी सहायक नदियां काली पश्चिम, कृष्णी, धमोला व पांवधोई अत्यंत प्रदुषित हैं। इन सभी में सीवर व उधोगों का तरल व ठोस गैर-शोषिध कचरा समाहित होता है जिस कारण से ये सभी नदियां मृतप्राय हो चुकी हैं। धमोला जैसी नदियों को तो सरकारी भाषा में भी नाला कहा जाने लगा है।
हिण्डन नदी जहां अपने प्रदूषण के कारण चर्चा का विषय बनी हुई है,  वहीं अपने सही उद्गम स्थल के विवाद से भी नहीं बच पाई है; क्योंकि उत्तर प्रदेश का सिंचाई विभाग हिण्डन नदी का उद्गम सहारनपुर जनपद के छुटमलपुर से देहरादून मार्ग पर करीब 10 किलोमीटर चलने के बाद पुर का टांडा गांव को मानता रहा है और उसी आधार पर अपनी योजनाएं बनाकर उन पर कार्य कर रहा है। इस स्थान पर सिंचाई विभाग द्वारा एक करोड़ की लागत से चार छोटे चेकडैम बनाए जा रहे हैं जबकि यहां भूड़ का रेतीला जंगल है और पानी का कोई स्रोत दूर-दूर तक नहीं है।
मेरी हिण्डन-मेरी पहल की टीम द्वारा 27 मार्च, 2017 को हिण्डन नदी का वास्तविक उद्गम खोजा गया है। यह उद्गम गजेटियर से भी मेल खाता है, क्योंकि गजेटियर में हिण्डन नदी का उद्गम उत्तराखण्ड की सीमा पर स्थित शिवालिक की पहाड़ियों को बताया गया है। इसी आधार पर हिण्डन के उद्गम की खोज की गई है। हिण्डन नदी का यह उद्गम सहारनपुर जनपद की बेहट तहसील के मुजफ्फराबाद ब्लाॅक के अन्तर्गत आता है तथा कालूवाला राय के आस-पास का क्षेत्र यहां पड़ता है। जहां पर हिण्डन नदी का उद्गम है वहां पहाड़ी के ऊपर एक कुण्ड बना है जिसमें से पानी झरने के द्वारा बारह महीने बहता है तथा बरसात में यहां पानी का स्तर काफी बढ़ भी जाता है।

मेरी हिण्डन-मेरी पहल की टीम ने जब इस उद्गम को खोजना प्रारम्भ किया तो सहारनपुर के छुटमलपुर से देहरादून मार्ग पर चलते हुए मोहण्ड स्थित चेक पोस्ट से शिवालिक वन क्षेत्र में प्रवेश करना पड़ता है। यहां से करीब दस किलोमीटर चलने के पश्चात् एक अन्य वन चैकी से दाहिने मुड़कर सीधे हिण्डन नदी के बैड में प्रवेश कर जाते हैं। हिण्डन नदी के बैड़ में करीब पांच किलोमीटर तक गाड़ी जा सकती है। वहां से तीन से चार किलोमीटर पैदल जाना पड़ता है और तब जाकर हम झरने तक पहुंच पाते हैं। यहीं हिण्डन नदी में स्वच्छ पानी का प्रवेश होता है और यही इस नदी का वास्तिवक उद्गम स्थल भी है। यह झरना करीब पचास फीट की ऊंचाई से नीचे गिरता है। जिस पहाड़ी से यह पानी नीचे गिरता है वहां हरी घास व काई जमी हुई है। इस दौरान हिण्डन के बैड़ में बीचोंबीच एक कुआं बना है जोकि ऊपर से भी ढका हुआ है और इसमें पानी का स्तर मात्र दस फीट है। इस पूरे बैड में जगह-जगह साफ पानी भरा हुआ है जहां मछलियों  की भरमार है। विशेष तरह की चील, चिड़ियाएं, गिरगिट, भैंस, बकरी तथा अन्य जंगली जानवर देखने को मिलते हैं। इस जंगल में लैपर्ड भी हैं। यहां हिण्डन के दोनों किनारे पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर वन गूजरों की झोपड़ियां बनी हुई हैं। इनमें व परिवार सहित रहते हैं। हिण्डन नदी के बैड में बहते व कहीं-कहीं ठहरे हुए पानी का टीडीएस 250-280 तक तथा पीएच 7.5 से 8.0 तक है। बैड के दोनों ओर ऊंची-ऊची पहाड़ियां और गूलर आदि के पेड़ मौजूद हैं।
हिण्डन नदी के उद्गम की इस नई खोज से जहां नदी को नया जीवन देने में मदद मिलेगी वहीं उम्मीद है कि सरकारी योजनाएं भी अब इसी आधार पर बनेगी। मेरी हिण्डन-मेरी पहल के तहत यहां कुछ योजनाओं पर कार्य किया जाएगा, जिनमें कि यहां मौजूद वन गूजरों के बच्चों के लिए हिण्डन जल स्कूल की स्थापना करना, वहां छोटे-छोटे चैक डैम बनाना तथा इसके बेसिन को संरक्षित रखते हुए सरकारी योजनाओं को यहां से प्रारम्भ कराना। शीघ्र ही एक सम्पूर्ण नदी शोध यात्रा का प्रारम्भ भी किया जाएगा जिसमें कि वैज्ञानिक, समाजसेवी, शोध छात्र व पत्रकार बन्धुओं को शामिल किया जाएगा।

