डी एन ए विकसित करने की भूमिका में आयें शिक्षक
लेखक: अरुण तिवारी
 
शानदार इमारतें, आधुनिकतम उपकरण, तकनीक, उन्नत किस्में, नस्लें… आज हमारी चाहत का हिस्सा हैं। गारंटीप्रूफ इलाज, ऊंची आय, अधिकतम उत्पादन भी हम चाहते ही हैं। इन्हे बनाने, हासिल करने, चलाने, हासिल तथा प्रबंधन करने वाले हुनरमंदों को तैयार करने का काम निःसंदेह शिक्षकों का है, किंतु क्या उक्त की उपलब्धता को आधार बनाकर किसी राष्ट्र को विकसित कहा जाना चाहिए ? परिदृश्य यह है कि सुविधा-साधनों की उपलब्धता की दृष्टि से जो राष्ट्र जितना अधिक विकसित है, वहां अमीर-ग़रीब के बीच की खाई उतनी अधिक चौड़ी  है। जिस राष्ट्र ने जितनी अधिक सुविधाभोगी जीवन शैली अपनाई हुई है, ग्रीन हाउस प्रभाव वाली गैसों के उत्सर्जन हेतु वह राष्ट्र उतने बड़े दोषी के रूप में चिन्हित हुआ है। ऐसे राष्ट्रों में पर्यावरण, रोज़गार, सेहत के मोर्चे पर उभरती नई चुनौतियां विकास के उनके हासिल पर ही सवालिया निशान लगा रही हैं। चीन में आपदाओं तथा अमेरिका में संकटग्रस्त जलस्त्रोतों की बढ़ती संख्या के साथ-साथ आर्थिक व रोज़गार के मोर्चे पर पेश चुनौतियों के आकलन से इसे समझा जा सकता है। भारत में ही देखें कि जो नगर जितना अधिक विकसित कहा जाता है, उसकी नदी उतनी ही अधिक गंदी है। स्पष्ट है कि विकास तथा किसी राष्ट्र की निर्माण प्रक्रिया को ठीक से समझे बगैर इस कार्य में शिक्षकों की भूमिका को चिन्हित करने में गलती होने की संभावना रहेगी ही। सात दशक पूरे होने के बाद आज़ाद भारत ऐसा न करे; अतः आइये समझें। 
 
क्या हो विकास की अवधारणा ?
 
हक़ीकत यह है कि विकास कभी एकांगी नहीं होता। अच्छा और सच्चा विकास सदैव सर्वग्राह्य, सर्वोदयी और समग्र होता है। आज जब विकास की सारी कवायदें सिर्फ और सिर्फ आर्थिक और भौतिक विकास को हासिल करने के लिए हो रही हैं; ज़रूरी है कि सबसे पहले हम विकास की किसी एक अवधारणा पर एकमत हों। 
 
हुबली-धारवाड़ कर्नाटक के दो नगरों के नाम हैं। इन नगरों का विकास खाका तैयार करते वक्त तत्कालीन स्थानीय उपायुक्त श्री दर्पण जैन ने विकास की जिस अवधारणा को आधार बनाया, मेरी समझ में वह सर्वश्रेष्ठ है। बकौल श्री दर्पण जैन – ”प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति, स्थान, जाति, समुदाय अर्थात संज्ञा व सर्वनाम का डी एन ए होता है। डी एन ए यानी मौलिक गुण, प्रकृति, प्रवृति, कौशल व क्षमता। जिसका विकास करना हो, उसके डी एन ए को उभार दो, सशक्त कर दो…विकसित कर दो; वह संज्ञा-सर्वनाम स्वतः विकसित हो जायेगा।”
 
मेरी राय में विकास चाहे एक शिक्षार्थी का हो या किसी राष्ट्र का, उक्त अवधारणा को आधार बनाना सर्वश्रेष्ठ होगा। 
 
