एक गीत, गंगा- यमुना जी को ‘जीवित माँ ‘ का कानूनी दर्जा
मांग से प्रेरित होकर लेखक श्री अरुण तिवारी द्वारा रच गया एक गीत.
निवेदन है कि कृपया पढ़ने का समय निकालें; तत्पश्चात उचित पायें तो नदी प्रेमियों में साझा करें और अपने दृष्टिकोण से अवगत करायें
पानी पोस्ट टीम
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तुम लिखो या न लिखो,
मैं खुद लिखूँगी कैफ़ियत जिंदा कि मुर्दा..
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पूजते थे कह मात देवी,
क्या खूब दिन थे !
पाक दरिया, पुष्प पूजा,
एक दीपक, नेक वन्दन,
स्नान उत्सव और मेला.
वो और थे कोई समझते नाद स्वर जो,
रहने दो, न कहो माता मुझे तुम,
मैं महरी हूं महरी सही, हटो तुम,
छोड़ दो मेरा किनारा, लहर आँचल.
राह रोको मत, जरा मैं साँस ले लूँ , फिर लिखूँगी कैफ़ियत ज़िंदा कि मुर्दा,
मात, देवी या कि महरी, क्या हैसियत मेरी जहाँ में…
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तोड़ डालूँ बांध-बंधन गले फंदा,
धो डालूँ कालिमा जो तुमने डाली,
खेल लूँ दोस्त अपनी मछलियों से,
कंकरों में छाप शंकर चमक रेती,
कृष्णा बन कान्हा को फिर शीश धारूं,
बन त्रिवेणी जगत का संगम बनूँ मैं,
दरख्त बयारों से दियारों तक दिखूँ मैं,
औ समंदर पिया से दो बात कर लूं.
कास की कलमें बनाकर
रौनकें फिर रचेंगी नित दास्तानें.
फिर तुम लिखो या न लिखो, मैं खुद लिखूंगी कैफ़ियत ज़िंदा कि मुर्दा
मात, देवी या कि महरी क्या हैसियत मेरी जहाँ में….
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तुम रहो ज़िन्दा है ज़रूरी
ज़िन्दगी इसीलिये मेरी,
मान जाना तब फिर आना
ठाठ से तुम घाट पर सजना-सजाना, खेलना कुछ रूठना मुझको मनाना,
आंचलों की छांव में बैठना,
मैं सुनूँगी मीत संग कुछ गीत गाना.
आटे की गोलियों में सान मन तुम,
मछलियों से सीखना प्रीत से
लहर के विपरीत चलना औ चलाना,
तंग रहना, फिर भी कैसे संग रहना.
फिर तुम लिखो या न लिखो, मैं खुद लिखूँगी कैफ़ियत ज़िंदा कि मुर्दा
मात, देवी या कि महरी क्या हैसियत मेरी जहां…
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रचनाकार सम्पर्क 🙏 अरुण तिवारी
amethiarun@gmail.com
9868793799
सन्दर्भ निवेदन
गंगा- यमुना जैसी नदियों को ‘जीवित माँ’ के क़ानूनी दर्जा देना ज़रूरी : क्यों और कैसे ?

आदरणीय मित्रों,
अभिवादन ।
हम भारतीय, गंगा जी को ‘माँ गंगा’ कहकर पुकारते हैं। यह केवल एक भावनात्मक संबोधन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था और जीवन्तता का आधारभूत प्रतीक है। किंतु क्या हम संतानें आज गंगा जी को माँ सरीखा सम्मान व सेवा प्रदान कर रहे हैं ?
नहीं।
हमारे ही द्वारा किए प्रदूषण, खनन, अतिक्रमण और अवैध निर्माण ने गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों को गंभीर संकट में डाल दिया है। अतः अब समय आ गया है कि हम केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि नदियों की जीवन्तता और मातृत्व को ठोस क़ानूनी आधार देकर अपनी नदियों की और उनके जरिए अपने अस्तित्व की रक्षा करें।
इसके लिए ज़रूरी है कि पहले हम समझें कि किसी नदी को ‘एक जीवित इकाई’ कहने का क़ानूनी मायने क्या है ?
जब किसी नदी को एक जीवित इकाई (Living Entity) का दर्जा दिया जाता है तो वह केवल ‘संपत्ति’ अथवा ‘प्राकृतिक संसाधन’ नहीं रहती, बल्कि उस नदी को एक व्यक्ति (Juristic Person) के रूप में क़ानूनी मान्यता प्राप्त हो जाती है।
इस मान्यता के हासिल होते ही नदी शब्द की उत्पत्ति, परिभाषा तथा उस नदी विशेष के नाम, स्थान, मौलिक गुण व मूल स्वरूप के अनुसार नदी विशेष के प्राकृतिक कर्तव्य व अधिकार कानूनी तौर पर भी निर्धारित हो जाते हैं। यह दर्जा कुछ-कुछ उसी प्रकार का है जैसे कि किसी कंपनी, नगरपालिका, ट्रस्ट अथवा मंदिर की मूर्ति को कानून में व्यक्ति के रूप में प्राप्त होता है ।