इस शोध यात्रा के दौरान हिण्डन व उसकी सहायक नदियों की सभी वास्तिवक प्रतीकों को उजागर किया जाएगा।

 

हिण्डन नदी: एक परिचय
हिण्डन नदी का उद्गम स्थल शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी में जनपद सहारनपुर के मुजफ्फराबाद ब्लाॅक से बहती है। यह नदी सहारनपुर जनपद से निकलकर मुजफ्फरनगर, मेरठ बागपत एवं गाजियाबाद जनपदों के होते हुए अंत में गौतमबुद्धनगर जनपद के मोमनाथल गांव के जंगल में यमुना नदी में समाहित हो जाती है। अपने उद्गम से लेकर यमुना नदी में समाहित होने तक हिण्डन नदी की लम्बाई 355 किलोमीटर है।
हिण्डन नदी के पश्चिमी भाग से होकर बहने वाली हिण्डन नदी की सहायक काली नदी (पश्चिमी) जनपद सहारनपुर में छुटमलपुर के निकट गांव नानका से निकलकर मुजफ्फरनगर व मेरठ जनपद के सीमावर्ती गांव अटाली/पिठलोकर के निकट हिण्डन नदी में समाहित हो जाती है। काली नदी (पश्चिमी) की कुल लम्बाई 145 किलोमीटर है। काली नदी (पश्चिमी) की प्रमुख सहायक नदी उत्तराखण्ड राज्य के हरिद्धार जनपद के कस्बा-भगवानपुर के निकट से निकलकर गांव-नन्हेड़ा, अनन्तपुर, परियाला, लाठरदेवा, हूण, मखदूमपुर व टिकोला कलां आदि से होकर जनपद सहारनपुर की तहसील देवबन्द के गांव-रणसुरा के निकट उत्तर प्रदेश की सीमा में प्रवेश करती है और सीमावर्ती गांव-मतौली के निकट काली नदी (पश्चिमी) में मिल जाती है। शीला नदी की कुल लम्बाई 61 किलोमीटर है। इस नदी का अधिकतम भाग उत्तराखण राज्य में है।
हिण्डन नदी के पूर्वी भाग से होकर बहने वाली हिण्डन नदी की एक अन्य सहायक कृष्णी नदी सहारनपुर नगर के पश्चिमी भाग से निकलकर सहारनपुर व शामली जनपदों से होते हुए बागपत जनपद के गांव बरनावा में जाकर हिण्डन नदी में विलीन हो जाती है। कृष्णी नदी की कुल लम्बाई 153 किलोमीटर है।
हिण्डन नदी की एक अन्य सहायक पांवधोई नदी जनपद सहारनपुर के गांव शंकलापुरी से निकलकर सहारनपुर शहर में ढमोला नाले में मिल जाती है। पांवधोई नदी की कुल लम्बाई 7 किलोमीटर है। ढ़मोला नाला अंत में जनपद सहारनपुर के गांव जैनपुर में जाकर हिण्डन नदी में मिल जाता है। ढ़मोला नाले की कुल लम्बाई 52 किलोमीटर है।
उपरोक्त के अतिरिक्त हिण्डन नदी की दो अन्य छोटी बरसाती नदियां भी हैं। जिनको नागदेव-रौं व चाचा-रौं के नाम से जाना जाता है। इनकी लम्बाई क्रमशः 8 व 7 किलोमीटर है। ये दोनों नदियों पहले गंगा-यमुना बेसिन में भूगर्भीय जन से रिचार्ज होकर बहती थीं। इस बेसिन में भूजल का स्तर अत्यंत नीचे चले जाने के कारण इन नदियों के मूलस्राव नगण्य हैं।
हिण्डन व उसकी सहायक नदियों का विवरण
क्रम –  नदी का नाम – उदगम स्थल –  विलीन स्थल – लम्बाई

