लेखक: अरुण तिवारी
पिछले 33 वर्षों के दौरान गंगा निर्मलता के सरकारी प्रयासों के हश्र का का निष्कर्ष एक ही है कि ढांचागत व्यवस्था से पहले नीतिगत स्पष्टता करें। अन्यथा समग्र नदी नीति बने बगैर योजना, कार्यक्रम, कानून, ढांचे.. सभी कुछ पहले भी कर्ज बढाने और संघर्ष लाने वाले साबित हुए; आगे भी होंगे। अतः जरूरी है कि सरकार पहले नदी पुनर्जीवन नीति, बांध निर्माण नीति और कचरा प्रबंधन नीति पारित करने संबंधी लंबित मांगों की पूर्ति की स्पष्ट पहल करे, तब ढांचागत व्यवस्था के बारे में सोचे। हां, इतनी सावधानी जरूरी हैं कि ये सभी भारत की राष्ट्रीय जलनीति जैसी कतई न हो। महज् बाजार की हितपूर्ति करने वाली नीति, भारतीय नहीं कही जा सकती। सभी के शुभ को आगे रखकर लाभ कमाना, भारतीयता है और सभी के शुभ को पीछे रखकर अपने लाभ को आगे रखना, लूट का बाजारू व्यवहार। गंगा, भारतीय संस्कृति की महाधारा भी है, अस्मिता का प्रतीक भी और पर्यावरण की माॅनीटर भी। निस्संदेह उसका निर्देश सर्वोपरि होना ही चाहिए। किंतु क्या नई सरकार सचमुच भारतीय आस्था और संस्कृति के गंगा निर्देश को व्यवहार को बदलने की हिम्मत जुटा पाई ?

जल का जीवंत मानने की संस्कृति भारतीय

मैं, यह इसलिए कह रहा हूं चूंकि नदियों को लेकर अब तक का सरकारी वैचारिक रुख भारतीयता के उस उभार से कतई मेल नहीं खाता है, जिसके रथ पर सवार होकर भाजपा केन्द्रीय सत्ता में आई। भारतीय धार्मिक आस्था पानी को आज भी इन्द्र-वरूण आदि के रूप में ही पूज्य और पवित्र ही मानती है। इस आस्था का व्यापक आधार भारत का परंपरागत ज्ञान तंत्र और उसका विज्ञान है। आप भारतीय वेद, पुराण, उपनिषद…कोई भी ग्रंथ उठाकर देख लीजिए इस ज्ञानतंत्र और उसके विज्ञान ने पानी की बूंद, बादल, हिम, हिमनद या किसी अन्य स्वरूप को ‘एच2ओ’ कहकर कभी संबोंधित नहीं किया। क्योंकि वह जानता था कि पानी के जिस स्वरूप को हम देखते हैं, वह सिर्फ ‘एच2ओ’ है ही नहीं। यदि पानी सिर्फ ‘एच2ओ’ होता, तो सिंथेटिक रक्त बना लेने वाला आधुनिक विज्ञान कभी का पानी बना चुका होता। हम हर छोटी-बङी प्रयोगशाला में पानी बनाकर पानी की कमी को धता बता रहे होते। एक जीवंत स्पंद के स्पर्श के बगैर एच2 और ओ आपस में जुङ ही नहीं सकते; ‘एच2ओ’ पानी का दृश्य स्वरूप पा ही नहीं सकता।

इसीलिए फिलहाल आधुनिक विज्ञान ने भी पानी बनाने के मामले में हाथ खङे कर दिए हैं। उसने बता दिया है कि पानी जीवंत है, महज् एक वस्तु नहीं, जिसे निर्मित किया जा सके।

नदियां कुदरती जींवत प्रणाली हैं; इंसान की बनाई निर्जीव सङक नही, जिसे जहां चाहे जोङ लें।

सरकारी रुख विपरीत

किंतु दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी राष्ट्रीय जलनीति पानी को ‘आर्थिक वस्तु’ के रूप में बिक्री हेतु स्थापित करने की जिद्द ठाने बैठी है। नदी जोङ परियोजना, नदी की परिभाषा को नकारने की एक अन्य जिद्द के रूप में आती दिखाई दे रही है। नदी की परिभाषा को नकारकर नदियों में पानी लाया जा सकता है, नदी का चरित्र वापस नहीं लौटाया जा सकता। इस चरित्रहीनता के खतरे जैविक और व्यापक हैं। भारतीय आस्था हमेशा से मानती रही है कि कोई भी नदी सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवंत प्रणाली होती हैं; जैसे हमारा मानव शरीर। नदियों को जीवंत मानने वाली गहरी धार्मिक आस्था को अब आधुनिक विज्ञान ने भी स्वीकार लिया है।

जीवंतता को संवैधानिक दर्जे की दरकार

इसी जीवंतता को आधार बनाकर नदियों को ‘नैचुरल पर्सन’ का सवैंधानिक दर्जा देने की एक शानदार पहल का श्रेय आज विश्व के जिन दो देशों को जाता है, वे हैं- इक्वाडोर और न्यूजीलैंड। …तो क्या अब जिस भारत की आस्था व ज्ञानतंत्र ने आधुनिक विज्ञान से पहले यह बात दुनिया को बताई, वहां नदियों को यह संवैधानिक दर्जा नहीं मिलना चाहिए ? मुझे इस छोटे से सवाल सेे हमारी नदियों की हकदारी हासिल करने की दिशा में एक बङी खिङकी खुलती दिखाई दे रही है। हो सकता है कि कोई यह कहकर इसे बहस का मुददा बना दे कि भारत का जनमानस तो नदियों को मां मानता ही है; संविधान यह मान्यता दे न दे… इससे क्या फर्क पङता है ? गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा देने से क्या फर्क पङ गया, सिवाय इसके कि गंगा के नाम पर कुछ हजार करोङ रुपये और खर्च हो गये ? सचुमच फर्क पङता, यदि मांग के अनुरूप गंगा को ‘राष्ट्रीय नदी’ नहीं, ‘राष्ट्रीय नदी प्रतीक’ का दर्जा दिया गया होता और उसके लिए सम्मान के नियम तय किए गये होते, जैसे कि राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान के लिए हैं; तब गंगा का अपमान करने वाले जाने कितनो पर अब तक राष्ट्रदोह के मुकदमे टांक दिए होते।

