नारी, यथार्थ ने

भी सोचें, तो पायेंगे कि नारी चाहे, मां हो, बहन, बेटी, प्रेयसी या पत्नी; हर रूप में वह अपने ममत्व का निर्वाह करना कभी नहीं भूलती।

नारी का यह व्यवहार सराहनीय है और आदरणीय भी।

संभवतः हर बरस महिला दिवस ऐसा ही कुछ बताने.. समझाने आता है; फिर भी न मालूम क्यों वह जितना बताता है, हम उतने ही और नीचे गिरते चले जा रहे हैं। 

हम भूलते जा रहे हैं कि नारी वास्तव में प्रकृतिरूपा है। अति होने पर जैसे  प्रकृति पलटवार करने लगी है. ऐसे ही यदि कोई नारी भी कर सकती है।

पुरुष और नारी कुदरत की इंसानी गाङी के दो पहिए हैं।

किसी भी समाज के लिए इससे अधिक शर्मनाक बात क्या हो सकती है कि गाङी के एक पहिए को दूसरे पहिए से खतरा हो जाये; सुरक्षा के लिए अलग से प्रावधान करने पङें; नारे लिखने पङे अथवा बहस चलानी पङे। निर्भया कांड के अपराधी, संसद की बहस, दीमापुर का  आक्रोश, अमेठी के भ्रष्ट विधायक गायत्री प्रजापति का चर्चित कारनामा और आम आदमी पार्टी को दिल्ली मंत्रिमंडल के लिए एक भी योग्य महिला न मिल पाने के रवैये में नारी के प्रति हम पुरुषों की मानसिकता के कई रूप झलकते हैं।

इन्हे झेलते हुए भी अपनी मर्यादा और संस्कारों को सहेजने की कोशिश में जुटी भारतीय नारी के चार  चित्र श्री अरुण तिवारी जी ने सहज ही रच डाले हैं ।

प्रथम चित्र-भारतीय नारी का दर्द,

दूसरा-असीम धैर्य,

तीसरा-जीवन साथी के प्रति भारतीय नारी का समर्पण और

चौथा – कई बेटों की माँ के अकेलेपन  को चित्रित करने का प्रयास है।

इन्हे हम महिला दिवस पर पानी पोस्ट के पाठकों के लिए विशेष तौर पर प्रस्तुत  कर रहे हैं.
कृपया समय और प्रतिक्रिया दें – पानी पोस्ट टीम 
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हा ! ये क्यूं हुआ ?

पहली, जन्म लेने से 
पहले ही मारी गई।
क्या वो बनती अजीजन, दुर्गा या लक्ष्मी
वो तो पूत की आशा पे वारी गई।
दूजी थी अनखिली,
खिलखिलाई नहीं।
वह नाबालिग बही,
सहमति के संबंध 
वे ठहराते सही। 
तीजी की देह 
व्यापार बनकर बिकी, 
वह खेत हो गई,
फिर रेत हो गई।
हा! ये क्यूं हुआ ? सोचो, कैसे हुआ ?

चौथी , जो थी पढी 
कुछ आगे बढी, 
प्रतिद्वंदी समझ वो 
खङा हो गया
फिर नीचे गिरा 
औ गिरता गया।
पांचवीं, तो सुहागन  
बीच आगन मरी, 
छठी के हिस्से में 
सौत आ गई।
हा! ये क्यूं हुआ ? सोचो, कैसे हुआ ?
सातवीं ने जनी जो
संतान नहीं,
निंदकों के दिलों को
वो भा गई।
आठवीं, मां बनकर भी 
निपूती रही।
पूत साथ रहते हुए भी
अनाथ हो गई। 
घर से बाहर परी
मौत आयेगी कब,
ये मनाती हुई। 
हा! ये क्यूं हुआ ? सोचो, कैसे हुआ ?

इक दिन अंधेरा हुआ
शर्म.. बेशर्म सोई
बागवां खूब जगा, 
फिर क्यूं बाग लुटा,
मेङ ही खेत को 
क्या खुद खा गया ?
हा!, ये क्यूं हुआ ?? सोचो, कैसे हुआ ?