हिण्डन नदी  –  शिवालिक की पहाड़ियां, (गांव-कालूवाला राय) जनपद -सहारनपुर (उ. प्र.) गंव-मोमनाथल जनपद-गौतमबुद्धनगर (उ. प्र.) – 355 किलोमीटर

कृष्णी नदी  –  पश्चिमी क्षेत्र सहारनपुर, जनपद (उत्तर प्रदेश) गांव-बरनावा, जनपद-बागपत (उत्तर प्रदेश)  – 153 किलोमीटर

काली नदी  –  (पश्चिम) छुटमलपुर के निकट गांव-नानका, जनपद-सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) गांव-अटाली/पिठलोकर, जनपद-मेरठ (उत्तर प्रदेश) –  145 किलोमीटर

शीला नदी  –  कस्बा-भगवानपुर, जनपद-हरिद्धार (उत्तराखण्ड) गांव-मतौली, जनपद-सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)  – 61 किलोमीटर

धमोला नदी  – सहारनपुर जनपद (उत्तर प्रदेश) शरकथाल गांव, जनपद-सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)  – 52 किलोमीटर

पांवधोई नदी   –  गांव-शंकलापुरी, जनपद-सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) सहारनपुर शहर, सहारनपुर जनपद (उ. प्र.)  – 07 किलोमीटर

नागदेव रौ   – सहारनपुर जनपद (उत्तर प्रदेश) सहारनपुर जनपद (उत्तर प्रदेश) – 08 किलोमीटर

चाचा रौ  – सहारनपुर जनपद (उत्तर प्रदेश) सहारनपुर जनपद (उत्तर प्रदेश) -0 7 किलोमीटर

 

उद्योगों  की स्थिति

हिण्डन व इसकी सभी सहायक नदियों के किनारे उत्तर प्रदेश राज्य में कुल 316 उद्योग स्थापित हैं। इसमें पल्प एण्ड पेपर-41, डिस्टलरी-8, शुगर-14, टेनरी-6, कपड़ा-105 व अन्य-142 उधोग शामिल हैं। जबकि उत्तराखण्ड राज्य के 7 उद्योग(पल्प एण्ड पेपर-5 तथा शुगर-2) जोकि शीला नदी के माध्यम से अपना कचरा काली नदी (पश्चिमी) तक पहुंचाते हैं, क्योंकि काली नदी (पश्चिमी) अंत में हिण्डन नदी में मिलती है तो यह कचरा भी हिण्डन नदी में ही मिल जाता है।
उत्तर प्रदेश जल निगम के अनुसार सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बुढ़ाना, बागपत, मेरठ, गाजियाबाद व नोएडा नगरों से करीब 1215.43 एमएलडी सीवेज निकलता है जोकि करीब 68 नालों के माध्यम से गिरता है। जिसमें से मात्र 1055 एमएलडी ही शुद्ध होकर जबकि बाकि बचा 348.93 एमएलडी बगैर शुद्धिकृत ही हिण्डन व उसकी सहायक नदियों में मिल जाता है।

उत्तर प्रदेश सरकार की पहल

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रमुख सात जनपदों में हिण्डन व उसकी सहायक नदियों के प्रदूषित होने के कारण यहां के गांवों से लगातार भूजल प्रदूषण की खबरों से भविष्य के खतरे को भांपते हुए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा हिण्डन नदी को प्रदूषण मुक्त करने का लक्ष्य तय किया गया है। इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कई स्तर से प्रयास किए जा रहे रहे हैं।

