लेखक: अरुण तिवारी
 
‘गं अव्ययं गम्यति इति गंगा। तुमने ही कहा कि मैं तुम्हे स्वर्ग ले जाने आई थी। मुझे तुम्ही इस धरा पर लाये थे। अब तुम्ही इस गंगा दशहरा पर मुझे मार क्यों नहीं देते ? तुमने मुझे मां से महरी तो बना ही दिया है। कोमा में भी पहुंचा ही दिया है। अब वापस मुझे मेरे लोक भी पहुंचा दो। मुझे स्वर्गवासी बना दो। मुझ गंगा के साथ पापकर्म तो तुम रोज ही करते हो। इस गंगा दशहरा पर एक पुण्य काम ही कर डालो। रोज-रोज की किचकिच से मुझे भी फुर्सत दे दो और खुद भी फुर्सत ले लो। सरकारें भी परेशान रहती है और मेरे लिए प्राण देने को आतुर मेरी कुछ बेसमझ संतानें भी। उन्हे प्राण देने की क्या जरूरत है ? हा! मैं हत्भागिनी तो दूसरों को जीवन देने आई थी। मैं दूसरों के प्राण लेने वाली बन गई। यह पापकर्म मैं अब और नहीं करना चाहती। बस! एक बार प्राण ले लो। एक बार मुक्ति दे दो। फिर मैं पीछे मुङकर भी नहीं देखुंगी। गंगा मर गई, तो कम से कम गंगा की बीमारी से बीमार होकर तुम तो नहीं मरोगे। इसलिए भी मैं मरना चाहती हूं। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। तिल-तिल कर मरने-मारने से तो अच्छा ही है कि आज किस्सा ही खत्म कर डालो एक साथ।
बोलो , करोगे इस गंगा दशहरा पर यह पुण्य कर्म ?”
 
इसे चाहे गंगा की अनुनय-विनय समझें या चीत्कार; आखिर गंगा के पास और चारा ही क्या बचा है सिवाय मर जाने के ? गंगा क्या करे ? गंगा देख रही है हर बरस। कभी कुंभ, कभी माघ मेला, कभी कार्तिक पूर्णिमा, कभी छठ पूजा और कभी गंगा दशहरा। गंगा किनारेे दुनिया का सबसे बङा पानी का मेला लगता है। करोङों दीपदान होते हैं। कोटि-कोटि हाथ… एक नहीं, कई-कई बार गंगा के सामने जुङ जाते हैं। हर हर गंगे ! जय जय मैया !! गाते हैं। लेकिन यही कोटि-कोटि हाथ गंगा के पुनरोद्धार के लिए एक साथ कभी नहीं जुटते। गरीब से गरीब परिवार भी अपनी गाढी कमाई का पैसा खर्च करके गंगा दर्शन के लिए आता है, लेकिन वह गंगा रक्षा के सिद्धांत को कभी याद नहीं करता। गंगा दर्शन को समझने और समझाने एक साथ कभी नहीं बैठता।
 
अजीब बात है कि गंगा को लेकर किसी धर्म, जाति, सम्प्रदाय, जाति या वर्ग में कोई भेद नहीं। कहने को गंगा को सभी मां कहते हैं। नेता, अफसर, भ्रष्ट और सज्जन…. सभी इसके आगे एक साथ मत्था टेकते हैं। बावजूद इसके, सभी के मन में गंगा रक्षा का संकल्प एक साथ कभी नहीं जगता;…. यह प्रश्न कभी नहीं उठता कि मल बन चुका गंगाजल, शिव को अभी ही स्वीकार्य नहीं है; एक दिन जब गंगा ही शव हो जायेगी, तो कहां से लाओगे कांवर ? क्या चढाओगे शिव को ?? गंगा जानती है कि हम कभी सोचते ही नहीं  कि तब कहां लगेगा माघ मेला ? हम कहां मनायेंगे गंगा दशहरा … कहां टेकेंगे माथा ?? मृत्यु पूर्व दो बूंद गंगाजल की अभिलाषा की पूर्ति करने तब हम कहां जायेंगे ??
बनाना तब बिजली, कहां बनाओगे ? लाना फिर गंगाजल, कहां से लाओगे ??? करना अस्थियां प्रवाहित किसी नाले में जाकर !! तुम इसी योग्य हो। 
 
