एक ग़ज़ल, हमारी नदियां और तहज़ीबें

शायर : अरुण तिवारी

कौन कहता है कि नदियों में पानी बहा करता है,
मां जना इतना भी नहीं जानता कि
जहां ममता की लहरें उठती हैं,
वहां सीने में पानी नहीं, सिर्फ दूध रहा करता है।

तहज़ीबें यह सच न मानने की मनमर्जी अक्सर किया करती हैं।
अरुण, यह बात तू जितना जल्दी समझ ले उतना ठीक,
वरना् इस दुनिया में तो मिल्कियत सिर्फ कुदरत की ही चला करती है।

2
तुम अच्छे हो कि गन्दे,
नदियां तो आइना होती हैं तहज़ीब का।
संतानें बेवफ़ा हो सकती हैं मगर
मां की छातियां सूख भी जायें तो भी भीतर ही भीतर बहा करती हैं।
तहज़ीबें यह सच न मानने की मनमर्जी अक्सर किया करती हैं…

3
तुम्हारी
तहज़ीबें होती होंगी ज़िदा या कि मुर्दा,
नदियां लाश हों तो भी किसी के कंधे पे कहां चला करती हैं।
किसी मां की ज़िंदादिली
भी क्या कभी मरती है भला,
अरे साहब, नदियां तो श्मशानों में भी जिंदा बहा करती है।
तहज़ीबें यह सच न मानने की मनमर्जी अक्सर किया करती हैं…

4
कहते हैं कि नदियों का भी जन्म, जवानी और बुजुर्गी होती है,
नदियां भी सोती हैं, जागती हैं, नहाती, धोती, दुःखी औ खुश होती है।
अरुण होगा तू हाकिम या कि धन्नासेठ कोई, दखल पसन्द नहीं इनकी रवानी को,
क्योंकि इनमें जिं़दा तेरी ज़िन्दगानी होती है।
तहज़ीबें यह सच न मानने की मनमर्जी अक्सर किया करती हैं…

5
जिसके किनारों ने कभी पनाह दी थी तेरे काफ़िले को,
कमबख्त, तूने आज गंगा जी के मैके पे चढ़ाई की है !
तूने बनाई होंगी इमारतें बहुत नायाब मेरे सीने पे,
कुदरत ने ऐसी बेवकूफियां न मालूम कितनी ढहाई हैं।
तहज़ीबें यह सच न मानने की मनमर्जी अक्सर किया करती हैं…

6
सुना है कि उन्हे बहुत गुरूर है अपने मुकाम पर,
हिमालय ने फिर दी है आवाज़, सुन,
तेरी खैरात नहीं, नदियां बाहुबली हैं; बाजुओं के दम पे जिया करती हैं।
जिस मिट्टी को कोई नहीं देता मुकाम, नदियां उसे मुकाम दिया करती हैं।
तहज़ीबें यह सच न मानने की मनमर्जी अक्सर किया करती हैं…

7
बड़ा मशहूर है यह जुमला खैरख्वाहों में कि
नदियां अपनी खोई ज़मीन खोजने के लिए पटवारी नहीं बुलाती।
यूं नहीं सूखती-बिफरती कोई नदी बेमौसम,
उससे पहले हमारी आंखों का पानी सूख जाता है।
तहज़ीबें यह सच न मानने की मनमर्जी अक्सर किया करती हैं…

8
नदियों की तो आदत होती है आज़ाद बहने की,
रेत, गाद, कंकर और सहचरों के साथ रहने की।
लहरों पर पहरों की उम्र पहर-दोपहर बस,
फिर तू चाहे न चाहे, पहरेदार भी साथ बहा करते हैं।
तहज़ीबें यह सच न मानने की मनमर्जी अक्सर किया करती हैं…

9
अनुपम कहते थे तेरा कैलेण्डर दस-बीस-पचास हज़ार साल का बस,
अरुण, हमारी क्या औकात कि नदियों की किस्मत लिख दें,
तू अपनी आज की तारीख में जो मन भर की कर सकता है कर,
कुदरत में तारीखें नहीं होती गाफिल, तवारीख और पैगाम होते हैं।
तहज़ीबें यह सच न मानने की मनमर्जी अक्सर किया करती हैं…

10
आब आने के लिए नहरें, जाने के लिए नाले तेरी कारीगरी हैं ठीक,
कुओं, कुण्डों, झीलों, तालाबों, नलों पर भी चल सकती है तेरी मर्जी,
मगर न तू मालिक है न मैनेजर नदियों का,
नदियां तो कुदरत की नियामतें हैं, ज़माने को मिली हैं किसी मकसद से भीख।
तहज़ीबें यह सच न मानने की मनमर्जी अक्सर किया करती हैं…

11
नदियों से सीखना हो तो बहना सीख,
पहाड़ों में गुनगुनाना, मैदानों में विस्तार और समन्दर में सुस्ताना सीख।
क़यामत कल भी आई थी, क़यामत कल भी आएगी,
अरुण, तू जब तलक है, सुकून दे, सुकून से रहना सीख।
तहज़ीबें यह सच न मानने की मनमर्जी अक्सर किया करती हैं…

12
यूं ही नहीं लिख पाता ज़माना कोई अफ़साना यारो,
शहादत पर सैल्यूट देने की आखिर कोई तो वजह होगी।
जब आब के अनेक सितारे मिलते हैं गंगा में,
तब बनता है किसी सागर पे मुकद्दस धाम प्यारो।
तहज़ीबें यह सच न मानने की मनमर्जी अक्सर किया करती हैं…

संपर्क : amethiarun@gmail.com (9868793799)

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