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जलतरंग

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कोयला ढोर

लेखक: अरुण तिवारी एक दिन मेरे गांव   पाकुङ में भी आया विकास साथ लाया एक लंबी काली-सर्पीली सङक खास, जो बांट गई पानी पाट गई पोखर लील गई खेत बना गई हमें कामचोर। फिर आये कतार दर कतार ट्रक ही ट्रक  सिखा गये बेईमानी बना गये  कोयला ढोर। अब हर रोज…

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मां भारती का जलगान

लेखक: अरुण तिवारी जयति जय जय जल की जय होजल ही जीवन प्राण है।यह देश भारत….सागर से उठा तो मेघ घनाहिमनद से चला नदि प्रवाह।फिर बूंद झरी, हर पात भरीसब संजो रहे मोती – मोती।।है लगे हजारों हाथ,यह देश भारत…..कहीं नौळा है, कहीं धौरा हैकहीं जाबो कूळम आपतानी।कहीं बंधा पोखर…

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