गंगा देख रही है कि जो समाज कभी दूसरों को पानी पिलाकर…. बैसाख-जेठ में प्याऊ लगाकर, नवसम्वत्, गगा दशहरा, बसंतपंचमी और गुरुपर्व पर शरबत बांटकर स्वयं को धन्य मानता था; वही समाज अब पानी व नदी खरीद-बेचकर धन्य हो रहा है। जो समाज कभी गंगा किनारे कुंभ लगाकर गंगा के साथ संस्कार और व्यवहार की मर्यादा तय करता था, वही समाज आज गंगा को अंतिम संस्कार के लिए तैयार कर रहा है। गंगा के किनारे 36 करोङ तीर्थों की परिकल्पना है। गंगा देख रही है कि जिन साधू और संतों को इन तीर्थों में बैठाकर गंगा चौकीदारी का दायित्व सौंपा था, वे ही गंगा से संस्कार की आचार संहिता भूल गये हैं। उनके आश्रमों का कचरा व मल ही गंगा को मलीन करने से नहीं चूक रहा। जब गुरु ही गोरू हो जाये, तो फिर उम्मीद ही कहां बचती है ! 
 
गंगा देख रही है कि जो समाज भगीरथ और भीष्म को याद रखता है, राम और कृष्ण को पूजता है, वही कृष्ण के कहे को भूल गये है – ”स्त्रोतसामस्मि जाह्नवी….” यानी नदियों मे मैं गंगा हूं। वह इस दुर्योग को भी देख रही है कि समाज ने स्वामी दयानंद, कबीरा, रैदास, वाल्मीकि, तुलसी, चाणक्य, आदिगुरु शंकराचार्य, अकबर, बुद्ध, नानक और महावीर को तो याद रखा, लेकिन उनके कहे गंगा वाक्यों को तो वह याद भी नहीं रखना चाहता। उसे न गंगाष्टक याद है, न जगन्नाथ की अमृतलहरी और न यह कि गो, गीता और गायत्री के बाद यदि मुक्ति का यदि कोई चौथा द्वार बचता है, तो वह है – गंगा।
इसीलिए आज गंगा की पुकार है। गंगा की चीत्कार है। गंगा मरना चाहती है।
 
गंगा, सचमुच अब बहुत बेबस है…. बीमार है….लाचार है। उत्तराखण्ड उसके मायके में ही उसका गला घोंट रहा है। गंगा के वेग को थामने वाले वनरूपी शिव केशों को काट रहा है। ”कंकर कंकर में शंकर” रूपी पत्थरों के चुगान और सांस देने वाली रेत के खदान में ही सारा मुनाफा देख रहा है। उत्तर प्रदेश, गंगा के अमृत में विष घोल रहा है। कमेलों के खूनी कचरा बहाकर उसके फेफङे सङा रहा है। गंगा केे शरीर पर ही कब्जा जमा रहा है। उत्तर प्रदेश, गंगा के करोङों जीव और बहमूल्य वनस्पतियों का घोषित हत्यारा है। बिहार, प्रदूषण के अलावा गंगा को किनारों को कटान से क्षत-विक्षत करने का भी दोषी है। झारखण्ड, धरती का अतिशोषण कर आर्सेनिक उपजा रहा है। प. बंगाल ने तो इसका नाम ही मिटा दिया है। इसे गंगा से हुगली बना दिया है। ससुराल सागर में पिया मिलन से पहले ही बैराज लगा दिया है। अब बताओ कि गंगा मरे न तो क्या करे ??
 
….तो आओ, एक बार तो सुन लें गंगा की पुकार। रोज-रोज मारने से तो अच्छा है कि आओ ! आज सब मिलकर मार ही डालें गंगा को एक बार। इसने असंख्य का उद्धार किया है। आइये, खोल दें इसकी मुक्ति के भी द्वार;  होगा गंगा दशहरा कभी गंगा अवतरण तिथि। आइये,  इसे गंगा पुण्य तिथि बना डालें। फिर ठाठ से मनायेंगे इसकी बरसी, हर बरस। तब सरकार भी नवाज ही देगी गंगा को किसी ‘भारतरत्न’ से। हो जायेगी उसके कर्तव्यों की भी इतिश्री। मिट जायेगा झंझट। हो जायेगा काम तमाम। तब खूब गाना-जय श्रीगंगा सहस्त्रनाम !!