कुछ कर न सको गर
जुबां तो ये खोलो
ऐ, मेरे देश बोलो – 2
कब तक सहोगे
ये दर्द-ए-मंजर 
कब तक रहोगे  
दिल मेरे मौन तुम ??
अब न कुछ तुम सहो,
दिल को खोलो.. कहो,
सोचो, कैसे हुआ ? हा! ये क्यूं हुआ ?
..क्योंकि मैं रोई नहीं
स्कूल नया
पोशाक बडी दीदी की
सिलकर साइज मे कसी हुई।
बापू की छुट्टी के इंतजार में
चप्पल रगेदते रहे पैर कई दिन
बस्ता, बक्सा, रिबन, जूता
यहां तक सुपना भी पुराना ही
बेटी पढेगी, आगे बढेगी
पर खुशियां हरदम रहीं नई,
क्योंकि मैं रोई नहीं…गर्मी में सलवार से
हम सीखते थे सलीका
बारिश में घुटने तक
भीग गईं शर्म
एक अदद दुपट्टे को
तरस गये हम
किसी की नही झुकी आंखें
सर्दियां होंठ सीकर
सो गई चुपचाप
उलट गया पन्ना
बीत गया साल
पर खुशियां हरदम रहीं नई
क्योंकि मैं रोई नहीं…..वे खाती रही ब्रैड बटर
लिए रात की रोटी
मैं सकुचाती रही
लौटते घर नाले किनारे
पा गई एक
दुर्गंध वाला सेब
खा बन गई मैं हंस
फिर भुगता पीलिया का दंश
आंखें पड गई पुरानी
पर खुशियां हरदम रहीं नई
क्योंकि मै रोई नहीं…..हाथ में छाले
मुंह पे काई
बापू ढूंढते रहे रिश्ता
रिजेक्ट होती रही फाइल
नुमाइश होती रही
लेकिन
न गल सकी हमारी दाल
किस्सा हो गया पुराना
पर खुशियां हरदम रही नईं
क्योंकि मैं रोई नहीं….
.
भाभी देती रही ताने
उछालती रही रिश्ते
लांछन किसी और का फन था
कुलच्छिनी मैं कहलाई
शर्मसार हुई शर्म
दिन दहाडे किसी ने
शर्म को ही मार दी गोली
दिल्ली हो नई चाहे
यह दिल्लगी तो पुरानी है
लो दिवस महिला ने भी
कर दी तसदीक
पर खुशियां हरदम रहीं नई,
क्योंकि मैं रोई नहीं….

 

…कि जाने कैसी प्रीत लगाई
जर गई बाती,
पथरा गईं अखिंयां,
खुशियां हई पराई।
अबहु न लौटे सजन बावरे
जग में होत हंसाई
कि जाने कैसी प्रीत लगाई…शबनम का लुट गया खजाना,
आती नहीं रुलाई,
गाल गुलाबी पीत हो गये,
बैरन हो गई निंदिया
रही गजल पडी अलसाई
कि जाने कैसी प्रीत..बिछुआ के मन पाप समायो,
खिसक चडा सरकाई
अंखियां मारैं तारे-चंदा
अब मो सो करैं हंसाई
मितवा मैं तो गई सकुचाई
कि जाने कैसी प्रीत….पोर-पोर में बसी सुरतिया
बावरी फिरी पगलाई
बैरी हो गये सभी सहारे
नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे
मैं तो करूं दोहाई
कि जाने कैसी प्रीत..अंग- अंग से जोबन उकसे
और सहा न जाये
मिश्री घुल कर खार हो गई
न है कोई खेवनहार
न लट फिर से लहराई
कि जाने कैसी प्रीत…

 

 

मां, पर पीर तो होती होगी

<गांव की सबसे बङी हवेली
उसमें बैठी मात दुकेली,
दीवारों से बाते करते,
दीवारों से सर टकराना,
दीवारों सा मन हो जाना,
दूर बैंक से पैसा लाना,
नाज पिसाना, सामान मंगाना,
हर छोटे बाहरी काम की खातिर
दूजों से सामने गिङगिङ जाना,
किसी तरह घर आन बचाना,
शूर हो, मज़बूर हो मां, पर पीर तो होती होगी।
 
देर रात तक कूटना-पछोरना,
भोर-सुबेरे बर्तन रगङना,
गोबर उठाना, चारा लगाना,
दुआर सजाना, खेत निराना,
अपनी खातिर खुद ही पकाना,
दर्द मचे, तो खुद ही मिटाना,
थकी देह, पर चलते जाना,
नही सहारा, न ही छुट्टी
मरे हुए सपनों की जद में 
मजदूरी सी करते जाना,
उलटी गिनती गिनते जाना,
हाल पूछो तो ठीक बताना, 
शूर हो, मज़बूर हो मां,पर पीर तो होती होगी।
 
भरी कोख की बनी मालकिन,
बाबूजी का छोङ के जाना,
फिर संतानों का साथ न पाना,
थकी देह पर कहर ढहाना,
झूठे-मूठे प्रेम दिखाना,
सूनी रातें, कैद दिनों में
चौकीदारी सौंप के जाना,
संतानों का कभी तो आना,
कभी बहाना, कभी बहलाना,
मोबाइल से घी पिलाना,
भरे कुनबे का यह अफसाना,
 
शूर हो, मज़बूर हो मां, पर पीर तो होती होगी।
फोटो साभार : Aanand Madhav, Flicker