समलक्षी हैं विकास व शिक्षा
 
सच पूछें तो शिक्षण का लक्ष्य भी वही है, जो कि विकास का। ‘एजुकेशन’ शब्द, ‘एजुकेयरे’ नामक जिस मूल शब्द से निकला है, इसका मतलब ही है – ”जिस शिक्षार्थी के भीतर जो सकारात्मक गुण, कौशल, वृति, क्षमता पहले से मौजूद है; उसे उभार देना..सशक्त कर देना।”  इस दृष्टि से देखें तो शिक्षार्थी के भीतर गणित, अर्थशास्त्र, रसायन विज्ञान आदि विषयों को भरते जाना, उसकी ‘क्वालीफिकेशन’ बढ़ाने का काम है, उसे ‘एजुकेटिड’ यानी शिक्षित करने का नहीं। किंतु इस समय का सच यही है कि हमारे शिक्षक और शिक्षालय, शिक्षार्थियों की ‘क्वालीफाइड’ बनाने का काम कर रहे हैं, ‘एजुकेडिट’ नहीं; जबकि कोई भी व्यक्ति अपने सकारात्मक मौलिक गुण, कौशल व वृति में संलग्न करते हुए राष्ट्र के निर्माण व विकास में जितना बेहतर योगदान दे सकता है, उतना किसी अन्य कार्य में रहते हुए नहीं। क्यों ? ….क्योंकि ऐसी संलग्नता से परिपूर्ण काम, हमारे मन व क्षमता के अनकूल काम होता है। इसके प्रति उत्साह और लगन का होना स्वाभाविक है। 
 
भारत की राष्ट्र निर्माण प्रक्रिया व राष्ट्रबोध
 
यदि हम भारत को एक शिक्षार्थी माने, तो जानना चाहिए कि भारत के डी एन ए में वह क्या-क्या है, जिसे उभारने का मतलब होगा, भारत को विकसित करना। भारत का डी एन ए जानने के लिए भारत राष्ट्र की निर्माण प्रक्रिया को जानना होगा। 
 
इतिहास गवाह है कि दुनिया के लगभग सभी राष्ट्रों का निर्माण, कबीला बिरादरियों के इर्द-गिर्द हुआ। भारत निर्माण यात्रा में भी आर्य, शक, हूण, यवन आदि कई कबीलों की हिस्सेदारी रही। भिन्नता यह रही कि पश्चिमी राष्ट्रों की निर्माण प्रक्रिया में शामिल हुए कबीलों में पहचान के आत्मबोध की भावना इतनी प्रबल रही कि राष्ट्र बनने पर उनका कबीलाई आत्मबोध ही राष्ट्रबोध के रूप में स्वीकार लिया गया; भारत में ऐसा नहीं हुआ। भारत के ढाई हज़ार साल के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई एक कबीला बिरादरी, बाकी सभी को खदेड़कर संपूर्ण भारत पर एकाधिकार स्थापित करने में सफल हुई हो। संपूर्ण भारत में एक राष्ट्रीय सत्ता कभी नहीं रही। नगालैण्ड और मिज़ोरम को छोड़ दें, तो भारत में किसी राज्य का गठन कबीलाई पहचान के आधार पर नहीं हुआ। इसका कारण यह है कि भारत में ज्यादातर कबीला बिरादरियां आसपास अथवा साथ-साथ बसीं। इस कारण इनमें सहिष्णुता व एकता का बोध न सिर्फ पैदा हुआ, बल्कि समय के साथ-साथ और प्रगाढ़ होता गया। सहिष्णुता तथा एकता के बोध ने भिन्न कबीलों के बीच विचार, व्यवहार तथा क्षमताओं के आदान-प्रदान की प्रकिया शुरु की। इस प्रक्रिया के कारण भारत में हर इलाके का एक स्थानीय संस्कार बना। स्थानीय संस्कार को बनाये रखते हुए एकता बोध को बनाये रखना ही कालांतर में भारतीय राष्ट्रबोध के रूप में स्थापित तथा समृद्ध हुआ। 
 
राष्ट्रबोध की जरूरत क्यों ?
 