बहरहाल, इस मांग में दम है कि भारत में भी नदियों की जीवंतता को संवैधानिक दर्जा मिलना ही चाहिए। कारण कि आज भारत अपने ही परपंरागत ज्ञानतंत्र व आस्था को नकारने पर उतारु हो गया है। नदियों के प्रति हमारी संवेदनायें मरी हंै। नदियों के साथ अच्छे व्यवहार के सामाजिक संस्कार कमजोर हुए है। हम बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से नदियों को शोषित-प्रदूषित करने में जुट गये है। हम कुदरत की इस बेशकीमती नियामत को इसका नैतिक हक देने को तैयार नहीं हैं। ऐसे हालात में अब आगे भारत की नदियों का नैसर्गिक व जीवंत बचे रहना मुश्किल दिखाई देता है। अतः जरूरी हो गया है कि इस मामले में हम संविधान द्वारा निर्देशित किए जायें।
नदियों के मातृत्व को मिले संवैधानिक दर्जा

भारत को चाहिए कि वह इससे भी आगे जाकर नदियों को सिर्फ ‘नैचुरल पर्सन’ नहीं, बल्कि ’नैचुरल मदर’ यानी ’प्राकृतिक मां’ का संवैधानिक दर्जा प्रदान करे। चूंकि भारतीय आस्था में नदियों को सिर्फ एक जीवंत प्रणाली हीे नहीं, बल्कि संतति को जन्म देकर तथा उसे पोषित कर सृष्टि रचना के क्रम को आगे बढाने वाली मां मानती है। यदि हम नाम बदलकर अमानीशाह या नजफगढ नाला बनी दी गई क्रमशः जयपुर की द्रव्यवती व अलवर से बहकर दिल्ली आने वाली साबी जैसी नदियों की बात छोङ दें, तो आज भी भारत में कोई नदी ऐसी नहीं है कि जिसे मां मानकर पूजा या आराधना न की जाती हो। ब्रह्मपुत्र, नद्य के रूप में पूज्य है ही। यह बात और है कि हम भारतीय नदियों को मानते मां है, लेकिन उनका उपयोग मैला ढोने वाली मालगाङी की तरह करते हैं। इसी विरोधाभास के कारण आज नदियां आज संविधान की ओर निहार रही हैं।

शुभ कदम के प्रत्यक्ष लाभ

नदियों को मां का संवैधानिक दर्जा प्राप्त होते ही नदी जीवन समृद्धि के सारे अधिकार स्वतः प्राप्त हो जायेंगे। नदियों से लेने-देने की सीमा स्वतः परिभाषित हो जायेगी। हम कह सकेंगे कि नदी मां से किसी भी संतान को उतना और तब तक ही लेने का हक है, जितना कि एक शिशु को अपनी मां से दूध। दुनिया के किसी भी संविधान की निगाह में मां बिक्री की वस्तु नहीं हैं। अतः यह नदियां को बेचना संविधान का उल्लंघन होगा। अतः नदी भूमि-जल आदि की बिक्री पर कानूनी रोक स्वतः लागू हो जायेगी। मां की कीमत पर कमाई पर रोक होगी। इसके विरोध में रोज-रोज आंदोलन नहीं करने पङेंगे। नदी मां को विष पिलाने वाले उसकी हत्या की कोशिश के दोषी होंगे। उन पर दीवानी नहीं, फौजदारी कानूनों के तहत् हत्या का मुकदमा चलेगा।

अनुभव की मांग भी यही

पिछले 25 वर्षों से नदी संरक्षण को लेकर चल रहे तमाम प्रयासों के आकलन के मददे्नजर निष्कर्ष साफ हैं कि नदियों को लूटकर अपनी तिजोरी भरने वाले एकजुट हैं। वे नदी संरक्षण के नाम पर लिए गये कर्ज में से भी मुनाफा कमाने की जुगत में लगे हैं। भारत में अब तक लागू पीपीपी परियोजनाओं के अनुभव भी लूट से परे नहीं रहे हैं। तय है कि सरकारें लूट से सहमत हैं। इसीलिए वे कैंसर का इलाज उसके स्त्रोत पर करने की बजाय बाहरी लक्ष्णों पर कर रही है। ताकि कैंसर फैलता रहे, नदी प्रदूषण मुक्ति के नाम पर खर्च बढता रहे और नेता, अधिकारी, ठेकेदार व कंपनियों की कमाई भी।

आइये! इस महिला दिवस पर इस मांग को आवाज दें।

नैचुरल मदर’ का संवैधानिक दर्जा देकर भारत की प्रत्येक नदी के जीवन व समृद्धि के अधिकार को वैधानिक बनाया जाये… उन नदियों के भी, जिनका नाम बदलकर हमने नाला बना दिया है।

भारत की नदी-पानी मंत्री सुश्री उमाभारती जी भी विचार करें कि क्या इस नीति और नीयत की पहल का करना अच्छा नहीं होगा ?

फोटो साभार : Cloud mind.info, National Musuem