हिण्डन व उसकी सहायक नदियों में अविरल एवं निर्मल प्रवाह सुनिश्चित करना माननीय मुख्यमंत्री की प्राथमिकताओं में शामिल है। अतः हिण्डन व उसकी सहायक नदियों में प्रदूषण के स्तर का मापन करते हुए इन्हें अविरल एवं निर्मल बनाने हेतु विजन डाक्यूमेंट तैयार करने हेतु कार्यालय ज्ञापन संख्या 74/2016/655/16-27-सिं0-4-99 (डब्ल्यू)/15, दिनांक 21.03.2016 के माध्यम से सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग को नोडल विभाग नामित करते हुए एवं नदियों के बेसिन में वास्तविक कार्य किए जाने एवं समस्त स्टेक होल्डर्स के साथ समन्वय स्थापित किए जाने हेतु मण्डलायुक्त महोदय, मेरठ की अध्यक्षता एवं मण्डलायुक्त महोदय, सहरनपुर की सह-अध्यक्षता में 19 सदस्य समन्वय समिति का गठन किया गया है।

 

हिण्डन की स्थिति
पिछले एक दशक से हिण्डन व उसकी दोनों सहायक नदियां गैर-शोधित तरल कचरा ढोने का साधन मात्र बनी हुई हैं। हिण्डन को हरनन्दी भी कहा जाता है, इसका वास्तिवक स्रोत कतई सूख चुका है। फिलहाल इसका प्रारम्भ सहारनपुर के एक प्रसिद्ध पेपर मिल के गैर-शोधित कचरे से होता है। हिण्डन नदी के उद्गम से लेकर इसके यमुना नदी में विलय होने तक किए गए अध्ययन में चैंकाने वाले तथ्य निकल कर सामने आए हैं। नदी में बहने वाले पानी में लैड, क्रोमियम व केडमियम जैसे भारी तत्व भरपूर मात्रा में पाए गए हैं। यही नहीं इसमें अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित किए जा चुके पाॅप्स (परसिसटेंट आॅरगेनिक पाल्यूटेंटस) भी पाए गए हैं।

 