नदियों को कानूनी दर्जे का वैश्विक संदर्भ
न्यूजीलैंड की वांगानुई नदी : एक आदर्श उदाहरण
न्यूजीलैंड की वांगानुई नदी आदिवासी माओरी समाज के लिए माँ के समान है। 170 वर्षों के लगातार संघर्ष के बाद, वर्ष-2017 में वहाँ की संसद ने इस नदी को कानूनी दर्जा प्रदान किया।
दर्जे के अंतर्गत किए गए खास प्रावधान :
1. नदी को Te Awa Tupua Act के तहत एक जीवित इकाई घोषित किया गया।
2. Te Pou Tupua नामक निकाय बनाया गया । नदी की ओर से निर्णय लेने के लिए इस निकाय में दो संरक्षक बनाये गए : एक – सरकारी और एक – माओरी समुदाय का सदस्य ।
3. नदी की दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए लगभग 80 मिलियन डॉलर का कोष स्थापित किया गया।
4. किसी भी खनन, बांध निर्माण या टनल परियोजना से पहले नदी के अधिकारों का ध्यान रखना अनिवार्य कर दिया गया।
5. अदालतें अब नदी को नुकसान को किसी “संपत्ति” का नुकसान नहीं, बल्कि किसी जीवित इकाई का नुकसान मानती हैं।
वांगानुई का यह मॉडल दिखाता है कि नदी को व्यक्ति का दर्जा दिया जाना, समाज व सरकार.. दोनों उसके प्रति जवाबदेह बनाता है।

खुशी की बात है कि सिर्फ वांगानुई नहीं, अब तक कई देशों ने अपनी नदियों और जलस्रोतों को जीवित इकाई का क़ानूनी दर्जा देने की जिम्मेदारी निभाई है :
*कोलंबिया की अत्रातो नदी (2016) और अमेज़न पारिस्थितिकी तंत्र (2018) को कानूनी अधिकार मिले।
*बांग्लादेश में 2019 में तुराग नदी और उसके साथ सभी नदियों को यह दर्जा दिया गया।
*कनाडा की मैग्पी नदी (2021) और अमेरिका की क्लैमथ नदी (स्थानीय आदिवासी कानून के तहत) को मान्यता मिली।
* हाल ही में इंग्लैंड में रिवर टेस्ट (2025) को प्रदूषण से बचाने के लिए यह दर्जा दिया गया।

नदियों को जीवित इकाई का क़ानूनी दर्जा और भारत
सुखद है कि अपनी नदियों को सदियों से मां मानने वाले हमारे देश भारत की एक प्रांतीय अदालत ने भी इस दिशा में एक अच्छा फैसला दिया.
वर्ष – 2017 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना नदियों को क़ानूनी तौर पर जीवित इकाई घोषित किया। अदालत ने कहा कि ये नदियाँ हमारे लिए माँ के समान हैं और इन्हें व्यक्ति का दर्जा मिलना चाहिए। लेकिन दुःखद यह हुआ कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस आदेश पर रोक लगा दी।
आप पूछ सकते हैं कि यदि यह दर्जा प्रभावी ढंग से लागू कर दिया जाये तो क्या लाभ होगा।

