नदी गीत – बोल, पैर कुल्हाड़ी फिर क्या होगा ?

अरुण तिवारी

🍁

शिव हैं औघड़, हिम राजा है,
पर इनका गहरा नाता है।
पार्वती को प्रिया बनाया,
गंगा को सिर पर बैठाया।
बड़ी मिन्नतें की भागीरथ ने,
तब इक धारा को धरा पे वारा।

तू इतनी बात समझ न पाया,
गंगा के सिर पे जा बैठा।

बोल नमामि, काम नुकसानी,
झूठ ढोल का फूट रहा है।
डोल गया जो शिव का मस्तक,
बोल पहाड़ी, फिर क्या होगा ?

डैम नहीं, ये डैमफूल है,
ऑल वेदर रोड की दादागिरी,
नदी में मलवा, पेड़ कुल्हाड़ा,
बना बगड़ में कोठी मूरख,
रिवर व्यिू के चक्कर में
पैर तले तू रगड़ जाएगा।
तू इतनी बात समझ न पाया,
बोल रे भोगी, फिर क्या होगा ?

🍁

यमुना है सूरज की बेटी,
खुद यमराज है इसका भाई।
लिए हुए सबका बहीखाता,
प्राण लेने को घूम रहा है।
देह कालिया डाले विष जब,
कान्हा फन को रौंद रहा है।

तू इतनी बात समझ न पाया,
विष अमृत में झोंक रहा है।

हाकिम नीचे, रुपया ऊपर,
सच बताना, कितने में ली ठेकेदारी ?
निकल पड़ा जो चक्र सुदर्शन,
बोल री राधा, फिर क्या होगा ?

लखवार-ब्यासी गला लंगोटी,
नहर-फैक्ट्री खींचें-सींचे।
खाली शीशी-काली शीशी,
दिल्ली ने तो नाक कटा दी।
बीमारों की लाइन लगी है,
चम्बल कितना अमृत घोले।
तू इतनी बात समझ न पाया,
बोल रे रोगी, फिर क्या होगा ?

🍁

शिव का सत्, मैखल की जाई,
नाम नर्मदा हठी बहुत है।
भद्र शोण भी करे जो धोखा,
मुँह मोड़ चल पड़ती उल्टा।
रहे कुँआरी चाहे जीवन भर,
न देती फिर कोई मौका।

तू इतनी बात समझ न पाया,
जब तक रेवा, तब तक मेवा,

वर्ना गर्त जवानी गई किसानी।
तू जोड़-तोड़ चाहे जितना कर ले,
फिर न लौटेगी तेरी रवानी,
बोल रे भेड़ा, फिर क्या होगा ?

कचरा, कब्जा, बंधन, शोषण,
जड़ से उखड़े, धड़ से उखड़े।
महीसर मरती, मरे पुजारी,
कचरा, कब्जा, बंधन, शोषण।
हर नदिया की यही कहानी,
करो घोटाला, दम घोटेगी।
तू इतनी बात समझ न पाया,
बोल पैर कुल्हाड़ी, फिर क्या होगा ?

परशु के फरसे से जन्मा नद लोहित,
ब्रह्म अमोघा पुत्र बड़ा नदराज कहाता,
त्रिदेशों का मेल कराता महाबाहु यह।
इसको कोई क्या मारेगा,
जिसके पग के आगे चट्टानें हट जाती हैं,
तंत्र योगिनी-मात कामख्या रक्षक जिसके।

तू इतनी बात समझ न पाया,
तूने इसको भी न छोड़ा।

फर्राटे की खातिर बांधा,
चीन खड़ा उद्गम पर छाती कूट रहा है।
एक दिवस डोलेगी धरती,
बोल माँ काली, फिर क्या होगा ?

कितना बोला, कितना ठेला,
तीरथ, तर्पण, स्नान हैं नदियां,
पर तुझको तो पैसे का लासा।
इक दिन बांझ बखरियां ढह जायेंगी,
ठूंठ लकड़ियां रह जायेंगी,
लय-प्रलय सब कर जायेंगी।

तू इतनी बात समझ न पाया.
अरुण तिवारी, फिर क्या होगा ?


रचनाकार संपर्क
amethiarun@gmail.com {9868793799}

One thought on “नदी गीत – बोल, पैर कुल्हाड़ी फिर क्या होगा ?”
  1. कितना बोला, कितना ठेला,
    तीरथ, तर्पण, स्नान हैं नदियां,
    पर तुझको तो पैसे का लासा।
    इक दिन बांझ बखरियां ढह जायेंगी,
    ठूंठ लकड़ियां रह जायेंगी,……
    सुंदर रचना

Leave a Comment