हिण्डन नदी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सात जनपदों में मौजूद दर्जनों गन्ना मिलों, पेपर मिलों, कमेलों, छोटे उद्योगों, शहर तथा कस्बों के गैर-शोधित सीवेज़ को ढोती है। कुछ उद्योगों का गैर-शोधित कचरा इसमें सीधे गिरता है तो कुछ का कृष्णी व काली नदियों के माध्यम से इसमें आकर मिलता है। अब यह नदी न होकर प्रदूषित नाला बन चुकी है। हिण्डन में दो और छोटी नदियां पांवधोई व धमोला भी सहारनपुर जनपद का सीवेज उडेल चुकी होती हैं। इन दोनों नदियों को वर्तमान पीढ़ी नाला ही समझती है जबकि गांवों के बुजुर्ग इन नदियों के नाला बन जाने पर मन-मसोस कर ही रह जाते हैं। धमोला के माध्यम से हिण्डन में करीब 58000 किलो लीटर सीवेज प्रति दिन हिण्डन नदी में आकर गिरता है। धमोला द्वारा जो तरल कचरा हिण्डन में डाला जाता है उसमें 1.79 मिलीग्राम/लीटर लैड, 4.15 मिलीग्राम/लीटर क्रोमियम व 0.017 मिलीग्राम/लीटर केडमियम की मात्रा मौजूद है। इसमें बी0एच0सी0, हेप्टाक्लोर एपोक्साइड, फिपरोनिल व एल्ड्रिन जैसे कीटनाशक भी पाए गए हैं। गौरतलब है कि बी0एच0सी0, हेप्टाक्लोर एपोक्साइड व एल्ड्रिन पाॅप्स की श्रेणी के अन्तर्गत आने वाले कीटनाशक हैं।
काली (पश्चिम) नदी जोकि हिण्डन के पूर्व से धनकपुर गांव के निकट से प्रारम्भ हो चुकी होती है। यह नदी सहारनपुर व मुजफ़्फरनगर जनपद से होती हुई मेरठ जनपद के गांव पिठलोकर में आकर हिण्डन में मिल जाती है। इस बीच इसमें करीब 25 पेपर मिलों, केमिकल प्लांटों, दर्जनों अन्य छोटे-बडे़ उधोगों, छोटे-बडे़ कस्बों का सीवेज व कमेले का करीब 85,000 किलो लीटर गैर-शोधित तरल कचरा रोज़ाना डाला जाता है। यह नदी इस तमाम कचरे को ढोती हुई अन्त में पिठलोकर गांव के निकट हिण्डन में उड़ेल देती है। यहां से आगे हिण्डन नदी में प्रदूषण का बोझा और अधिक बढ़ जाता है। इन दोनों नदियों के मिलन के पश्चात् हिण्डन के पानी में लैड 0.92 मिलीग्राम/लीटर व क्रोमियम 5.65 मिलीग्राम/लीटर पाया गया है। इसमें हेप्टाक्लोर एपोक्साइड व फिपरानिल जैसे कीटनाशक भी मौजूद हैं।
सहारनपुर जनपद में ही हिण्डन नदी के पश्चिम में कैरी गांव के निकट से प्रारम्भ होने वाली कृष्णी नदी सर्वाधिक प्रदूषित नदी है। यह नदी अपने उद्गम स्थल से ननौता कस्बे तक सूखी हुई है। ननौता में स्थित उत्तर प्रदेश सरकार का गन्ना मिल व उसकी आसवनी (डिस्टलरी) के गैर-शौधित कचरे से कृष्णी नदी का प्रारम्भ होता है। यह दुखद ही है कि जिस सरकार पर नदियों के प्रदूषण को रोकने की जिम्मवारी है वही सरकार नदी को प्रदूषण का घर बना रही है। यह नदी जैसे ही ननौता के कचरे को लेकर आगे बढ़ती है तो इसमें चरथावल, थानाभवन, सिक्का व शामली के उद्योगों  का गैर-शोधित तरल कचरा व इनका सीवेज विभिन्न नालों के माध्यम से मिलता रहता है। कृष्णी नदी अंत में अपना तमाम प्रदूषित कचरा महाभारतकालीन बरनावा गांव के निकट हिण्डन नदी में डाल देती है। जब कृष्णी नदी हिण्डन में मिल चुकी होती है तो उसमें भारी तत्वों व कीटनाशकों की मात्रा और अधिक बढ़ जाती है।

कृष्णी नदी के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नदी पर सल्फा, काबडोत, कुडाना, बनत, केडी, गोसगढ़ व धकोड़ी गांवों में सात चेक डेम (छोटे बांध) बनाए गए हैं। इन बांधों को बनाने के पीछे तर्क प्रस्तुत किया गया है कि ऐसा करने से आस-पास के क्षेत्र का भू-जल स्तर तो बढ़ेगा ही साथ ही किसानों को सिंचाई के लिए पानी भी सुलभता से उपलब्ध होगा। अंधे हो चुके सरकारी विभागों से यह पूछने वाला कोई नहीं है कि जिस पानी में हर रोज दो दर्जन छोटे-बडे़ उधोगों का करीब 10,000 किलो लीटर गैर-शौधित तरल कचरा डाला जाता हो उस पानी की गुणवत्ता कैसी होगी? इस पानी में 0.12 मिलीग्राम/लीटर लैड व 3.50 मिलीग्राम/लीटर क्रोमियम जैसे भारी तत्व मौजूद हैं, यही नहीं प्रतिबंधित कीटनाशक हेप्टाक्लोर, हेप्टाक्लोर एपोक्साइड, एल्ड्रिन व बी0एच0सी0 भी इस पानी में घुले हुए हैं। जब यह पानी भूजल में रिसेगा या किसान इससे अपनी फसलों की सिंचाई करेंगे तो क्या हालात होंगे?
बरनावा से मोहननगर तक के सफ़र में हिण्डन नदी में और भी दर्जनों छोटे-बड़े उधोगों का गैर-शौधित कचरा मिलता है, इस बीच इसमें एक नहर के माध्यम से बालैनी के निकट साफ पानी भी डाला जाता है लेकिन वह भी इसकी गुणवत्ता में कोई खास अन्तर नहीं ला पाता है। मोहननगर के बैराज़ पर हिण्डन के बहाव को रोककर इसके प्रदूषित पानी को एक नहर के माध्यम से कालंदी कुंज के बैराज से पहले यमुना में डाल दिया जाता है। मोहननगर हिण्डन बैराज से आगे नदी में बहुत कम मात्रा में पानी बचता है। इसमें प्रदूषण घोलता है वैशाली काॅलोनी का सीवेज। यहां से आगे बढ़ने पर हिण्डन में इंद्रापुरम सीवेज वाटर ट्रीटमेंट  प्लांट का नाला भी मिल जाता है। हिण्डन नदी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है तो उसमें छितारसी के बदरपुर प्लांट का कचरा, कुलेसरा, भंगेल, नोएडा व ग्रेटर नोएडा का सीवेज तथा गाजियाबाद व गौतमबुद्धनगर जनपदों में मौजूद तरल कचरा निकालने वाले उधोगों का गैर-शोधित कचरा आकर मिलता रहता है। इन सब के कारण हिण्डन में प्रदूषण का स्तर एक बार पुनः बढ़ जाता है। इस स्थान पर भी हिण्डन में भारी तत्व व प्रतिबंधित कीटनाशक अत्याधिक मात्रा में पाए गए हैं।