हक़ीकत में भारत के डी एन ए में मौजू़द असल गुण व शक्ति यह राष्ट्रबोध ही है। इसी राष्ट्र बोध के कारण ही अलग-अलग राजतंत्र अथवा गणतंत्र के रूप में रहते हुए भी इन कबीलों ने स्वयं को भारत की राष्ट्रीय अस्मिता से जोडे़ रखा। इसी राष्ट्रबोध के कारण तमाम संस्कृतियों के मिट जाने के बावजूद, भारतीय संस्कृति का वजूद अभी भी बचा हुआ है। तमाम झंझावतों के बावजूद यदि आज भी शांति और प्रेम की हमारी थाती कुछ शेष है, तो इसका कारण ऐसा राष्ट्रबोध ही है। इसी राष्ट्रबोध ने प्रकृति के प्रत्येक जीव के प्रति शोषक की बजाय, पोषक के भाव को कभी भारतीय जीवन शैली के रूप में स्थापित किया। आज भारत की शिक्षण प्रणाली व शिक्षार्थी तमाम जानकारियोें से परिपूर्ण हैं, लेकिन उन्हे उक्त राष्ट्रबोध से परिपूर्ण करने का काम अभी अधूरा अथवा अधकचरा है। इसी अधूरे तथा अधकचरेपन का परिणाम है कि भारत पर सांप्रदायिक वर्गभेद, पर्यावरणीय विध्वंस तथा सामुदायिक टूटन के चित्र लगातार बढ़ रहे हैं। कट्टर हिंदूवाद को राष्ट्रवाद घोषित करने की वर्तमान कोशिशों को मैं भारत के डी एन ए में मौजूद असल राष्ट्रबोध की अनदेखी मानता हूं।
 
शिक्षकों की भूमिका
 
ऐसी स्थिति में भारत के प्रति राष्ट्रबोध का उभार व समृद्धि ही भारत के विकास का बुनियादी काम है। इसमें शिक्षकों की भूमिका इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है, चूंकि इस दायित्व की पूर्ति के लिए एकमात्र उपलब्ध दीर्घकालिक तंत्र हमारे शिक्षालय ही हैं। मेरी राय में यदि हमारे शिक्षक, शिक्षार्थियों में स्थानीय संस्कारों को मज़बूत करने के साथ-साथ भिन्न भाषा-भाषियों, वर्णों, जाितयों, संप्रदायों तथा वर्गों के बीच एकता बोध की समृद्धि संभव कर सकें, तो भारत एक राष्ट्र के रूप में कई ऐसी सीढ़ियां तेजी से चढ़ सकेगा, जिन्हे आर्थिक, भौतिक, राजनैतिक, लोकतांत्रिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विकास के रूप में चिन्हित किया जाता रहा है।
सादगी व स्वावलंबन सिखायें शिक्षक
 
स्वैच्छिक श्रम, कम में कम में जीवन चलाने में गौरव की अनुभूति अर्थात सौंदर्यपूर्ण सादगी और स्वावलंबन की वृति व कौशल को मैं भारत के डी एन ए में मौजूद अन्य गुण व क्षमता के रूप में देखता हूं। इस दृष्टि से भारत के प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास का एक मौलिक पहलू यह भी है कि टैक्स के बदले, सिंचाई, यातायात और सुरक्षा की जिम्मेदारी ही शासन के हिस्से में रही। शेष जिम्मेदारियां, स्थानीय समुदाय स्वयं उठाईं। उन्हे लेकर शासन की भूमिका सिर्फ सहयोगी की रही। हक़ीकत तो यह है कि मौलिक भारत में राष्ट्र भाव की तीव्र इच्छा वाले व्यक्ति, राष्ट्रोन्नति संबंधी कार्य हेतु शासन की प्रतीक्षा कभी नहीं करते थे। कृषि, जंगल, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार आदि जैसे कई कार्यों का प्रबंधन पूरी तरह समुदायों के हाथों में था। इसका लाभ यह हुआ कि भारत के समुदाय, एक उत्कृष्ट लोक विज्ञानी और स्वावलंबी समुदाय के रूप में विकसित हो सके। परिणामस्वरूप, ज्यादातर सामुदायिक ज़रूरतों को लेकर शासन और जनता के बीच टकराव के मौके कम आये; सामुदायिक प्रबंधन व्यवस्थायें, ज्यादा कामयाब व ज्यादा टिकाऊ साबित हुईं। 
 
आज लोग सोचते हैं कि नदी, जंगल, हवा, पानी, अस्पताल, स्कूल, सड़क… सभी कुछ सरकार के हैं। अतः इन्हे ठीक रखने की जिम्मेदारी सरकार की है; वही ठीक रखे। इसे भारत के डी एन ए गुणों में हुई गिरावट न कहें, तो क्या कहें ? इसी गिरावट के चलते भारत आज अपने भीतर नैतिक क्षरण, भ्रष्टाचार व परावलंबन को बढ़ते देखने के लिए विवश है। 
 
