नदी गीत – मन मत करना अब तू मनमानी…

अरुण तिवारी

नदियां इस धरती की नस हैं,
इनमे बहते पंचम रस हैं।

नदी किनारे, फिर भी प्यासे,
वे असभ्य बड़े अभागे होंगे,

निज लालच में आगे होंगे,
कर्तव्यों से भागे होंगे।

या तो अमृत में विष छोड़ा होगा,
बारिश से मुख मोड़ा होगा,
नदी से नाता तोड़ा होगा,
या फिर राह कुचाली रोड़ा होगा।
कुछ तो की होगी मनमानी, मात बनी गर् काला पानी…

नदियां हरी चूनड़ की बेटी,
झरनों संग उगती-इठलाती।

जिस घाटी से नदिया रूठे,
वह घाटी बड़ी अभागिन होगी,

जटाजूट को काटा होगा,
खुद को कभी न जोता होगा।

या तो हिम को छेड़ा होगा,
विस्फोटों से तोड़ा होगा,
या नदी पेट में मलवा बस्ती,
बिना हटाये छोड़ा होगा।
कुछ तो की होगी मनमानी, मात बनी गर् काला पानी…

हम सब नदियों की संतानें,
मां पाले पोसे लोरी गाये।

जिनके घर मां खुद उजाड़े,
वे पुतले बड़े अभागे होंगे।

बेईमान मन में बैठा होगा,
नहीं नींद से जागे होंगे।

या तो सीने को रौंदा होगा,
भाले-बल्लम गाड़े होंगे,
या माता को खोद-खोद
खुद ही पैर कुल्हाड़ी होंगे।
कुछ तो की होगी मनमानी, मात बनी गर् काला पानी…

भाग्यशाली वे रेती होतीं,
जिनको थपती देकर नदिया सेतीं।

जिनको नदी नहीं नहलाये,
वे खेत बड़े अभागे होंगे,

कुछ ज्यादा सिर पर बैठे होंगे,
दूर कहीं पर ऐंठे होंगे।

कुछ ख्यालों ने टोका होगा,
बंध बांधकर रोका होगा,
या फिर नदिया को खींच-खींच,
हमने खुद को ज्यादा सींचा होगा.
कुछ तो की होगी मनमानी, मात बनी गर् काला पानी…

नदी-जीव का गहरा रिश्ता,
नदी बहेगी, जीव बसेगा।

जन्म नहीं है, मृत्यु नहीं है,
सागर नदी का अपना घर है,

बादल बनकर व्योम सजाती,
बूंद-बूंद गर्भ बीच समाती,
भरे पेट फिर बाहर आती।

प्रलय में भी जीवन लय है,
नवजीवन सा कर जाती है,
शुद्ध भाव को भर जाती है,
गागर-गागर घर जाती है,
क्रांति हरित रंग कर जाती है।
शोषण नहीं, पोषण का रिश्ता, मन मत करना अब तू मनमानी…

संपर्क : amethiarun@gmail.com
9868793799

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