हिण्डन के यमुना में मिल जाने के पश्चात् जब यमुना नदी के पानी का परीक्षण किया गया तो उसमें लैड 1.12, क्रोमियम 6.78 व केडमियम 0.014 मिलीग्राम/लीटर पाए गए। यही नहीं इस स्थान पर बी0एच0सी0 व हेप्टाक्लोर जैसे पाॅप्स भी सर्वाधिक मात्रा में पाए गए। अध्ययन के दौरान की गई बाॅयोमाॅनिटिरिंग में हिण्डन व उसकी दोनों सहायक नदियों में किसी भी स्थान पर पर्याप्त मात्रा में आॅक्सीजन मौजूद नहीं है। नदी में एक-दो स्थानों को छोड़कर कहीं पर भी जलीय सूक्ष्म जीव भी नहीं पाए गए हैं।
देश के एक जाने-माले औधोगिक घराने ने पिछले दो वर्षों में ही हिण्डन के किनारे गगनोली, बुढ़ाना व किनौनी में तथा कृष्णी नदी के किनारे थानाभवन में चार गन्ना मिल स्थापित हैं। किनौनी में तो आसवनी भी लगाई गई है। इन चारों का गैर-शौधित तरल कचरा नालों के माध्यम से हिण्डन व कृष्णी नदियों में डाला जा रहा है।
सहारनपुर, मुजफ़्फरनगर, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद व गौतमबुद्धनर के प्रदूषण विभागों की मानें तो हिण्डन नदी में उधोगों, कस्बों व शहरों का करीब 98,000 किलो लीटर तरल कचरा सीधे व करीब 95,000 किलो लीटर कृष्णी व काली नदी (पश्चिम) के माध्यम से आकर हर रोज गिरता है। हिण्डन नदी प्रत्येक दिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सात जनपदों के उधोगों व शहरों का करीब 1,90,000 किलो लीटर गैर-शोधित  तरल कचरा लेकर बहती है तथा इसे यमुना नदी में डाल देती है। सर्वाधिक दुख यह सोचकर होता है कि उधोगों द्वारा जो प्रदूषित पानी वाला कचरा इन नदियों में डाला जाता है वह पानी जमीन के नीचे से खींचा गया पेयजल होता है। अर्थात स्वच्छ पेयजल को निकालकर पहले तो उसे प्रदूषित किया जा रहा है तथा बाद में उससे नदियों को बर्बाद किया जा रहा है। ऐसा करने से उधोगों के आस-पास के क्षेत्र के भूजल में भी लगातार गिरावट आती जा रही है। इन नदियों के संबंध में अगर यह कहा जाए कि इनके उद्गम स्थल अब बदल चुके हैं तो काई अतिसियोक्ति नहीं होगी। क्योंकि इन तीनों नदियों में से कोई भी अपने वास्तविक स्रोत से अब नहीं बहती है।

 