स्थानीय सरोकारों से जोड़ें शिक्षक
 
हमारे शिक्षक तथा शिक्षालय चाहें तो भारत को इसकी इस विवशता से मुक्ति दिला सकते हैं, किंतु इसके लिए हमारे शिक्षण के परम्परागत विषय, पाठ्यक्रम, शिक्षकों के चयन तथा शिक्षण के तौर-तरीकों मंे परिवर्तन करना होगा; अपनी निष्ठा और नैतिकता को बेदाग बनाना होगा; शिक्षण कला का विकास एक पेशे के रूप में नहीं, एक राष्ट्रधर्म के रूप में करना होगा। शिक्षार्थियों को अधिक अंक, ऊंची नौकरी और अधिक आय हासिल करने वाली मशीन बनाने की बजाय भारत के राष्ट्रबोध में पगी पीढ़ी के रूप में उभारने का दायित्व निभाना होगा। प्रत्येक शिक्षार्थी की मूल प्रकृति, प्रवृत्ति, गुण, कौशल तथा क्षमता की पहचान कर उसे इस तरह तराशना तथा उभारना होगा कि ताकि वह निजी के साथ-साथ सामुदायिक ज़रूरतों की पूर्ति का सहयोगी बनकर उभरे। शिक्षार्थी तथा शिक्षण प्रक्रिया को शिक्षालय परिसर से बाहर विस्तार देकर ही यह संभव होगा।
  
लोकज्ञान लौटाने की जिम्मेदारी
 
जजमानी प्रथा के कमजोर पड़ने के कारण बिना किसी स्कूल गये पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ने वाली परम्परागत कारीगरी, कला और लोकज्ञान के पहिए अब भारत में भी धीमे पड़ने लगे हैं। कारपोरेट हितों की पूर्ति हेतु भारत की परम्परागत वैद्यकी और देसी जड़ी-बूटी आधारित घरेलु नुस्खे सिखाने वाली प्रक्रिया लगभग नष्ट ही कर दी गई है। देसी बीज, देसी खाद, देसी उपकरण, देसी पद्धतियों, देसी नस्लों तथा सहकारी कृषि को प्रोत्साहित न किए जाने के कारण भारत की कृषि आज लागत की अधिकता, असंतुलन तथा जहरीलेपन का सबब बन गई है। कृषि विज्ञान के विद्यार्थी उन्नत बीज की बाजारू किस्मों की सूक्ष्म संरचना जानते हैं, लेकिन देसी बीजों को सालों-साल संजोकर रखने की कला नहीं जानते। इस सभी ने मिलकर भारत की ग्रामीण व्यवस्था को बाजार द्वारा शोषित होते रहने को मज़बूर कर दिया है। लिहाजा, अब भारत में भी एक ओर ऊंचे पैकेज वाले नौजवान हैं, तो दूसरी ओर लाख-दो लाख के जैसे छोटे कर्ज में फंसकर आत्महत्या करने वाले किसान भी है। 
 
यदि शिक्षक, अपनी शिक्षण प्रणाली व भाव को ऐसा रख सकें; ताकि शिक्षार्थी अपने शिक्षण काल में ही स्वयं के गुण-कौशल को स्थानीय सरोकार से जोड़कर विकसित करने में लग जायें, तो समाज में शिक्षक पुनः एक सम्मानित उद्धारक के रूप में प्रतिष्ठित में हो जायेंगे। इससे जहां एक ओर न सिर्फ बेरोज़गारी और पलायन पर लगाम लगेगी, समुदायों का परावलंबन घटेगा, उच्च कोटि शिक्षण में आ रही अड़चनें स्वतः दूर हो जायेंगी। 
 
कहना न होगा कि श्रम, स्वदेशी, स्वावलंबन, स्थानीय सरोकार, एकता, नैतिकता से पगा राष्ट्र बोध भारत का एक ज़रूरी सुरक्षा कवच है, जिसे मज़बूत कराने में बुनियादी भूमिका तो शिक्षक जन की रहने वाली है। यह एक चुनौती भी है और संभावना भी। क्या राष्ट्रप्रेमी होने का दावा करने वाले भारतीय शिक्षक और शिक्षालय इसे स्वीकारेंगे ?