‘जीवित इकाई’ का कानूनी दर्जा मिलने के क्या-क्या लाभ ?
1. न्यायिक अधिकार : गंगा–यमुना को स्वतन्त्र पक्षकार के रूप में सुना जा सकेगा।
2. जल संरक्षण का जनाधिकार : इनके अभिभावक प्रतिनिधि ( Guardians ) इनकी ओर से मुक़दमे दायर कर सकेंगे।
3. जीवन जीने का अधिकार : नदी को हानि पहुँचना, एक जीवित इंसान को हानि पहुंचाना मानकर क्रिमिनल कानूनों के तहत विचारणीय एवं दण्डनीय अपराध होगा।
4. अनियन्त्रित को नियंत्रित करने का अधिकार : अवैध खनन, प्रदूषण, अतिक्रमण और धारा को अवरुद्ध करने वाले अनियंत्रित निर्माण पर तुरंत रोक लगाई जा सकेगी और हुई क्षति की पूर्ति भी हासिल की जा सकेगी। चूंकि तब सरकार और उद्योगों को किसी भी विकास योजना में नदियों से अर्थात उनके अभिभावक प्रतिनिधियों से स्वीकृति लेनी आवश्यक होगी। अतः सम्बन्धित विभागों/ संस्थाओं को निर्णय लेते वक्त स्वयं भी इसका ध्यान रखना आवश्यक हो जाएगा।
5. सांस्कृतिक अधिकार : गंगा और यमुना केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व और संविधान से जुड़ी सांस्कृतिक प्राधिकारी हो जायेंगी l

* उक्त कानूनी दर्जे से हमारी नदियों अन्य क्या-क्या लाभ / क़ानूनी अधिकार प्राप्त हों जायेंगे ?
* हमें अपनी नदियों के लिए सिर्फ ‘ एक जीवित इकाई’, ‘जीवित इकाइयों के समुच्चय’, ‘एक जीवित इंसान’ के रूप क़ानूनी दर्जे की मांग को आगे बढ़ाना चाहिए अथवा ‘जीवित माँ ‘ के रूप में क़ानूनी दर्जे की ?
* इस कानूनी दर्जे को फिलहाल माँ गंगा-यमुना जी हेतु लागू करने का भारतीय मॉडल क्या होना चाहिए ?
* क्या हम प्रस्ताव दें कि इसके लिए एक ऐसी स्वतंत्र ‘नदी न्यायाधिकर परिषद’ बनाई जाए; जिसके अधिकार प्राप्त सदस्यों में बहुमत संख्या न्यायपालिका, वैज्ञानिक, पर्यावरणविद और समाज के प्रतिनिधियों की हो ?
* क्या हम भारत की संसद से माँ गंगा–यमुना हितैषी एक ऐसे ‘गंगा- यमुना जीवनाधिकार विधेयक’ को पारित कराने की अपील करें, जो कि माँ गंगा-यमुना को इनके प्रकृति प्रदात कर्तव्यों एवं अधिकारों की पूर्ति तथा माता के रूप में प्राप्त लोकास्था को सुनिश्चित करने में पूरी स्पष्टता के साथ सक्षम हो ?
• क्या हम मांग करें कि गंगा- यमुना पुनर्जीवन हेतु कानूनी अनुशासन प्राप्त विशेष कोष बने, जिसमें प्रदूषकों से वसूले गए जुर्माने और उद्योगों से हासिल पर्यावरण शुल्क जमा हो ?
* कानूनी दर्जे को प्रभावी ढंग से लागू कराने हेतु स्थानीय स्तर पर जन निगरानी तंत्र विकसित और सक्रिय करना ज़रूरी होगा। इस दृष्टि से क्या ‘हम सुनिश्चित कर्तव्य एवं अधिकार प्राप्त ‘नदी पंचायतों’ के व्यापक स्तर पर गठन की मांग करें ?

हम गंगा प्रेमी समझते हैं कि आज जब पूरी दुनिया नदियों के अधिकारों को मान्यता देने की ज़रूरत महसूस कर रही है तो भारत तो नदियों को माँ मानने वाला देश है; गंगा और यमुना का जीवन क्षीण होने से भारत के आधे से ज्यादा भू-भाग में बसर कर रहे सिर्फ इंसान नहीं, खरबों अन्य प्राणियों के जीवन जीने के आशा क्षीण हो जायेगी। निरंतर दुरूह होती स्थिति हमें बाध्य कर रही है कि हम एकजुट हों और गंगा-यमुना सरीखी अपनी माताओं को इनका हक़ सुनिश्चित कराने में लग जायें: यह हमारा नैतिक व सांस्कृतिक दायित्व भी है और संवैधानिक भी। इसी से हमारी नदियां समृद्ध होंगी और हम भी। भारत की उस गुरु परंपरा की पुनर्स्थापना भी जवाबदारी से हकदारी के इसी रास्ते पर चलकर हासिल होगी, जो कि सदियों से दुनिया को अहिंसा और सत्य का मार्ग दिखाती रही है।
ऐसे संकल्प और जिज्ञासा प्रश्नों पर मन्थन और आगे की रणनीति तय करने के लिए एक परिचर्चा आयोजित की गई।
2. एक पुराना लेख
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