पहल का परिचय 

मेरी हिण्डन-मेरी पहल

हिण्डन व उसकी सहायक नदियों के सुधार हेतु जहां उत्तर प्रदेश सरकार ने कदम उठाया है वहीं सामाजिक स्तर से एक अनूठी पहल प्रारम्भ हुई है। इस पहल को मेरी हिण्डन-मेरी पहल नाम दिया गया है। यह एक सामाजिक पहल है। इसके तहत कोई भी आमजन हिण्डन व उसकी सहायक नदियों के सुधार में सहयोग हेतु किसी भी प्रकार से सहयोग कर सकता है। हिण्डन नदी के उद्मग स्थल से लेकर उसके यमुना नदी में विलीन होने तक सभी सात जनपदों में इस अभियान का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। हिण्डन व उसकी सहायक नदियों किनारे बसा समाज इस पहल के साथ जुड़कर अपनी नदियों के लिए प्रयास करने को आतुर नजर आ रहे हैं। कहीं तालाब बनाने का कार्य हो रहा है तो कहीं वृक्षारोपण का। ऐसे ही अनेकों प्रयास समाज ने प्रारम्भ किए हैं।
मेरठ मण्डल के मण्डलायुक्त आलोक सिन्हा से प्रेरणा पाकर नीर फाउंडेशन ने मेरी हिण्डन-मेरी पहल अभियान की शुरूआत की है। इसका उद्देश्य सरकार के सकारात्मक प्रयासों के साथ हिण्डन व उसकी सहायक नदियों के किनारे बसे समाज को जोड़ना है। सरकार के प्रयास से समाज जुड़ेगा और उसमें सहयोग करेगा तो बेहतर परिणाम देखने को मिल रहे हैं। इस पहल के तहत हिण्डन व उसकी सहायक नदियों के किनारे बसा समाज व इन नदियों से प्रभावित समाज अपने दायित्व को समझते हुए अपने स्तर से योगदान देने दे रहे हैं।

मेरी हिण्डन-मेरी पहल का प्रारूप

मेरी हिण्डन-मेरी पहल की सात सदस्यों की एक केंद्रीय कमेटी बनाई गई है। हिण्डन व उसकी सहायक नदियों के गुजरने वाले प्रत्येक जनपद में दो सदस्यों एक जनपदीय कमेटी बनाई गई है। नदियों के पांच किलोमीटर दोनों किनारों के प्रत्येक गांव में दो सदस्यों की एक गांव कमेटी बनाई जा रही है। केंद्रीय स्तर पर दो सदस्यों की एक मीडिया कमेटी बनाई गई है। सभी कमेटियों के सभी सदस्य अवैतनिक हैं।

सहारनपुर जनपद से लेकर गौतमबुद्धनगर तक सभी जनपदों की कमेटियों के गठन का कार्य किया जा रहा है। गाजियाबाद में सामाजिक कार्यकर्ता संजय कश्यप, मुजफ्फरनगर में नंदकिशोर शर्मा, बागपत में कुलदीप त्यागी, शामली में करूणेश, मेरठ में राहुल देव, गौतमबुद्धनगर में विक्रांत तथा सहारनपुर में पी के शर्मा इस अभियान की कमान संभालेंगे।

मेरी हिण्डन-मेरी पहल के स्वयंसेवक

इस अभियान के तहत इन नदियों के किनारे के गांवों में मेरी हिण्डन-मेरी पहल के स्वयं सेवक नियुक्त किए जा रहे हैं। स्वयं सेवक कोई भी वह आमजन बन सकता है जो यह मानता हो कि हां हिण्डन व उसकी सहायक नदियों के लिए मैं भी कुछ करना चाहता हूं। ये स्वयं सेवक विभिन्न प्रकार से अपना योगदान दे रहे हैं। कोई भी स्वयं सेवक इन नदियों के संरक्षण में योगदान हेतु अपनी योजना मेरी हिण्डन-मेरी पहल समिति के सामने प्रस्तुत कर सकता है। कमेटी द्वारा योजना पास किए जाने पर उस योजना को अमल में लाया जाएगा। ये स्वयं सेवक ही इन नदियों के वास्विक रक्षक हैं। स्वयं सेवक नदी में प्रदूषण समाप्त करने के कार्य में सहयोगी की भूमिका निभा रहे हैं। समय-समय पर सभी स्वयं सेवकों के सम्मेलन आयाजित किए जाने हैं।

मेरी हिण्डन-मेरी पहल के प्रचार माध्यम

इस अभियान को सफल बनाने हेतु विभिन्न प्रचार माध्यमों की सहायता ली जा रही है। इसका एक फेसबुक पेज, पोर्टल, वेबसाइट, लोगो, हिन्दी न्यूजलेटर (हिण्डन मंथन), पम्पलेट, पर्चे, स्टीकर, बैनर, दीवार लेखन व एक डाक्यूमेंट्री फिल्म आदि का कार्य किया जा रहा है। इस अभियान का फेसबुक पेज, मुखपत्र, लोगो व वेबसाइट आदि प्रचार माध्यम कार्य करने लगे हैं।

मेरी हिण्डन-मेरी पहल के कार्य

* हिण्डन व उसकी दोनों सहायक नदियों के पानी के कुल 26 नदियों के नमूनों का परीक्षण किया जाएगा। जिसमें कि हिण्डन से 14 नमूने कृष्णी व काली से 6-6 नमूनों का परीक्षण किया जाएगा। नदी के गुजरने वाले प्रत्येक जनपद से दो नमूने लिए जाएंगे। पहला नमूना जहां नदी उस जनपद में प्रवेश करती है और दूसरा दूसरे जनपद में प्रवेश करन से पहले।

  
* हिण्डन व उसकी सहायक नदियों के किनारों के गांवों का डाटा तैयार किया जा रहा है।
* इन सभी गांवों में मेरी हिण्डन-मेरी पहल के स्वयं सेवक नियुक्त किए जा रहे हैं।
*इन सभी गांवों में नदी-जल जागरूकता गोष्ठियां आयोजित की जा रही हैं। गोष्ठियों के दौरान नदी के कारण होने वाली परेशानियों को समझकर उनके समाधान का सरकार के साथ मिलकर प्रयास किया जा रहा है।
* इन नदियों के पानी से किसान सिंचाई न करें इसके लिए उनको जागरूक किया जाएगा। जिन गांवों में इन नदियों के पानी से फसलों की सिंचाई की जाती है उनकी मिट्टी व फसलों का परीक्षण कराकर गांववासियों को जानकारी दी जा रही है।
* जिन गांवों जल प्रदूषण की गंभीर समस्या है या फिर गांववासियों को गंभीर बीमारियां हो रही हैं, उन गांवों का डोर टू डोर सर्वे कराकर उन गांवों में शुद्ध पीने का पानी उपलब्ध कराने हेतु स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रयास किया जा रहा है। इन गांवों  में शीघ्र व दूरगामी दो प्रकार की योजनाएं बनाई जा रही हैं। शीघ्र में उनको तुरंत किस प्रकार से राहत दी जा सकती है उससे संबंधित कार्य किए जा रहे हैं तथा दूरगामी में गांवों का भूजल प्रदूषण मुक्त हो तथा उनकी कृषि मिट्टी जह़र मुक्त हो इसके लिए विभिन्न प्रकार के कार्य किए जा रहे हैं।
* इन नदियों के किनारों पर समय-समय पर वृक्षारोपण का कार्य प्रारम्भ किया गया है।
* इन नदियों का नाले से नदियों बनाने में गांव वासियों से सुझाव लिए जा रहे हैं।
* जल प्रदूषण से प्रभावित गांवों में चिकित्सा कैम्प लगाने का कार्य प्रारम्भ किया गया है।
* जिन गांवों का भूजल अत्यधिक प्रदूषित हो चुका है उनका परीक्षण भी कराए जाने का कार्य प्रारमभ किया गया है।
*इन नदियों के किनारे के गांवों के निजी व सरकारी स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
*स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर इन नदियों के किनारे के गांवों में सरकारी योजनाओं का ठीक प्रकार से संचालन हो; इसके लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
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रमन त्यागी 

निदेशक
नीर फाउंडेशन
प्रथम तल, सम्राट शाॅपिंग माॅल, गढ़ रोड़, मेरठ (उ0 प्र0)
09411676951

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फोटो – वीडियो साभार :  Neer Foundation, Meerut